शुक्रवार, 22 जनवरी 2021

आतंकी ...जितेन्द्र कुमार गुप्ता




"अंतर का दायरा "
“माँ, नींद नहीं आ रही। कहानी कहो न।" पांच  साल के सोनू ने बिस्तर पर लेटे -लेटे माँ,मधु से मनुहार की। आतँकियों से मुठभेड़ में शहीद हुए लेफ्टीनेंट अरूण की पत्नी थी मधु। पति की मृत्यु के बाद मिले रूपये घर बनवाने में खत्म हो गये। घर में बूढ़े सास-ससुर भी थे । बस, पेंशन पर  किसी तरह गुजारा हो रहा था। नन्हा सोनू हालात रोज देखता और जल्दी से जल्दी बड़ा होकर माँ के लिये , दादा-दादी के लिये कुछ करना चाहता था। बेटे को पढ़ा- लिखा कर फौजी बनाना ही सपना था इसलिये रोज पति की बहादुरी के किस्से सुनाती और रोज हंसकर पूछती,"मेरा राजा बेटा क्या बनेगा?" पहले तो  सोनू झट से ,कभी फौजी,कभी डॉक्टर,तो कभी-कभी पायलट कह देता था।
आज भी सुबह जब मधु ने हंसकर पूछा," मेरा राजा बेटा क्या बनेगा ?" 
"सोचूंगा।" सोनू का जवाब अचकचा गया था  मधु को। मन में कुछ खटक रहा था। 
अचानक सोनू उठकर बैठ गया।
"मैने सोच लिया माँ। क्या बनना है बड़े होकर।  खूब पैसे कमाऊंगा। 
फिर हम सब खूब आराम से रहेंगे।" सोनू की आँखों में चमक थी।
"अच्छा वो कैसे?" 
"आतंकी बनकर सरेन्डर कर दूंगा।"
मधु सन्न थी और सोनू की निगाह अटकी थी, अखबार में छपी न्यूज पर..
सीमा पर हुए शहीद की शहादत को दस लाख  और सरेन्डर करने वाले आतंकी को दो करोड़...। 
अंतर का दायरा बहुत बड़ा था।
-जितेन्द्र कुमार गुप्ता

गुरुवार, 21 जनवरी 2021

फ्राड

लघु कथा
फ्राड कौन


यह एक दिलचस्प वाकया है।
एक फाइनेंस कंपनी से फोन आता है कि 4 लाख का लोन आप ले सकते हैं। मैंने कहा घर आ जाओ बात करते हैं। अगले दिन सुबह 10 बजे दो युवक आ गए। सबकुछ ठीक था, लेकिन मामला मेरे पेशे पर अटक गया।
- उसने कहा की हम पत्रकार को लोन नहीं देते हैं।
- क्यों भाई? मैंने पूछा। 
- हम पुलिस और वकील को भी नहीं लोन नहीं देते हैं। उन्होंने कहा।
- ऐसा क्यों ? मैंने फिर पूछा।
- कंपनी की पॉलिसी है। दोनों एक साथ बोले। वे भी मुस्करा रहे थे और मैं भी।
- अच्छा है। फोन करने से पहले पेशा पूछ लिया करो भाई। या झांसा देने की फिराक में रहते हो। सूदखोरों के चंगुल में फंसना कौन चाहता है? मुझे तो यकीन नहीं था कि तुम लोग आओगे। आ भी गए तो बात नहीं बनेगी यह भी यकीन था। मैंने थोड़ा रोष में कहा।
- क्यों? अब उन्होंने सवाल किया।
- क्योंकि हमसे फ्राड करना आसान नहीं है प्यारे....। मैंने मुस्कुरा दिया।
- वो तो है...कहते हुए वे दोनों चले गए।
हालांकि इस बीच वह चाय पी चुके थे।
अच्छी चाय पिलाने के लिए श्रीमती जी की तारीफ भी की....।
--
- ओमप्रकाश तिवारी
अमर उजाला, रोहतक

बुधवार, 20 जनवरी 2021

वास्तव मे माता ही है गाय...चेतन ठकरार




एक दिन मंगलवार की सुबह वॉक करके रोड़ पर बैठा हुआ था,हल्की हवा और सुबह का सुहाना मौसम बहुत ही अच्छा लग रहा था,तभी वहाँ एक कार आकर रूकी, और उसमें से एक वृद्ध उतरे,अमीरी उसके लिबाज और व्यक्तित्व दोनों बयां कर रहे थे। वे एक पॉलीथिन बैग ले कर मुझसे कुछेक दूर ही एक सीमेंट के चबूतरे परबैठ गये.

