गुरुवार, 21 मई 2026

117 ..भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है

चंदूलाल विश्व-प्रतियोगिता-फेम एक दिन घबड़ाए हुए डाक्टर के यहां पहुंचे और बोले, डाक्टर साहब, आजकल मुझे भूख नहीं लगती।
डाक्टर ने पूछा, आज सबेरे से क्या खाया?
चंदूलाल बोले, सबेरे बिस्तर पर वही कोई दस कप चाय पी और चाय के साथ दस-पंद्रह प्लेट जलेबियां। फिर हाथ-मुंह धोकर बाजार गया। वहां कोई पंद्रह प्लेट समोसे और कोई छह गिलास दूध पीया। फिर शहर का एक चक्कर मारा, तब तक ग्यारह बज चुके थे और भोजन का समय भी हो चुका था, सो घर पहुंचा। वहां बीस रोटियां और दस प्लेट चावल और कोई दस संतरे खाए, और…
डाक्टर बीच में ही टोकते हुए बोला, तो क्या अब मुझे खाने का इरादा है?
भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है।
तो एक तरफ परिग्रह वाले लोग हैं, जो इकट्ठा करते चले जाते हैं। फिर इकट्ठा करते-करते थक जाते हैं, बुरी तरह थक जाते हैं। थक जाते हैं तो उलटा करने लगते हैं। सोचते हैं परिग्रह से तृप्ति नहीं मिली तो त्याग से मिलेगी। पहले धन इकट्ठा करते थे, अब धन छोड़ कर भागते हैं। पहले स्त्रियों के पीछे भागते थे; अब स्त्रियां देखीं कि एकदम भागते हैं, उनकी तरफ पीठ करके भागते हैं। जो-जो पहले किया था उससे उलटा करने लगते हैं। जैसे कोई आदमी सोचता हो कि शीर्षासन करेंगे तो जीवन रूपांतरित हो जाएगा।
लेकिन मनुष्य के जीवन का एक तर्क है–एक काम करके जब थक जाता है तो तत्क्षण दूसरी अति पर चला जाता है। स्वभावतः उसे लगता है ऐसा करने से नहीं हुआ, इससे विपरीत करके देख लूं। इसलिए भोगी हैं, परिग्रही हैं और त्यागी हैं।
और तुम यह चकित होओगे जान कर: जितना भोगी समाज हो उतना ही उसमें त्यागियों का आदर होता है। क्योंकि भोगी को त्याग का तर्क समझ में आता है। उसके मन में भी लग रहा है कि कुछ मिल तो रहा नहीं है, इकट्ठा तो कर रहा हूं, कुछ मिल तो रहा नहीं है। अभी अपनी सामर्थ्य कम है, आत्मबल कम है, संकल्प कम है। जब संकल्प होगा तो हम भी त्याग कर और मुनि हो जाएंगे।
साक्षी-भाव उसका नाम, साक्षी-भाव उसका स्वरूप। संग्रह में भी कर्ता आ जाता है और त्याग में भी कर्ता आ जाता है। और जहां कर्ता आ गया वहां संसार आ गया। कर्ता यानी संसार का द्वार।जहां भी होओ–चाहे संसार में और चाहे संसार के बाहर, चाहे त्यागी होओ चाहे भोगी–एक बात खयाल रखना: कर्ता-भाव न आए। जहां कर्ता-भाव आया, वहीं चूक हो गई, वहीं फिसले, बुरे फिसले। साक्षी-भाव बना रहे। दुकान पर भी बैठ कर अगर साक्षी-भाव बना रहे, बाजार में भी बैठ कर अगर तुम सिर्फ दर्शक मात्र रहो–तो पर्याप्त।
बस यह साक्षी-भाव सतत बहने लगे, चौबीस घंटे बहने लगे, सपने में भी बना रहे, सपने में भी दिखाई पड़ता रहे कि मैं साक्षी हूं–फिर तुम्हारे ऊपर कोई कालिख न रह जाएगी, कोई कलुष न रह जाएगा, कोई कल्मष न रह जाएगा। तुम परम शुद्ध परमात्मा को अनुभव कर लोगे! वह तुम्हारे भीतर विराजमान है, एक क्षण को भी वहां से हटा नहीं है।
- भगवान श्री रजनीश

गुरुवार, 14 मई 2026

116 रोटी की सैकड़ों प्रजातियां हैं और कुछ तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं

 रोटी की सैकड़ों प्रजातियां हैं और कुछ तो 
पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं ।

यहाँ शीर्ष 10 सर्वश्रेष्ठ रोटी हैं

1. अफगानिस्तान

पारंपरिक बोलानी रोटी, अफगानिस्तान.

