मंगलवार, 25 जुलाई 2017

कुण्डलियाँ काका की..... प्रभुदयाल गर्ग ( काका हाथरसी)


नाम बड़े दर्शन छोटे / काका हाथरसी 

दूर युद्ध से भागते, नाम रखा रणधीर,
भागचंद की आज तक सोई है तकदीर।
सोई है तकदीर, बहुत-से देखे-भाले,
निकले प्रिय सुखदेव सभी, दु:ख देने वाले।
कह ‘काका’ कविराय, आंकड़े बिल्कुल सच्चे,
बालकराम ब्रह्मचारी के बारह बच्चे।

चतुरसेन बुद्धू मिले, बुद्धसेन निर्बुद्ध,
श्री आनन्दीलालजी रहें सर्वदा क्रुद्ध। 
रहें सर्वदा क्रुद्ध, मास्टर चक्कर खाते,
इंसानों को मुंशी, तोताराम पढ़ाते,
कह ‘काका’, बलवीरसिंहजी लटे हुए हैं,
थानसिंह के सारे कपड़े फटे हुए हैं।

बेच रहे हैं कोयला, लाला हीरालाल,
सूखे गंगारामजी, रूखे मक्खनलाल।
रूखे मक्खनलाल, झींकते दादा-दादी-
निकले बेटा आसाराम निराशावादी।
कह ‘काका’, कवि भीमसेन पिद्दी-से दिखते,
कविवर ‘दिनकर’ छायावादी कविता लिखते।

आकुल-व्याकुल दीखते शर्मा परमानंद,
कार्य अधूरा छोड़कर भागे पूरनचंद।
भागे पूरनचंद, अमरजी मरते देखे,
मिश्रीबाबू कड़वी बातें करते देखे।
कह ‘काका’ भण्डारसिंहजी रोते-थोते,
बीत गया जीवन विनोद का रोते-धोते।

शीला जीजी लड़ रही, सरला करती शोर,
कुसुम, कमल, पुष्पा, सुमन निकलीं बड़ी कठोर।
निकलीं बड़ी कठोर, निर्मला मन की मैली
सुधा सहेली अमृतबाई सुनीं विषैली।
कह ‘काका’ कवि, बाबू जी क्या देखा तुमने?
बल्ली जैसी मिस लल्ली देखी है हमने।
काका हाथरसी
........जारी अगले अंक में भी

सोमवार, 24 जुलाई 2017

काका की कुण्डलियाँ..... प्रभुदयाल गर्ग ( काका हाथरसी)

नाम बड़े दर्शन छोटे......काका हाथरसी

नाम-रूप के भेद पर कभी किया है गौर?
नाम मिला कुछ और तो, शक्ल-अक्ल कुछ और।
शक्ल-अक्ल कुछ और, नैनसुख देखे काने,
बाबू सुंदरलाल बनाए ऐंचकताने।
कह ‘काका’ कवि, दयारामजी मारे मच्छर,
विद्याधर को भैंस बराबर काला अक्षर।

मुंशी चंदालाल का तारकोल-सा रूप,
श्यामलाल का रंग है, जैसे खिलती धूप।
जैसे खिलती धूप, सजे बुश्शर्ट हैण्ट में-
ज्ञानचंद छ्ह बार फेल हो गए टैंथ में।
कहं ‘काका’ ज्वालाप्रसादजी बिल्कुल ठंडे,
पंडित शांतिस्वरूप चलाते देखे डंडे।

देख, अशर्फीलाल के घर में टूटी खाट,
सेठ छदम्मीलाल के मील चल रहे आठ।
मील चल रहे आठ, कर्म के मिटें न लेखे,
धनीरामजी हमने प्राय: निर्धन देखे।
कह ‘काका’ कवि, दूल्हेराम मर गए कंवारे,
बिना प्रियतमा तड़पें प्रीतमसिंह बिचारे।

दीन श्रमिक भड़का दिए, करवा दी हड़ताल,
मिल-मालिक से खा गए रिश्वत दीनदयाल।
रिश्वत दीनदयाल, करम को ठोंक रहे हैं,
ठाकुर शेरसिंह पर कुत्ते भोंक रहे हैं।
‘काका’ छ्ह फिट लंबे छोटूराम बनाए,
नाम दिगम्बरसिंह वस्त्र ग्यारह लटकाए।

पेट न अपना भर सके जीवन-भर जगपाल,
बिना सूंड के सैकड़ों मिलें गणेशीलाल।
मिलें गणेशीलाल, पैंट की क्रीज सम्हारी-
बैग कुली को दिया चले मिस्टर गिरिधारी।
कह ‘काका’ कविराय, करें लाखों का सट्टा,
नाम हवेलीराम किराए का है अट्टा। 
काका हाथरसी
........जारी अगले अंक में भी



