रविवार, 21 जून 2026

119 वास्कोडिगामा ने भारत आकर किस फल का सेवन किया कि उसके सारे घाव भर गए ?

 वास्कोडिगामा ने भारत आकर किस फल का सेवन किया कि उसके सारे घाव भर गए ?


यूरोप के लोगों को पता ही नहीं था कि भारत जैसा साधन संपन्न देश है, 1498 में पुर्तगाल के व्यापारी वास्कोडिगामा ने जहाज द्वारा अनेक स्थानों का भ्रमण किया जहां उसने भारत को पाया यात्रा के दौरान उसके शरीर में अनेक घाव हो गए थे जो अत्यधिक पीड़ा दे रहे थे और रक्त रुकने का नाम नहीं ले रहा था।

केरल के कालीकट स्थान पर पहुंचने के बाद वास्कोडिगामा ने स्थानीय निवासियों से मुलाकात की जिन्होंने उसके घावों की मरहम पट्टी की और पपीते का सेवन करना शुरू किया कुछ ही दिनों में वास्कोडिगामा बिल्कुल ठीक हो गया उसने पपीते के बीज संग्रहित कर अपने देश ले गया। वास्कोडिगामा ने पपीते को "सुनहरा फल" कहकर संबोधित किया है।

मार्कोपोलो और उसके साथी कई दिनों से जहाज यात्रा पर सवार होकर नए देशों की खोज करने में लगे थे जिससे पोषक तत्वों की कमी के चलते हैं उन्हें स्कर्वी रोग से सामना करना पड़ा जिससे उनके मसूड़ों से खून रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था तब उन्हें किसी देश में पपीते का सेवन करवाया गया जिससे उनका स्कर्वी रोग ठीक हो गया।

अक्सर जब हमारे शरीर में प्लेटलेट्स की कमी होती है तो चिकित्सक हमें पपीते की पत्तियों का रस पीने की सलाह देता है और कुछ ही दिनों में हम ठीक हो जाते हैं उसी प्रकार पपीते के बीजों का प्रयोग भी औषधीय महत्व के लिए किया जाता है पपीता पेट की समस्याओं के लिए रामबाण सिद्ध है साथ ही विटामिन ए की खूबियों के कारण आंखों की रोशनी के लिए वरदान है। इसमें कैंसर को ठीक करने की भी खूबियां हैं।बुजुर्गों के गठिया की समस्या को दूर करता है। 

सबसे प्रमुख बात यह है कि सेवन किए गए फास्ट फूड पिज़्ज़ा, चाऊमीन, बर्गर, द्वारा निर्मित जहर को पेट से निष्कासित करने का काम करता है


कुल मिलाकर यह हमारे शरीर को कंप्यूटर की तरह रिफ्रेश कर देता है।
अतः हफ्ते में एक बार स्वयं, पत्नी, और बच्चों, बुजुर्गों को पपीते का सेवन जरूर करें और स्वस्थ रहें।


रविवार, 14 जून 2026

118 ...मिट्टी के पत्तल से सीधे 'मोक्ष का शॉर्टकट'


 'मोक्ष का शॉर्टकट'

 पेरिस, मॉस्को और नासा के वैज्ञानिकों के बनारस में संन्यास लेने के बाद, पूरी दुनिया की साइकोलॉजी और न्यूरो-साइंस इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया। इस बार स्विट्ज़रलैंड के ज़्यूरिख से दुनिया के सबसे बड़े 'ब्रेन मैपिंग एक्सपर्ट' और 'ह्यूमन बिहेवियर साइंटिस्ट', डॉ. लुकास हॉफमैन, बनारस पहुंचे।


उनका मानना था कि इंसान का स्वाद और उसका मूड पूरी तरह से दिमाग के केमिकल लोचा (Neurological Circuits) से कंट्रोल होता है। वे अपने साथ एक पोर्टेबल न्यूरो-स्कैनर, ब्रेन-वेव ट्रैकर और जीभ की नसों को नापने वाला एक 'सेंसरी गन' लेकर आए थे। उनका इरादा था यह समझना कि आखिर बनारस का खाना लोगों के दिमाग को कैसे 'कंट्रोल' कर लेता है।


शाम के वक्त डॉ. लुकास गोदौलिया की एक बेहद भीड़भाड़ वाली चाट की दुकान के सामने जा खड़े हुए। वहां उन्होंने देखा कि एक आदमी हाथ में पत्तल लिए खड़ा है, और हलवाई अपनी उंगली से एक कड़क गोलगप्पे (पानीपुरी) में छेद करके, उसमें चोखा भर रहा है और फिर उसे तीखे-खट्टे पानी के ड्रम में डुबोकर सीधे उस आदमी के पत्तल में फेंक रहा है। लोग बिना चबाए, पूरा का पूरा गोलगप्पा मुंह में ठँस रहे हैं और उनकी आँखों से आंसू बह रहे हैं।



लुकास ने तुरंत अपना न्यूरो-स्कैनर चालू किया और हैरान होकर चिल्लाए— "Oh My God! इस लिक्विड का एसिडिक लेवल और क्रंच इंडेक्स इंसानी दिमाग की नसों को हिला रहा है! बिना किसी स्पून के, इस तरह सीधे हाथ से खाना साइंटिफिकली अनहाइजीनिक है, फिर भी इन लोगों का हैप्पी हॉर्मोन (Dopamine) इतनी तेज़ी से ऊपर कैसे भाग रहा है?"