पॉलीथिन चबूतरे पर उंडेल दी,उसमे गुड़ भरा हुआ था,अब उन्होने आओ आओ करके पास ने ही खड़ी बैठी गायो को बुलाया,सभी गाय पलक झपकते ही उन बुजुर्ग के इर्द गिर्द ठीक ऐसे ही आ गई जैसे कई महीनो बाद बच्चे अपने बाप को घेर लेते हैं.

कुछ को उठाकर खिला रहे थे तो कुछ स्वयम् खा रही थी,वे बड़े प्रेम से उनके सिर पर हाथ फेर रहे थे।कुछ ही देर में गाय अधिकांश गुड़ खाकर चली गई,इसके बाद जो हुआ वो वो वाक्या हैं जिसे मैं ज़िन्दगी भर नहीं भुला सकता.

हुआ यूँ की गायो के खाने के बाद जो गुड़ बच गया था वो बुजुर्ग उन टुकड़ो को उठा उठा कर खाने लगे,मैं उनकी इस क्रिया से अचंभित हुआ पर उन्होंने बिना किसी परवाह के कई टुकड़े खाये और अपनी गाडी की और चल पड़े।

मैं दौड़कर उनके नज़दीक पहुँचा और बोला "अंकल जी क्षमा चाहता हूँ पर अभी जो हुआ उससे मेरा दिमाग घूम गया क्या आप मेरी जिज्ञाषा शांत करेंगे की आप इतने अमीर होकर भी गाय का झूँठा गुड क्यों खाया ??"

उनके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान उभरी उन्होंने खिड़की वापस बंद की और मेरे कंधे पर हाथ रख वापस सीमेंट के चबूतरे पर आ बैठे,और बोले "ये जो तुम गुड़ के झूँठे टुकड़े देख रहे हो ना बेटे मुझे इनसे स्वादिष्ट आज तक कुछ नहीं लगता।जब भी मुझे वक़्त मिलता हैं मैं अक्सर इसी जगह आकर अपनी आत्मा में इस गुड की मिठास घोलता हूँ।"

"मैं अब भी नहीं समझा अंकल जी आखिर ऐसा क्या हैं इस गुड में ???"

वे बोले "ये बात आज से कोई 40 साल पहले की हैं उस वक़्त मैं 22 साल का था घर में जबरदस्त आंतरिक कलह के कारण मैं घर से भाग आया था,परन्तू दुर्भाग्य वश ट्रेन में कोई मेरा सारा सामान और पैसे चुरा ले गया।

इस अजनबी शहर में मेरा कोई नहीं था,भीषण गर्मी में खाली जेब के दो दिन भूखे रहकर इधर से उधर भटकता रहा,और शाम को जब भूख मुझे निगलने को आतुर थी तब इसी जगह ऐसी ही एक गाय को एक महानुभाव गुड़ डालकर गया,यहाँ एक पीपल का पेड़ हुआ करता था तब चबूतरा नहीं था, मैं उसी पेड़ की जड़ो पर बैठा भूख से बेहाल हो रहा था, मैंने देखा की गाय की गाय ने गुड़ छुआ तक नहीं और उठ कर चली गई, मैं कुछ देर किंकर्तव्यविमूढ़सोचता रहा और फिर मैंने वो सारा गुड़ उठा लिया और खा लिया।मेरी मृतप्रायः आत्मा में प्राण आ गये।

