मंगलवार, 11 अगस्त 2026

126 ..एक एफ आई आर ऐसा भी

 


लाला बहुत परेशान था. उसने कई जगह फोन किया अन्ततः सोचा, थाने जाना ही ठीक रहेगा.

उसने थाने जाकर आपबीती सुनाई-
"साहब! मेरा सेल्समेन तेईस लाख रुपये लेकर भाग गया है, दो नम्बर का पैसा नहीं है; दो दिन की बिक्री की रकम थी. दरअसल बैंक के सभी काम वही करता था,
रोज की तरह कल भी वह पैसा लेकर बैंक गया और वापस नहीं आया. वह बैंक भी नहीं पहुँचा, उसका मोबाइल भी बंद है; कृपया उसे पकड़िए".
थानेदार व डिप्टी-थानेदार ने सब बातें ध्यान से सुना और सेठ जी को दिलासा देते हुए कहा-
"हकीकत पता करके बताते हैं,आप निश्चिंत होकर घर जाइए, एफ आई आर की कॉपी बाद में ले जाना".
लाला जी के जाने के बाद थानेदार ने सब इंस्पेक्टर से कहा-
"एफ आई आर लिख लो और उसमें लिखना कि नौकर की लाश फला जगह पड़ी मिली,
अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ लूट व हत्या का मामला दर्ज कर लिया है. तफ़तीश जारी है, बाक़ी देख लेना."
लेने के देने पड़े

रविवार, 9 अगस्त 2026

125 ....दुख का कारण....अलक




एक व्यापारी को नींद न आने की बीमारी थी। उसका नौकर मालिक की बीमारी से दुखी रहता था। एक दिन व्यापारी अपने नौकर को सारी संपत्ति देकर चल बसा। 

सम्पत्ति का मालिक बनने के बाद नौकर रात को सोने की कोशिश कर रहा था, किन्तु अब उसे नींद नहीं आ रही थी। एक रात जब वह सोने की कोशिश कर रहा था, उसने कुछ आहट सुनी। 
देखा, एक चोर घर का सारा सामान समेट कर उसे बांधने की कोशिश कर रहा था, परन्तु चादर छोटी होने के कारण गठरी बंध नहीं रही थी।

नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला, 
इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा,  भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ। 
इसी ने मेरे मालिक की नींद उड़ा रखी थी और अब मेरी। 

उसकी बातें सुन चोर की भी आंखें खुल गई।

शुक्रवार, 31 जुलाई 2026

124 ...तो यह उसे उसके रोग से ज्यादा दर्द देता

 क आदमी ने एक बहुत ही खूबसूरत लड़की से शादी की। शादी के बाद दोनो की ज़िन्दगी बहुत प्यार से गुजर रही थी। वह उसे बहुत चाहता था और उसकी खूबसूरती की हमेशा तारीफ़ किया करता था। लेकिन कुछ महीनों के बाद लड़की चर्मरोग (skin Disease) से ग्रसित हो गई और धीरे-धीरे उसकी खूबसूरती जाने लगी। खुद को इस तरह देख उसके मन में डर समाने लगा कि यदि वह बदसूरत हो गई, तो उसका पति उससे नफ़रत करने लगेगा और वह उसकी नफ़रत बर्दाशत नहीं कर पाएगी।



स बीच एकदिन पति को किसी काम से शहर से बाहर जाना पड़ा। काम ख़त्म कर जब वह घर वापस लौट रहा था, उसका accident हो गया। Accident में उसने अपनी दोनो आँखें खो दी। लेकिन इसके बावजूद भी उन दोनो की जिंदगी सामान्य तरीके से आगे बढ़ती रही। समय गुजरता रहा और अपने चर्मरोग के कारण लड़की ने अपनी खूबसूरती पूरी तरह गंवा दी। वह बदसूरत हो गई, लेकिन अंधे पति को इस बारे में कुछ भी पता नहीं था। इसलिए इसका उनके खुशहाल विवाहित जीवन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।

