मंगलवार, 28 जनवरी 2014

जीने की कोशिश जारी है............चंद्रसेन विराट

प्रिय किसको भुजपाश नहीं है
इसकी किसे तलाश नहीं है।

जीने की कोशिश जारी है
जीने का अवकाश नहीं है।

अनगढ़ता-सौंदर्य मूर्ति की
तीखी तेज तराश नहीं है।

बँट तो चुकी धरा यह पूरी
बँटा अभी आकाश नहीं है।

फूल नुमाइश में सब शहरी
इनमें ग्राम्य पलाश नहीं है।

चौंके सारे मित्र आधुनिक
मेरे घर में ताश नहीं है।

मेरा कत्ल हुआ, मिल पाई
लेकिन मेरी लाश नहीं है।

सृजन नहीं है किस विनाश का
किस निर्मिति का नाश नहीं है।

जला रही वह आग कि जिसमें
लपटें मगर प्रकाश नहीं है।

वह भी क्या उपलब्धि कि कोई
कहने को शाबाश नहीं है।

इतना मानव-पतन किंतु कवि
दुःखी जरूर, हताश नहीं है।

-चंद्रसेन विराट 

सोमवार, 27 जनवरी 2014

हमारे शहर में अफ़सर नयी जो आई है..............सचिन अग्रवाल 'तन्हा'



हवा जो नर्म है ,साज़िश ये आसमान की है
वो जानता है परिंदे को ज़िद उड़ान की है

मेरा वजूद ही करता है मुझसे ग़द्दारी
नहीं तो उठने की औकात किस ज़ुबान की है

हमारे शहर में अफ़सर नयी जो आई है
सुना है मैंने, वो बेटी किसी किसान की है

अभी भी वक़्त है मिल बैठकर ही सुलझालो
अभी तो बात फ़क़त घर के दरमियान की है

जवान जिस्म से बोले बुलंदियों के नशे
रहे ख़याल की आगे सड़क ढलान की है

तेरी वफ़ा पे मुझे शक है कब मेरे भाई
मिला है मौके से जो बात उस निशान की है

ये मीठा नर्म सा लहजा ही सिर्फ उसका है
अदब से झुकने की तहज़ीब खानदान की है

सचिन अग्रवाल 'तन्हा'

पता नहीं तुम क्या सोचोगे" .............उत्पल कान्त मिश्र



"आसमान में देखा है
वो कमर" ................... !!

"हुं" ..................... !!

"कितना भोला दिखता है न
श्वेत, सुन्दर, शीतल" ........... !!

"हुं" ..................... !!

"इसके आते ही क्यूँ
मन में वेग होता है" ................ !!

"उन्न" .............. !!

"ये पूरा होता है तो
क्यों मुझमें उन्माद आता है" ............ !!

"क्या कहते हो
तुमको भी
मैं तो चुप ही थी
पता नहीं तुम क्या सोचोगे" ................ !!

"कहती तो, कभी अपनें मन की बात
क्यों न बनती हो तुम, मरासिम" ................ !!

"मैं, मरासिम".................... ??

"हाँ ! मरासिम !
श्वेत, सुन्दर, शीतल" ................ !!

"ओफ, ओ "...............!!

"अंतर है थोड़ा सा बस
आसमान के और मेरे मरासिम में " ............ !!

"हुं, हुं " ....................... !!

"तुम्हारी धवल चाँदनी में
मन रुकता है, उद्वेग थमता है" .............. !!

"बाप रे" ....................... !!

"वो देखो, इस नदी की लहरों को
कल - कल, कुल - कुल कर बलखाती
तुमको ही तो देख रही हैं" ........................... !!

"......................."

"मैं हूँ, नदी है, तुम हो:
और है दूर, वो सुनहरा चाँद
कितना शांत है सब
शीतल ! निर्मल ! तुम से ..................... !!

"चलो ना, अब चलते हैं
अन्धेरा भी आ गया है
नरभक्षी अब निकलेंगे
हम कैसे पहचानेंगे
आदमी की खाल पहन
हमसे, तुमसे ही दिखते हैं
चलो ना, अब चलते हैं" ......... !!

"ह्म्म्मम्म
काश ! होती धवल चाँदनी
इस धरती पर, तुमसी
मरासिम" ...................................... !!

