बुधवार, 15 जुलाई 2026

122 ..जिंदा में भी चमत्कार, मर कर भी चमत्कार!

 मुझे एक कहानी बहुत प्रीतिकर है–सूफियों की कहानी है।


एक फकीर ने एक सम्राट के द्वार पर अपना भिक्षापात्र रखा। सुबह-सुबह थी और सम्राट अपने बगीचे से घूम कर महल में प्रवेश कर रहा था। सम्राट ने कहा, क्या चाहते हो?
फकीर ने कहा, क्या का सवाल नहीं है। एक बात चाहता हूं कि मेरा भिक्षापात्र खाली न रहे। चाहे कंकड़-पत्थरों से भर दो, मगर भर दो। रिक्तता काटती है। खाली नहीं रहना चाहता। मेरा भिक्षापात्र भर दो।
सम्राट ने कहा, यह भी कोई बहुत बड़ा सवाल है! इतना छोटा सा भिक्षापात्र, अभी भरवाए देते हैं!
लेकिन उस फकीर ने फिर कहा कि देखना, खयाल रखना। शर्त यह है कि भिक्षापात्र भरना चाहिए, नहीं तो हटूंगा नहीं द्वार से।



सम्राट ने कहा, अरे पागल! तूने मुझे समझा क्या है, कोई भिखमंगा समझा है? अपने वजीरों को बुला कर कहा कि भर दो सोने से इसका भिक्षापात्र!
स्वर्ण-अशर्फियां डाली गईं। मगर उसका भिक्षापात्र अद्भुत था। डाली गईं स्वर्ण-अशर्फियां, आवाज भी न करें और खो जाएं। खन-खन की आवाज भी न हो। जैसे किसी अतल गहराई में गिर गईं! छोटा सा भिक्षापात्र और जब झांक कर देखो तो उनका पता ही न चले। खजाना खाली होने लगा। दोपहर हो गई, सारी राजधानी इकट्ठी हो गई, खबर आग की तरह फैल गई कि सम्राट ने एक झंझट ले ली। बड़े-बड़े युद्ध जीता, एक फकीर से हारा जा रहा है। और फकीर अपना भिक्षापात्र लिए खड़ा है और अपना चमीटा बजा रहा है।
और वह कहता है कि तब तक नहीं हटूंगा…जब शर्त स्वीकार की है तो मेरा भिक्षापात्र भर दो। और राजा के आंसू निकले आ रहे हैं और राजा की कमर टूटी जा रही है। हीरे-जवाहरात भी चले गए, सोना-चांदी भी चला गया। जो कुछ भी था पास, सब समाप्त हो गया। सांझ होतेऱ्होते खजाने खाली हो गए। वजीरों ने कहा, अब हमारे पास कुछ भी नहीं है।
सम्राट उसके पैरों पर गिर पड़ा और कहा, मुझे क्षमा करो! मगर जाने के पहले एक राज बता जाओ, तुम्हारे इस भिक्षापात्र का क्या रहस्य है?
उस फकीर ने कहा, इसका कोई रहस्य नहीं है। इसे मैंने आदमी की खोपड़ी से बनाया है। न आदमी की खोपड़ी कभी भरती है, न यह भिक्षापात्र कभी भरता है। इसका कोई बड़ा राज नहीं है। ऐसे ही मरघट पर यह खोपड़ी मिल गई थी, इसको घिस-घिस कर, ठीक-ठाक करके मैंने भिक्षापात्र बना लिया। जब मैंने बनाया था भिक्षापात्र, मुझे भी यह राज पता नहीं था। वह तो जब मैंने चीजें इसमें रखीं और खो गईं, तब मैं चौंका कि वाह! वाह रे आदमी! जिंदा में भी चमत्कार, मर कर भी चमत्कार!
प्रस्तुति- स्वामी अद्वैत भारती
बोधि मठ इंटरनेशनल (कोसी)
डुमरी, पूर्णिया, बिहार- 095708 85495

शनिवार, 4 जुलाई 2026

121 सच्ची ताकत एकता में ही निहित है

 



कल बसंत की हल्की धूप लेने को मै अपने घर के पिछले गार्डन में गई..