मैं उसी पेड़ की जड़ो में रात भर पड़ा रहा, सुबह जब मेरी आँख खुली तो काफ़ी रौशनी हो चुकी थी, मैं नित्यकर्मो से फारिक हो किसी काम की तलास में फिर सारा दिन भटकता रहा पर दुर्भाग्य मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा था, एक और थकान भरे दिन ने मुझे वापस उसी जगह निराश भूखा खाली हाथ लौटा दिया।

शाम ढल रही थी, कल और आज में कुछ भी तो नहीं बदला था, वही पीपल,वही भूखा मैं और वही गाय।कुछ ही देर में वहाँ वही कल वाले सज्जन आये और कुछेक गुड़ की डलिया गाय को डालकर चलते बने,गाय उठी और बिना गुड़ खाये चली गई, मुझे अज़ीब लगा परन्तू मैं बेबस था सो आज फिर गुड खा लिया मैंने और वही सो गया,सुबह काम तलासने निकल गया,आज शायद दुर्भाग्य की चादर मेरे सर पे नहीं थी सो एक ढ़ाबे पे पर मुझे झूँठे बर्तन धोने का काम मिल गया।

कुछ दिन बाद जब मालिक ने मुझे पहली पगार दी तो मैंने 1 किलो गुड़ख़रीदा और किसी दिव्य शक्ति के वशीभूत 7 km पैदल चलकर उसी पीपल के पेड़ के नीचे आया नज़र दौड़ाई तो गाय भी दिख गई,मैंने सारा गुड़ उस गाय को डाल दिया,इस बार मैं अपने जीवन में सबसे ज्यादा चौंका क्योकि गाय सारा गुड़ खा गई।

जिसका मतलब साफ़ था की गाय ने 2 दिन जानबूझ कर मेरे लिये गुड़ छोड़ा था, मेरा हृदय भर उठा उस ममतामई स्वरुप की ममता देखकर, मैं रोता हुआ ढ़ाबे पे पहुँचा और बहुत सोचता रहा। फिर एक दिन मुझे एक फर्म में नौकरी मिल गई, दिन बे दिन मैं उन्नति और तरक्की के शिखर चढ़ता गया, शादी हुई बच्चे हुये आज मैं खुद की फर्म का मालिक हूँ, जीवन की इस लंबी यात्रा में मैंने कभी भी उस गाय माता को नहीं भुलाया...।

मैं अक्सर यहाँ आता हूँ और इन गायो को गुड़ डालकर इनका झूँठा गुड़ खाता हूँ, मैं लाखो रूपए गौ शालाओं में चंदा देता हूँ, परन्तू मेरी मृग तृष्णा यही आकर मिटती हैं बेटे।"

मैं देख रहा था वे बहुत भावुक हो चले थे, "समझ गये अब तो तुम", मैंने सिर हाँ में हिलाया, वे चल पड़े, गाडी स्टार्ट हुई और निकल गई।

मैं उठा उन्ही टुकड़ो में से एक टुकड़ा उठाया मुँह में डाला सचमुच वो कोई साधारण गुड़ नहीं था उसमे कोई दिव्य मिठास थी जो जीभ के साथ आत्मा को भी मीठा कर गई।

मंगलवार, 19 जनवरी 2021

टॉप स्टोरी ....पक्षियों सी बोली, घोंसलों से घर

 अफ्रीकी देश तंजानिया अनोखी आदिम जनजातियों की मातृभूमि रही है और उन्हीं में से एक है पाषाण कालीन शिकारी जनजाति- हडजा।   

 हडजा समुदाय की जिसका सिर्फ इतिहास पाषाण युग से नहीं चला आ रहा बल्कि यहां की परंपराएं आज भी उतनी ही प्राचीन हैं। हडजा लोग अपना घर गुफाओं और पठारी इलाकों में ठीक उसी तरह बनाते हैं जैसे कोई पक्षी अपना घोंसला बनाता है। ये लोग लाठी और टहनियों को एक-दूसरे से बुनकर अपने झोपड़े का निर्माण करते हैं जो दूर से देखने पर जमीन पर पड़े किसी विशालकाय घोंसले के जैसे ही लगते हैं। 

पक्षियों सी बोली, घोंसलों से घर...