रविवार, 23 जुलाई 2017

एकलव्य की विडम्बना.........राम कुमार आत्रेय


एकलव्य ने  गहन आत्मविश्वास के   साथ    गुरु   द्रोणाचार्य के कक्ष  में   अनुमति  माँगकर प्रवेश  किया। प्रवेश  करते ही  उसने   गुरु  द्रोणचार्य के   चरणों  को  स्पर्श   करते हुए नमस्कार किया।  द्रोणाचार्य  का हाथ आशीर्वाद  के  लिए अभ्यासवश जरा सा- ही ऊपर उठा था ; लेकिन एकलव्य के तन पर फटे–पुराने वस्त्रों  पर दृष्टि पड़ते ही  वह किसी मुर्दे  की तरह अपने पूर्व   के  स्थान पर गिरकर स्थिर    हो गया।

द्रोणाचार्य के   होठों   के बीच  से  एक अनचाहा–सा स्वर  निकला,  ‘‘कहिए   कैसे आना हुआ?’’

‘‘आपकी अकादमी  में    मैं   शस्त्र  विद्या  का ज्ञान प्राप्त करना  चाहता हूँ,    गुरुजी।  मुझे अकादमी में  प्रवेश दिलाकर कृतार्थ  करें।’’ एकलव्य के स्वर  में  निहित  विनम्रता गिड़गिड़ाहट में   परिवर्तित  होकर रह गई  थी।

‘‘तुम्हें   यहाँ  प्रवेश  नहीं दिया जा सकता बच्चे!’’  टका  –सा  उत्तर दिया था गुरु   द्रोण ने।

‘‘इस  प्रकार  इनकार मत कीजिए गुरु जी। पिछले जन्म  में तो   आपने मुझे भील  बालक होने  के कारण  प्रवेश  नहीं दिया था।  बाद में   आपको  गुरु मानकर मैंने  शस्त्र  विद्या में   स्वयं ही पारंगतता  हासिल   कर ली । इस पर आपने गुरु–दक्षिणा के  रूप में   मेरा   अंगूठा ही  माँग लिया था।  परन्तु मैंने  बाद में  घोर   तपस्या  की ताकि मैं   क्षत्रिय जाति में   जन्म लेकर आपसे शस्त्र विद्या सीख सकूँ।  मुझे क्षत्रिय  जाति में तो   जन्म नहीं मिला,   परन्तु   प्रभु ने   ब्राह्मण  के घर अवश्य जन्म दे  दिया।  ब्राह्मण तो सभी  जातियों   से  श्रेष्ठ  होता है   न गुरु जी। आप भी तो ब्राह्मण   ही  हैं।  इस बार मुझे  प्रवेश    दे  ही   दीजिए प्रभु।’’ एकलव्य द्रोणाचार्य  के  चरणों में   गिरकर गिड़गिड़ाने  लगा था।

‘‘सुनो बच्चे,   यदि तुम इस बार भील  बालक  के रूप  में   भी   यहाँ  प्रवेश लेने आते  तो भी   तुम्हें   मैं  प्रवेश   देने से इनकार नहीं  करता। मेरी विवशता   है   कि इस बार ब्राह्मण बालक होने  पर भी  यहाँ  प्रवेश  नहीं दे  पाऊँगा। कारण तुम्हारे  फटे  –पुराने वस्त्र।  बता  रहे हैं    कि तुम निर्धन  हो।  इसलिए।’’

एकलव्य भूल   गया था  कि गुरुजनों  की बात  काटना अशिष्टता  समझी जाती है।  वह स्वयं पर नियंत्रण   नहीं रख पाया।  बोल  पड़ा‘‘निर्धन  होना भी  पाप हो  गया,  गुरु जी?’’

‘‘बात यह है   एकलव्य अब इस अकादमी में   पढ़ने  वाले  छात्रा यु​धिष्ठिर,    अजु‍र्न,   भीम,तथा    दुर्योधन बनकर नहीं  बल्कि आईएएस,  आईपीएस, इन्जीनियर  तथा  डाक्टर बनकर राष्ट्र  की  सेवा करते हैं,   देश को चलाते   हैं।  इसके लिए वे  प्रति वर्ष  एक लाख दस हजार रुपये  छात्रावास शुल्क भी   चुकाते हैं।  प्रतिमास  पाँच हजार रुपये  शिक्षण  शुल्क तथा पाँच हजार रूपये   छात्रावास शुल्क भी   उन्हें   चुकाना   होता है।  क्या तुम ऐसा  कर सकते हो?’’

