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रविवार, 16 दिसंबर 2018

होरी में दिल चोरी....किरण मानु बरनवाल 'अंशु'


पति की व्यस्तता से परेशान पत्नी किट्टी पार्टी तो कभी महिला मंडल की सदस्य बन मॉडर्न होने का दंभ भरते हुए समय व्यतीत कर रही थी। बच्चे पहले ही पंख लगा घोंसले से फुर्र हो चुके थे। मॉडर्न पत्नी एकाएक इस जीवनशैली से ऊबने लगी। डूबते का सहारा ऊपरवाले, सो उसने भगवान की भक्ति में ख़ुद को लीन कर लिया। दिन भर भजन-कीर्तन पूजा-पाठ, आदर्श की बातें करते-करते दो चार बरस में ही सबसे कटने लगी।

   विदेशी बच्चे घर आने पर माताजी का हाल देख बेहाल हो गये। पिता तो अपनी दुनिया में मग्न सूटबूट में बुढापा छिपाये जवानी की कुलांचें भर रहे थे। मां बेचारी योगन बनी जा रही थी। माता जी को स्मार्ट बनाने के लिए स्मार्टफ़ोन का सहारा लिया और सिखा दिया स्मार्टफोन उपयोग करना। धीरे-धीरे माताजी फ़ेसबुक की दुनिया में पदार्पण करने लगी।
फ़ेसबुक पर प्रोफ़ाइल खोला, बेचारी वृद्धा का कोई भी मित्र बनने को तैयार नहीं हुआ। पत्नी ने फ़ेक आई डी बनाई , ख़ूबसूरत-सी कन्या से सबको इश्क होने लगा। लाईक कमेंट्स आने लगे। इसी सिलसिले में बांके जवान का निमंत्रण स्वीकार कर दिल हार बैठी। चैटिंग का क्रम जारी हुआ तो होली पर साक्षात मिलने पर आ अटका। वृद्धा परेशान बगीचे में उस कमनीय काया को कहां से ले जाये।

ख़ैर, किसी तरह दिल कड़ा कर "सो-कॉल्ड" प्रियतम को सच बताने की ठानी। जी-जान से पार्लर  से मेकअप करा चल पड़ी मायावी दुनिया के आशिक से मिलने। गाल गुलाल से भी ज़्यादा गुलाबी हो रहे थे।
अरररर....ये क्या? जिन्होनें पत्नी को कभी प्यार के दो बोल नहीं बोले, वो फ़ेसबुकिया प्रेमिका के लिए तारे तोड़ने का वादा किया करता था। राहों पर फूल बिछाने को तत्पर आशिक तो ख़ुद का पति निकला। दोनों की आँखें टकराती हैं, होंठ कांप रहे थे।

एक दूसरे को धोखा देते हुए नयी ज़िंदगी के सपने धराशायी हो रहे थे। हाथों के तोते उड़ गये, महंगे उपहार मुंह चिढ़ा रहे थे।
जीवन फिर उसी बिंदु पर आ अटका जहाँ से पति-पत्नी चले थे।

-किरण मानु बरनवाल 'अंशु'

मंगलवार, 17 जनवरी 2017

आसरा,,,,,,,विरेंदर 'वीर' मेहता




"लाखों आशियाने पर एक रात का आसरा नहीं।" गली में किसी की पुकार सुन विश्वा ने कोठरी से बाहर देखा। उसका 'मोती' (कुत्ता) एक अजनबी फ़कीर पर भौंक रहा था। सहसा विश्वा को मजाक सूझा और वह अपनी 'बोतल' संभालकर हंस पड़ा। "चल जोगिया, आज की रात मैं बनता हूँ तेरा आसरा। पर एक शर्त है कि तुझे 'मदिरा' पीनी होगी मेरे साथ, क्योंकि मैं तो बिन पिये सोया नहीं आज तक।" 
"जैसी रब की मर्ज़ी।" फ़कीर भी हंसने लगा। "लेकिन बच्चा, अगर हम पियेंगे तो आज तू नहीं पियेगा। बोल क्या बोलता है?"
विश्वा सोच में पड़ गया लेकिन फिर मुस्कराने लगा। "ठीक है जोगिया आज यही सही।"
रात तो ग़ुज़रनी ही थी आख़िर गहरी होते-होते ग़ुज़र गयी। .........
"इतनी सुन्दर सुबह।" खो सा गया विश्वा।
"अच्छा बच्चा चलता हूँ अपने धर्म-कर्म की राह पर।" फ़कीर की आवाज़ से विश्वा सूर्योदय के जादू से बाहर आ गया। "बाबा। मैंने तो रात एक मज़ाक किया था और तुमने एक रात के आसरे के लिये अपना धर्म-कर्म सब खो दिया।"
"नहीं मेरे बच्चे, सिर्फ़ एक आसरे के लिये नही!" मुस्कराता हुआ फ़कीर चल दिया।
'पक्षियो की चहचहाट, नदी की हिलोरे लेती लहरें और चमत्कारी सूर्योदय' और भी कितना कुछ उसको देकर जा रहा था वह अलमस्त फ़कीर, मानो कह रहा हो। "मेरी एक रात ने तो तेरे सारे अंधेरे को समेट लिया बच्चा।"
पीछे-पीछे चल पड़ा था उसका प्यारा 'मोती' और विश्वा उन्हें जाते दूर तक देखता रहा, सिर्फ़ देखता रहा।
-विरेंदर 'वीर' मेहता