उत्पल कान्त मिश्र
मुंबई, १५:१२
१९/११/२०११ 

http://utpalkant.blogspot.in/2011/10/blog-post_19.html

शुक्रवार, 24 जनवरी 2014

चलो फुटपाथ पर चलकर कोई मिसरा उठाते हैं.....सचिन अग्रवाल

 
यही ज़िद है तो फिर हिस्सा सभी अपना उठाते हैं
अगर शबनम तुम्हारी है तो हम शोला उठाते हैं

जो हक़ के वास्ते सर अपने कटवाना ही गैरत है
तो ले दुनिया सर अपना और हम ऊंचा उठाते हैं

मुसलसल आँधियों को वरगलाना तुम रखो जारी
चिरागों की धधकती लौ का हम ज़िम्मा उठाते हैं

कई सुथरे घरानों की हक़ीक़त जानते होंगे
ये बच्चे रोज़ चौराहों से जो कूड़ा उठाते हैं

मुनासिब हो तो कितने हैं अना पर ज़ख्म गिन लेना
ये लो हम आज अपने आप से परदा उठाते हैं

किसी रिश्ते की जानिब फिर झुके जाते हैं ज़ेहन ओ दिल
चलो मुट्ठी में फिर एक रेत का दरिया उठाते हैं

चलो कुछ भूखे प्यासे बच्चों के चेहरे ग़ज़ल कर दें
चलो फुटपाथ पर चलकर कोई मिसरा उठाते हैं

('नये मरासिम' में प्रकाशित हो चुकी है)

सचिन अग्रवाल

गुरुवार, 23 जनवरी 2014

न शिकायत है, न ही रोए!..................प्रेमजी (अप्रवासी भारतीय)


ये उम्र तान करके सोए हैं,
थकान पांव-भर जो ढोए हैं।

किसी सड़क पे नहीं मिलती है,
सुबह जो गर्द में ये बोए हैं।

लोग कहते हैं कारवां चुप है,
सराय धुंध में समोए हैं।

नाव कब तक संभालते मोहसिम,
पहाड़ भी जहां डुबोए हैं।

रहन की छत है, ब्याज का बिस्तर,
न शिकायत है, न ही रोए हैं।

फफोले प्यार के निकल आए,
न जाने जिस्म कहां धोए हैं।

न कोई खौफ है अंधेरों से,
न कोई रोशनी संजोए है।

एक मुर्दा शहर-सा मौसम है,
एक मुर्दे की तरह सोए हैं।

ये कहानी कहीं छपे न छपे,
कलम की नोक हम भिगोए हैं।

-प्रेमजी (अप्रवासी भारतीय)

बुधवार, 22 जनवरी 2014

टूटने की यह कहानी..................विद्यानंदन राजीव




नींद टूटी और स्वर्णिम स्वप्न टूटे
थम नहीं पाई अभी तक
टूटने की यह कहानी!

सोचते जब चल पड़ें
परछाइयों का साथ छोड़ें
सामने अवरोध, उनकी
उठ रही बाहें मरोड़ें,

समय की घातक व्यवस्था
हौसलों को तोड़ देती
और गतिकामी चरण को
आँधियों में छोड़ देती,

किंतु अचरज, नहीं अब तक
जिन्दगी में हार मानी।

झेलती प्रतिरोध सारे
अस्मिता फिर भी बनी है
फिसल जाती, फिर संभालती
आस्था कितनी घनी है,

हर कदम रण-भूमि में है
और प्रतिपल का समर है
घात पर आघात सहकर
हौसला होता प्रखर है,

आग का दरिया, कमी है
राह पर घातक हिमानी!
थम नहीं पाई अभी तक
टूटने की यह कहानी!

-विद्यानंदन राजीव
सौजन्यः वेब दुनिया

 

शनिवार, 18 जनवरी 2014

मैं हारा अपनी आदत से................प्रमोद त्रिवेदी

मैं हारा
मैं हारा अपनी आदत से।

कहते हैं लोग- "यह गुलाम, अपनी आदत का।
मजबूर, अपनी आदत से"।
यह मेरी कमजोरी।


कहते हैं सब- "पा सकता है कोई भी ।
चाहे तो इस टेव से मुक्ति।
असंभव नहीं कुछ भी"।

सोचता किन्तु मैं,
इस सोच से अलग
बचेगा ही क्या,
छूट गई यदि मुझसे
मेरी आदत,

क्या मतलब रह जाएगा तब
मेरे होने का।


फूल खिलते हैं आदतन।
जानते हैं,
तोड़ लिए जाएंगे खिलते ही
या बिखर जाएंगे
पंखुड़ी-पंखुड़ी खिलते ही
तब भी कहां छोड़ा खिलना।
छोड़ा नहीं नदी ने बहना
खारे होने के डर से।


सुना है अभी-अभी
आदत से मजबूर तो गिरे गड्‌ढे में।
मरे,

अपने जुनून में।

मैं हंसा फिर
अपनी आदत के मुताबिक।

-प्रमोद त्रिवेदी