ह उसे उसी तरह प्यार करता रहा। एकदिन उस लड़की की मौत हो गई। पति अब अकेला हो गया था। वह बहुत दुखी था. वह उस शहर को छोड़कर जाना चाहता था।

सने अंतिम संस्कार की सारी क्रियाविधि पूर्ण की और शहर छोड़कर जाने लगा. तभी एक आदमी ने पीछे से उसे पुकारा और पास आकर कहा, “अब तुम बिना सहारे के अकेले कैसे चल पाओगे? इतने साल तो तुम्हारी पत्नी तुम्हारी मदद किया करती थी.” पति ने जवाब दिया, “दोस्त! मैं अंधा नहीं हूँ। मैं बस अंधा होने का नाटक कर रहा था। क्योंकि यदि मेरी पत्नी को पता चल जाता कि मैं उसकी बदसूरती देख सकता हूँ, तो यह उसे उसके रोग से ज्यादा दर्द देता।

सलिए मैंने इतने साल अंधे होने का दिखावा किया. वह बहुत अच्छी पत्नी थी. मैं बस उसे खुश रखना चाहता था.” .. ...

---सीख--- 
खुश रहने के लिए हमें भी एक दूसरे की कमियों के प्रति आखे बंद कर लेनी चाहिए.. और उन कमियों को नजरअंदाज कर देना चाहिए...

शनिवार, 25 जुलाई 2026

123 ..नौजवान चोर है

 एक बार एक बूढ़े आदमी ने हैअफवाह फैलाई कि उसके पड़ोस में रहने वाला नौजवान चोर  l


यह बात दूर - दूर तक फैल गई आस - पास के लोग उस नौजवान से बचने लगे l नौजवान परेशान हो गया कोई उस पर विश्वास ही नहीं करता था l

तभी गाँव में चोरी की एक वारदात हुई और शक उस नौजवान पर गया उसे गिरफ्तार कर लिया
गया l लेकिन कुछ दिनों के बाद सबूत के अभाव में वह निर्दोष साबित हो गया l निर्दोष साबित होने के बाद वह नौजवान चुप नहीं बैठा, उसने बूढ़े आदमी पर गलत आरोप लगाने के लिए
मुकदमा दायर कर दिया। 

पंचायत में बूढ़े आदमी ने अपने बचाव में सरपंच से कहा l 'मैंने जो कुछ कहा था, वह एक टिप्पणी से अधिक कुछ नहीं था किसी को नुकसान पहुंचाना मेरा मकसद नहीं था।
सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा, 'आप एक कागज के टुकड़े पर वो सब बातें लिखें, जो आपने उस नौजवान के बारे में कहीं थीं, और जाते समय उस कागज के टुकड़े - टुकड़े करके घर के रस्ते पर फ़ेंक दें कल फैसला सुनने के लिए आ जाएँ

बूढ़े व्यक्ति ने वैसा ही किया l
अगले दिन सरपंच ने बूढ़े आदमी से कहा कि फैसला सुनने से पहले आप बाहर जाएँ और उन कागज के टुकड़ों को, जो आपने कल बाहर फ़ेंक दिए थे, इकट्ठा कर ले आएं।
बूढ़े आदमी ने कहा मैं ऐसा नहीं कर सकता। उन टुकड़ों को तो हवा कहीं से कहीं उड़ा कर ले गई होगी। अब वे नहीं मिल सकेंगें, मैं कहाँ - कहाँ उन्हें खोजने के लिए जाऊंगा ?

सरपंच ने कहा 'ठीक इसी तरह, एक सरल - सी टिप्पणी भी किसी का मान - सम्मान उस सीमा तक नष्ट कर सकती है, जिसे वह व्यक्ति किसी भी दशा में दोबारा प्राप्त करने में सक्षम नहीं हो सकता। इसलिए यदि किसी के बारे में कुछ अच्छा नहीं कह सकते, तो चुप रहें।
वाणी पर हमारा नियंत्रण होना चाहिए, ताकि हम शब्दों के दास न बनें।
#ज्वलंत 
#हिंदी ब्लॉगिंग

122 ..जिंदा में भी चमत्कार, मर कर भी चमत्कार!