‘‘नहीं गुरुदेव। मेरे माता–पिता तो दो वक्त का भोजन ही मुश्किल से जुटा पाते  हैं।’’ ऐसा कहते  हुए एकलव्य की  गर्दन झुक  गई  थी।

‘‘यदि मैं   तुम   जैसे  निर्धन छात्र को  उनके   साथ   कक्षा   में   बिठाऊँगा    ,तो वे सब तुम्हारे साथ   बैठने से  इनकार कर देंगे।  छात्रों   के माता–पिता   भी   किसी अन्य अकादमी में   उन्हें प्रवेश दिलवाना   पसन्द करेंगे,  न कि मेरी  अकादमी में।  यह प्रश्न जाति का नहीं,  धन का है    बच्चे।  जाओ  किसी सरकारी विद्यालय में    प्रवेश लेकर   जो भी   सीखने   को मिले सीख लेना।  और   नहीं  तो  वे तुम्हें वे  तुम्हें  अँगूठा    लगाना   तो सिखा   ही देंगे। हाँ,  इस बार  तुम्हारा अँगूठा  नहीं  माँगूँगा।’’ द्रोण  ने   एकलव्य के समक्ष  स्थिति   पूरी तरह स्पष्ट  कर दी।

गत जीवन में अँगूठा    कटवाकर सहानुभूति अर्जित कर लेने वाला  एकलव्य समझ नहीं पा रहा था  कि अपने दाएँ   हाथ के अँगूठे  को स्वयं  काटकर फेंक   दे  अथवा  आयु  पर्यन्त व्यर्थ    में  ही उसका   बोझ  ढोता रहे।
-राम  कुमार आत्रेय

-0-सम्पर्क-0-   
राम  कुमार आत्रेय
864–ए/12,आजाद   नगर,
कुरुक्षेत्र  136119 हरियाणा

शनिवार, 22 जुलाई 2017

बचपन-बचपन.....मीरा जैन


बेटे   दिव्यम  के जन्मदिन   पर गिफ्ट  में    आए    ढेर  से   नई तकनीक के  इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों   में  कुछ को दिव्यम   चला   ही  नहीं पा रहा था।  घर के अन्य   सदस्यों ने   भी हाथ आजमाइश  की लेकिन किसी को   भी सफलता नहीं मिली। तभी काम वाली   बाई सन्नो का दस वर्षीय लड़का  किसी काम  से घर आया  सभी  को खिलौने के  लिए बेवजह मेहनत करता देख वह  बड़े   ही  धीमे व संकोची लहजे   में   बोला-‘‘आँटी जी! आप कहें  तो  खिलौनों को   चलाकर बता दूँ?’

पहले  तो मालती उसका चेहरा देखती रही फिर  मन ही मन सोच रही थी  कि इसे दिया तो  निश्चित ही तोड़ देगा, फिर भी  सन्नो का लिहाज कर बेमन से हाँ  कर दिया  और देखते ही  देखते मुश्किल खिलौने को उसने   एक बार में   ही स्टार्ट  कर दिया। सभी आश्चर्यचकित मालती ने  सन्नों  को   हँसते हुए ताना मारा-‘वाह  री  सन्नो! यूँ   तो कहेगी   पगार कम पड़ती  है, और इतने  महँगे    खिलौने   छोरे को दिलाती है   जो  मैंने   आज तक  नहीं  खरीदे?’

इतना   सुनते  ही सन्नो की  आँखें  नम हो   गई ।   उसने रुँधे   गले से  कहा-‘‘बाई  जी! यह खिलौनों  से खेलता नहीं; बल्कि खिलौनों  की  दुकान पर काम करता है।’’ जवाब सुन  मालती   स्वयं को लज्जित महसूस कर सोचने लगी  दोनों   के  बचपन में कितना अंतर है।
-मीरा  जैन

-0-सम्पर्क -0-
मीरा  जैन   516, 
सॉईनाथ  कालोनी, 
सेठी नगर, 
उज्जैन, मध्यप्रदेश

बुधवार, 19 जुलाई 2017

उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग....अमृत

हवा के रुख के साथ ही, मसीहा बदल लेते हैं लोग।
इधर मौसम बदलते हैं, उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग।।

बदल  बदल कर लोग, बदल रहे हैं ज़िन्दगी।
इधर टोपी बदलते  हैं, उधर  सेहरा  बदल लेते है लोग।।

कौन जाने कैसे पूरा करेंगे, वे अपना सफर।
इधर  किश्ती  बदलते हैं, उधर किनारा बदल लेते हैं।। 

रंग बदलना तो कोई गिरगिट, आदमजात से सीखे।
इधर चेहरा बदलते हैं, उधर मोहरा बदल लेते हैं लोग।।

हवा के रुख के  साथ ही, मसीहा बदल लेते हैं लोग।
इधर मौसम बदलते हैं, उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग।।

-अमृत

रविवार, 16 जुलाई 2017

‘पगलिया’.......प्रशान्त पांडेय

एगो कुसुमिया है. हड़हड़ाते चलती है. मुंह खोली नहीं की राजधानी एक्सप्रेस फेल. हमरे यहां काम करने आती है. टेंथ का एक्जाम था तो काम छोड़ दी थी. दू-तीन महीना बाद अब जा के फिर पकड़ी है.