तंदूर ओवन में पकी अफगानिस्तान की बोलानी रोटी ;

बोलानी रोटी बहुत पतली परत होती है औरबिच में कई प्रकार की सामग्री भरी जाती है ,
जैसे कि आलू, पालक, दाल, कद्दू या लौकी;

2. अंगोला

अंगोला में यह बेकरी चेक गणराज्य ने तौहफे में दी है।
सफेद ब्रेड आपको यूरोपियन बैगूलेट्स की याद दिलाएंगे।



3. ऑस्ट्रेलिया


पारंपरिक ऑस्ट्रेलियाई पनीर दमपर रोटी

स्ट्रीक पर पकाई जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई डम्पर रोटी


4. ऑस्ट्रिया

सनफलोवेर ब्रेड जो ऑस्ट्रियाई की ग्रीष्मकालीन सैंडविच के रूप में जाना जाता है .


चेक गणराज्य और स्लोवाकिया में भी सफेद आटे से बनते है ऑस्ट्रियन ब्रेड रोल

5. चेक गणराज्य

Umava जो चेक गणराज्य के दक्षिण में एक क्षेत्र है 
वहा की उसी नामक पारंपरिक चेक ब्रेड ,
गहरे आटे ( राई और गेहूं के फूल) से बनी हुयी:


6. डोमिनिकन गणराज्य

डोमिनिकन गणराज्य के पहाड़ी क्षेत्रों की 
मकई की रोटी ये 10 किलो का भारी पाव.

ये जानकारी कोरा से प्राप्त हुइ है

मंगलवार, 12 मई 2026

115 ..कौमी एकता का ठेका तो हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है।



अजमेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ थी कि
 
वहां की कोई बेंच खाली नहीं थी। 

एक बेंच पर एक परिवार, जो पहनावे से हिन्दू लग रहा था,
 
के साथ बुर्के में एक अधेड़ सुसभ्य महिला बैठी थी। 

उसने सभ्यता से पान की पीक थूक-2 कर प्लेटफार्म 

पर अपने आस-पास कई चित्र बना दिये थे। 

बहुत देर चुपचाप बैठने के बाद जब उससे चुप्पी बर्दाश्त न हुई तो 

उसने बगल में बैठे युवक से पूछा,

 "अजमेर के रहने वाले हैं या फिर यहाँ घूमने आये हैं?"

युवक ने बताया, "जी अपने माता पिता के साथ

पुष्कर में ब्रह्मा जी के मंदिर के दर्शन करने आया था।"

महिला ने बुरा मुँह बनाते हुए फिर पूछा,"आप लोग अजमेर शरीफ की दरगाह पर नहीं गए?"

युवक ने उस महिला से प्रति उत्तर कर दिया, "क्या आप ब्रह्मा जी के मंदिर गई थीं?"

महिला अपने मुँह को और बुरा बनाते हुए बोली,

"लाहौल विला कुव्वत। इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है और 

आप पूछ रहे हैं कि ब्रह्मा के मंदिर में गई थी।"

युवक झल्लाकर बोला,
"जब आप ब्रह्मा जी के मंदिर में जाना हराम मानती हैं
तो हम क्यों अजमेर शरीफ की 
दरगाह पर जाकर अपना माथा फोड़ें।"
महिला युवक की माँ से शिकायती लहजे में बोली, 
"देखिये बहन जी। आपका लड़का तो बड़ा बदतमीज है। 
ऐसी मजहबी कट्टरता की वजह से ही तो हमारी कौमी एकता में फूट पड़ती है।"
युवक की माँ मुस्कुराते हुए बोली, 

"ठीक कहा बहन जी।
कौमी एकता का ठेका तो
हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है।