कालीन परिस्थितियों में ही अपने आप को समेटे हुए निवास कर रहे हैं। पुरातत्वविदों का मानना है कि हडजा लोग पाषाण युग के समय से ही अपने उसी परिवेश में आज तक रह रहे हैं और वैसा ही व्यवहार भी कर रहे हैं। यहां तक कि ये लोग एक-दूसरे से बातचीत के लिए किसी भाषा का नहीं बल्कि मुंह में अपनी जीभ से स्मैकिंग या पॉपिंग जैसी ध्वनि के जरिए सिटी जैसी आवाज निकालते हैं। होठों से निकली इसी तरह की आवाज के जरिए ये अपने समुदाय के सदस्यो से संवाद स्थापित करते हैं। ये लोग न तो बोलना जानते हैं, न पढ़ना-लिखना। मुंह से निकली सीटी जैसी आवाज की विविधता से ही ये लोग अपने मनोभावों को एक-दूसरे को जाहिर करते हैं।


ऐसे ही चली आ रही परंपरा.....

भाषा के अभाव में हडजा लोगों का कोई लिखित इतिहास मौजूद नहीं है। वे एक पीढ़ी से अपनी दूसरी पीढ़ी तक अपने इतिहास को अपनी खुद की सीटी बजाने वाली भाषा 'क्लिकिंग' के जरिए ही पहुंचाते हैं। क्लिकिंग भाषा दुनिया की सबसे पुरानी भाषाओं में से एक है जो सिर्फ इस समुदाय में सीमित है। हडजा लोग ना किसी कैलेंडर का उपयोग करते हैं और ना ही किसी घड़ी का। ये लोग आज भी सूर्य और चन्द्रमा की गतिविधियों से अपने समय का निर्धारण करते हैं।



हडजा 10 हजार साल पुरानी सभ्यता के साथ ही जी रहे हैं। ये धनुष और तीर से बंदर, लंगूर, पक्षी, हिरण, मृग और भैंसों का शिकार करते हैं और समूह में रहते हैं। हडजा धरती पर सबसे ज्यादा समय तक शिकार पर जीवित रहने वाली बची हुई जनजातियों में से एक है। हडजा लोगों के हर दिन के पांच घंटे शिकार में ही बीतते हैं। इसके बाद समुदाय के वयस्क पुरुष नशे में अपना समय व्यतीत करते हैं। हडजा जनजाति के लोग अपने पछियों के घोंसले जैसे झोपड़े में नौ-दस घंटे तक एक ही मुद्रा में आराम करते हैं।

कच्चा मांस खाता है ये शिकारी समुदाय

पिछले हजारों सालों में उनके जीवन के तरीके में कोई भी बदलाव नहीं आया है। वे अपने दिन की शुरुआत शिकार करने से शुरू करते हैं और शिकार के लिए एक जगह पर कुछ हफ्तों के लिए अपना शिविर बनाते हैं और फिर आगे बढ़ जाते हैं। हडजा लोग 5 या 6 साल पहले तक कच्चा मांस ही खाया करते थे। हालांकि, अब जाकर ये लोग एक या दो मिनट के लिए मांस को आग में भूनने लगे हैं। हडजा जनजाति के पुरुष शिकारी होते हैं। वे एडेनियम नामक झाड़ी के पत्तों से जहर प्राप्त करते है और उस जहर को अपने तीर और धनुष में लगाकर जानवरों का शिकार करते हैं जबकि हडजा महिलाएं और बच्चे जामुन, बाओबाब फल, कन्द , मूल जैसे खाद्य पदार्थो को इकट्ठा करती हैं।

शादी का बंधन नहीं ...

