शनिवार, 28 मार्च 2026

102..तीन पहर तो बीत गये

 तीन पहर तो बीत गये,



गुरुवार, 26 मार्च 2026

101-युद्ध के आखिर में जला

 युद्ध के आखिर में जला


एक जला हुआ जमीन का टुकड़ा 
बारुद की फसल गल गई होगी.

सैकड़ो ं बदबूदार जिस्म फैले होंगे 
जमीन के ऊपर, जिन्हे कब्रें नसीब नहीं हुई.

जले जिस्म, हथियार और घर,
सब गड्ड-मड्ड हो जाएंगे 
एक दूसरे के साथ

और आखिर में तुम उन सब पर फूल चढ़ाओगे
दुआ मांगोगे उनकी शांति के लिए,
प्रार्थनाएं करोगे और मोमबत्तियां जलाओगे 

आने वाली पीढ़ियों को सुनाओगे
सदियों तक,
उस अनचाही युद्ध की दास्तां
जो कभी नहीं चाही थी,
उस जली हुई जमीन ने,

सड़े हुए जवान जिस्मों ने,
और एक उजड़ी हुई सभ्यता ने,

एक युद्ध जिसे, 
एक सभ्य दुनिया ने थोपा था ,
सभ्यता के खिलाफ

- चंडीगढ़ के प्रवीण चौबे

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

ईश्वर पर विश्वास

 ईश्वर पर विश्वास



जंगल में एक गर्भवती हिरनी बच्चे को जन्म देने को थी। वो एकांत जगह की तलाश में घूम रही थी, 
कि उसे नदी किनारे ऊँची और घनी घास दिखी। उसे वो उपयुक्त स्थान लगा शिशु को जन्म देने के लिए। वहां पहुंचते ही उसे प्रसव पीड़ा शुरू हो गयी। 
उसी समय आसमान में घनघोर बादल वर्षा को आतुर हो उठे 
और बिजली कड़कने लगी।


उसने दायी तरफ देखा, तो एक शिकारी तीर का निशान, 
उसकी तरफ कर रहा था। घबराकर वह दाहिने तरफ झुकी, 
तो वहां एक भूखा शेर, झपटने को तैयार बैठा था। सामने सूखी घास 
आग पकड़ चुकी थी और पीछे की तरफ झुकी, तो नदी में जल बहुत था। 
मादा हिरनी क्या करती ? वह प्रसव पीड़ा से व्याकुल थी। अब क्या होगा ? 
क्या हिरनी जीवित बचेगी ? क्या वो अपने शावक को जन्म दे पाएगी ? 
क्या शावक जीवित रहेगा ? क्या जंगल की आग सब कुछ जला देगी? 
क्या मादा हिरनी शिकारी के तीर से बच पाएगी ? क्या मादा हिरनी भूखे शेर का भोजन बनेगी ? 
वो एक तरफ आग से घिरी है और पीछे नदी है। क्या करेगी वो ?

हिरनी अपने आप को शून्य में छोड, 
अपने बच्चे को जन्म देने में लग गयी। कुदरत का करिश्मा देखिए। 
बिजली चमकी और तीर छोड़ते हुए, शिकारी की आँखे चौंधिया गयी। 
उसका तीर हिरनी के पास से गुजरते, शेर की आँख में जा लगा, 
शेर दहाड़ता हुआ इधर उधर भागने लगा। और शिकारी, 
शेर को घायल जानकर भाग गया। घनघोर बारिश शुरू हो गयी और जंगल की आग बुझ गयी। 
हिरनी ने शावक को जन्म दिया।

हमारे जीवन में भी कभी कभी कुछ क्षण ऐसे आते है, 
जब हम चारो तरफ से समस्याओं से घिरे होते हैं 
और कोई निर्णय नहीं ले पाते। 
तब सब कुछ नियति के हाथों सौंपकर अपने उत्तरदायित्व 
व प्राथमिकता पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए। 
अन्ततः यश, अपयश, हार, जीत, जीवन, मृत्यु का अन्तिम निर्णय ईश्वर करता है। 
हमें उस पर विश्वास कर उसके निर्णय का सम्मान करना चाहिए। 
कुछ लोग हमारी सराहना करेंगे, कुछ लोग हमारी आलोचना करेंगे। 
दोनों ही मामलों में हम फायदे में है एक हमें प्रेरित करेगा और 
दूसरा हमारे भीतर सुधार लाएगा।

बुधवार, 9 जुलाई 2025

अज़ब-ग़ज़ब

अज़ब-ग़ज़ब


रविवार, 2 मार्च 2025

07....सुंदर कार्यों को देर से मत छोड़ो,

बुधवार, 19 फ़रवरी 2025

06 ..चार धाम यात्रा

चार धाम यात्रा 



    शादी की पहली रात थी। सुहाग सेज पर सजी दुल्हन अपने पति के साथ नए जीवन की शुरुआत के सपने देख रही थी। तभी उसका पति स्वादिष्ट भोजन का थाल लेकर कमरे में आया, और कमरे में उस भोजन की खुशबू फैल गई। दुल्हन ने मुस्कुराते हुए कहा, "क्यों न मां जी को भी बुला लेते? हम तीनों साथ में भोजन करेंगे।" पति ने हंसते हुए कहा, "छोड़ो, मां खाकर सो गई होंगी। आओ, हम प्यार से खाना खाते हैं।"

