गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

107 AIIMS राजकुमारी अमृत कौर ने बनाया। इतिहास की किताबें लिखती हैं


एक महिला ने AIIMS बनाया। कांग्रेस ने उनका नाम मिटा दिया।

नेहरू ने श्रेय ले लिया।
AIIMS राजकुमारी अमृत कौर ने बनाया।
इतिहास की किताबें लिखती हैं— “नेहरू ने AIIMS बनाया”।
यह पंक्ति इतिहास नहीं, प्रोपेगेंडा है।
Jawaharlal Nehru ने AIIMS नहीं बनाया।
AIIMS Rajkumari Amrit Kaur की वजह से अस्तित्व में आया।
AIIMS इसलिए बना क्योंकि एक महिला ने
ज़मीन दी, पैसा जुटाया, सिस्टम से लड़ी और काम करवा कर दिखाया—
जबकि कांग्रेस देखती रही और बाद में ब्रांडिंग कर गई।

वह जमीन, जिसका ज़िक्र कभी नहीं होता
AIIMS दिल्ली, अंसारी नगर की लगभग 190 एकड़ की कीमती ज़मीन पर खड़ा है।
यह जमीन: न सरकार ने खरीदी, न अधिग्रहित की
यह राजकुमारी अमृत कौर की पारिवारिक संपत्ति थी—
जो उन्होंने दान में दी।, आज के मूल्य पर यह ज़मीन हज़ारों-हज़ार करोड़ रुपये की है।
कांग्रेस ने इस पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया।
वह पैसा, जो नेहरू के पास नहीं था आजादी के बाद भारत आर्थिक रूप से टूटा हुआ था।
कांग्रेस के पास न संसाधन थे, न तैयारी—सिर्फ़ नारे थे।

तब अमृत कौर ने:
न्यूजीलैंड से विदेशी सहायता जुटाई
अंतरराष्ट्रीय मेडिकल सहयोग लाया
उपकरण, प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की व्यवस्था की
अगर कांग्रेस सक्षम होती, तो विदेशी मदद की ज़रूरत ही क्यों पड़ती?
वह क़ानून, जिसे कांग्रेस टालती रही

AIIMS अधिनियम, 1956
नेहरू की तत्परता से नहीं,
अमृत कौर के लगातार दबाव से पास हुआ।
उन्होंने लड़ाई लड़ी:
अफसरशाही की सुस्ती से
मंत्रिमंडल की उदासीनता से
कांग्रेस की ढिलाई से
फाइलें चलीं क्योंकि उन्होंने ज़बरदस्ती चलवाईं।
नेहरू ने वास्तव में क्या किया?
पहले से बने काम को मंज़ूरी दी
भाषण दिए
फीते काटे

इसे संस्थान-निर्माण नहीं कहते।
इसे ऑप्टिक्स कहते हैं।
कांग्रेस ने उन्हें क्यों भुला दिया?
क्योंकि यह सच तीन मिथक तोड़ देता है:
कांग्रेस ने भारत बनाया
नेहरू ने संस्थान खड़े किए
सत्ता = योगदान
AIIMS इन सबका उलटा प्रमाण है।
एक शाही महिला ने
अपनी विरासत जनस्वास्थ्य के लिए कुर्बान कर दी।
कांग्रेस ने श्रेय हड़प लिया।

*हकीकत*
AIIMS राजकुमारी अमृत कौर की विरासत है।
कांग्रेस ने सिर्फ़ नाम पट्टिका लगाई।
बलिदान किसी और का।
इश्तिहार कांग्रेस का।

बुधवार, 8 अप्रैल 2026

106 चांद बाबा गवाही देंगे।

 चाँद गवाही देगा



दतिया के पास एक गाँव की कथा है। एक किसान था कोई 50 वर्ष आयु का, बलिष्ठ और क्रोधी। 
उसकी पत्नी का एक दुर्घटना में देहांत हो गया था, बाल बच्चे थे नहीं।
एक रात वह खेत पर गया तो पाया कि पड़ोसी किसान ने उसका पानी काट कर 
अपने खेत में लगा लिया है।
किसान हत्थे से उखड़ गया। बात गाली गलौज से बढ़कर मारपीट तक पहुंच गई। 
उसकी लाठी के एक प्रचंड प्रहार ने प्रतिद्वंदी का सिर खोल दिया।

