सोमवार, 30 जनवरी 2017

मूर्ख कौन? ....रचनाकार अज्ञात


किसी गांव में एक सेठ रहता था. उसका एक ही बेटा था, जो व्यापार के काम से परदेस गया हुआ था. सेठ की बहू एक दिन कुएँ पर पानी भरने गई. घड़ा जब भर गया तो उसे उठाकर कुएँ के मुंडेर पर रख दिया और अपना हाथ-मुँह धोने लगी. तभी कहीं से चार राहगीर वहाँ आ पहुँचे. एक राहगीर बोला, “बहन, मैं बहुत प्यासा हूँ. क्या मुझे पानी पिला दोगी?”

सेठ की बहू को पानी पिलाने में थोड़ी झिझक महसूस हुई, क्योंकि वह उस समय कम कपड़े पहने हुए थी. उसके पास लोटा या गिलास भी नहीं था जिससे वह पानी पिला देती. इसी कारण वहाँ उन राहगीरों को पानी पिलाना उसे ठीक नहीं लगा.

बहू ने उससे पूछा, “आप कौन हैं?”

राहगीर ने कहा, “मैं एक यात्री हूँ”

बहू बोली, “यात्री तो संसार में केवल दो ही होते हैं, आप उन दोनों में से कौन हैं? अगर आपने मेरे इस सवाल का सही जवाब दे दिया तो मैं आपको पानी पिला दूंगी. नहीं तो मैं पानी नहीं पिलाऊंगी.”

बेचारा राहगीर उसकी बात का कोई जवाब नहीं दे पाया.

तभी दूसरे राहगीर ने पानी पिलाने की विनती की.

बहू ने दूसरे राहगीर से पूछा, “अच्छा तो आप बताइए कि आप कौन हैं?”

दूसरा राहगीर तुरंत बोल उठा, “मैं तो एक गरीब आदमी हूँ.”

सेठ की बहू बोली, “भइया, गरीब तो केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?”

प्रश्न सुनकर दूसरा राहगीर चकरा गया. उसको कोई जवाब नहीं सूझा तो वह चुपचाप हट गया.

तीसरा राहगीर बोला, “बहन, मुझे बहुत प्यास लगी है. ईश्वर के लिए तुम मुझे पानी पिला दो”

बहू ने पूछा, “अब आप कौन हैं?”

तीसरा राहगीर बोला, “बहन, मैं तो एक अनपढ़ गंवार हूँ.”

यह सुनकर बहू बोली, “अरे भई, अनपढ़ गंवार तो इस संसार में बस दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?”

बेचारा तीसरा राहगीर भी कुछ बोल नहीं पाया.

अंत में चौथा राहगीह आगे आया और बोला, “बहन, मेहरबानी करके मुझे पानी पिला दें. प्यासे को पानी पिलाना तो बड़े पुण्य का काम होता है.”

सेठ की बहू बड़ी ही चतुर और होशियार थी, उसने चौथे राहगीर से पूछा, “आप कौन हैं?”

वह राहगीर अपनी खीज छिपाते हुए बोला, “मैं तो..बहन बड़ा ही मूर्ख हूँ.”

बहू ने कहा, “मूर्ख तो संसार में केवल दो ही होते हैं. आप उनमें से कौन हैं?”

वह बेचारा भी उसके प्रश्न का उत्तर नहीं दे सका. चारों पानी पिए बगैर ही वहाँ से जाने लगे तो बहू बोली, “यहाँ से थोड़ी ही दूर पर मेरा घर है. आप लोग कृपया वहीं चलिए. मैं आप लोगों को पानी पिला दूंगी”

चारों राहगीर उसके घर की तरफ चल पड़े. बहू ने इसी बीच पानी का घड़ा उठाया और छोटे रास्ते से अपने घर पहुँच गई. उसने घड़ा रख दिया और अपने कपड़े ठीक तरह से पहन लिए.

इतने में वे चारों राहगीर उसके घर पहुँच गए. बहू ने उन सभी को गुड़ दिया और पानी पिलाया. पानी पीने के बाद वे राहगीर अपनी राह पर चल पड़े.