 मुझे एक कहानी बहुत प्रीतिकर है–सूफियों की कहानी है।


एक फकीर ने एक सम्राट के द्वार पर अपना भिक्षापात्र रखा। सुबह-सुबह थी और सम्राट अपने बगीचे से घूम कर महल में प्रवेश कर रहा था। सम्राट ने कहा, क्या चाहते हो?
फकीर ने कहा, क्या का सवाल नहीं है। एक बात चाहता हूं कि मेरा भिक्षापात्र खाली न रहे। चाहे कंकड़-पत्थरों से भर दो, मगर भर दो। रिक्तता काटती है। खाली नहीं रहना चाहता। मेरा भिक्षापात्र भर दो।
सम्राट ने कहा, यह भी कोई बहुत बड़ा सवाल है! इतना छोटा सा भिक्षापात्र, अभी भरवाए देते हैं!
लेकिन उस फकीर ने फिर कहा कि देखना, खयाल रखना। शर्त यह है कि भिक्षापात्र भरना चाहिए, नहीं तो हटूंगा नहीं द्वार से।



सम्राट ने कहा, अरे पागल! तूने मुझे समझा क्या है, कोई भिखमंगा समझा है? अपने वजीरों को बुला कर कहा कि भर दो सोने से इसका भिक्षापात्र!
स्वर्ण-अशर्फियां डाली गईं। मगर उसका भिक्षापात्र अद्भुत था। डाली गईं स्वर्ण-अशर्फियां, आवाज भी न करें और खो जाएं। खन-खन की आवाज भी न हो। जैसे किसी अतल गहराई में गिर गईं! छोटा सा भिक्षापात्र और जब झांक कर देखो तो उनका पता ही न चले। खजाना खाली होने लगा। दोपहर हो गई, सारी राजधानी इकट्ठी हो गई, खबर आग की तरह फैल गई कि सम्राट ने एक झंझट ले ली। बड़े-बड़े युद्ध जीता, एक फकीर से हारा जा रहा है। और फकीर अपना भिक्षापात्र लिए खड़ा है और अपना चमीटा बजा रहा है।
और वह कहता है कि तब तक नहीं हटूंगा…जब शर्त स्वीकार की है तो मेरा भिक्षापात्र भर दो। और राजा के आंसू निकले आ रहे हैं और राजा की कमर टूटी जा रही है। हीरे-जवाहरात भी चले गए, सोना-चांदी भी चला गया। जो कुछ भी था पास, सब समाप्त हो गया। सांझ होतेऱ्होते खजाने खाली हो गए। वजीरों ने कहा, अब हमारे पास कुछ भी नहीं है।
सम्राट उसके पैरों पर गिर पड़ा और कहा, मुझे क्षमा करो! मगर जाने के पहले एक राज बता जाओ, तुम्हारे इस भिक्षापात्र का क्या रहस्य है?
उस फकीर ने कहा, इसका कोई रहस्य नहीं है। इसे मैंने आदमी की खोपड़ी से बनाया है। न आदमी की खोपड़ी कभी भरती है, न यह भिक्षापात्र कभी भरता है। इसका कोई बड़ा राज नहीं है। ऐसे ही मरघट पर यह खोपड़ी मिल गई थी, इसको घिस-घिस कर, ठीक-ठाक करके मैंने भिक्षापात्र बना लिया। जब मैंने बनाया था भिक्षापात्र, मुझे भी यह राज पता नहीं था। वह तो जब मैंने चीजें इसमें रखीं और खो गईं, तब मैं चौंका कि वाह! वाह रे आदमी! जिंदा में भी चमत्कार, मर कर भी चमत्कार!
प्रस्तुति- स्वामी अद्वैत भारती
बोधि मठ इंटरनेशनल (कोसी)
डुमरी, पूर्णिया, बिहार- 095708 85495

शनिवार, 4 जुलाई 2026

121 सच्ची ताकत एकता में ही निहित है

 



कल बसंत की हल्की धूप लेने को मै अपने घर के पिछले गार्डन में गई..