हडजा जनजाति के भीतर कोई नेता नहीं होता है। यहां सभी लोग समान होते हैं, न कि बड़े-छोटे। ये खानाबदोश लोग भोजन और पानी की तलाश में एक स्थान से दूसरे स्थान तक पैदल चलते रहते हैं। हडजा लोगो में शादी नाम की कोई प्रथा या परंपरा नहीं होती है, ये एक उन्मुक्त समाज है। ये रात में आग जलाकर कैंप फायर बनाते हैं और आग के चारों तरफ समुदाय की सभी औरतें और पुरुष सदस्य एक-दूसरे के आसपास बैठते हैं। वे एक-दूसरे को अपनी 'क्लिकिंग' भाषा में कहानी सुनाते हैं और बातचीत और नाच-गाना करते हैं।


मध्य रात्रि को जब ये कार्यक्रम खत्म हो जाता है, तो उसके बाद ये लोग उसी आग के चारों तरफ युगल जोड़े में सोते हैं और एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं। अगर किसी किसी जोड़े का संबंध लंबे समय के लिए हो जाता है तो वे अपनी इच्छा से पति-पत्नी के रूप में रहते हैं, लेकिन इसे किसी शादी नाम की परंपरा से नहीं जोड़ा जाता। इस समाज में चाहे पुरुष हो या कि औरत ये सभी अपनी अपनी पसंद से अपनी जोड़ियां हमेशा बदलते रहते हैं और हर रात आग के चारों तरफ बदल-बदल कर एक-दूसरे के साथ शारीरिक संबंध बनाते हैं।

पूर्णिमा पर होता है खास उत्सव....

हडजा जनजाति में पूर्णिमा की रात का बहुत धार्मिक महत्व होता है। पूर्णिमा की रात्रि को हडजा लोग एक विशेष धार्मिक आयोजन करते है जिसे 'एपेम' कहते हैं। इस आयोजन के दौरान पुरुष अपने पूर्वजों की तरह कपड़े पहनते हैं और अपने समुदाय कि महिलाओं और बच्चों के लिए नृत्य करते हैं। इसी एपेम कि धार्मिक प्रदर्शनी के दौरान इस समुदाय कि वे लड़कियां जिन्हें पहली बार महावारी हुई होती है, वे इस समुदाय के उस लड़के के साथ शारीरिक संबंध बनाती हैं जिसने पहले किसी औरत के साथ शारीरिक संबंध नहीं बनाया हो। इस समारोह में जंगली जानवरों का शिकार करने वाले पुरुषों को सम्मानित भी करते हैं। उन्हें अपनी पसंद की महिला से शारीरिक संबंध बनाने की आजादी भी होती है।
साभार....
https://navbharattimes.indiatimes.com/world/other-countries/all-you-need-to-know-about-hadza-tribe-of-africa-which-talks-in-whistling-and-lives-in-nest-like-houses/articleshow/80315866.cms?story=5


रविवार, 16 दिसंबर 2018

होरी में दिल चोरी....किरण मानु बरनवाल 'अंशु'


पति की व्यस्तता से परेशान पत्नी किट्टी पार्टी तो कभी महिला मंडल की सदस्य बन मॉडर्न होने का दंभ भरते हुए समय व्यतीत कर रही थी। बच्चे पहले ही पंख लगा घोंसले से फुर्र हो चुके थे। मॉडर्न पत्नी एकाएक इस जीवनशैली से ऊबने लगी। डूबते का सहारा ऊपरवाले, सो उसने भगवान की भक्ति में ख़ुद को लीन कर लिया। दिन भर भजन-कीर्तन पूजा-पाठ, आदर्श की बातें करते-करते दो चार बरस में ही सबसे कटने लगी।

   विदेशी बच्चे घर आने पर माताजी का हाल देख बेहाल हो गये। पिता तो अपनी दुनिया में मग्न सूटबूट में बुढापा छिपाये जवानी की कुलांचें भर रहे थे। मां बेचारी योगन बनी जा रही थी। माता जी को स्मार्ट बनाने के लिए स्मार्टफ़ोन का सहारा लिया और सिखा दिया स्मार्टफोन उपयोग करना। धीरे-धीरे माताजी फ़ेसबुक की दुनिया में पदार्पण करने लगी।
फ़ेसबुक पर प्रोफ़ाइल खोला, बेचारी वृद्धा का कोई भी मित्र बनने को तैयार नहीं हुआ। पत्नी ने फ़ेक आई डी बनाई , ख़ूबसूरत-सी कन्या से सबको इश्क होने लगा। लाईक कमेंट्स आने लगे। इसी सिलसिले में बांके जवान का निमंत्रण स्वीकार कर दिल हार बैठी। चैटिंग का क्रम जारी हुआ तो होली पर साक्षात मिलने पर आ अटका। वृद्धा परेशान बगीचे में उस कमनीय काया को कहां से ले जाये।