तभी हलवाई ने मुस्कुराकर उनके हाथ में एक पत्तल थमा दी और बोला— "बाबू, मशीन किनारे रखो। पहले एक 'गोलगप्पा चापो', फिर बात करना।"


लुकास ने जैसे ही वह पानी से भरा गोलगप्पा मुंह में रखा, तीखे, खट्टे और पुदीने के पानी का एक ऐसा ब्लास्ट हुआ कि उनके दिमाग का न्यूरो-स्कैनर वहीं हैंग हो गया। उनकी आँखें पूरी खुल गईं और उनके कान लाल हो गए।


अभी वे संभल भी नहीं पाए थे कि हलवाई ने उनके पत्तल में गरमा-गरम, कड़क 'आलू टिक्की चाट' रख दी, जिसके ऊपर गाढ़ी दही, सोंठ की मीठी चटनी और हरी मिर्च का तड़का लगा था। उसके तुरंत बाद, हलवाई ने एक समोसे को हाथ से फोड़कर, उसके ऊपर छौंकी हुई मटर और ढेर सारे मसाले डालकर 'समोसा चाट' भी परोस दी।



क्रंची गोलगप्पे का तीखापन, आलू टिक्की का सोंधा-मक्खन जैसा स्वाद, और समोसा चाट की खट्टी-मीठी गरम मिठास— इन तीनों के कॉम्बिनेशन ने लुकास के दिमाग के सारे न्यूरोलॉजिकल फॉर्मूले और साइकोलॉजी की थ्योरीज़ को एक झटके में डिलीट कर दिया। वे अपनी सेंसरी गन वहीं काउंटर पर छोड़कर, उंगलियों से पत्तल चाटने लगे।


उन्होंने अपने स्विस टैबलेट पर तुरंत नोट लिखा— "रिसर्च अपडेट: स्विट्ज़रलैंड में हम इंसानी दिमाग को शांत करने के लिए थेरेपी और दवाइयाँ देते हैं, लेकिन बनारस में 'गोलगप्पे और चाट' का यह कॉम्बिनेशन दिमाग के सारे तनाव को एक सेकंड में धो देता है। इस स्वाद में कोई मेडिकल कैलकुलेशन नहीं है, यह तो सीधे आत्मा को रिबूट करने का तरीका है।"


रात होते-होते डॉ. लुकास दुकान के बगल में नाली के किनारे कबाड़ के बेंच पर बैठ गए। उन्होंने देखा कि चाट खाने के बाद हर इंसान ऐसे मुस्कुरा रहा है जैसे उसे दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना मिल गया हो।



लुकास ने अपनी लाख डॉलर की ब्रेन-मैपिंग मशीन को गंगा जी में विसर्जित कर दिया और गहरी सांस लेकर बोले— "यूरोप की सारी न्यूरो-साइंस इस कड़ाही और पानी के ड्रम के सामने घुटने टेक चुकी है। हम वहां लैब में खुशी ढूंढते हैं, यहाँ तो मिट्टी के पत्तल से सीधे 'मोक्ष का शॉर्टकट' मिल रहा है।"


रात को डॉ. लुकास हॉफमैन ने ज़्यूरिख की अपनी यूनिवर्सिटी को एक छोटा सा ईमेल भेजा: "क्लिनिक तुरंत बंद कर दो! सारे न्यूरो-स्कैनर और थेरेपी मशीनें कबाड़ में बेच दो। मैंने जिंदगी भर इंसानी दिमाग को मापा, पर असली मानसिक शांति तो बनारस के इस तीखे गोलगप्पे और समोसा चाट में है। यहाँ पेट नहीं भरता, यहाँ इंसान का 'अहंकार' पिघल जाता है। मैं अब स्विट्ज़रलैंड वापस नहीं आ रहा!"


अगले दिन सुबह, अस्सी घाट की सीढ़ियों पर अब ग्यारह विदेशी बैठे थे। पुराने सभी वैज्ञानिकों के बीच अब स्विट्ज़रलैंड के डॉ. लुकास भी भगवा कुर्ता पहने, हाथ में चाय का कुल्हड़ लिए बैठे थे। लुकास साहब ज़ोर से चिल्लाए: "एलन साहब! निकोलाई साहब! अपनी साइंस और लैब को यूरोप की ट्रेनों में ही छोड़ आओ... यहाँ आओ, पहले दो पत्तल आलू टिक्की चापो... मोक्ष यहाँ चाट की दुकान पर पत्तल बिछाए खड़ा है...