सेठ उस समय घर में एक तरफ बैठा यह सब देख रहा था. उसे बड़ा दुःख हुआ. वह सोचने लगा, इसका पति तो व्यापार करने के लिए परदेस गया है, और यह उसकी गैर हाजिरी में पराए मर्दों को घर बुलाती है. उनके साध हँसती बोलती है. इसे तो मेरा भी लिहाज नहीं है. यह सब देख अगर मैं चुप रह गया तो आगे से इसकी हिम्मत और बढ़ जाएगी. मेरे सामने इसे किसी से बोलते बतियाते शर्म नहीं आती तो मेरे पीछे न जाने क्या-क्या करती होगी. फिर एक बात यह भी है कि बीमारी कोई अपने आप ठीक नहीं होती. उसके लिए वैद्य के पास जाना पड़ता है. क्यों न इसका फैसला राजा पर ही छोड़ दूं. यही सोचता वह सीधा राजा के पास जा पहुँचा और अपनी परेशानी बताई. सेठ की सारी बातें सुनकर राजा ने उसी वक्त बहू को बुलाने के लिए सिपाही बुलवा भेजे और उनसे कहा, “तुरंत सेठ की बहू को राज सभा में उपस्थित किया जाए.”

राजा के सिपाहियों को अपने घर पर आया देख उस सेठ की पत्नी ने अपनी बहू से पूछा, “क्या बात है बहू रानी? क्या तुम्हारी किसी से कहा-सुनी हो गई थी जो उसकी शिकायत पर राजा ने तुम्हें बुलाने के लिए सिपाही भेज दिए?”

बहू ने सास की चिंता को दूर करते हुए कहा, “नहीं सासू मां, मेरी किसी से कोई कहा-सुनी नहीं हुई है. आप जरा भी फिक्र न करें.”

सास को आश्वस्त कर वह सिपाहियों से बोली, “तुम पहले अपने राजा से यह पूछकर आओ कि उन्होंने मुझे किस रूप में बुलाया है. बहन, बेटी या फिर बहू के रुप में? किस रूप में में उनकी राजसभा में मैं आऊँ?”

बहू की बात सुन सिपाही वापस चले गए. उन्होंने राजा को सारी बातें बताई. राजा ने तुरंत आदेश दिया कि पालकी लेकर जाओ और कहना कि उसे बहू के रूप में बुलाया गया है.

सिपाहियों ने राजा की आज्ञा के अनुसार जाकर सेठ की बहू से कहा, “राजा ने आपको बहू के रूप में आने के ले पालकी भेजी है.”

बहू उसी समय पालकी में बैठकर राज सभा में जा पहुँची.

राजा ने बहू से पूछा, “तुम दूसरे पुरूषों को घर क्यों बुला लाईं, जबकि तुम्हारा पति घर पर नहीं है?”

बहू बोली, “महाराज, मैंने तो केवल कर्तव्य का पालन किया. प्यासे पथिकों को पानी पिलाना कोई अपराध नहीं है. यह हर गृहिणी का कर्तव्य है. जब मैं कुएँ पर पानी भरने गई थी, तब तन पर मेरे कपड़े अजनबियों के सम्मुख उपस्थित होने के अनुरूप नहीं थे. इसी कारण उन राहगीरों को कुएँ पर पानी नहीं पिलाया. उन्हें बड़ी प्यास लगी थी और मैं उन्हें पानी पिलाना चाहती थी. इसीलिए उनसे मैंने मुश्किल प्रश्न पूछे और जब वे उनका उत्तर नहीं दे पाए तो उन्हें घर बुला लाई. घर पहुँचकर ही उन्हें पानी पिलाना उचित था.”

राजा को बहू की बात ठीक लगी. राजा को उन प्रश्नों के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता हुई जो बहू ने चारों राहगीरों से पूछे थे.

राजा ने सेठ की बहू से कहा, “भला मैं भी तो सुनूं कि वे कौन से प्रश्न थे जिनका उत्तर वे लोग नहीं दे पाए?”

बहू ने तब वे सभी प्रश्न दुहरा दिए. बहू के प्रश्न सुन राजा और सभासद चकित रह गए. फिर राजा ने उससे कहा, “तुम खुद ही इन प्रश्नों के उत्तर दो. हम अब तुमसे यह जानना चाहते हैं.”

बहू बोली, “महाराज, मेरी दृष्टि में पहले प्रश्न का उत्तर है कि संसार में सिर्फ दो ही यात्री हैं – सूर्य और चंद्रमा. मेरे दूसरे प्रश्न का उत्तर है कि बहू और गाय इस पृथ्वी पर ऐसे दो प्राणी हैं जो गरीब हैं. अब मैं तीसरे प्रश्न का उत्तर सुनाती हूं. महाराज, हर इंसान के साथ हमेशा अनपढ़ गंवारों की तरह जो हमेशा चलते रहते हैं वे हैं – भोजन और पानी. चौथे आदमी ने कहा था कि वह मूर्ख है, और जब मैंने उससे पूछा कि मूर्ख तो दो ही होते हैं, तुम उनमें से कौन से मूर्ख हो तो वह उत्तर नहीं दे पाया.” इतना कहकर वह चुप हो गई.