ख़ैर, किसी तरह दिल कड़ा कर "सो-कॉल्ड" प्रियतम को सच बताने की ठानी। जी-जान से पार्लर  से मेकअप करा चल पड़ी मायावी दुनिया के आशिक से मिलने। गाल गुलाल से भी ज़्यादा गुलाबी हो रहे थे।
अरररर....ये क्या? जिन्होनें पत्नी को कभी प्यार के दो बोल नहीं बोले, वो फ़ेसबुकिया प्रेमिका के लिए तारे तोड़ने का वादा किया करता था। राहों पर फूल बिछाने को तत्पर आशिक तो ख़ुद का पति निकला। दोनों की आँखें टकराती हैं, होंठ कांप रहे थे।

एक दूसरे को धोखा देते हुए नयी ज़िंदगी के सपने धराशायी हो रहे थे। हाथों के तोते उड़ गये, महंगे उपहार मुंह चिढ़ा रहे थे।
जीवन फिर उसी बिंदु पर आ अटका जहाँ से पति-पत्नी चले थे।

-किरण मानु बरनवाल 'अंशु'

रविवार, 9 दिसंबर 2018

सफलतम मैनेजर..."एक आम गृहिणी"


कई साल पहले एक बड़े कॉर्पोरेट हाउस ने बेंगलोर में मैनेजमेंट गुरुओं 
का एक सम्मेलन कराया था।

उसमे एक सवाल पूछा गया था। आप सफलतम मैनेजर किसे मानते हैं?

विशेषज्ञों ने...
रोनाल्ड रीगन से नेल्सन मंडेला तक,
चर्चिल से गांधी तक,
टाटा से हेनरी फोर्ड तक,
चाणक्य से बिस्मार्क तक,
और न जाने कितने और नाम सुझाये।

पर ज्यूरी ने कुछ और ही सोच रखा था।
सही उत्तर था सफलतम प्रबंधक है...

"एक आम गृहिणी"

* एक गृहिणी परिवार से किसी का ट्रांसफर नहीं कर सकती।
* किसी को सस्पेंड नहीं कर सकती।
* किसी को टर्मिनेट नहीं कर सकती।
और,
* किसी को अपॉइंट भी नहीं कर सकती।
परन्तु फिर भी सबसे काम करवाने की क्षमता रखती है।
किससे, क्या और कैसे कराना है...
कब प्रेम के राग में हौले से काम पिरोना है...
और कब राग सप्तक पर उच्च स्वर में भैरवी सुना कर जरूरी कामों को 
अंजाम तक पहुंचाना है...

उसे पता होता है।
मानव संसाधन प्रबंधन का इससे बेहतर क्या उदहारण हो सकता है?
बड़े बड़े उद्योगों में भी कभी कभी इसलिए काम रुक जाता है क्योंकि जरूरी फ्यूल नहीं था या कोई स्पेयर पार्ट उपलब्ध नहीं था या कोई रॉ मटेरियल कम पड़ गया।

पर किसी गरीब से गरीब घर मे भी नमक कम नहीं पड़ता।
शायद बहुत याद करने पर भी आप को वह दिन याद न आ पाए जिस दिन मां आपको खाने में सिर्फ इसलिए कुछ नहीं दे पाई कि बनाने को कुछ नही था या गैस खत्म हो गई थी या कुकर का रिंग खराब हो गया था।

हर कमोबेशी और हर समस्या का विकल्प एक गृहिणी रखती है।
वो भी बिल्कुल खामोशी से।
सामग्री प्रबंधन एवं संचालन, संधारण प्रबंधन का इससे बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है ?