    दुल्हन ने फिर कहा, "नहीं, मैंने मां जी को खाते हुए नहीं देखा। उन्हें बुला लेते हैं।" इस पर पति ने झुंझलाते हुए जवाब दिया, "तुम क्यों जिद कर रही हो? मां शादी के कामों से थकी होंगी। सो गई होंगी। जब जागेंगी, तब खा लेंगी। आओ, हम अपना खाना खाते हैं।"
    यह सुनकर दुल्हन को एक अजीब सा एहसास हुआ। उसने सोचा कि जो व्यक्ति अपनी मां का ख्याल नहीं रख सकता, वह भला मेरे लिए कितना संवेदनशील होगा? इस बात ने उसे अंदर तक झकझोर दिया। उसने उसी रात अपने जीवन को लेकर एक बड़ा फैसला लिया और कुछ समय बाद उसने अपने पति से तलाक ले लिया।
    समय बीतता गया। दुल्हन ने दूसरी शादी कर ली और अपने जीवन को नई दिशा दी। उसका नया परिवार उसे प्यार और सम्मान देता था। कुछ वर्षों बाद उसके दो बच्चे हुए, जो बेहद सुशील और आज्ञाकारी निकले। उधर, उसका पहला पति भी दूसरी शादी करके अपनी जिंदगी जीने लगा।
    जब वह स्त्री 60 वर्ष की हुई, तो उसने अपने बेटों से चार धाम यात्रा की इच्छा जताई। बेटे तुरंत तैयार हो गए और मां को लेकर यात्रा पर निकल पड़े। एक दिन यात्रा के दौरान भोजन के लिए वे रुके। बेटों ने मां के लिए भोजन परोसा और उसे खाने का आग्रह किया। तभी स्त्री की नजर एक भूखे और गंदे वृद्ध पुरुष पर पड़ी, जो बड़ी कातर निगाहों से उनके भोजन की ओर देख रहा था।
    स्त्री का दिल पिघल गया। उसने अपने बेटों से कहा, "पहले इस वृद्ध को नहलाओ, साफ कपड़े पहनाओ, फिर हम सब साथ में भोजन करेंगे।" बेटे जब उस वृद्ध को नहलाकर और कपड़े पहना कर लाए, तो स्त्री उसे देखकर चौंक गई। वह वृद्ध कोई और नहीं, बल्कि उसका पहला पति था, जिससे उसने सुहागरात को ही तलाक ले लिया था।
    स्त्री ने वृद्ध से पूछा, "तुम्हारी यह हालत कैसे हो गई?" वृद्ध ने नजरें झुकाकर कहा, "मेरे अपने ही बच्चे मुझे भोजन नहीं देते। मेरा तिरस्कार करते हैं और आखिरकार मुझे घर से बाहर निकाल दिया।"
स्त्री ने गहरी सांस लेते हुए कहा, "मुझे इस दिन का अंदेशा उसी रात हो गया था, जब तुम अपनी मां को खाना खिलाने के बजाय, वह स्वादिष्ट थाल लेकर मेरे पास आ गए थे। मेरे बार-बार कहने के बावजूद तुमने अपनी मां की उपेक्षा की। आज तुम उसी का फल भोग रहे हो।"
    स्त्री की बात सुनकर वृद्ध की आंखें भर आईं। उसने महसूस किया कि जो व्यवहार उसने अपनी मां के साथ किया था, वही उसके बच्चों ने उसके साथ किया। यह घटना हमें सिखाती है कि अपने बुजुर्गों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, क्योंकि बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने माता-पिता को करते हुए देखते हैं। बुजुर्गों का सम्मान और देखभाल केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि हमारी अगली पीढ़ी के लिए एक आदर्श है।
-संकलन

सोमवार, 27 जनवरी 2025

05 ..जलियाँवाला बाग में बसंत


जलियाँवाला बाग में बसंत



(जलियाँवाला बाग की घटना बैसाखी को घटी थी,
बैसाखी वसंत से सम्बंधित महीनों (फाल्गुन और चैत्र)
के अगले दिन ही आती है)

यहाँ कोकिला नहीं, काग हैं, शोर मचाते,
काले काले कीट, भ्रमर का भ्रम उपजाते।

कलियाँ भी अधखिली, मिली हैं कंटक-कुल से,
वे पौधे, व पुष्प शुष्क हैं अथवा झुलसे।

परिमल-हीन पराग दाग सा बना पड़ा है,
हा! यह प्यारा बाग खून से सना पड़ा है।

ओ, प्रिय ऋतुराज! किन्तु धीरे से आना,
यह है शोक-स्थान यहाँ मत शोर मचाना।


वायु चले, पर मंद चाल से उसे चलाना,
दुःख की आहें संग उड़ा कर मत ले जाना।

कोकिल गावें, किन्तु राग रोने का गाएं,
भ्रमर करें गुंजार कष्ट की कथा सुनावें।

लाना संग में पुष्प, न हों वे अधिक सजीले,
तो सुगंध भी मंद, ओस से कुछ कुछ गीले।

किन्तु न तुम उपहार भाव आ कर दिखलाना,
स्मृति में पूजा हेतु यहाँ थोड़े बिखराना।

कोमल बालक मरे यहाँ गोली खा कर,
कलियाँ उनके लिये गिराना थोड़ी ला कर।

आशाओं से भरे हृदय भी छिन्न हुए हैं,
अपने प्रिय परिवार देश से भिन्न हुए हैं।

कुछ कलियाँ अधखिली यहाँ इसलिए चढ़ाना,
कर के उनकी याद अश्रु के ओस बहाना।

तड़प तड़प कर वृद्ध मरे हैं गोली खा कर,
शुष्क पुष्प कुछ वहाँ गिरा देना तुम जा कर।

यह सब करना, किन्तु यहाँ मत शोर मचाना,
यह है शोक-स्थान बहुत धीरे से आना।



-सुभद्रा कुमारी चौहान