राजा ने बड़े आश्चर्य से पूछा, “क्या तुम्हारी नजर में इस संसार में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं?”

“हाँ, महाराज, इस घड़ी, इस समय मेरी नजर में सिर्फ दो ही मूर्ख हैं.”

राजा ने कहा, “तुरंत बतलाओ कि वे दो मूर्ख कौन हैं.”

इस पर बहू बोली, “महाराज, मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं इसका उत्तर दूं.”

राजा को बड़ी उत्सुकता थी यह जानने की कि वे दो मूर्ख कौन हैं. सो, उसने तुरंत बहू से कह दिया, “तुम निःसंकोच होकर कहो. हम वचन देते हैं तुम्हें कोई सज़ा नहीं दी जाएगी.”

बहू बोली, “महाराज, मेरे सामने इस वक्त बस दो ही मूर्ख हैं.” फिर अपने ससुर की ओर हाथ जोड़कर कहने लगी, “पहले मूर्ख तो मेरे ससुर जी हैं जो पूरी बात जाने बिना ही अपनी बहू की शिकायत राजदरबार में की. अगर इन्हें शक हुआ ही था तो यह पहले मुझसे पूछ तो लेते, मैं खुद ही इन्हें सारी बातें बता देती. इस तरह घर-परिवार की बेइज्जती तो नहीं होती.”

ससुर को अपनी गलती का अहसास हुआ. उसने बहू से माफ़ी मांगी. बहू चुप रही.

राजा ने तब पूछा, “और दूसरा मूर्ख कौन है?”

बहू ने कहा, “दूसरा मूर्ख खुद इस राज्य का राजा है जिसने अपनी बहू की मान-मर्यादा का जरा भी खयाल नहीं किया और सोचे-समझे बिना ही बहू को भरी राजसभा में बुलवा लिया.”

बहू की बात सुनकर राजा पहले तो क्रोध से आग बबूला हो गया, परंतु तभी सारी बातें उसकी समझ में आ गईं. समझ में आने पर राजा ने बहू को उसकी समझदारी और चतुराई की सराहना करते हुए उसे ढेर सारे पुरस्कार देकर सम्मान सहित विदा किया.