-संकलन

गुरुवार, 21 मई 2026

117 ..भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है

चंदूलाल विश्व-प्रतियोगिता-फेम एक दिन घबड़ाए हुए डाक्टर के यहां पहुंचे और बोले, डाक्टर साहब, आजकल मुझे भूख नहीं लगती।
डाक्टर ने पूछा, आज सबेरे से क्या खाया?
चंदूलाल बोले, सबेरे बिस्तर पर वही कोई दस कप चाय पी और चाय के साथ दस-पंद्रह प्लेट जलेबियां। फिर हाथ-मुंह धोकर बाजार गया। वहां कोई पंद्रह प्लेट समोसे और कोई छह गिलास दूध पीया। फिर शहर का एक चक्कर मारा, तब तक ग्यारह बज चुके थे और भोजन का समय भी हो चुका था, सो घर पहुंचा। वहां बीस रोटियां और दस प्लेट चावल और कोई दस संतरे खाए, और…
डाक्टर बीच में ही टोकते हुए बोला, तो क्या अब मुझे खाने का इरादा है?
भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है।
तो एक तरफ परिग्रह वाले लोग हैं, जो इकट्ठा करते चले जाते हैं। फिर इकट्ठा करते-करते थक जाते हैं, बुरी तरह थक जाते हैं। थक जाते हैं तो उलटा करने लगते हैं। सोचते हैं परिग्रह से तृप्ति नहीं मिली तो त्याग से मिलेगी। पहले धन इकट्ठा करते थे, अब धन छोड़ कर भागते हैं। पहले स्त्रियों के पीछे भागते थे; अब स्त्रियां देखीं कि एकदम भागते हैं, उनकी तरफ पीठ करके भागते हैं। जो-जो पहले किया था उससे उलटा करने लगते हैं। जैसे कोई आदमी सोचता हो कि शीर्षासन करेंगे तो जीवन रूपांतरित हो जाएगा।
लेकिन मनुष्य के जीवन का एक तर्क है–एक काम करके जब थक जाता है तो तत्क्षण दूसरी अति पर चला जाता है। स्वभावतः उसे लगता है ऐसा करने से नहीं हुआ, इससे विपरीत करके देख लूं। इसलिए भोगी हैं, परिग्रही हैं और त्यागी हैं।
और तुम यह चकित होओगे जान कर: जितना भोगी समाज हो उतना ही उसमें त्यागियों का आदर होता है। क्योंकि भोगी को त्याग का तर्क समझ में आता है। उसके मन में भी लग रहा है कि कुछ मिल तो रहा नहीं है, इकट्ठा तो कर रहा हूं, कुछ मिल तो रहा नहीं है। अभी अपनी सामर्थ्य कम है, आत्मबल कम है, संकल्प कम है। जब संकल्प होगा तो हम भी त्याग कर और मुनि हो जाएंगे।
साक्षी-भाव उसका नाम, साक्षी-भाव उसका स्वरूप। संग्रह में भी कर्ता आ जाता है और त्याग में भी कर्ता आ जाता है। और जहां कर्ता आ गया वहां संसार आ गया। कर्ता यानी संसार का द्वार।जहां भी होओ–चाहे संसार में और चाहे संसार के बाहर, चाहे त्यागी होओ चाहे भोगी–एक बात खयाल रखना: कर्ता-भाव न आए। जहां कर्ता-भाव आया, वहीं चूक हो गई, वहीं फिसले, बुरे फिसले। साक्षी-भाव बना रहे। दुकान पर भी बैठ कर अगर साक्षी-भाव बना रहे, बाजार में भी बैठ कर अगर तुम सिर्फ दर्शक मात्र रहो–तो पर्याप्त।
बस यह साक्षी-भाव सतत बहने लगे, चौबीस घंटे बहने लगे, सपने में भी बना रहे, सपने में भी दिखाई पड़ता रहे कि मैं साक्षी हूं–फिर तुम्हारे ऊपर कोई कालिख न रह जाएगी, कोई कलुष न रह जाएगा, कोई कल्मष न रह जाएगा। तुम परम शुद्ध परमात्मा को अनुभव कर लोगे! वह तुम्हारे भीतर विराजमान है, एक क्षण को भी वहां से हटा नहीं है।
- भगवान श्री रजनीश

गुरुवार, 14 मई 2026

116 रोटी की सैकड़ों प्रजातियां हैं और कुछ तो पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं

 रोटी की सैकड़ों प्रजातियां हैं और कुछ तो 
पूरी दुनिया में प्रसिद्ध हैं ।

यहाँ शीर्ष 10 सर्वश्रेष्ठ रोटी हैं

1. अफगानिस्तान

पारंपरिक बोलानी रोटी, अफगानिस्तान.

तंदूर ओवन में पकी अफगानिस्तान की बोलानी रोटी ;

बोलानी रोटी बहुत पतली परत होती है औरबिच में कई प्रकार की सामग्री भरी जाती है ,
जैसे कि आलू, पालक, दाल, कद्दू या लौकी;

2. अंगोला

अंगोला में यह बेकरी चेक गणराज्य ने तौहफे में दी है।
सफेद ब्रेड आपको यूरोपियन बैगूलेट्स की याद दिलाएंगे।



3. ऑस्ट्रेलिया


पारंपरिक ऑस्ट्रेलियाई पनीर दमपर रोटी

स्ट्रीक पर पकाई जाने वाली ऑस्ट्रेलियाई डम्पर रोटी


4. ऑस्ट्रिया

सनफलोवेर ब्रेड जो ऑस्ट्रियाई की ग्रीष्मकालीन सैंडविच के रूप में जाना जाता है .


चेक गणराज्य और स्लोवाकिया में भी सफेद आटे से बनते है ऑस्ट्रियन ब्रेड रोल

5. चेक गणराज्य

Umava जो चेक गणराज्य के दक्षिण में एक क्षेत्र है 
वहा की उसी नामक पारंपरिक चेक ब्रेड ,
गहरे आटे ( राई और गेहूं के फूल) से बनी हुयी:


6. डोमिनिकन गणराज्य

डोमिनिकन गणराज्य के पहाड़ी क्षेत्रों की 
मकई की रोटी ये 10 किलो का भारी पाव.

ये जानकारी कोरा से प्राप्त हुइ है

मंगलवार, 12 मई 2026

115 ..कौमी एकता का ठेका तो हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है।



अजमेर रेलवे स्टेशन के प्लेटफार्म पर इतनी भीड़ थी कि
 
वहां की कोई बेंच खाली नहीं थी। 

एक बेंच पर एक परिवार, जो पहनावे से हिन्दू लग रहा था,
 
के साथ बुर्के में एक अधेड़ सुसभ्य महिला बैठी थी। 

उसने सभ्यता से पान की पीक थूक-2 कर प्लेटफार्म 

पर अपने आस-पास कई चित्र बना दिये थे। 

बहुत देर चुपचाप बैठने के बाद जब उससे चुप्पी बर्दाश्त न हुई तो 

उसने बगल में बैठे युवक से पूछा,

 "अजमेर के रहने वाले हैं या फिर यहाँ घूमने आये हैं?"

युवक ने बताया, "जी अपने माता पिता के साथ

पुष्कर में ब्रह्मा जी के मंदिर के दर्शन करने आया था।"

महिला ने बुरा मुँह बनाते हुए फिर पूछा,"आप लोग अजमेर शरीफ की दरगाह पर नहीं गए?"

युवक ने उस महिला से प्रति उत्तर कर दिया, "क्या आप ब्रह्मा जी के मंदिर गई थीं?"

