गुरुवार, 16 जनवरी 2014

बरसों बाद उसी सूने-आँगन में...........धर्मवीर भारती

बरसों बाद उसी सूने-आँगन में
जाकर चुपचाप खड़े होना
रिसती-सी यादों में पिरा-पिरा उठना
मन का कोना-कोना


कोने से फिर उन्हीं सिसकियों का उठना
फिर आकर बाहों में खो जाना
अकस्मात मंडप के गीतों की लहरी
फिर सन्नाटा हो जाना
दो गाढ़ी मेंहदी वाले हाथों का जुड़ना
कंपना, बेबस हो गिर जाना

रिसती-सी यादों में पिरा-पिरा उठना
मन का कोना-कोना
बरसों बाद उसी सूने-आँगन में
जाकर चुपचाप खड़े होना


-धर्मवीर भारती
मधुरिमा, बुधवार,15, जनवरी.2014

रविवार, 12 जनवरी 2014

बुलबुल को क्या सुने कोई उड़ जाते हैं हवास....मीर तकी `मीर’



अब की हज़ार रंग गुलिस्तां में आए गुल
पर उस बगैर अपने तो जी को न भाए गुल

नाचार हो "चमन में रहिए" कहूं जब
बुलबुल कहे है "और कोई दिन बराए-गुल"

बुलबुल को क्या सुने कोई उड़ जाते हैं हवास
जब दर्दमंद कहते हैं दम भर "हाय गुल"

क्या समझें लुत्फ़ चेहरों के रंगो-बहार का
बुलबुल ने और कुछ नहीं देखा सिवाए गुल

या वरफ़ उन लबों का ज़बाने-कलम पे "मीर"
या मुंह में अंदलीब के थे बर्ग-हाए-गुल

-मीर तकी `मीर’
...................
बराए-गुलः फूल(प्रियतमा), वरफ़ः प्रशंसा
अंदलीबः बुलबुल, बर्ग-हाए-गुलः फूलों की पंखुड़ियां
....................
मूल नामः मुहम्मद तकी
जन्मः 1724
अवसानः 1810
 


शनिवार, 11 जनवरी 2014

मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे.........दुष्यंत कुमार

 
मेरे स्वप्न तुम्हारे पास सहारा पाने आएंगे
इस बूढ़े पीपल की छाया में सुस्ताने आएंगे

हौले-हौले पांव हिलाओ जल सोया है छेड़ो मत
हम सब अपने-अपने दीपक यहीं सिराने आएंगे

थोड़ी आँच बची रहने दो थोड़ा धुआं निकलने दो
तुम देखोगी इसी बहाने कई मुसाफिर आएंगे

उनको क्या मालूम निरूपित इस सिकता पर क्या बीती
वे आये तो यहां शंख सीपियां उठाने आएंगे

फिर अतीत के चक्रवात में दृष्टि न उलझा लेना तुम
अनगिन झोंके उन घटनाओं को दोहराने आएंगे

रह-रह आँखो में चुभती है पथ की निर्जन दोपहरी
आगे और बढ़े तो शायद दृष्य सुहानें आएंगे

मेले में भटके तो कोई घर पहुंचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएंगे

हम क्यों बोलें कि इस आंधी में कई घरौंदे टूट गये
इन असफल निर्मितियों के शव कल पहचाने जाएंगे

हम इतिहास नहीं रच पाए इस पीड़ा में दहते हैं
अब जो धारायें पकड़ेंगे इसी मुहाने आएंगे

-दुष्यंत कुमार
मधुरिमा, बुधवार, 8 जनवरी 2014

सोमवार, 6 जनवरी 2014

बारिश में कागज की नाव थी........अज्ञात (फेसबुक से प्राप्त)


एक बचपन का जमाना था,
जिस में खुशियों का खजाना था..

चाहत चाँद को पाने की थी,
पर दिल तितली का दिवाना था..

खबर ना थी कुछ सुबहा की,
ना शाम का ठिकाना था..

थक कर आना स्कूल से,
पर खेलने भी जाना था...

माँ की कहानी थी,
परियों का फसाना था..

बारिश में कागज की नाव थी,
हर मौसम सुहाना था..

अज्ञात (फेसबुक से प्राप्त)

रविवार, 5 जनवरी 2014

आत्मशक्ति पर निर्भर हो.............अनुपमा पाठक

मान-अभिमान से परे
रूठने-मनाने के सिलसिले-सा
कुछ तो भावुक आकर्षण हो !




किनारे पर रेत से घर बनाता
और अगले पल उसे तोड़-छोड़
आगे बढ़ता -सा
भोला-भाला जीवन दर्शन हो !





नमी सुखाती हुई
रूखी हवा के विरुद्ध
नयनों से बहता निर्झर हो !



परिस्थितियों की दुहाई न देकर
अन्तःस्थिति की बात हो
शाश्वत संघर्ष
आत्मशक्ति पर निर्भर हो !




भीतर बाहर
एक से...
कोई दुराव-छिपाव नहीं
व्यवहारगत सच्चाइयां
मन प्राण का दर्पण हो !




सच के लिये
लड़ाई में
निजी स्वार्थों के हाथों
कभी न आत्मसमर्पण हो !



-अनुपमा पाठक

बुधवार 1,जनवरी 2014 की मधुरिमा में प्रकाशित रचना

शुक्रवार, 3 जनवरी 2014

गीत बनाने की जिद है....-यश मालवीय


दीवारों से भी बतियाने की जिद है
हर अनुभव को गीत बनाने की जिद है

दिये बहुत से गलियारों मे जलते हैं
मगर अनिश्चय के आंगन तो खलते हैं
कितना कुछ घट जाता है मन के भीतर ही
अब सारा कुछ बाहर लाने की जिद है

जाने क्यों जो जी में आया नहीं किया
चुप्पा आसमान को हमने समझ लिया
देख चुके भाषा का बैभव सारा
बच्चों जैसा अब तुतलाने की जिद है

कौन बहलता है अब परी कथाओं से
सौ विचार आते हैं नई दिशाओं से
खोया रहता एक परिन्दा सपनों का
उसको अपने पास बुलाने की जिद है

सरोकार क्या उनसे जो खुद से ऊबे
हमके तो अच्छे लगते हैं मंसूबे
लहरे अपना नाम-पता तक सब खो दें
ऐसा इक तूफान उठाने की जिद है..
---यश मालवीय

मधुरिमा में प्रकाशित रचना


गुरुवार, 2 जनवरी 2014

जल्दबाज़ी में......निर्मल आनन्द


जल्दबाज़ी में
छूट जाता है
कुछ न कुछ
कुछ न कुछ
हो जाती है गलतियां
हड़बड़ी में
पत्र लिखते हुए

नहीं रहती
चित्रकार के
चित्र में सफाई
कहीं फीके
कहीं गाढ़े
लग जाते हैं रंग
कट जाती है उंगलियां
सब्जी काटते-काटते

जब देखते हैं हम पलटकर
बीते दिनों के पन्ने
हमारी गलतियां
सबक की शक्ल में
मुस्कुराती हैं !

-निर्मल आनन्द