शनिवार, 21 जनवरी 2017

विश्व बैंक की रिपोर्ट व एक भिखारी से संवाद....सुदर्शन कुमार सोनी

एक लम्बी लघु कथा.......
भोपाल के बोर्ड ऑफ़िस चौराहे पर स्थित, "मोटल सिराज" से एक कार्यक्रम अटेंड कर मैं अपने ग़रीबखाने में वापिसी के लिये अपनी कार उठाने पैदल मुख्य सड़क के नीचे की सड़क पर जा रहा था कि थोड़ा आगे जाने पर मुझे मुख्य सड़क से लगी एक संकरी सीमेंट रोड पर दो शख़्स थोड़ी दूरी पर आमने-सामने बैठे दिखे। मैं रिश्तेदारी में एक जन्मदिन कार्यक्रम के लज़ीज़ खाने को उदरस्थ करने के उपरांत-की स्थिति में था। अतः मेरी नज़र दोनों भिखारियों पर चली गयी वह पालथी मारकर आमने-सामने बैठे थे और उनके सामने कई टिन फ़ॉयल रखी थी, कुछ खुल गयी थी कुछ बंद थी। बाजू में एक बाटली भी रखी दिख रही थी जिसमे पीले भूरे रंग का कोई द्रव भरा था। मेरी नज़रों ने तुरन्त पहचान लिया कि ये भाई दिनभर की कमाई के बाद अपना डिनर कर रहे हैं। साथ में बाटली से पैग भी मार लेते होंगे। क्योंकि बाटली कुछ खाली लग रही थी।
चूँकि हमारा पेट भरा हुआ था और आप तो जानते ही हैं कि जब पेट भरा हो तो समाजसेवा के लिये दिल बल्लियों उछलने लगता है। हम ठिठक गये भिखारी देखने नहीं उसके ठाठ का आकलन करने! और इसलिये भी हमें ज़्यादा कौतुक हो रहा था क्योंकि विश्व बैंक की ग़रीबी पर हालिया आयी रिपोर्ट हमें यहाँ प्रथम सही लग रही थी! ये भिखारी "हाथ कंगन को आरसी क्या" की उक्ति चरितार्थ कर रहे थे। "विश्व बैंक" ने अभी हाल में ही अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पूरे विश्व में ग़रीबी कम हो रही है, और इसकी कम होने की सबसे ज़्यादा दर भारत में रही है। बीस सौ पन्द्रह में भारत में ग़रीब कुल जनसंख्या का दस प्रतिशत से भी कम रहे थे। यह भारत जैसे देश के लिये एक अच्छी स्थिति कही जा सकती है, अब ये बात अलग है कि बहुत से लोग ग़रीबों की संख्या कम होने से दुखी हो रहे होंगे यह आप बेहतर जानते हो कि इसमें कौन-कौन हैं? और इसी का प्रत्यक्ष आकलन का मौक़ा सड़क किनारे बैठे भिखारियों के रूप में आ खड़ा होने से हमारे क़दम अपने आप ही रुक गये थे।
हम भिखारी से सवाल-जबाब के मूड में आ गये थे। इन दो भिखारियों को पहले वैसे हम कोई मज़दूर समझ रहे थे जो कि सड़क के किसी गड्ढे को पूरने का काम कर रहे होंगे या कि नये गड्ढे करने का काम कर रहे होंगे! और हम आप सब जानते ही हैं कि हमारे यहाँ नयी सड़क नगरनिगम या लोक-निर्माण विभाग के बनाने के बाद ही बीएसएनल या अन्य किसी मोबाईल कंपनी को केबल के लिये सड़क खोदने की याद आती है तो या तो हमने सोचा कि गड्ढा करने या गड्ढा पूरने के काम में लगे मज़दूर होंगे ये।
लेकिन हमारे इस सवाल पर भिखारी ने अजीब सा मुँह बनाया! बोला साहब मज़दूरी-वज़दूरी के काम में कुछ नहीं रखा ये सब हम कर के छोड़ चुके हैं घाटे का धंधा है?
मैंने आश्चर्य से कहा, कुछ नहीं रखा, आजकल तो भोपाल में मज़दूर को चार सौ रुपये से अधिक हर दिन मिलता है?
वह बोला तो इसमें कौन सी ख़ास बात है इससे अधिक ही हम रोज़ अपने इस नये काम में कमा लेते हैं! और उसने सामने बैठे अपने साथी भिखारी की ओर पुकार कर कहा क्यों भीखू ग़लत कह रहा हूँ क्या?
भीखू ने पहले तो एक घूँट हलक़ के अंदर किया फिर बोला लालू आज तो छैः सौ रही कमाई मेरी! तुम्हारी कितनी तो वह बोला छैः सौ तो नहीं पाँच सौ के लगभग रही।
मुझे यह सुन लगा कि जो कहते हैं कि अच्छे दिन नहीं आये हैं वे ग़लत हैं सबसे पहले तो इन्हीं के आये हैं! मैंने आगे कहा कि यह खाना वग़ैरह टिन फ़ॉयल में कहाँ से लाये हैं आप दोनों? ये पार्टी वाले दे गये होंगे? इस पर वह नाराज़ हो गया बोला साहब हम माँग कर नहीं खाते मेहनत की कमाई का खाते हैं! भीख माँगने का यह मतलब नहीं है कि हम खाना भी माँगें लोगों से! हमारे उसूल के ख़िलाफ़ है यह।
वह आगे बोला साहब लगता है अभी आपके पास टाईम ही टाईम है पेट भरा है न, ठीक है हम भी मस्ती में हैं तो बात कर लेते हैं! लेकिन धंधे के टाईम पर इस एमपीनगर में हमारे पास एक मिनट का भी समय नहीं रहता है! पूरे टाईम चौराहे में एक ओर की बत्ती लाल रहती है और हम बस यहीं पर कार वालों को लाचारी व विवशता की बत्ती देकर अपना काम करते हैं।
यह एमपीनगर है सामने देखो वो "अमित शुक्ला क्लासेस" फिर वो बोर्ड देखो "रिजवी सर" और न जाने कितने कोचिंग संस्थान है यहाँ अपने पूरे एमपी से आये कई हज़ार बच्चे फ़ास्ट फ़ूड खाकर ही ज़िंदा रहते हैं। इसमें कम से कम साफ़-सफ़ाई तो रहती है वैसे भी स्वच्छ भारत अभियान चल रहा है और सब हाथ में झाड़ू उठाकर फोटो खिंचवा चुके हैं! तो हमारा भी तो इस दिशा में कोई फ़र्ज़ बनता है!