साभार- हर्षवर्धन आर्य


सोमवार, 4 मई 2026

114 ..'जनरल चौधरी लाहौर में प्रवेश कर रहे हैं।'

 भारत में मैं कई राजनेताओं को जानता हूँ, 
किन्तु मैंने उनमें दिमाग नहीं पाया।

    जिन सामान्य बातों को कोई भी समझ सकता है, जिन्हें समझने के लिए किसी महान प्रतिभा की जरूरत नहीं है, उन्हें भी राजनेता समझ नहीं पाते । मेरा एक मित्र भारतीय सेना का कमांडर इन चीफ था। उनका नाम था जनरल चौधरी | जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तो इस आदमी ने प्रधान मंत्री से हमले का मुकाबला करने की अनुमति मांगी | उसने कहा कि इस समय सिर्फ रक्षात्मक होने से कुछ नहीं होगा क्योंकि यदि आप रक्षात्मक हैं तो इसका अर्थ है, आप पहले ही हार गए हैं | यह एक सरल सैन्य रणनीति है कि बचाव का सबसे अच्छा तरीका आक्रामक होना है |
    चौधरी का सुझाव था कि अगर पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर हमला किया है, तो हमें पाकिस्तान पर चार –पांच मोर्चों से आक्रमण करना चाहिए। वे घबरा जायंगे और समझ नहीं पायेंगे कि वे अपनी सेना कहाँ भेजें। उन्हें अपने देश की पूरी सीमा का बचाव करना होगा, तो उनका हमला अपने आप विफल हो जाएगा ।
    लेकिन उफ़ ये राजनेता ! प्रधान मंत्री नेहरू ने उन्हें कहा कि सुबह तक 6 बजे तक इंतजार करो।
जनरल चौधरी ने मुझे बताया कि उसके बाद उन्हें सेना से निकाल दिया गया था – लेकिन यह बात सार्वजनिक नहीं की गई ।
सार्वजनिक रूप से तो वे ससम्मान सेवानिवृत्त हुए, लेकिन सचाई यह है कि उन्हें निकाला गया था | उनसे कहा गया था - 'या तो आप इस्तीफा दें या हम आपको बाहर निकाल देंगे।'
अपराध क्या था उनका ? उनका अपराध यह था कि उन्होंने छः बजे के स्थान पर सुबह 5 बजे पाकिस्तान पर हमला कर दिया । क्योंकि उनकी नजर में यही सही समय था, छः बजे तो सूर्योदय हो जाएगा, लोग जाग जायेंगे। सुबह पांच बजे का समय एकदम उपयुक्त था - सब लोग सो रहे थे – वे लोग हक्के बक्के हो गए । और उसने जैसा कहा था, बैसा ही हुआ - उसने पूरे पाकिस्तान को थरथरा दिया । देखते ही देखते भारतीय सेनायें पाकिस्तान से सबसे बड़े शहर लाहौर से सिर्फ 15 मील दूर रह गईं |
तब तक राजनेता क्या कर रहे थे ? पूरी रात नेहरू और उनकी कैबिनेट विचार विमर्श में उलझी रही - ऐसा करने का क्या नतीजा होगा, बैसा करने से क्या होगा और सुबह 6 बजे तक भी वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए । तभी उन्होंने रेडियो पर सुना - 'जनरल चौधरी लाहौर में प्रवेश कर रहे हैं।'
यह स्थिति राजनेताओं के लिए असहनीय थी | उन्होंने लाहौर से सिर्फ 15 मील दूर उन्हें रोक दिया और जहाँ तक मैं समझता हूँ, यह मूर्खता की पराकाष्ठा थी | यदि उस दिन लाहौर जीत लिया जाता, कश्मीर की समस्या और भारत का सरदर्द हमेशा के लिए हल हो गया होता। कश्मीर के उस क्षेत्र की समस्या अब कभी हल नहीं हो सकती, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है - और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जनरल चौधरी को वापस आने के लिए कहा गया | कहा गया कि भारत एक अहिंसक देश है और आपने आदेश का इंतजार नहीं किया ।
    उन्होंने प्रधान मंत्री से साफ़ शब्दों में कहा - सैन्य रणनीतियों को मैं समझता हूं, आप नहीं  आप छः बजे की बात करते हैं, पर उस समय भी आपका ऑर्डर कहाँ था? पाकिस्तान ने पहले ही कश्मीर के सबसे सुंदर हिस्से पर कब्जा कर लिया था - और आप पूरी रात चर्चा ही करते रहे । यह चर्चा का समय नहीं था - युद्ध के मैदान पर फैसला किया जाना चाहिए था । अगर आपने मुझे लाहौर में जाने की अनुमति दी होती तो हम सौदेबाजी की स्थिति में होंते । अब हम सौदेबाजी की स्थिति में नहीं हैं। आपने मुझे वापस बुला लिया और मुझे वापस आना पड़ा। '
    संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम लाइन का निर्णय किया । तो अब वर्षों से संयुक्त राष्ट्र सेनाएं वहां गश्त कर रही हैं, दूसरी ओर पाकिस्तानी सेनाएं गश्त कर रही हैं, इस तरफ भारतीय सेनाएं गश्त कर रही हैं। वर्षों से सिर्फ बकवास हो रही है ! और वे संयुक्त राष्ट्र में गए, जहाँ सिर्फ चर्चा होती है, और नतीजा वही ढाक के तीन पात ।और पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए क्षेत्र को आप युद्ध विराम के कारण वापस नहीं ले सकते। उन्होंने अपनी संसद में फैसला किया है कि उनके द्वारा कब्ज़ा किया गया क्षेत्र पाकिस्तान का अभिन्न अंग है । अब वे इसे अपने नक्शे पर दिखाते हैं। अब यह क्षेत्र कब्जाया हुआ नहीं, पाकिस्तानी क्षेत्र है।
मैंने जनरल चौधरी से कहा था- 'यह एक साधारण सी बात थी कि आपको सौदेबाजी की स्थिति में होना चाहिए था। यदि आपने लाहौर ले लिया होता, तो वे कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते | क्योंकि वे लाहौर खोना बर्दास्त नहीं कर सकते थे। उसके बाद अगर कोई संघर्ष विराम होता भी तो सौदेबाजी करते समय लाहौर हमारे पास होता । अब सौदेबाजी के लिए भारत के पास क्या है ? पाकिस्तान को क्या परेशानी? '
लेकिन राजनेताओं में दिमाग होता ही कहाँ हैं? "
     प्रवचन-२८,ओशो