उस दौरान मैंने कुछ असामान्य देखा: दर्जनों चींटियाँ पानी की एक बड़ी बोतल में गिर गई थीं।

शुरुआत में, जब वे साफ पानी में संघर्ष कर रही थीं, तो ऐसा लगा जैसे वे जीवित रहने के लिए एक-दूसरे को नीचे धकेल रही हों। यह सोचकर मुझे घृणा हुई, इसलिए मैंने अपनी नज़रें हटा लीं।

लेकिन दो घंटे बाद, उत्सुकता के कारण मैंने उन्हें फिर से देखा।

और मैं दंग रह गई।

चींटियाँ एक-दूसरे को डुबो नहीं रही थीं। उन्होंने अपने शरीरों से एक जीवित द्वीप बना लिया था — एक छोटा सा, चलता-फिरता बेड़ा। कुछ नीचे रहकर दूसरों का सहारा बनी हुई थीं, और फिर वे बारी-बारी से अपनी जगह बदल रही थीं ताकि हर किसी को आराम मिल सके।

उनमें से किसी ने भी पहले खुद को बचाने की कोशिश नहीं की।

वे पूरी शांति और बेहतरीन तालमेल के साथ हिल-डुल रही थीं, जैसे वे सभी एक बात समझती हों: जीवित रहना तभी संभव है जब सब साथ हों।

मैंने धीरे से पानी में एक चम्मच डाला। एक-एक करके, चींटियाँ बाहर निकलने लगीं — 
कोई घबराहट नहीं, कोई अफरातफरी नहीं। तभी अचानक, एक कमजोर चींटी
फिसलकर वापस अंदर गिर गई।

और तभी मैंने वह देखा जिसे मैं कभी नहीं भूल पाऊंगी।
आखिरी चींटी, जो पहले से सुरक्षित थी, पीछे मुड़ी। वह डूबने वाली चींटी की ओर वापस गई, मानो कह रही हो, "हिम्मत मत हारो, मैं तुम्हें छोड़कर नहीं जाऊंगी।"

उसने दूसरी चींटी को पकड़ा, लेकिन वह उसे अकेले नहीं उठा सकी।
इसलिए मैंने फिर से चम्मच नीचे किया — और वे दोनों सुरक्षित बाहर निकल आईं।
मैं वहां खामोश खड़ा रही।

मुझे अपनी पहली सोच पर शर्म महसूस हुई — कि वे स्वार्थी थीं। और मैं उस दृश्य से चकित थी
जो मैंने अभी देखा था: अनुशासन, लचीलापन, एकता और निस्वार्थ भाव। 

यदि इतने छोटे जीव ऐसी एकजुटता के साथ काम कर सकते हैं... तो हम इंसान अक्सर उन लोगों को अनदेखा क्यों कर देते हैं जिन्हें मदद की जरूरत होती है?





हम पुल बनाने के बजाय दीवारें क्यों खड़ी करते हैं?
उस सुबह, प्रकृति ने मुझे एक सरल लेकिन शक्तिशाली सबक सिखाया: 
सच्ची ताकत एकता में ही निहित है।


और अगर हम इस तरह जीना भूल गए हैं, 
तो शायद इसे फिर से सीखने का समय आ गया है — 
उन चीटियों से

सोमवार, 29 जून 2026

120 ,,गन्ने का जूस लगाना... पर सुनो, एकदम 'शुगर-फ्री' होना चाहिए

 


कल दोपहर भयंकर गर्मी में गन्ने के ठेले पर खड़ा होकर ₹30 वाला बड़ा ग्लास दबा रहा था। तभी वहाँ एक 'हाई-फाई डाइट कांशियस' मैडम अपनी चमचमाती गाड़ी से उतरीं। ठेले वाले से बोलीं—"भैया, एक गन्ने का जूस लगाना... पर सुनो, एकदम 'शुगर-फ्री' होना चाहिए!"