मैं आश्चर्य चकित कि यह तो "उन्नत कृषक" की तरह "उन्नत भिखारी" है! वो आगे बोला कि साहब बनाने-खाने के लफड़े में कौन पड़े सौ रुपये से कम में खाना बढ़िया पैक आ जाता है। जो बुलाना है बुला लेते हैं और साथ एक बाटली ले आते हैं, तो दिन भर की थकान व ग़म दूर हो जाते हैं और उसने एक घूँट तुरन्त मार ली बाटली से, मैं देखता रह गया कि यह नये ज़माने के भिखारी हैं जो कि पैकड खाना खाते हैं। हम और आप बाहर का अवाईड करते हैं कि कौन पैसे ख़र्च करे लेकिन ये दिलेरी से ख़र्च करते हैं।
मेरे चुप रहने पर वह पिज़्ज़ा का एक टुकड़ा मुँह में अंदर ठूँसते हुये बोला, क्या सोच रहे हो साहब कि हम भिखारी होकर मिले खाने की जगह यह क्यों खा रहे है?
साहब ऐसा है अपने भी कुछ सिंद्धांत हैं हम कोई राजनैतिक दल या नेता नहीं हैं कि चाहे जब रंग बदल लें। हम भिक्षा में खाना नहीं लेते केवल नगदी लेते हैं।
मैंने कहा कि क्या रोज़ ही आप लोग "रेडी टू ईट" खाना खाते हो?" वह थोड़ा तल्ख़ होकर बोला क्या आप रोज़ खाना नहीं खाते हो जो ऐसा सवाल कर रहे हो? आज के ज़माने में कौन चिक-चिक करे हर चीज़ पैकड मिलती है और आप देख ही रहे हो कि कितना मोटर कारों का प्रदूषण है यहाँ यदि हम चूल्हा जला कर पकायेंगे तो एक बीमार हो जायेंगे दो कितना समय बरबाद होगा इतने में तो हम न जाने कितना कमा लेंगे भीख से? मैंने सोचा समय प्रबंधन की क्या सीख दी है इसने।
मैंने उत्सुकता से पूछा पानी कहाँ से लाते हो?
तो उसने मुस्कुराकर अपनी दाँयी ओर दबी एक दूसरी बाटली निकाल ली हम हैरान रह गये। यह मिनरल वाटर की बॉटल थी एक उसके बाँये ओर बाटली दूसरी दाँये ओर बाटली।
दूसरा भिखारी बोला, साहब बाहर का पानी पीना भी ख़तरे से खाली नहीं है? हम आश्चर्यचकित रह गये इनके यह ठाठ देखकर हम यहाँ से आगे ही नहीं बढ़ पा रहे थे। हमें लगा कि विश्व बैंक की रिपोर्ट कितनी सटीक रहती है! हम हमेशा से ही इसके पक्षधर रहे हैं! आज देखो इस देश का भिखारी भी मज़े कर रहा है! ग़रीबी कम हो रही है तभी तो यह स्थिति बनी है!
हम यह सोच ही रहे थे कि मोबाईल की रिंगटोन बजने की आवाज़ आयी हमें लगा कि हमारा मोबाईल बजा है। घर से बाहर हुये घंटा भर हो गया है अतः यह बीवी ने फोन पर घंटी का घंटा बजा दिया। जेब में हाथ डाला तो हमारा मोबाईल शांत था हमने पत्नी को मन ही मन धन्यवाद दिया। लेकिन साथ ही यह सोचा कि ज़रूर वह चैनल में कोई सास-बहु का अच्छा सीरियल देखने में व्यस्त हो गयी होगी नहीं तो ऐसा तो हो ही नहीं सकता कि हर घंटे वह फोन पर हमारी क्लास न लें? हमने देखा कि भिखारी का मोबाईल बज रहा था जेब से उसने उसे निकाल कर बाहर कर दिया था।
मैंने कहा बात तो कर लो? कोई ख़ास बात होगी तो वह बोल उठा अरे साहब अपन रात को डिनर के समय फोन नहीं उठाते। और हमें मालूम है यह किसका होगा। इस समय हमारा अगले चौराहे पर बैठा दोस्त खा-पीकर मस्त हो गया होगा तो अब वह हमें इसी समय फोन करता है दिनभर की एक्सपीरिंयस शेयरिंग होती है। या बीट का सिपाही होगा स्साला आये दिन भीख माँगता है।
हम आश्चर्य-चकित थे कि ये तो पढ़ा-लिखा भिखारी जान पड़ता है! हमारी नज़र सामने हंटर बीयर के चमकते विज्ञापन पर गयी हमें लगा कि आज हमें इस भिखारी से साक्षात्कार होकर अंदर से हंटर की मार जैसा लग रहा है?
वह फिर बोल उठा साहब आपको कष्ट हो रहा है न कि हम जैसा भिखारी मिनरल वाटर व पैकड खाना व महँगी शराब पी रहा है? साहब सबकी अपनी-अपनी क़िस्मत है!
मैंने कहा लेकिन इस माँगने के काम में तुम्हे अपनी आत्मा कचोटती महसूस नहीं होती?
वह बोला इस देश में किसी की आत्मा किसी भी बात से कचोटती नहीं है। सब पहले की भाँति चलता रहता है चाहे विस्फोट में सौ लोग मर जायें, मिनी बस में गैंग रेप हो जाये, पुल टूटने पर दो लोग मर जायें, मंदिर में भगदड़ मचने से लोग मर जायएं बस उस पर थोड़ी सी तात्कालिक चर्चा होती है फिर सब पहले की ही तरह शांत हो जाता है! सब लोग फिर अपने अपने गुंताड़े (अपने अपने काम) में लग जाते हैं। यहाँ के नीच प्रकृति के लोग तो सर्जीकल स्ट्राईक पर भी सवाल उठाते हैं। वो जो चीन है वाल वाला वह भी कहता है सीमा पार कोई वाल या फेंसिग भारत लगायेगा तो गड़बड़ हो जायेगा!
मैंने सोचा कि इसे इतनी सब जानकारी कैसे है, तो वह भाँप गया बोला साहब यह भोपाल है। यहाँ अख़बारों की कमी नहीं है यहाँ हर हफ़्ते एक नया अख़बार निकलता है! जो बाल श्रम क़ानून के पालन की बात करते हैं वही अख़बार शाम तीन बजे से बच्चों के माध्यम से चौराहों पर बिकवाते हैं और हमारी यह स्थायी गद्दी है। हमें दो-तीन अख़बार मुफ़्त में मिलते हैं और फिर मुफ़्त के अख़बार को पढ़ने का अलग मज़ा है!
मैंने अब यहाँ से खिसक लेना ही उचित समझा। मैंने जाते-जाते देखा कि आखिरी घूँट लेने के बाद वे दोनों मस्ती में वही लुढ़क गये थे। मैंने सोचा कि दिलजले मानें या न मानें इस देश ने प्रगति न की होती तो क्या आज ये भिखारी पैकड खाना, मिनरल वाटर के साथ अच्छी शराब पी रहे होते और उसके बाद चैन की नींद!