अंधेरे से उजाले की ओर

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

113 आत्मविश्वास हो तो सर्व कार्य सफल


एक नर्स लंदन में ऑपरेशन से दो घंटे पहले मरीज़ के कमरे में घुसकर कमरे को ठीक करने में और वहां रखे गुलदस्ते को संवारने में लगी थी।

ऐसे ही काम करते करते उसने मरीज की ओर देखकर यूँ ही रेंडमली पूछ लिया;
"सर आपका ऑपरेशन कौन सा डॉक्टर कर रहा है?"
नर्स ने सवाल कर के करीब से उस मरीज को देखा, जो थोड़ा घबराया हुआ सा लग रहा था!
लाजिमी है कि उसका ऑपरेशन था तो उसे घबराहट होगी ही।
फिर भी मरीज़ ने अपने लहजे को थोड़ा बेहतर करते हुए कहा; "डॉ. जबसन।" नर्स ने डॉक्टर का नाम सुना और आश्चर्य के साथ मुस्कराते हए अपना काम बीच मे छोड़कर मरीज़ के एकदम पास पहुँची और पूछा;

"सर, क्या डॉ. जबसन ने वास्तव में आपके ऑपरेशन को स्वीकार किया हैं?
मरीज़ ने कहा "हाँ, मेरा ऑपरेशन वही कर रहे है।"
नर्स ने कहा "बड़ी अजीब बात है, विश्वास नहीं होता"
परेशान होते हुए मरीज़ ने पूछा ;
"लेकिन इसमें ऐसी क्या अजीब बात है?"

नर्स ने कहा "वास्तव में इस डॉक्टर ने अब तक हजारों ऑपरेशन किए हैं उसके ऑपरेशन में सफलता का अनुपात 100 प्रतिशत है । इनकी तीव्र व्यस्तता की वजह से इन्हें समय निकालना बहुत मुश्किल होता है। मैं हैरान हूँ आपका ऑपरेशन करने के लिए उन्हें फुर्सत कैसे मिली?