रविवार, 21 जून 2026

119 वास्कोडिगामा ने भारत आकर किस फल का सेवन किया कि उसके सारे घाव भर गए ?

 वास्कोडिगामा ने भारत आकर किस फल का सेवन किया कि उसके सारे घाव भर गए ?


यूरोप के लोगों को पता ही नहीं था कि भारत जैसा साधन संपन्न देश है, 1498 में पुर्तगाल के व्यापारी वास्कोडिगामा ने जहाज द्वारा अनेक स्थानों का भ्रमण किया जहां उसने भारत को पाया यात्रा के दौरान उसके शरीर में अनेक घाव हो गए थे जो अत्यधिक पीड़ा दे रहे थे और रक्त रुकने का नाम नहीं ले रहा था।

केरल के कालीकट स्थान पर पहुंचने के बाद वास्कोडिगामा ने स्थानीय निवासियों से मुलाकात की जिन्होंने उसके घावों की मरहम पट्टी की और पपीते का सेवन करना शुरू किया कुछ ही दिनों में वास्कोडिगामा बिल्कुल ठीक हो गया उसने पपीते के बीज संग्रहित कर अपने देश ले गया। वास्कोडिगामा ने पपीते को "सुनहरा फल" कहकर संबोधित किया है।

मार्कोपोलो और उसके साथी कई दिनों से जहाज यात्रा पर सवार होकर नए देशों की खोज करने में लगे थे जिससे पोषक तत्वों की कमी के चलते हैं उन्हें स्कर्वी रोग से सामना करना पड़ा जिससे उनके मसूड़ों से खून रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था तब उन्हें किसी देश में पपीते का सेवन करवाया गया जिससे उनका स्कर्वी रोग ठीक हो गया।

अक्सर जब हमारे शरीर में प्लेटलेट्स की कमी होती है तो चिकित्सक हमें पपीते की पत्तियों का रस पीने की सलाह देता है और कुछ ही दिनों में हम ठीक हो जाते हैं उसी प्रकार पपीते के बीजों का प्रयोग भी औषधीय महत्व के लिए किया जाता है पपीता पेट की समस्याओं के लिए रामबाण सिद्ध है साथ ही विटामिन ए की खूबियों के कारण आंखों की रोशनी के लिए वरदान है। इसमें कैंसर को ठीक करने की भी खूबियां हैं।बुजुर्गों के गठिया की समस्या को दूर करता है। 

सबसे प्रमुख बात यह है कि सेवन किए गए फास्ट फूड पिज़्ज़ा, चाऊमीन, बर्गर, द्वारा निर्मित जहर को पेट से निष्कासित करने का काम करता है


कुल मिलाकर यह हमारे शरीर को कंप्यूटर की तरह रिफ्रेश कर देता है।
अतः हफ्ते में एक बार स्वयं, पत्नी, और बच्चों, बुजुर्गों को पपीते का सेवन जरूर करें और स्वस्थ रहें।


रविवार, 14 जून 2026

118 ...मिट्टी के पत्तल से सीधे 'मोक्ष का शॉर्टकट'


 'मोक्ष का शॉर्टकट'

 पेरिस, मॉस्को और नासा के वैज्ञानिकों के बनारस में संन्यास लेने के बाद, पूरी दुनिया की साइकोलॉजी और न्यूरो-साइंस इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया। इस बार स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख से दुनिया के सबसे बड़े 'ब्रेन मैपिंग एक्सपर्ट' और 'ह्यूमन बिहेवियर साइंटिस्ट', डॉ. लुकास हॉफमैन, बनारस पहुंचे।


उनका मानना था कि इंसान का स्वाद और उसका मूड पूरी तरह से दिमाग के केमिकल लोचा (Neurological Circuits) से कंट्रोल होता है। वे अपने साथ एक पोर्टेबल न्यूरो-स्कैनर, ब्रेन-वेव ट्रैकर और जीभ की नसों को नापने वाला एक 'सेंसरी गन' लेकर आए थे। उनका इरादा था यह समझना कि आखिर बनारस का खाना लोगों के दिमाग को कैसे 'कंट्रोल' कर लेता है।