महिला अपने मुँह को और बुरा बनाते हुए बोली,

"लाहौल विला कुव्वत। इस्लाम में बुतपरस्ती हराम है और 

आप पूछ रहे हैं कि ब्रह्मा के मंदिर में गई थी।"

युवक झल्लाकर बोला,
"जब आप ब्रह्मा जी के मंदिर में जाना हराम मानती हैं
तो हम क्यों अजमेर शरीफ की 
दरगाह पर जाकर अपना माथा फोड़ें।"
महिला युवक की माँ से शिकायती लहजे में बोली, 
"देखिये बहन जी। आपका लड़का तो बड़ा बदतमीज है। 
ऐसी मजहबी कट्टरता की वजह से ही तो हमारी कौमी एकता में फूट पड़ती है।"
युवक की माँ मुस्कुराते हुए बोली, 

"ठीक कहा बहन जी।
कौमी एकता का ठेका तो
हम हिन्दुओं ने ही ले रखा है।

साभार- हर्षवर्धन आर्य


सोमवार, 4 मई 2026

114 ..'जनरल चौधरी लाहौर में प्रवेश कर रहे हैं।'

 भारत में मैं कई राजनेताओं को जानता हूँ, 
किन्तु मैंने उनमें दिमाग नहीं पाया।

    जिन सामान्य बातों को कोई भी समझ सकता है, जिन्हें समझने के लिए किसी महान प्रतिभा की जरूरत नहीं है, उन्हें भी राजनेता समझ नहीं पाते । मेरा एक मित्र भारतीय सेना का कमांडर इन चीफ था। उनका नाम था जनरल चौधरी | जब पाकिस्तान ने भारत पर हमला किया, तो इस आदमी ने प्रधान मंत्री से हमले का मुकाबला करने की अनुमति मांगी | उसने कहा कि इस समय सिर्फ रक्षात्मक होने से कुछ नहीं होगा क्योंकि यदि आप रक्षात्मक हैं तो इसका अर्थ है, आप पहले ही हार गए हैं | यह एक सरल सैन्य रणनीति है कि बचाव का सबसे अच्छा तरीका आक्रामक होना है |
    चौधरी का सुझाव था कि अगर पाकिस्तान ने कश्मीर के एक हिस्से पर हमला किया है, तो हमें पाकिस्तान पर चार –पांच मोर्चों से आक्रमण करना चाहिए। वे घबरा जायंगे और समझ नहीं पायेंगे कि वे अपनी सेना कहाँ भेजें। उन्हें अपने देश की पूरी सीमा का बचाव करना होगा, तो उनका हमला अपने आप विफल हो जाएगा ।
    लेकिन उफ़ ये राजनेता ! प्रधान मंत्री नेहरू ने उन्हें कहा कि सुबह तक 6 बजे तक इंतजार करो।
जनरल चौधरी ने मुझे बताया कि उसके बाद उन्हें सेना से निकाल दिया गया था – लेकिन यह बात सार्वजनिक नहीं की गई ।
सार्वजनिक रूप से तो वे ससम्मान सेवानिवृत्त हुए, लेकिन सचाई यह है कि उन्हें निकाला गया था | उनसे कहा गया था - 'या तो आप इस्तीफा दें या हम आपको बाहर निकाल देंगे।'
अपराध क्या था उनका ? उनका अपराध यह था कि उन्होंने छः बजे के स्थान पर सुबह 5 बजे पाकिस्तान पर हमला कर दिया । क्योंकि उनकी नजर में यही सही समय था, छः बजे तो सूर्योदय हो जाएगा, लोग जाग जायेंगे। सुबह पांच बजे का समय एकदम उपयुक्त था - सब लोग सो रहे थे – वे लोग हक्के बक्के हो गए । और उसने जैसा कहा था, बैसा ही हुआ - उसने पूरे पाकिस्तान को थरथरा दिया । देखते ही देखते भारतीय सेनायें पाकिस्तान से सबसे बड़े शहर लाहौर से सिर्फ 15 मील दूर रह गईं |
तब तक राजनेता क्या कर रहे थे ? पूरी रात नेहरू और उनकी कैबिनेट विचार विमर्श में उलझी रही - ऐसा करने का क्या नतीजा होगा, बैसा करने से क्या होगा और सुबह 6 बजे तक भी वे किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पाए । तभी उन्होंने रेडियो पर सुना - 'जनरल चौधरी लाहौर में प्रवेश कर रहे हैं।'
यह स्थिति राजनेताओं के लिए असहनीय थी | उन्होंने लाहौर से सिर्फ 15 मील दूर उन्हें रोक दिया और जहाँ तक मैं समझता हूँ, यह मूर्खता की पराकाष्ठा थी | यदि उस दिन लाहौर जीत लिया जाता, कश्मीर की समस्या और भारत का सरदर्द हमेशा के लिए हल हो गया होता। कश्मीर के उस क्षेत्र की समस्या अब कभी हल नहीं हो सकती, जिस पर पाकिस्तान ने कब्जा कर लिया है - और ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि जनरल चौधरी को वापस आने के लिए कहा गया | कहा गया कि भारत एक अहिंसक देश है और आपने आदेश का इंतजार नहीं किया ।
    उन्होंने प्रधान मंत्री से साफ़ शब्दों में कहा - सैन्य रणनीतियों को मैं समझता हूं, आप नहीं  आप छः बजे की बात करते हैं, पर उस समय भी आपका ऑर्डर कहाँ था? पाकिस्तान ने पहले ही कश्मीर के सबसे सुंदर हिस्से पर कब्जा कर लिया था - और आप पूरी रात चर्चा ही करते रहे । यह चर्चा का समय नहीं था - युद्ध के मैदान पर फैसला किया जाना चाहिए था । अगर आपने मुझे लाहौर में जाने की अनुमति दी होती तो हम सौदेबाजी की स्थिति में होंते । अब हम सौदेबाजी की स्थिति में नहीं हैं। आपने मुझे वापस बुला लिया और मुझे वापस आना पड़ा। '
    संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध विराम लाइन का निर्णय किया । तो अब वर्षों से संयुक्त राष्ट्र सेनाएं वहां गश्त कर रही हैं, दूसरी ओर पाकिस्तानी सेनाएं गश्त कर रही हैं, इस तरफ भारतीय सेनाएं गश्त कर रही हैं। वर्षों से सिर्फ बकवास हो रही है ! और वे संयुक्त राष्ट्र में गए, जहाँ सिर्फ चर्चा होती है, और नतीजा वही ढाक के तीन पात ।और पाकिस्तान द्वारा कब्जाए गए क्षेत्र को आप युद्ध विराम के कारण वापस नहीं ले सकते। उन्होंने अपनी संसद में फैसला किया है कि उनके द्वारा कब्ज़ा किया गया क्षेत्र पाकिस्तान का अभिन्न अंग है । अब वे इसे अपने नक्शे पर दिखाते हैं। अब यह क्षेत्र कब्जाया हुआ नहीं, पाकिस्तानी क्षेत्र है।
मैंने जनरल चौधरी से कहा था- 'यह एक साधारण सी बात थी कि आपको सौदेबाजी की स्थिति में होना चाहिए था। यदि आपने लाहौर ले लिया होता, तो वे कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाते | क्योंकि वे लाहौर खोना बर्दास्त नहीं कर सकते थे। उसके बाद अगर कोई संघर्ष विराम होता भी तो सौदेबाजी करते समय लाहौर हमारे पास होता । अब सौदेबाजी के लिए भारत के पास क्या है ? पाकिस्तान को क्या परेशानी? '
लेकिन राजनेताओं में दिमाग होता ही कहाँ हैं? "
     प्रवचन-२८,ओशो