-सुदर्शन कुमार सोनी

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

आसरा,,,,,,,विरेंदर 'वीर' मेहता




"लाखों आशियाने पर एक रात का आसरा नहीं।" गली में किसी की पुकार सुन विश्वा ने कोठरी से बाहर देखा। उसका 'मोती' (कुत्ता) एक अजनबी फ़कीर पर भौंक रहा था। सहसा विश्वा को मजाक सूझा और वह अपनी 'बोतल' संभालकर हंस पड़ा। "चल जोगिया, आज की रात मैं बनता हूँ तेरा आसरा। पर एक शर्त है कि तुझे 'मदिरा' पीनी होगी मेरे साथ, क्योंकि मैं तो बिन पिये सोया नहीं आज तक।" 
"जैसी रब की मर्ज़ी।" फ़कीर भी हंसने लगा। "लेकिन बच्चा, अगर हम पियेंगे तो आज तू नहीं पियेगा। बोल क्या बोलता है?"
विश्वा सोच में पड़ गया लेकिन फिर मुस्कराने लगा। "ठीक है जोगिया आज यही सही।"
रात तो ग़ुज़रनी ही थी आख़िर गहरी होते-होते ग़ुज़र गयी। .........
"इतनी सुन्दर सुबह।" खो सा गया विश्वा।
"अच्छा बच्चा चलता हूँ अपने धर्म-कर्म की राह पर।" फ़कीर की आवाज़ से विश्वा सूर्योदय के जादू से बाहर आ गया। "बाबा। मैंने तो रात एक मज़ाक किया था और तुमने एक रात के आसरे के लिये अपना धर्म-कर्म सब खो दिया।"
"नहीं मेरे बच्चे, सिर्फ़ एक आसरे के लिये नही!" मुस्कराता हुआ फ़कीर चल दिया।
'पक्षियो की चहचहाट, नदी की हिलोरे लेती लहरें और चमत्कारी सूर्योदय' और भी कितना कुछ उसको देकर जा रहा था वह अलमस्त फ़कीर, मानो कह रहा हो। "मेरी एक रात ने तो तेरे सारे अंधेरे को समेट लिया बच्चा।"
पीछे-पीछे चल पड़ा था उसका प्यारा 'मोती' और विश्वा उन्हें जाते दूर तक देखता रहा, सिर्फ़ देखता रहा।
-विरेंदर 'वीर' मेहता

मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

क्या आपने कभी इन पश्चिमी दार्शनिकों को पढ़ा है


*लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910)*
"हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।

*हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946)*
" हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही दिलशाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । सलाम हो उस दिन को "।

*अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955)*
"मैं समझता हूँ कि हिन्दूओ ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके । हिन्दुत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।

*हस्टन स्मिथ (1919)*
"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।

*माइकल नोस्टरैडैमस (1503 - 1566)*
" हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा"।

*बर्टरेंड रसेल (1872 - 1970)*
"मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।

*गोस्टा लोबोन (1841 - 1931)*
" हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।

*बरनार्ड शा (1856 - 1950)*
"सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।

*जोहान गीथ (1749 - 1832)*
"हम सभी को अभी या बाद मे हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है ।मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।"

विपुल लखनवी "बुलेट" की फेसबुक वाल से

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है....


एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है, भगवान आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे. एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बनकर खड़ा हो
जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ.

भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना. कुछ बोलना नहीं, मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है.

सेवक मान जाता है.

सबसे पहले मंदिर में बिजनेसमैन आता है और कहता है, भगवान मैंने नयी फैक्ट्री डाली है, उसे खूब उंचाई पर पहुंचाना और वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे गिर जाता है. वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है.

सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता.

इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं, भगवान मदद कर.....तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है. वह भगवान का शुक्रिया अदा करता है और चला जाता है.

अब तीसरा व्यक्ति आता है. वह नाविक होता है. वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान.

तभी पीछे से बिजनेसमैन पुलिस के साथ आता है और पुलिस को बताता है कि मेरे बाद ये नाविक आया है. इसी ने मेरा पर्स चुराया है, पुलिस नाविक को पकड के ले जा रही होती है कि भगवान की जगह खडा सेवक बोल पड़ता है कि पर्स तो उस गरीब आदमी ने उठाया है.

अब पुलिस उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है.

रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी-खुशी पूरा किस्सा बताता है.
भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा है.

वह व्यापारी गलत धंधे करता है. अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ना था. इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इनसान को मिला था. पर्स मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते.

रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था. अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती. उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती. तुमने सब गड़बड़ कर दी.

बात पते की. 
कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी प्रॉब्लम आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरा साथ ही क्यों हुआ. लेकिन इसके पीछे भगवान की प्लानिंग होती है. जब भी कोई प्रॉब्लम आये. उदास मत होना. इस स्टोरी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है....

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

विभिन्न पुस्तकों से संकलित

विभिन्न पुस्तकों से संकलित

कठिनाईयाँ

जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाईयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाईयों को मिटा नहीं सकते। क्योंकि अपनी समस्याओं एंव कठिनाईयों की वजह आप स्वयं हैं।

असंभव

इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। हम वो सब कुछ कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, 
जो आज तक हमने नहीं सोचा।

हार ना मानना

बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी, जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है। इसलिए लक्ष्य की ओर बढ़ें। अर्थ- हार व जीत का
सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का सहीं परिचय करवाती है।

सच्चा आत्मविश्वास

अगर किसी चीज़ को आप सच्चे दिल से चाहो तो पूरी कायनात 
उसे तुमसे मिलाने में लग जाती हैं।

सच्ची महानता

सच्ची महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि 
हर बार गिरकर फिर से उठ जाने में हैं।

गलतियां

अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है। आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है।

चिन्ता

अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं हैं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य में पछतावा है।

शक्ति

ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है।

मेहनत

हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां व समय हमारा भाग्य लिख ही देंगी।

सपने

सच कहे तो सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, 
सपने तो वो है जो हमको नींद हीं न आने दें।

समय

आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (२४ घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है। समय सभी काे एक समान ही मिलता हैं।