शाम के वक्त डॉ. लुकास गोदौलिया की एक बेहद भीड़भाड़ वाली चाट की दुकान के सामने जा खड़े हुए। वहां उन्होंने देखा कि एक आदमी हाथ में पत्तल लिए खड़ा है, और हलवाई अपनी उंगली से एक कड़क गोलगप्पे (पानीपुरी) में छेद करके, उसमें चोखा भर रहा है और फिर उसे तीखे-खट्टे पानी के ड्रम में डुबोकर सीधे उस आदमी के पत्तल में फेंक रहा है। लोग बिना चबाए, पूरा का पूरा गोलगप्पा मुंह में ठँस रहे हैं और उनकी आँखों से आंसू बह रहे हैं।



लुकास ने तुरंत अपना न्यूरो-स्कैनर चालू किया और हैरान होकर चिल्लाए— "Oh My God! इस लिक्विड का एसिडिक लेवल और क्रंच इंडेक्स इंसानी दिमाग की नसों को हिला रहा है! बिना किसी स्पून के, इस तरह सीधे हाथ से खाना साइंटिफिकली अनहाइजीनिक है, फिर भी इन लोगों का हैप्पी हॉर्मोन (Dopamine) इतनी तेज़ी से ऊपर कैसे भाग रहा है?"


तभी हलवाई ने मुस्कुराकर उनके हाथ में एक पत्तल थमा दी और बोला— "बाबू, मशीन किनारे रखो। पहले एक 'गोलगप्पा चापो', फिर बात करना।"


लुकास ने जैसे ही वह पानी से भरा गोलगप्पा मुंह में रखा, तीखे, खट्टे और पुदीने के पानी का एक ऐसा ब्लास्ट हुआ कि उनके दिमाग का न्यूरो-स्कैनर वहीं हैंग हो गया। उनकी आँखें पूरी खुल गईं और उनके कान लाल हो गए।


अभी वे संभल भी नहीं पाए थे कि हलवाई ने उनके पत्तल में गरमा-गरम, कड़क 'आलू टिक्की चाट' रख दी, जिसके ऊपर गाढ़ी दही, सोंठ की मीठी चटनी और हरी मिर्च का तड़का लगा था। उसके तुरंत बाद, हलवाई ने एक समोसे को हाथ से फोड़कर, उसके ऊपर छौंकी हुई मटर और ढेर सारे मसाले डालकर 'समोसा चाट' भी परोस दी।



क्रंची गोलगप्पे का तीखापन, आलू टिक्की का सोंधा-मक्खन जैसा स्वाद, और समोसा चाट की खट्टी-मीठी गरम मिठास— इन तीनों के कॉम्बिनेशन ने लुकास के दिमाग के सारे न्यूरोलॉजिकल फॉर्मूले और साइकोलॉजी की थ्योरीज़ को एक झटके में डिलीट कर दिया। वे अपनी सेंसरी गन वहीं काउंटर पर छोड़कर, उंगलियों से पत्तल चाटने लगे।


उन्होंने अपने स्विस टैबलेट पर तुरंत नोट लिखा— "रिसर्च अपडेट: स्विट्ज़रलैंड में हम इंसानी दिमाग को शांत करने के लिए थेरेपी और दवाइयाँ देते हैं, लेकिन बनारस में 'गोलगप्पे और चाट' का यह कॉम्बिनेशन दिमाग के सारे तनाव को एक सेकंड में धो देता है। इस स्वाद में कोई मेडिकल कैलकुलेशन नहीं है, यह तो सीधे आत्मा को रिबूट करने का तरीका है।"


रात होते-होते डॉ. लुकास दुकान के बगल में नाली के किनारे कबाड़ के बेंच पर बैठ गए। उन्होंने देखा कि चाट खाने के बाद हर इंसान ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे उसे दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना मिल गया हो।