अंधेरे से उजाले की ओर

सोमवार, 27 अप्रैल 2026

113 आत्मविश्वास हो तो सर्व कार्य सफल


एक नर्स लंदन में ऑपरेशन से दो घंटे पहले मरीज़ के कमरे में घुसकर कमरे को ठीक करने में और वहां रखे गुलदस्ते को संवारने में लगी थी।

ऐसे ही काम करते करते उसने मरीज की ओर देखकर यूँ ही रेंडमली पूछ लिया;
"सर आपका ऑपरेशन कौन सा डॉक्टर कर रहा है?"
नर्स ने सवाल कर के करीब से उस मरीज को देखा, जो थोड़ा घबराया हुआ सा लग रहा था!
लाजिमी है कि उसका ऑपरेशन था तो उसे घबराहट होगी ही।
फिर भी मरीज़ ने अपने लहजे को थोड़ा बेहतर करते हुए कहा; "डॉ. जबसन।" नर्स ने डॉक्टर का नाम सुना और आश्चर्य के साथ मुस्कराते हए अपना काम बीच मे छोड़कर मरीज़ के एकदम पास पहुँची और पूछा;

"सर, क्या डॉ. जबसन ने वास्तव में आपके ऑपरेशन को स्वीकार किया हैं?
मरीज़ ने कहा "हाँ, मेरा ऑपरेशन वही कर रहे है।"
नर्स ने कहा "बड़ी अजीब बात है, विश्वास नहीं होता"
परेशान होते हुए मरीज़ ने पूछा ;
"लेकिन इसमें ऐसी क्या अजीब बात है?"

नर्स ने कहा "वास्तव में इस डॉक्टर ने अब तक हजारों ऑपरेशन किए हैं उसके ऑपरेशन में सफलता का अनुपात 100 प्रतिशत है । इनकी तीव्र व्यस्तता की वजह से इन्हें समय निकालना बहुत मुश्किल होता है। मैं हैरान हूँ आपका ऑपरेशन करने के लिए उन्हें फुर्सत कैसे मिली?

नर्स की बात सुनते ही मरीज़ ने एकदम प्रफुल्लित होते हुए कहा;
ये मेरी अच्छी किस्मत है कि डॉ जबसन को फुरसत मिली और वह मेरा ऑपरेशन कर रहे हैं!
नर्स ने एक बार फिर कहा;
"यकीन मानिए, मेरा हैरत अभी भी बरकरार है कि दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर आपका ऑपरेशन कर रहा है! "
मरीज ने अपने हाथ जोड़कर प्रसन्न मुद्रा में ईश्वर का धन्यवाद किया। और इस बातचीत के बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया गया।
मरीज़ का ऑपरेशन सफल हुआ, और उसे आराम से अपने कमरे में ले जाया गया। मरीज ने तेज़ी से रिकवरी करी, और उसे छुट्टी भी मिल गई। किंतु उसे यह आश्चर्य हुआ कि, ऑपरेशन से पहले मिलने आई नर्स उसे फिर से दिखाई नहीं दी।
वास्तव में मरीज़ के कमरे में आई महिला कोई नर्स नहीं, बल्कि उसी
एक नर्स लंदन में ऑपरेशन से दो घंटे पहले मरीज़ के कमरे में घुसकर कमरे को ठीक करने में और वहां रखे गुलदस्ते को संवारने में लगी थी।
ऐसे ही काम करते करते उसने मरीज की ओर देखकर यूँही रेंडमली पूछ लिया;
"सर आपका ऑपरेशन कौन सा डॉक्टर कर रहा है?"
नर्स ने सवाल कर के करीब से उस मरीज को देखा, जो थोड़ा घबराया हुआ सा लग रहा था! लाजिमी है कि उसका ऑपरेशन था तो उसे घबराहट होगी ही।
फिर भी मरीज़ ने अपने लहजे को थोड़ा बेहतर करते हुए कहा; "डॉ. जबसन।"
नर्स ने डॉक्टर का नाम सुना और आश्चर्य के साथ मुस्कराते हए अपना काम बीच मे छोड़कर मरीज़ के एकदम पास पहुँची और पूछा;
"सर, क्या डॉ. जबसन ने वास्तव में आपके ऑपरेशन को स्वीकार किया हैं?
मरीज़ ने कहा "हाँ, मेरा ऑपरेशन वही कर रहे है।"
नर्स ने कहा "बड़ी अजीब बात है, विश्वास नहीं होता"
परेशान होते हुए मरीज़ ने पूछा ;
"लेकिन इसमें ऐसी क्या अजीब बात है?"
नर्स ने कहा "वास्तव में इस डॉक्टर ने अब तक हजारों ऑपरेशन किए हैं
उसके ऑपरेशन में सफलता का अनुपात 100 प्रतिशत है । इनकी तीव्र व्यस्तता की वजह से
इन्हें समय निकालना बहुत मुश्किल होता है। मैं हैरान हूँ आपका ऑपरेशन
करने के लिए उन्हें फुर्सत कैसे मिली?
नर्स की बात सुनते ही मरीज़ ने एकदम प्रफुल्लित होते हुए कहा;
ये मेरी अच्छी किस्मत है कि डॉ जबसन को फुरसत मिली और वह मेरा ऑपरेशन कर रहे हैं!
नर्स ने एक बार फिर कहा;"यकीन मानिए, मेरा हैरत अभी भी बरकरार है कि
दुनिया का सबसे अच्छा डॉक्टर आपका ऑपरेशन कर रहा है! "
मरीज ने अपने हाथ जोड़कर प्रसन्न मुद्रा में ईश्वर का धन्यवाद किया। और इस बातचीत के बाद मरीज को ऑपरेशन थिएटर में पहुंचा दिया गया।
मरीज़ का ऑपरेशन सफल हुआ, और उसे आराम से अपने कमरे में ले जाया गया। मरीज ने तेज़ी से रिकवरी करी, और उसे छुट्टी भी मिल गई। किंतु उसे यह आश्चर्य हुआ कि, ऑपरेशन से पहले मिलने आई नर्स उसे फिर से दिखाई नहीं दी।