दूसरा आदमी जमीन पर गिर गया। दूर दूर तक न कोई इंसान था, न जानवर।
चाँदनी रात थी और एक आदमी जमीन पर पड़ा अपनी आखिरी साँसें ले रहा था।
मरते आदमी ने सारी शक्ति जुटा कर क्षीण स्वर में कहा, “तुमको इसकी सजा मिलेगी, 
देखना।”किसान हँस दिया, “किसने देखा कि हमने मारा? गवाही कौन देगा?”
मरता आदमी मुस्कराया, उसकी आँखें अब मुँद रही थीं। “गवाही ?” - 
वह बोला तो आवाज एक कराह सी बन कर निकली,

“कोई गवाह न हो तो क्या! चाँद तो है न, चांद बाबा गवाही देंगे।”
और उसकी गर्दन एक और लुढ़क गई।
अगली सुबह पुलिस आई लेकिन कोई गवाह या सबूत न मिलने की वजह से लौट गई।
साढे ग्यारह महीने बाद किसान ने दूसरी शादी कर ली। 15 दिन बीत गए।
अधेड़ किसान नवोढ़ा पत्नी की हर फरमाइश पूरी करने की कोशिश करता था।
उस रात किसान घर की छत पर लेटा हुआ था।

पूरा चाँद निकला हुआ था। किसान कुछ पल चाँद को देखता रहा फिर ठठा कर हँसने लगा।
नववधू ने अपनी लजीली पलकें उठा कर पति को प्रश्नवाचक दृष्टि से देखा।

किसान ने हँसना बंद कर दिया, “कुछ नहीं, ऐसे ही।”
लेकिन नई दुल्हन के मन में शंका आ गई कि पति उसके मायके पर हँस रहा है।
उसने रूठ कर मुँह फुला लिया। पति के लाख मिन्नतें करने के बाद भी वह मानती नहीं।

आखिरकार किसान ने राज कहीं न खोलने के लिए सैकड़ों कसमें खिला कर 
पत्नी को सारी कथा कह सुनाई।अगले दिन किसान की पत्नी ने घर आई एक 
पड़ोसन को (सैकड़ों कसमें खिला कर) कहानी बता, अपना पेट हल्का कर लिया।
पड़ोसन ने अपना कर्तव्य निभाया और आगे किसी को (सैकड़ों कसमें खिला कर) बात सरका दी।

इस मनोरम विधि से अगले दिन दोपहर तक साल भर पहले हुये कत्ल के बारे में आधा गाँव जान गया,
गाँव का सरकारी चौकीदार जान गया और जान गया निकटस्थ थाना।
शाम होते न होते कातिल किसान के हाथों में लोहे के कंगन पड़ गये।
पुलिस दल जब मुजरिम किसान को मुश्कें बाँध कर, पैदल ही ले चला तो चाँद निकल आया था।
गिरफ्तार कातिल ने एक बार आँख भर कर चाँद को देखा, फिर हँसने लगा। 
इतना हँसा कि उसकी आँखों में पानी आ गया।
थानेदार ने डपट कर पूछा, “क्या हुआ बे, दीवाना हुआ है क्या ?”
उसकी डपट से बेखबर, उसका मुजरिम कहीं दूर किसी बीते लम्हे को देख रहा था।

“उसने कहा था” किसान फुसफुसाया,
“उसने कहा था कि चाँद गवाही देगा।”
तारांकित कहानी

मंगलवार, 7 अप्रैल 2026

105 सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कमला देवी हजारिका

असम में एक ईसाई धर्म प्रचारक भेजे गए थे, नाम था फादर क्रूज।

इन्हें असम के एक प्रभावशाली परिवार के लड़के को घर आकर अंग्रेजी पढ़ाने का अवसर मिला। 
पादरी साहब धीरे-धीरे घर का निरीक्षण करने लगे।

उन्हें पता चल गया कि बच्चे की दादी इस घर में सबसे प्रभाव वाली हैं। इसलिए उनको यदि ईसा की शिक्षाओं के जाल में फँसाया जाए तो उनके माध्यम से पूरा परिवार और फिर पूरा गाँव ईसाई बनाया जा सकता है।
पादरी साहब दादी माँ को बताने लगे कि कैसे ईसा कोढ़ी का कोढ़ ठीक कर देते थे, 
कैसे वो नेत्रहीनों को नेत्र ज्योति देते थे,

आदि-आदि... दादी ने कहा बेटा, हमारे ”राम-कृष्ण” के चमत्कारों के आगे तो कुछ भी नहीं ये सब !
तुमने सुना है कि हमारे राम ने एक पत्थर का स्पर्श किया तो वो जीवित स्त्री में बदल गई।
राम जी के नाम के प्रभाव से पत्थर भी तैर जाता था पानी में, आज भी तैर रहे हैं,