विश्वास

विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है। विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता हैं। विश्वास की नीव पर टिके है सारे रिश्तें।

सफलता

दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते हैं जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते हैं।

सोच

बारिश के दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही नज़रअन्दाज कर देते है। समस्याए समान है, लेकिन आपका नजरिया इनमें फर्क पैदा करती है। इसलिए अपने सोचने के नजरिये में बदलाव करें।

प्रसन्नता

यहा पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है... 
ये आप ही के कर्मों से आती है .... आपके कर्मं ही निमित्त बनते हैं।

निमित्त भाव

आप सिर्फ निमित्त मात्र हैं इस संसार में। यह संसार एक रंगमंच हैं - सभी मनुष्य आत्मायें अपना-अपना Part Play कर रही हैं। जाे आत्मा अपना Part निमित्त भाव से Play कर रही है, ओ आनंद में हैं।
याद रखें - जीवन में सच्चा आनंद और शांति ताे सिर्फ व सिर्फ ईश्वरीय ध्यान `या` परमात्म याद (Godly Meditation)  में ही हैं। चाहे अरबों-खरबों (Billions - trillions) इकट्ठा कर लो फिर भी सच्चा आनंद और शांति कभी ना मिलेगी।

साभार वैभवी पाण्डेय

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

गोबर भी है बड़े काम की चीज.....

गाय के गोबर से बना डाला मकान
हरियाणा (रोहतक) : वर्तमान में बन रहे मकान गर्मी में तपते हैं तो सर्दी में सिकुड़ने को मजबूर कर देते हैं। इसके पीछे कारण है कि मकान निर्माण में प्रयोग होने वाला लोहा, सीमेंट और पक्की ईंट ऊष्मा को अंदर आने से नहीं रोक पाते। इस समस्या से निजात पाने के लिए डॉ. शिव दर्शन मलिक ने गाय के गोबर एवं जिप्सम को मिलाकर एक मकान तैयार किया है। इस नई तकनीक में नींव से ऊपर एक दाना भी सीमेंट, रोड़ी, पक्की ईंट आदि का प्रयोग नहीं होगा। प्राकृतिक संसाधनों से बने इस भवन में वातानुकूलन की आवश्यकता नहीं। अपने इस अविष्कार को लेकर डॉ. मलिक ने मंगलवार को प्रेसवार्ता की।
शहर के शीला बाईपास के निकट रहने वाले डॉ. मलिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल व अविष्कार में लगे हैं। इन्होंने पूर्व में कृषि कचरे से इंजन, आटा चक्की और ट्यूबवेल भी चलाये हैं। राष्ट्रीय कृषि मेले गंगानगर, राजस्थान में इनको सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में नवाजा जा चुका है।
जिप्सम से बना विशेष प्लास्टर होता हो उपयोग इस भवन में 26, 20 और 4 इंच आकार के जिप्सम ब्लॉक लगे हैं। इनमें एक तरफ कट व दूसरी तरफ उभार है जिससे वे एक-दूसरे में फंस जाते हैं। इनके जोड़ों को भरने के लिए भी सीमेंट का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि गजिप्सम से निर्मित एक विशेष प्लास्टर उपयोग में लिया जाता है। खास बात ये भी है कि दीवार फटाफट बनती है और बाद में तराई भी नहीं करनी पड़ती।
जिप्सम उष्मा रोधी, ध्वनि रोधी होने के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ अग्नि रोधी पदार्थ है। यह आग लगने के चार घंटे तक नहीं जलता। अगर तब तक भी आग न बुझे तो यह क्रिस्टलीय जल छोड़ने लगता है और आग बुझाने में मदद करता है। जिप्सम गाय का गोबर मिलाने पर यह सोने में सुहागे जैसा काम करता है। गोबर के मिलाने से जिप्सम प्लास्टर की कमियां जैसे की भंगुरपन व पानी सोखना काफी हद तक दूर हो जाती हैं व इसकी मजबूती बढ़ती है।
गौशालाओं की बढ़ेगी आमद डॉ. शिवदर्शन ने बताया कि वे अपने इस नए वैदिक प्लास्टर अविष्कार से गौशालाओं को जोड़ेंगे। इसके गोबर से वे ब्लॉक बनाकर लोगों को मकान बनाने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इससे लागत बहुत ही कम आती है और गौशालाओं की आमदनी भी बढ़ेगी, क्योंकि उनका गोबर खरीदा जाएगा। उष्मा रोधी भवन की मियाद भी ज्यादा है।
कानपुर , उत्तर प्रदेश