वास्तव में मरीज़ के कमरे में आई महिला कोई नर्स नहीं,
बल्कि उसी अस्पताल की मनोवैज्ञानिक डॉक्टर थी।
जिनका काम मरीजों को मानसिक और मनोवैज्ञानिक रूप से संचालित करना था।
उन्हें ऑपरेशन के लिए संतुष्ट करना था, और उनपर मरीज़ शक भी नहीं कर सकता था।
इस महिला डॉक्टर ने अपना काम मरीज़ के कमरे में गुलदस्ता सजाते हुए, बहुत खूबसूरती से किया।
उसने मरीज़ के दिल और दिमाग में बिठा दिया कि, जो डॉक्टर इसका ऑपरेशन करेगा वो
दुनिया का मशहूर और सबसे सफल डॉक्टर है जिसका हर ऑपरेशन सफल ऑपरेशन है और इन सब के साथ मरीज़ स्वयं सकारात्मक तरीके से सुधार की तरफ लौट आया।
आज ज्ञान ने सिद्ध कर दिया कि रोगी जितनी दृढ़ता से रोग को नियंत्रित करने का वादा करता है,
उतनी ही दृढ़ता से रोग पर जीत दर्ज कर सकता है ।
यह सत्य है कि उपचार केवल शरीर का नहीं, मन का भी होता है।
दवाइयाँ अपना काम बेशक करती हैं, पर असली बदलाव विश्वास से ही शुरू होता है।

जब मरीज मन मे पॉजिटिविटी रखे कि वह ठीक होगा,
तो उसकी हर कोशिका उसी दिशा में जुट जाती हैं। डर शरीर को कमजोर करता है,
जबकि भरोसा उसे लड़ने की ताकत देता है।
मन के हारे हार है। मन के जीते जीत।
नोट: कोरोना काल में पढ़ी सबसे खूबसूरत कहानियों में से एक कहानी है यह
-टीशा
 

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

112 ..हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए

हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए 


लड़कियों के एक विद्यालय में नई अध्यापिका बहुत खूबसूरत थी, बस उम्र थोड़ी अधिक हो रही थी, लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी। सभी छात्राएं उसे देखकर तरह-तरह के अनुमान लगाया करती थीं। एक दिन किसी कार्यक्रम के दौरान जब छात्राएं उसके इर्द-गिर्द खड़ी थीं, तो एक छात्रा ने बातों-बातों में ही उससे पूछ लिया, "मैडम, आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की?...??


अध्यापिका ने कहा, "पहले एक कहानी सुनाती हूं।" उसने कहा, "एक महिला को बेटे की लालसा में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसे धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छा अनुसार बेटा पैदा कर दे। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो-रोकर दुआ करती रही...!!

अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझ कर शांत हो गया। फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनिया से चली जाती...!!

अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आंसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी जिंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनियां से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए...!!अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं। 

जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं, 'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना...!!अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सब कुछ कर सकती है, सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके...!!

एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए वह जानबूझकर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली, "पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं...!!

इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है। 
वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। 
हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए...!!
अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। 
उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। 
रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। 
यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझ कर शांत हो गया।
 
फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनिया से चली जाती...!!
अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आँसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी जिंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनिया से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए...!!
अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं। 
जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं, 
'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना...!!

अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सब कुछ कर सकती है, 
सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके...!!एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए वह जानबूझकर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली, 

"पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं...!!इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है। वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। 

हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए 
और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए...!!!!!
-पूजा मिश्रा

सोमवार, 20 अप्रैल 2026

111 ..चीनी भाषा दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है


स्वामी रामतीर्थ  जापान गए। जिस जहाज पर वह थे, एक नब्बे वर्ष का जर्मन बूढ़ा चीनी भाषा सीख रहा था। अब चीनी भाषा सीखनी बहुत कठिन बात है। शायद मनुष्य की जितनी भाषाएं हैं, उनमें सबसे ज्यादा कठिन बात है। क्योंकि चीनी भाषा के कोई वर्णाक्षर नहीं होते, कोई क ख ग नहीं होता। वह तो चित्रों की भाषा है। इतने चित्रों को सीखना नब्बे वर्ष की उम्र में! अंदाजन किसी भी आदमी को दस वर्ष लग जाते हैं ठीक से चीनी भाषा सीखने में।

चीनी भाषा (विशेषकर मंदारिन) 
दुनिया की सबसे पुरानी और सबसे ज्यादा बोली जाने 
वाली भाषाओं में से एक है, 
जिसके 1 अरब से अधिक भाषी हैं। 
यह एक टोनल (स्वर-आधारित) भाषा है

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

110 .. इंदौर में पुंगनूर गाय का एक जोड़ा है

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ दिन पहले पुंगनूर नस्ल की गायों को चारा खिलाते हुए तस्वीर पोस्ट की थी। साथ ही उन्हें दुलारते भी दिखे थे। मध्य प्रदेश के इंदौर में पुंगनूर नस्ल की गाय एक दूध व्यापारी के पास है। अब फिर से उनके गायों की चर्चा शुरू हो गई है। साथ ही उसके गाय के बारे में जानने की उत्सुकता भी बढ़ गई है। इंदौर में पुंगनूर गाय का एक जोड़ा है, जिसे यहां के दूध व्यापारी आंध्र प्रदेश से खरीदकर लाए थे। आइए आपको इस गाय की खासियत बताते हैं। 

दरअसल, पुंगनूर एक दुर्लभ प्रजाति की गाय है, इस गाय का नाम आंध्र प्रदेश के चित्तूर जिले के शहर पुंगनूर पर रखा गया है। पुंगनूर गाय सफेद और हल्के भूरे रंग की होती है। जिनका माथा काफी चौड़ा और सींग छोटे होते हैं। पुंगनूर गाय की औसत ऊंचाई ढाई फीट से तीन फीट के बीच होती है। वहीं, इस गाय का अधिकतम वजन 105 से 200 किलोग्राम तक होता है।  

इनके दूध में कई औषधीय गुण भी होते हैं। इन गायों का जिक्र पुराणों में भी मिलता है। पुंगनूर गाय के दूध की खास बात यह है कि इसमें 8 प्रतिशत तक फैट पाया जाता है। जबकि अन्य गाय के दूध में फैट केवल 3 से 5 प्रतिशत ही फैट होता है। इसके अलावा पुंगनूर गाय के मूत्र के अंदर एंटी बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं। इसका इस्तेमाल आंध्र प्रदेश के किसान फसलों पर छिड़काव के लिए करते हैं।  



वहीं, इस जोड़े को एक दूध व्यापारी सत्तू शर्मा ने एक साल पहले आंध्र प्रदेश के चित्तूर से खरीदकर इंदौर लाए है। तभी से ये गाय क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र है। महज ढाई फीट हाइट वाली यह दुनिया की सबसे छोटी गाय है। सत्तू शर्मा के मुताबिक पुंगनूर प्रजाति की गाय मध्य प्रदेश आने वाली संभवत: पहली गाय है। उन्होंने नवभारत टाइम्स.कॉम से बातचीत में कहा कि इसके दूध में स्वर्ण होता है।  



शर्मा ने बताया की दुनियाभर में मशहूर भगवान तिरुपति बालाजी का अभिषेक और प्रसाद इसी नस्ल के दूध से होता रहा है। ये देश में विलुप्त होती नस्लों में शामिल है। देश में इन गायों की संख्या सिर्फ 1000 के आसपास ही रह गई है।  

पुंगनूर गाय आपको एक लाख रुपए से लेकर 25 लाख रुपए तक की कीमत पर मिल जाती है। हालांकि इंदौर के व्यापारी ने कहा कि हमारे पास जो गाय है, उसकी कीमत 5-10 लाख रुपए तक है। ये भी माना जाता जाता है कि पुंगनूर गाय की आयु  जितनी कम होगी, उसकी कीमत उतनी ही अधिक होगी। कम संख्या होने की वजह से इसकी कीमत अधिक है।  

-सौजन्य गूगल जी

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2026

109 " तलाक के कागजों का क्या होगा..???

 तलाक होने के बाद पति कोर्ट से निकल कर ऑटो मे बैठा तो तलाकसुदा पत्नी रौनक भी उसी ऑटो मे बैठ गई..???उदास पति ने एक कातर दृष्टि से दस साल साथ रही पत्नी रौनक की तरफ देखा " वह बुझी मुस्कान के साथ बोली " बस अड्डे तक आखरी सफर आपके साथ करना चाहती हूँ।पति बोला " एलिमनी की रकम दो से तीन महीने मे दे दूंगा। घर बेच दूंगा।  तेरे लिए बनाया था। तू ही जिंदगी मे नही रही तो घर  का क्या करूँगा। ।


"रौनक जल्दबाजी मे बोली " घर मत बेचना। मुझे पैसे नही चाहिए। प्राइवेट जॉब करने लगी हूँ 
मेरा और मुन्ने का गुजारा हो जाता है। " अचानक ऑटो वाले ने ब्रेक मारे तो  पत्नी रौनक का मुँह सामने की रेलिंग से टकराने वाला था कि पति ने झटके से उसकी बांह पकड़ कर रोक लिया। 
वह पति की आँखों मे देखते हुए भरी आँखों से बोली 
"अलग हो गए मगर परवाह करने की आदत नही गई आपकी।" 

वह कुछ नही बोला। मगर वह रोने लगी। रोते रोते बोली " एक बात पूछूँ..??? " वह नजर उठा कर बोला "क्या? " 
वह धीरे से बोली " दो साल हो गए अलग रहते हुए " मेरी याद आती थी क्या? " वह बोला " अब बताने से भी क्या फायदा..???अब तो सब कुछ खत्म हो गया न? तलाक हो चुका है।