नर्स की बात सुनते ही मरीज़ ने एकदम प्रफुल्लित होते हुए कहा;
ये मेरी अच्छी किस्मत है कि डॉ जबसन को फुरसत मिली और वह मेरा ऑपरेशन कर रहे हैं!
नर्स ने एक बार फिर कहा;
"यकीन मानिए, मेरा हैरत अभी भी बरकरार है कि दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर आपका ऑपरेशन कर रहा है! "
मरीज ने अपने हाथ जोड़कर प्रसन्न मुद्रा में ईश्वर का धन्यवाद किया। और इस बातचीत के बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया गया।
मरीज़ का ऑपरेशन सफल हुआ, और उसे आराम से अपने कमरे में ले जाया गया। मरीज ने तेज़ी से रिकवरी करी, और उसे छुट्टी भी मिल गई। किंतु उसे यह आश्चर्य हुआ कि, ऑपरेशन से पहले मिलने आई नर्स उसे फिर से दिखाई नहीं दी।
वास्तव में मरीज़ के कमरे में आई महिला कोई नर्स नहीं, बल्कि उसी
एक नर्स लंदन में ऑपरेशन से दो घंटे पहले मरीज़ के कमरे में घुसकर कमरे को ठीक करने में और वहां रखे गुलदस्ते को संवारने में लगी थी।
ऐसे ही काम करते करते उसने मरीज की ओर देखकर यूँही रेंडमली पूछ लिया;
"सर आपका ऑपरेशन कौन सा डॉक्टर कर रहा है?"
नर्स ने सवाल कर के करीब से उस मरीज को देखा, जो थोड़ा घबराया हुआ सा लग रहा था! लाजिमी है कि उसका ऑपरेशन था तो उसे घबराहट होगी ही।
फिर भी मरीज़ ने अपने लहजे को थोड़ा बेहतर करते हुए कहा; "डॉ. जबसन।"
नर्स ने डॉक्टर का नाम सुना और आश्चर्य के साथ मुस्कराते हए अपना काम बीच मे छोड़कर मरीज़ के एकदम पास पहुँची और पूछा;
"सर, क्या डॉ. जबसन ने वास्तव में आपके ऑपरेशन को स्वीकार किया हैं?
मरीज़ ने कहा "हाँ, मेरा ऑपरेशन वही कर रहे है।"
नर्स ने कहा "बड़ी अजीब बात है, विश्वास नहीं होता"
परेशान होते हुए मरीज़ ने पूछा ;
"लेकिन इसमें ऐसी क्या अजीब बात है?"
नर्स ने कहा "वास्तव में इस डॉक्टर ने अब तक हजारों ऑपरेशन किए हैं
उसके ऑपरेशन में सफलता का अनुपात 100 प्रतिशत है । इनकी तीव्र व्यस्तता की वजह से
इन्हें समय निकालना बहुत मुश्किल होता है। मैं हैरान हूँ आपका ऑपरेशन
करने के लिए उन्हें फुर्सत कैसे मिली?
नर्स की बात सुनते ही मरीज़ ने एकदम प्रफुल्लित होते हुए कहा;
ये मेरी अच्छी किस्मत है कि डॉ जबसन को फुरसत मिली और वह मेरा ऑपरेशन कर रहे हैं!
नर्स ने एक बार फिर कहा;"यकीन मानिए, मेरा हैरत अभी भी बरकरार है कि
दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर आपका ऑपरेशन कर रहा है! "
मरीज ने अपने हाथ जोड़कर प्रसन्न मुद्रा में ईश्वर का धन्यवाद किया। और इस बातचीत के बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया गया।
मरीज़ का ऑपरेशन सफल हुआ, और उसे आराम से अपने कमरे में ले जाया गया। मरीज ने तेज़ी से रिकवरी करी, और उसे छुट्टी भी मिल गई। किंतु उसे यह आश्चर्य हुआ कि, ऑपरेशन से पहले मिलने आई नर्स उसे फिर से दिखाई नहीं दी।