अचानक बड़ा खर्च आ जाने पर या किसी की बीमारी पर, बाकी सब बगलें झांकने लगते हैं।
लेकिन वो फटाफट पुराने संदूको में छुपा कर रखे बचत के पैसे निकालती है।
कुछ गहने गिरवी रखती है। कुछ घरों से सिर्फ साख के आधार पर उधार लेती है।
पर पैसे का इंतजाम कर ही लाती है।
संकटकालीन अर्थ प्रबंध का इससे बेहतर क्या उदाहरण हो सकता है?

निचले इलाकों में बेमौसम बारिश में घर में पानी भरने लगे या बिना खबर अचानक चार मेहमान आ जायें।
सब के लिए आपदा प्रबंधन की योजना रहती है उसके पास।
और...
सारे प्रबंधन के लिए पास में है बस कुछ आंसू और कुछ मुस्कान।
लेकिन...
जो सबसे बड़ी चीज होती है...
वो है...
जिजीविषा, समर्पण और प्रेम
सफल गृहिणी का सबसे बड़ा संबल होता है सब्र।
वही सब्र...
जिसके बारे में किसी ने बहुत सटीक कहा है...

सब्र का घूंट दूसरों को पिलाना कितना आसान लगता है।
ख़ुद पियो तो, क़तरा क़तरा ज़हर लगता है।!

रविवार, 7 अक्तूबर 2018

एक चुटकी ज़हर.......

सिर्फ एक चुटकी ज़हर

आरती नामक एक युवती का विवाह हुआ और वह अपने पति और सास के साथ अपने ससुराल में रहने लगी। कुछ ही दिनों बाद आरती को आभास होने लगा कि उसकी सास के साथ पटरी नहीं बैठ रही है। सास पुराने ख़यालों की थी और बहू नए विचारों वाली।
आरती और उसकी सास का आये दिन झगडा होने लगा।
दिन बीते, महीने बीते साल भी बीत गया न तो सास टीका - टिप्पणी करना छोड़ती और न आरती जवाब देना। हालात बद से बदतर होने लगे। आरती को अब अपनी सास से पूरी तरह नफरत हो चुकी थी. आरती के लिए उस समय स्थिति और बुरी हो जाती जब उसे भारतीय परम्पराओं के अनुसार दूसरों के सामने अपनी सास को सम्मान देना पड़ता। अब वह किसी भी तरह सास से छुटकारा पाने की सोचने लगी.
एक दिन जब आरती का अपनी सास से झगडा हुआ और पति भी अपनी माँ का पक्ष लेने लगा तो वह नाराज़ होकर मायके चली आई।
आरती के पिता आयुर्वेद के डॉक्टर थे. उसने रो - रो कर अपनी व्यथा पिता को सुनाई और बोली .... “आप मुझे कोई जहरीली दवा दे दीजिये जो मैं जाकर उस बुढ़िया को पिला दूँ नहीं तो मैं अब ससुराल नहीं जाऊँगी…”
बेटी का दुःख समझते हुए पिता ने आरती के सिर पर प्यार से 
हाथ फेरते हुए कहा ... “बेटी, अगर तुम अपनी सास को ज़हर 
खिला कर मार दोगी तो तुम्हें पुलिस पकड़ ले जाएगी और साथ ही मुझे भी क्योंकि वो ज़हर मैं तुम्हें दूंगा. इसलिए ऐसा करना ठीक नहीं होगा.”
लेकिन आरती जिद पर अड़ गई ... “आपको मुझे ज़हर देना ही होगा ….
 अब मैं किसी भी कीमत पर उसका मुँह देखना नहीं चाहती !”
कुछ सोचकर पिता बोले .... “ठीक है जैसी तुम्हारी मर्जी। लेकिन मैं तुम्हें जेल जाते हुए भी नहीं देख सकता इसलिए जैसे मैं कहूँ वैसे तुम्हें करना होगा ! मंजूर हो तो बोलो ?”
“क्या करना होगा ?”, आरती ने पूछा.
पिता ने एक पुडिया में ज़हर का पाउडर बाँधकर आरती के हाथ में देते हुए कहा .... “तुम्हें इस पुडिया में से सिर्फ एक चुटकी ज़हर रोज़ अपनी सास के भोजन में मिलाना है।
कम मात्रा होने से वह एकदम से नहीं मरेगी बल्कि धीरे - धीरे आंतरिक रूप से कमजोर होकर 5 से 6 महीनों में मर जाएगी. लोग समझेंगे कि वह स्वाभाविक मौत मर गई.”
पिता ने आगे कहा ....“लेकिन तुम्हें बेहद सावधान रहना होगा ताकि तुम्हारे पति को बिलकुल भी शक न होने पाए वरना हम दोनों को जेल जाना पड़ेगा ! इसके लिए तुम आज के बाद अपनी सास से बिलकुल भी झगडा नहीं करोगी बल्कि उसकी सेवा करोगी।
 यदि वह तुम पर कोई टीका टिप्पणी करती है तो तुम चुपचाप सुन लोगी, बिलकुल भी प्रत्युत्तर नहीं दोगी ! बोलो कर पाओगी ये सब ?”
आरती ने सोचा, छ: महीनों की ही तो बात है, फिर तो छुटकारा मिल ही जाएगा, उसने पिता की बात मान ली और ज़हर की पुडिया लेकर ससुराल चली आई.
ससुराल आते ही अगले ही दिन से आरती ने सास के भोजन में एक चुटकी ज़हर रोजाना मिलाना शुरू कर दिया।
 साथ ही उसके प्रति अपना बर्ताव भी बदल लिया. अब वह सास के किसी भी ताने का जवाब नहीं देती बल्कि क्रोध को पीकर मुस्कुराते हुए सुन लेती।
रोज़ उसके पैर दबाती और उसकी हर बात का ख़याल रखती।
सास से पूछ - पूछ कर उसकी पसंद का खाना बनाती, उसकी हर आज्ञा का पालन करती।