" रौनक बोली " दो सालों मुझे वो एक बार भी वो नींद नही आई जो आपके हाथ का तकिया बना कर सोने से आती थी। कह कर वह फफक पड़ी। बस अड्डा आ गया था। दोनों ऑटो से उतरे तो पति ने उसका हाथ पकड़ लिया। 

काफी दिनों बाद पति का स्पर्श कलाई पर महसूस हुआ तो वह भावुक हो गई। पति बोला " चलो अपने घर चलते हैं। " इतना सुनते ही रौनक बोली " तलाक के कागजों का क्या होगा..??? " पति बोला " फाड़ देंगे। इतना सुनते ही वह दहाड़ मार कर पति के गले से चिपट गई। 

पीछे पीछे दूसरे ऑटो मे आ रहे पति पत्नी के रिश्तेदार 
उनको इस हालत मे देखकर चुपचाप बस मे बैठकर चले गए।

रिश्तों को रिश्तेदारो पर मत छोड़ो, खुद निर्णय लेवें, 
आपस मे बात करो, अपनी गलती हो तो स्वीकार करो।

108 ..अलौकिक बुद्धि यहाँ है

 अलौकिक बुद्धि यहाँ है


अलौकिक बुद्धि यहाँ है
आप पुराने हो जाएँगे
वे मुझे डराने की कोशिश करते हैं
मैं पहले से ही डरा हुआ हूँ
मैं जानकारी के लिए अपने स्मार्टफ़ोन पर बहुत ज़्यादा निर्भर करता हूँ
अपने दिमाग से ज़्यादा
जिसने मुझे सज़ा दी है
कि मैं पहले की तरह यादों को रखने से इनकार कर रहा हूँ
लेकिन
मुझे सबसे ज़्यादा चिंता इस बात की है
क्या मेरे प्रियजनों के साथ मेरा समीकरण बदल जाएगा
क्या मेरा दिमाग यह पढ़ना बंद कर देगा कि वे क्या संदेश देना चाहते हैं
क्या मैं अपने फ़ोन की ओर भागूँगा
ताकि उनके हर इशारे का मतलब पढ़ सकू,या 
यह भयानक विलक्षणता की पराकाष्ठा नहीं है
-इन्दिरा (वर्ड प्रेस से)

गुरुवार, 9 अप्रैल 2026

107 AIIMS राजकुमारी अमृत कौर ने बनाया। इतिहास की किताबें लिखती हैं


एक महिला ने AIIMS बनाया। कांग्रेस ने उनका नाम मिटा दिया।

नेहरू ने श्रेय ले लिया।
AIIMS राजकुमारी अमृत कौर ने बनाया।
इतिहास की किताबें लिखती हैं— “नेहरू ने AIIMS बनाया”।
यह पंक्ति इतिहास नहीं, प्रोपेगेंडा है।
Jawaharlal Nehru ने AIIMS नहीं बनाया।
AIIMS Rajkumari Amrit Kaur की वजह से अस्तित्व में आया।
AIIMS इसलिए बना क्योंकि एक महिला ने
ज़मीन दी, पैसा जुटाया, सिस्टम से लड़ी और काम करवा कर दिखाया—
जबकि कांग्रेस देखती रही और बाद में ब्रांडिंग कर गई।

वह जमीन, जिसका ज़िक्र कभी नहीं होता
AIIMS दिल्ली, अंसारी नगर की लगभग 190 एकड़ की कीमती ज़मीन पर खड़ा है।
यह जमीन: न सरकार ने खरीदी, न अधिग्रहित की
यह राजकुमारी अमृत कौर की पारिवारिक संपत्ति थी—
जो उन्होंने दान में दी।, आज के मूल्य पर यह ज़मीन हज़ारों-हज़ार करोड़ रुपये की है।
कांग्रेस ने इस पर एक रुपया भी खर्च नहीं किया।
वह पैसा, जो नेहरू के पास नहीं था आजादी के बाद भारत आर्थिक रूप से टूटा हुआ था।
कांग्रेस के पास न संसाधन थे, न तैयारी—सिर्फ़ नारे थे।

तब अमृत कौर ने:
न्यूजीलैंड से विदेशी सहायता जुटाई
अंतरराष्ट्रीय मेडिकल सहयोग लाया
उपकरण, प्रशिक्षण और विशेषज्ञता की व्यवस्था की
अगर कांग्रेस सक्षम होती, तो विदेशी मदद की ज़रूरत ही क्यों पड़ती?
वह क़ानून, जिसे कांग्रेस टालती रही

AIIMS अधिनियम, 1956
नेहरू की तत्परता से नहीं,
अमृत कौर के लगातार दबाव से पास हुआ।
उन्होंने लड़ाई लड़ी:
अफसरशाही की सुस्ती से
मंत्रिमंडल की उदासीनता से
कांग्रेस की ढिलाई से
फाइलें चलीं क्योंकि उन्होंने ज़बरदस्ती चलवाईं।
नेहरू ने वास्तव में क्या किया?
पहले से बने काम को मंज़ूरी दी
भाषण दिए
फीते काटे

इसे संस्थान-निर्माण नहीं कहते।
इसे ऑप्टिक्स कहते हैं।
कांग्रेस ने उन्हें क्यों भुला दिया?
क्योंकि यह सच तीन मिथक तोड़ देता है:
कांग्रेस ने भारत बनाया
नेहरू ने संस्थान खड़े किए
सत्ता = योगदान
AIIMS इन सबका उलटा प्रमाण है।
एक शाही महिला ने
अपनी विरासत जनस्वास्थ्य के लिए कुर्बान कर दी।
कांग्रेस ने श्रेय हड़प लिया।

*हकीकत*
AIIMS राजकुमारी अमृत कौर की विरासत है।
कांग्रेस ने सिर्फ़ नाम पट्टिका लगाई।
बलिदान किसी और का।
इश्तिहार कांग्रेस का।