पादरी साहब खामोश हो जाते। पर अपने कुत्सित प्रयास जारी रखते।
एक दिन पादरी साहब चर्च से केक लेकर आ गए और दादी को खाने को दिया।
पादरी साहब को विश्वास था कि दादी न खायेंगी, पर उसकी आशा के विपरीत दादी ने
केक लिया और खा गई।

पादरी साहब आँखों में गर्वोक्त उन्माद भरे अट्टहास कर उठे, माताजी ! 
तुमने चर्च का प्रसाद खा लिया, अब तुम ईसाई हो।

दादी ने पादरी साहब के कान खींचते हुए कहा, वाह रे अधर्मी ! 
मुझे एक दिन केक खिलाया तो मैं ईसाई हो गई। 
और मैं प्रतिदिन तुमको अपने घर का खिलाती हूँ, 
तो तू हिन्दू कैसे नहीं हुआ रे नमक हराम ? 
तू तो प्रतिदिन सनातन धर्म की इस आदि भूमि का वायु, जल लेता है 
फिर तो तेरा रोम-रोम हिन्दू बन जाना चाहिए।
अपने स्वधर्म और राष्ट्र को पथभ्रष्ट होने और गलत दिशा में जाने से बचाने वाली 
ये दादी माँ थी असम की सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कमला देवी हजारिका कौन जानता है 
इनको असम से बाहर ? 
हमारा कर्तव्य है कि सारा देश  इनके बारे में जानें 

सुप्रसिद्ध क्रांतिकारी कमला देवी हजारिका

रविवार, 5 अप्रैल 2026

104 कम नहीं समझिएगा

भण्डारा
 बहू ने आईने में लिपस्टिक ठीक करते हुए कहा -

"माँ जी, आप अपना खाना बना लेना, मुझे और इन्हें आज एक पार्टी में जाना है ...!!"

बूढ़ी माँ ने कहा - "बेटी मुझे गैस वाला चूल्हा चलाना नहीं आता ...!!"

तो बेटे ने कहा - "माँ, पास वाले मंदिर में आज भंडारा है , तुम वहाँ चली जाओ ना,
खाना बनाने की कोई नौबत ही नहीं आयेगी....!!!"


माँ चुपचाप अपनी चप्पल पहनकर मंदिर की ओर चल दीं.....

यह पूरा वाक्या 10 साल का बेटा रोहन सुन रहा था।

पार्टी में जाते वक्त रास्ते में रोहन ने अपने पापा से

कहा - "पापा, मैं जब बहुत बड़ा आदमी बन जाऊंगा ना, तब मैं भी
अपना घर किसी मंदिर के पास ही बनाऊंगा ....!!!"

क्योंकि माँ, जब मुझे भी किसी दिन ऐसी ही किसी पार्टी में जाना होगा तब तुम भी तो
किसी मंदिर में भंडारे में खाना खाने जाओगे ना, और मैं नहीं चाहता कि
तुम्हें कहीं दूर के मंदिर में जाना पड़े....!!!!

अब आगे....।।

बेटे ने कार वापस मोड़ ली और घर पहुंचे। रास्ते में दोनों ने तय किया कि 
जाते ही माँ के पैर पकड़ कर माफी मांग लेंगे।

नीचे पार्किंग में कार खड़ी करके जब दोनों 10वीं मंजिल पर अपने फ्लैट में पहुंचे तो अंदर से
जोर - जोर से म्यूजिक सिस्टम बजने की और कई लोगों के जोर - जोर से हँसने
और बातें करने की आवाजें आ रही थीं। 
बेटे ने घंटी बजाई।

अंदर से माँ जी की आवाज आई, " शारदा जी, दरवाजा खोल दीजिये,
लगता है आज पिज्जा जल्दी आ गया। "

जब दरवाजा खुला तो सामने बगल के फ्लैट में रहने वाले शर्मा जी की माँ शारदा देवी खड़ी थीं।

अंदर घर में माँ जी जीन्स और पीला टॉप पहने घूम रही थीं। कमरे में उसी बिल्डिंग में रहने वाले
माँ जी के हमउम्र आठ - दस महिलाएं और पुरुष थे। सभी के हाथ में ठंडी पेप्सी के ग्लास थे,
और सबके पैर म्यूजिक सिस्टम में बज रहे "पानी, पानी, पानी......." गाने पर थिरक रहे थे।

बेटे - बहू को देखकर पहले तो माँ जी कुछ सकपका गईं पर फिर उन्होंने संभलते हुए कहा, "क्या हुआ बेटा, पार्टी कैंसिल हो गई क्या? कोई बात नहीं, हमारी पार्टी ज्वाइन कर लो, मैं तीन पिज्जा और ऑर्डर कर देती हूँ।

मोरल - मोरल -वोरल कुछ नहीं ! बस आजकल के बुजुर्गों को बेबस, लाचार और कमजोर समझने की गलती कभी मत करो, क्योंकि तुम आज जिस स्कूल में पढ़ रहे हो, वो कभी वहाँ के हेडमास्टर थे!




शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

103 ..दीवान बहादुर रायसाहब दाऊ कल्याण सिंह जी


दीवान बहादुर रायसाहब दाऊ कल्याण सिंह जी 

ये है छत्तीसगढ़ की पावन धरा के महादानी दीवान बहादुर रायसाहब दाऊ कल्याण सिंह जी रायपुर शहर का
प्रतिष्ठित डी. के. हॉस्पिटल इन्ही के नाम पर है दाऊ जी ने 1944 में डी के अस्पताल वाली जमीन के साथ में भवन निर्माण के लिये 1,25,000/- नगद (वर्तमान की गणना में लगभग 70 करोड़) भी दिये थे,
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जी का जन्म 04/04/1876 को हुआ था दाऊ जी को लोग सिर्फ डी के अस्पताल की जमीन के दानदाता के रूप में जानते हैं,
पर ये परिचय इस महान दानदाता के लिए काफी नहीं है। आज का एम्स अस्पताल जो कि पुराना टी.बी. अस्पताल भी दाऊ जी की दान की हुई जमीन पर ही बना है। लभान्डी की जमीन के साथ कृषि महाविद्यालय और गरीब छात्रों के हास्टल निर्माण के लिए 112000/- (वर्तमान के लगभग 62 करोड़ रूपये), टी.बी.अस्पताल के लिए 323 एकड़ जमीन, रायपुर जगन्नाथ मंदिर के खर्चे के लिये संपूर्ण खैरा ग्राम का दान,कृषि पर रिसर्च के लिये बरोंडा ग्राम में जमीन, भाटापारा में कृषि विज्ञान हेतू विशाल जमीन, भाटापारा में अकाल के समय कल्याण सागर जलाशय का निर्माण, भाटापारा में विशाल मवेशी अस्पताल,गरीबों के लिये पुस्तकालय का निर्माण जैसे अनेकों पुण्य कार्य इस महादानी ने छत्तीसगढ़ में किये।
छत्तीसगढ़ के बाहर भी इस पुण्यात्मा ने अनेकों महादान किये जिसमें प्रमुख हैं नागपुर के लेडी ईरविन हास्पिटल के निर्माण में सहयोग, सेन्ट्रल महिला कॉलेज के निर्माण में मुख्य दान, बिहार के भूकंप में महादान,वर्धा की भयंकर बाढ़ में दिल खोलकर दान दिया। दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल आज के बड़े उद्योपतियों से कई गुना ज्यादा धनवान थे।उन्होंने 1937 में लगभग 70000/- राजस्व पटाया था।(आज की गणना में लगभग 39 करोड़ से अधिक) आज इस महादानी,छत्तीसगढ़ के गौरव का नाम कहीं खो गया है खुद छत्तीसगढ़ के वासी भी इस महान माटीपुत्र के बारे में ज्यादा या कुछ भी नहीं जानते।  
 
 

शनिवार, 28 मार्च 2026

102..तीन पहर तो बीत गये

 तीन पहर तो बीत गये,



गुरुवार, 26 मार्च 2026

101-युद्ध के आखिर में जला

 युद्ध के आखिर में जला


एक जला हुआ जमीन का टुकड़ा 
बारुद की फसल गल गई होगी.

सैकड़ो ं बदबूदार जिस्म फैले होंगे 
जमीन के ऊपर, जिन्हे कब्रें नसीब नहीं हुई.

जले जिस्म, हथियार और घर,
सब गड्ड-मड्ड हो जाएंगे 
एक दूसरे के साथ

और आखिर में तुम उन सब पर फूल चढ़ाओगे
दुआ मांगोगे उनकी शांति के लिए,
प्रार्थनाएं करोगे और मोमबत्तियां जलाओगे 

आने वाली पीढ़ियों को सुनाओगे
सदियों तक,
उस अनचाही युद्ध की दास्तां
जो कभी नहीं चाही थी,
उस जली हुई जमीन ने,

सड़े हुए जवान जिस्मों ने,
और एक उजड़ी हुई सभ्यता ने,

एक युद्ध जिसे, 
एक सभ्य दुनिया ने थोपा था ,
सभ्यता के खिलाफ

- चंडीगढ़ के प्रवीण चौबे