कुछ हफ्ते बीतते बीतते सास के स्वभाव में भी परिवर्तन आना शुरू हो गया. बहू की ओर से अपने तानों का प्रत्युत्तर न पाकर उसके ताने अब कम हो चले थे बल्कि वह कभी कभी बहू की सेवा के बदले आशीष भी देने लगी थी।
धीरे - धीरे चार महीने बीत गए, आरती नियमित रूप से सास को रोज़ एक चुटकी ज़हर देती आ रही थी।
किन्तु उस घर का माहौल अब एकदम से बदल चुका था, सास बहू का झगडा पुरानी बात हो चुकी थी. पहले जो सास आरती को गालियाँ देते नहीं थकती थी, अब वही आस - पड़ोस वालों के आगे आरती की तारीफों के पुल बाँधने लगी थी।
 बहू को साथ बिठाकर खाना खिलाती और सोने से पहले भी जब तक बहू से चार प्यार भरी बातें न कर ले, उसे नींद नही आती थी।
छठा महीना आते आते आरती को लगने लगा कि उसकी सास उसे बिलकुल अपनी बेटी की तरह मानने लगी हैं। उसे भी अपनी सास में माँ की छवि नज़र आने लगी थी।
जब वह सोचती कि उसके दिए ज़हर से उसकी सास कुछ ही दिनों में मर जाएगी तो वह परेशान हो जाती थी।
इसी ऊहापोह में एक दिन वह अपने पिता के घर दोबारा जा पहुंची और बोली ... “पिताजी, मुझे उस ज़हर के असर को ख़त्म करने की दवा दीजिये क्योंकि अब मैं अपनी सास को मारना नहीं चाहती … !
 वो बहुत अच्छी हैं और अब मैं उन्हें अपनी माँ की तरह चाहने लगी हूँ!”
पिता ठठाकर हँस पड़े और बोले ... “ज़हर ? कैसा ज़हर ? मैंने तो तुम्हें ज़हर के नाम पर हाजमे का चूर्ण दिया था … हा हा हा !!!”
"बेटी को सही रास्ता दिखाये,
माँ बाप का पूर्ण फर्ज अदा करे"