लुकास ने अपनी लाख डॉलर की ब्रेन-मैपिंग मशीन को गंगा जी में विसर्जित कर दिया और गहरी सांस लेकर बोले— "यूरोप की सारी न्यूरो-साइंस इस कड़ाही और पानी के ड्रम के सामने घुटने टेक चुकी है। हम वहां लैब में खुशी ढूंढते हैं, यहाँ तो मिट्टी के पत्तल से सीधे 'मोक्ष का शॉर्टकट' मिल रहा है।"


रात को डॉ. लुकास हॉफमैन ने ज़्यूरिख की अपनी यूनिवर्सिटी को एक छोटा सा ईमेल भेजा: "क्लिनिक तुरंत बंद कर दो! सारे न्यूरो-स्कैनर और थेरेपी मशीनें कबाड़ में बेच दो। मैंने जिंदगी भर इंसानी दिमाग को मापा, पर असली मानसिक शांति तो बनारस के इस तीखे गोलगप्पे और समोसा चाट में है। यहाँ पेट नहीं भरता, यहाँ इंसान का 'अहंकार' पिघल जाता है। मैं अब स्विट्ज़रलैंड वापस नहीं आ रहा!"


अगले दिन सुबह, अस्सी घाट की सीढ़ियों पर अब ग्यारह विदेशी बैठे थे। पुराने सभी वैज्ञानिकों के बीच अब स्विट्ज़रलैंड के डॉ. लुकास भी भगवा कुर्ता पहने, हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए बैठे थे। लुकास साहब ज़ोर से चिल्लाए: "एलन साहब! निकोलाई साहब! अपनी साइंस और लैब को यूरोप की ट्रेनों में ही छोड़ आओ... यहाँ आओ, पहले दो पत्तल आलू टिक्की चापो... मोक्ष यहाँ चाट की दुकान पर पत्तल बिछाए खड़ा है...

-संकलन

गुरुवार, 21 मई 2026

117 ..भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है

चंदूलाल विश्व-प्रतियोगिता-फेम एक दिन घबड़ाए हुए डाक्टर के यहां पहुंचे और बोले, डाक्टर साहब, आजकल मुझे भूख नहीं लगती।
डाक्टर ने पूछा, आज सबेरे से क्या खाया?
चंदूलाल बोले, सबेरे बिस्तर पर वही कोई दस कप चाय पी और चाय के साथ दस-पंद्रह प्लेट जलेबियां। फिर हाथ-मुंह धोकर बाजार गया। वहां कोई पंद्रह प्लेट समोसे और कोई छह गिलास दूध पीया। फिर शहर का एक चक्कर मारा, तब तक ग्यारह बज चुके थे और भोजन का समय भी हो चुका था, सो घर पहुंचा। वहां बीस रोटियां और दस प्लेट चावल और कोई दस संतरे खाए, और…
डाक्टर बीच में ही टोकते हुए बोला, तो क्या अब मुझे खाने का इरादा है?
भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है।
तो एक तरफ परिग्रह वाले लोग हैं, जो इकट्ठा करते चले जाते हैं। फिर इकट्ठा करते-करते थक जाते हैं, बुरी तरह थक जाते हैं। थक जाते हैं तो उलटा करने लगते हैं। सोचते हैं परिग्रह से तृप्ति नहीं मिली तो त्याग से मिलेगी। पहले धन इकट्ठा करते थे, अब धन छोड़ कर भागते हैं। पहले स्त्रियों के पीछे भागते थे; अब स्त्रियां देखीं कि एकदम भागते हैं, उनकी तरफ पीठ करके भागते हैं। जो-जो पहले किया था उससे उलटा करने लगते हैं। जैसे कोई आदमी सोचता हो कि शीर्षासन करेंगे तो जीवन रूपांतरित हो जाएगा।
लेकिन मनुष्य के जीवन का एक तर्क है–एक काम करके जब थक जाता है तो तत्क्षण दूसरी अति पर चला जाता है। स्वभावतः उसे लगता है ऐसा करने से नहीं हुआ, इससे विपरीत करके देख लूं। इसलिए भोगी हैं, परिग्रही हैं और त्यागी हैं।
और तुम यह चकित होओगे जान कर: जितना भोगी समाज हो उतना ही उसमें त्यागियों का आदर होता है। क्योंकि भोगी को त्याग का तर्क समझ में आता है। उसके मन में भी लग रहा है कि कुछ मिल तो रहा नहीं है, इकट्ठा तो कर रहा हूं, कुछ मिल तो रहा नहीं है। अभी अपनी सामर्थ्य कम है, आत्मबल कम है, संकल्प कम है। जब संकल्प होगा तो हम भी त्याग कर और मुनि हो जाएंगे।
साक्षी-भाव उसका नाम, साक्षी-भाव उसका स्वरूप। संग्रह में भी कर्ता आ जाता है और त्याग में भी कर्ता आ जाता है। और जहां कर्ता आ गया वहां संसार आ गया। कर्ता यानी संसार का द्वार।जहां भी होओ–चाहे संसार में और चाहे संसार के बाहर, चाहे त्यागी होओ चाहे भोगी–एक बात खयाल रखना: कर्ता-भाव न आए। जहां कर्ता-भाव आया, वहीं चूक हो गई, वहीं फिसले, बुरे फिसले। साक्षी-भाव बना रहे। दुकान पर भी बैठ कर अगर साक्षी-भाव बना रहे, बाजार में भी बैठ कर अगर तुम सिर्फ दर्शक मात्र रहो–तो पर्याप्त।
बस यह साक्षी-भाव सतत बहने लगे, चौबीस घंटे बहने लगे, सपने में भी बना रहे, सपने में भी दिखाई पड़ता रहे कि मैं साक्षी हूं–फिर तुम्हारे ऊपर कोई कालिख न रह जाएगी, कोई कलुष न रह जाएगा, कोई कल्मष न रह जाएगा। तुम परम शुद्ध परमात्मा को अनुभव कर लोगे! वह तुम्हारे भीतर विराजमान है, एक क्षण को भी वहां से हटा नहीं है।
- भगवान श्री रजनीश