उस दौरान मैंने कुछ असामान्य देखा: दर्जनों चींटियाँ पानी की एक बड़ी बोतल में गिर गई थीं।

शुरुआत में, जब वे साफ पानी में संघर्ष कर रही थीं, तो ऐसा लगा जैसे वे जीवित रहने के लिए एक-दूसरे को नीचे धकेल रही हों। यह सोचकर मुझे घृणा हुई, इसलिए मैंने अपनी नज़रें हटा लीं।

लेकिन दो घंटे बाद, उत्सुकता के कारण मैंने उन्हें फिर से देखा।

और मैं दंग रह गई।

चींटियाँ एक-दूसरे को डुबो नहीं रही थीं। उन्होंने अपने शरीरों से एक जीवित द्वीप बना लिया था — एक छोटा सा, चलता-फिरता बेड़ा। कुछ नीचे रहकर दूसरों का सहारा बनी हुई थीं, और फिर वे बारी-बारी से अपनी जगह बदल रही थीं ताकि हर किसी को आराम मिल सके।

उनमें से किसी ने भी पहले खुद को बचाने की कोशिश नहीं की।

वे पूरी शांति और बेहतरीन तालमेल के साथ हिल-डुल रही थीं, जैसे वे सभी एक बात समझती हों: जीवित रहना तभी संभव है जब सब साथ हों।

मैंने धीरे से पानी में एक चम्मच डाला। एक-एक करके, चींटियाँ बाहर निकलने लगीं — 
कोई घबराहट नहीं, कोई अफरातफरी नहीं। तभी अचानक, एक कमजोर चींटी
फिसलकर वापस अंदर गिर गई।

और तभी मैंने वह देखा जिसे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी।
आखिरी चींटी, जो पहले से सुरक्षित थी, पीछे मुड़ी। वह डूबने वाली चींटी की ओर वापस गई, मानो कह रही हो, "हिम्मत मत हारो, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी।"

उसने दूसरी चींटी को पकड़ा, लेकिन वह उसे अकेले नहीं उठा सकी।
इसलिए मैंने फिर से चम्मच नीचे किया — और वे दोनों सुरक्षित बाहर निकल आईं।
मैं वहां खामोश खड़ा रही।

मुझे अपनी पहली सोच पर शर्म महसूस हुई — कि वे स्वार्थी थीं। और मैं उस दृश्य से चकित थी
जो मैंने अभी देखा था: अनुशासन, लचीलापन, एकता और निस्वार्थ भाव। 

यदि इतने छोटे जीव ऐसी एकजुटता के साथ काम कर सकते हैं... तो हम इंसान अक्सर उन लोगों को अनदेखा क्यों कर देते हैं जिन्हें मदद की जरूरत होती है?





हम पुल बनाने के बजाय दीवारें क्यों खड़ी करते हैं?
उस सुबह, प्रकृति ने मुझे एक सरल लेकिन शक्तिशाली सबक सिखाया: 
सच्ची ताकत एकता में ही निहित है।


और अगर हम इस तरह जीना भूल गए हैं, 
तो शायद इसे फिर से सीखने का समय आ गया है — 
उन चीटियों से

सोमवार, 29 जून 2026

120 ,,गन्ने का जूस लगाना... पर सुनो, एकदम 'शुगर-फ्री' होना चाहिए

 


कल दोपहर भयंकर गर्मी में गन्ने के ठेले पर खड़ा होकर ₹30 वाला बड़ा ग्लास दबा रहा था। तभी वहाँ एक 'हाई-फाई डाइट कांशियस' मैडम अपनी चमचमाती गाड़ी से उतरीं। ठेले वाले से बोलीं—"भैया, एक गन्ने का जूस लगाना... पर सुनो, एकदम 'शुगर-फ्री' होना चाहिए!"