गुरुवार, 21 मई 2026

117 ..भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है

चंदूलाल विश्व-प्रतियोगिता-फेम एक दिन घबड़ाए हुए डाक्टर के यहां पहुंचे और बोले, डाक्टर साहब, आजकल मुझे भूख नहीं लगती।
डाक्टर ने पूछा, आज सबेरे से क्या खाया?
चंदूलाल बोले, सबेरे बिस्तर पर वही कोई दस कप चाय पी और चाय के साथ दस-पंद्रह प्लेट जलेबियां। फिर हाथ-मुंह धोकर बाजार गया। वहां कोई पंद्रह प्लेट समोसे और कोई छह गिलास दूध पीया। फिर शहर का एक चक्कर मारा, तब तक ग्यारह बज चुके थे और भोजन का समय भी हो चुका था, सो घर पहुंचा। वहां बीस रोटियां और दस प्लेट चावल और कोई दस संतरे खाए, और…
डाक्टर बीच में ही टोकते हुए बोला, तो क्या अब मुझे खाने का इरादा है?
भरता नहीं मन। भरता ही नहीं; मन का वह स्वभाव नहीं है।
तो एक तरफ परिग्रह वाले लोग हैं, जो इकट्ठा करते चले जाते हैं। फिर इकट्ठा करते-करते थक जाते हैं, बुरी तरह थक जाते हैं। थक जाते हैं तो उलटा करने लगते हैं। सोचते हैं परिग्रह से तृप्ति नहीं मिली तो त्याग से मिलेगी। पहले धन इकट्ठा करते थे, अब धन छोड़ कर भागते हैं। पहले स्त्रियों के पीछे भागते थे; अब स्त्रियां देखीं कि एकदम भागते हैं, उनकी तरफ पीठ करके भागते हैं। जो-जो पहले किया था उससे उलटा करने लगते हैं। जैसे कोई आदमी सोचता हो कि शीर्षासन करेंगे तो जीवन रूपांतरित हो जाएगा।
लेकिन मनुष्य के जीवन का एक तर्क है–एक काम करके जब थक जाता है तो तत्क्षण दूसरी अति पर चला जाता है। स्वभावतः उसे लगता है ऐसा करने से नहीं हुआ, इससे विपरीत करके देख लूं। इसलिए भोगी हैं, परिग्रही हैं और त्यागी हैं।
और तुम यह चकित होओगे जान कर: जितना भोगी समाज हो उतना ही उसमें त्यागियों का आदर होता है। क्योंकि भोगी को त्याग का तर्क समझ में आता है। उसके मन में भी लग रहा है कि कुछ मिल तो रहा नहीं है, इकट्ठा तो कर रहा हूं, कुछ मिल तो रहा नहीं है। अभी अपनी सामर्थ्य कम है, आत्मबल कम है, संकल्प कम है। जब संकल्प होगा तो हम भी त्याग कर और मुनि हो जाएंगे।
साक्षी-भाव उसका नाम, साक्षी-भाव उसका स्वरूप। संग्रह में भी कर्ता आ जाता है और त्याग में भी कर्ता आ जाता है। और जहां कर्ता आ गया वहां संसार आ गया। कर्ता यानी संसार का द्वार।जहां भी होओ–चाहे संसार में और चाहे संसार के बाहर, चाहे त्यागी होओ चाहे भोगी–एक बात खयाल रखना: कर्ता-भाव न आए। जहां कर्ता-भाव आया, वहीं चूक हो गई, वहीं फिसले, बुरे फिसले। साक्षी-भाव बना रहे। दुकान पर भी बैठ कर अगर साक्षी-भाव बना रहे, बाजार में भी बैठ कर अगर तुम सिर्फ दर्शक मात्र रहो–तो पर्याप्त।
बस यह साक्षी-भाव सतत बहने लगे, चौबीस घंटे बहने लगे, सपने में भी बना रहे, सपने में भी दिखाई पड़ता रहे कि मैं साक्षी हूं–फिर तुम्हारे ऊपर कोई कालिख न रह जाएगी, कोई कलुष न रह जाएगा, कोई कल्मष न रह जाएगा। तुम परम शुद्ध परमात्मा को अनुभव कर लोगे! वह तुम्हारे भीतर विराजमान है, एक क्षण को भी वहां से हटा नहीं है।
- भगवान श्री रजनीश

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