गुरुवार, 14 मई 2026

116 रोटी की सैकड़ों प्रजातियां हैं और कुछ तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं

 रोटी की सैकड़ों प्रजातियां हैं और कुछ तो 
पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं ।

यहाँ शीर्ष 10 सर्वश्रेष्ठ रोटी हैं

1. अफगानिस्तान

पारंपरिक बोलानी रोटी, अफगानिस्तान.

तंदूर ओवन में पकी अफगानिस्तान की बोलानी रोटी ;

बोलानी रोटी बहुत पतली परत होती है औरबिच में कई प्रकार की सामग्री भरी जाती है ,
जैसे कि आलू, पालक, दाल, कद्दू या लौकी;

2. अंगोला

अंगोला में यह बेकरी चेक गणराज्य ने तौहफे में दी है।
सफेद ब्रेड आपको यूरोपियन बैगूलेट्स की याद दिलाएंगे।



3. ऑस्ट्रेलिया


पारंपरिक ऑस्ट्रेलियाई पनीर दमपर रोटी

स्ट्रीक पर पकाई जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई डम्पर रोटी


4. ऑस्ट्रिया

सनफलोवेर ब्रेड जो ऑस्ट्रियाई की ग्रीष्मकालीन सैंडविच के रूप में जाना जाता है .


चेक गणराज्य और स्लोवाकिया में भी सफेद आटे से बनते है ऑस्ट्रियन ब्रेड रोल

5. चेक गणराज्य

Umava जो चेक गणराज्य के दक्षिण में एक क्षेत्र है 
वहा की उसी नामक पारंपरिक चेक ब्रेड ,
गहरे आटे ( राई और गेहूं के फूल) से बनी हुयी:


6. डोमिनिकन गणराज्य

डोमिनिकन गणराज्य के पहाड़ी क्षेत्रों की 
मकई की रोटी ये 10 किलो का भारी पाव.

ये जानकारी कोरा से प्राप्त हुइ है