वास्तव में मरीज़ के कमरे में आई महिला कोई नर्स नहीं,
बल्कि उसी अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर थी।
जिनका काम मरीजों को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से संचालित करना था।
उन्हें ऑपरेशन के लिए संतुष्ट करना था, और उनपर मरीज़ शक भी नहीं कर सकता था।
इस महिला डॉक्टर ने अपना काम मरीज़ के कमरे में गुलदस्ता सजाते हुए, बहुत खूबसूरती से किया।
उसने मरीज़ के दिल और दिमाग में बिठा दिया कि, जो डॉक्टर इसका ऑपरेशन करेगा वो
दुनिया का मशहूर और सबसे सफल डॉक्टर है जिसका हर ऑपरेशन सफल ऑपरेशन है और इन सब के साथ मरीज़ स्वयं सकारात्मक तरीके से सुधार की तरफ लौट आया।
आज ज्ञान ने सिद्ध कर दिया कि रोगी जितनी दृढ़ता से रोग को नियंत्रित करने का वादा करता है,
उतनी ही दृढ़ता से रोग पर जीत दर्ज कर सकता है ।
यह सत्य है कि उपचार केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है।
दवाइयाँ अपना काम बेशक करती हैं, पर असली बदलाव विश्वास से ही शुरू होता है।

जब मरीज मन मे पॉजिटिविटी रखे कि वह ठीक होगा,
तो उसकी हर कोशिका उसी दिशा में जुट जाती हैं। डर शरीर को कमजोर करता है,
जबकि भरोसा उसे लड़ने की ताकत देता है।
मन के हारे हार है। मन के जीते जीत।
नोट: कोरोना काल में पढ़ी सबसे खूबसूरत कहानियों में से एक कहानी है यह
-टीशा
 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

112 ..हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए

हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए 


लड़कियों के एक विद्यालय में नई अध्यापिका बहुत खूबसूरत थी, बस उम्र थोड़ी अधिक हो रही थी, लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी। सभी छात्राएं उसे देखकर तरह-तरह के अनुमान लगाया करती थीं। एक दिन किसी कार्यक्रम के दौरान जब छात्राएं उसके इर्द-गिर्द खड़ी थीं, तो एक छात्रा ने बातों-बातों में ही उससे पूछ लिया, "मैडम, आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की?...??


अध्यापिका ने कहा, "पहले एक कहानी सुनाती हूं।" उसने कहा, "एक महिला को बेटे की लालसा में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसे धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छा अनुसार बेटा पैदा कर दे। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो-रोकर दुआ करती रही...!!

अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझ कर शांत हो गया। फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनिया से चली जाती...!!

अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आंसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी जिंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनियां से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए...!!अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं। 

जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं, 'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना...!!अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सब कुछ कर सकती है, सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके...!!

एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए वह जानबूझकर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली, "पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं...!!

इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है। 
वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। 
हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए...!!
अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। 
उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। 
रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। 
यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझ कर शांत हो गया।
 
फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनिया से चली जाती...!!
अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आँसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी जिंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनिया से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए...!!
अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं। 
जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं, 
'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना...!!

अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सब कुछ कर सकती है, 
सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके...!!एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए वह जानबूझकर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली, 

"पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं...!!इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है। वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। 

हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए 
और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए...!!!!!
-पूजा मिश्रा

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

111 ..चीनी भाषा दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है


स्वामी रामतीर्थ  जापान गए। जिस जहाज पर वह थे, एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था। अब चीनी भाषा सीखनी बहुत कठिन बात है। शायद मनुष्य की जितनी भाषाएं हैं, उनमें सबसे ज्यादा कठिन बात है। क्योंकि चीनी भाषा के कोई वर्णाक्षर नहीं होते, कोई क ख ग नहीं होता। वह तो चित्रों की भाषा है। इतने चित्रों को सीखना नब्बे वर्ष की उम्र में! अंदाजन किसी भी आदमी को दस वर्ष लग जाते हैं ठीक से चीनी भाषा सीखने में।

चीनी भाषा (विशेषकर मंदारिन) 
दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा बोली जाने 
वाली भाषाओं में से एक है, 
जिसके 1 अरब से अधिक भाषी हैं। 
यह एक टोनल (स्वर-आधारित) भाषा है