वास्कोडिगामा ने भारत आकर किस फल का सेवन किया कि उसके सारे घाव भर गए ?
यूरोप के लोगों को पता ही नहीं था कि भारत जैसा साधन संपन्न देश है, 1498 में पुर्तगाल के व्यापारी वास्कोडिगामा ने जहाज द्वारा अनेक स्थानों का भ्रमण किया जहां उसने भारत को पाया यात्रा के दौरान उसके शरीर में अनेक घाव हो गए थे जो अत्यधिक पीड़ा दे रहे थे और रक्त रुकने का नाम नहीं ले रहा था।
केरल के कालीकट स्थान पर पहुंचने के बाद वास्कोडिगामा ने स्थानीय निवासियों से मुलाकात की जिन्होंने उसके घावों की मरहम पट्टी की और पपीते का सेवन करना शुरू किया कुछ ही दिनों में वास्कोडिगामा बिल्कुल ठीक हो गया उसने पपीते के बीज संग्रहित कर अपने देश ले गया। वास्कोडिगामा ने पपीते को "सुनहरा फल" कहकर संबोधित किया है।
मार्कोपोलो और उसके साथी कई दिनों से जहाज यात्रा पर सवार होकर नए देशों की खोज करने में लगे थे जिससे पोषक तत्वों की कमी के चलते हैं उन्हें स्कर्वी रोग से सामना करना पड़ा जिससे उनके मसूड़ों से खून रुकने का नाम ही नहीं ले रहा था तब उन्हें किसी देश में पपीते का सेवन करवाया गया जिससे उनका स्कर्वी रोग ठीक हो गया।
अक्सर जब हमारे शरीर में प्लेटलेट्स की कमी होती है तो चिकित्सक हमें पपीते की पत्तियों का रस पीने की सलाह देता है और कुछ ही दिनों में हम ठीक हो जाते हैं उसी प्रकार पपीते के बीजों का प्रयोग भी औषधीय महत्व के लिए किया जाता है पपीता पेट की समस्याओं के लिए रामबाण सिद्ध है साथ ही विटामिन ए की खूबियों के कारण आंखों की रोशनी के लिए वरदान है। इसमें कैंसर को ठीक करने की भी खूबियां हैं।बुजुर्गों के गठिया की समस्या को दूर करता है।
सबसे प्रमुख बात यह है कि सेवन किए गए फास्ट फूड पिज़्ज़ा, चाऊमीन, बर्गर, द्वारा निर्मित जहर को पेट से निष्कासित करने का काम करता है
कुल मिलाकर यह हमारे शरीर को कंप्यूटर की तरह रिफ्रेश कर देता है।
अतः हफ्ते में एक बार स्वयं, पत्नी, और बच्चों, बुजुर्गों को पपीते का सेवन जरूर करें और स्वस्थ रहें।
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पपीता सचमुच बहुत गुणकारी फल है और हमारे रोजमर्रा के भोजन में इसकी जगह जरूर होनी चाहिए। इसमें कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं, जो पाचन, आंखों और शरीर की सामान्य सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.
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