"तब सब ठीक है?" हम अइसही पूछ लिए. गलती किये। माने कुसुमिया का पटर-पटर चालू।

"सब ठीके न है....कमाना, खाना है..... चलिए रहा है......भाभी लेकिन धुक-धुक भी हो रहा है....परीक्षा में पास हो जाएंगे न?"

"काहे नहीं...मेहनत की हो, निकल जाओगी,"

"हाँ.....आ जरूरी भी न है, आज कल कोइयो तो पढ़ले-लिखल न खोजता है?"

तभी हमको याद आया की काम छोड़ने से पहले कुसुमिया बोली थी उसका सादी होने वाला है.

उस समय तो हम यही सोचे थे की आदिवासी लोग है, गरीब हईये है.......माई-बाप जल्दी सादी करके काम निपटा देना चाह रहा होगा। छौ  गो बच्चा में चार गो बेटिये है; आ ई सबसे बड़ी है.

अब हमरो मन कुलबुला रहा था.

पूछ लिए: "का हुआ तुम्हरा सादी का?"

"सादी? काहे ला सादी?"

"तुम्ही तो बोली थी छुट्टिया से पहले,"

"अरे! तो अभी घर में बोले नहीं हैं न....अइसे कइसे माँ से बोल दें.....अभी दू-तीन साल बाद देखेंगे,"

"दू-तीन साल बाद?"

"भाभी, सादी तो हम ही तय किये हैं....लेकिन लड़कवा का अभी कोई नौकरिये नहीं है.... एक्के बात है की खाता पीता नहीं है... ऊ भी पढ़ाइये न कर रहा है!"

"तुम्हरा माई-बाप? ऊ लोग भी तो खोज रहा होगा?"

"माँ को ढलैया के काम से फ़ुरसते नहीं है और बाप तो जानबे करते हैं.....ऊ कुछ करता तो हम लोग को काहे काम करना पड़ता?"

"अरे जो पूछ रहे हैं ऊ बता न.....सदिया करेगी की नहीं?”

"नहीं भाभी, अभिये ई सब पचड़ा में कौन पड़े...अभी कमा रहे हैं, खेला-मदारी चलिए रहा है........सादी कौन करेगा रे अभी? बक्क!"

जाने केतना और बकबकाने के बाद गयी तब हम, आ ई, खूब हँसे। ई हो घरे पर थे. उसका सब बात सुने थे.

"एतना साल सादी को हो गया, सोच सकते हैं की अपना चक्कर के बारे में कउनो लईकी अइसे बात करेगी?" हम इनसे पूछे. ई खाली हंस रहे थे.

उधर से अम्मा आईं. पूजा पर बइठे-बइठे उहो सब सुन लीं थीं. प्रसाद बाँटते हुए कहीं: "जाए दो! कम से कम इमनदारी से मान तो रही है. न तो इसी के लिए आज-काल केतना न करम हो जाता है."

-प्रशान्त पांडेय


शनिवार, 1 जुलाई 2017

थैंकू भैया....डॉ. आरती स्मित


वह माँ के साथ ज़बरन पाँव घसीटती चली जा रही थी। उसकी नज़रें बार-बार सड़क के दोनों ओर सजी दुकानों पर जा-जाकर अटक जातीं। मन हिलोर मारता कि माँ से कुछ कहे, मगर उसे डर था कि माँ से अभी कुछ कहने का मतलब यहीं बीच सड़क पर मार खाना होगा। यों भी, आज माँ का मूड कुछ ठीक नहीं, कल मालकिन ने ताकीद की थी, देर न करना, मगर देर हो ही गई, इसलिए काम में हाथ बँटाने को माँ उसको भी ज़बर्दस्ती साथ ले जा रही थी। अबीर~, गुलाल के रंग-बिरंगे पैकेट उसे बुलाते, तरह-तरह के रूपों वाली पिचकारियाँ, गुब्बारे सब उसे उसे इशारा करते से लगते। वह टूटी चप्पल घसीटती अधमरी सी चलती रही।
"अरी,चल ना! का हुआ, पाँव में छाले पड़ गए का.... एक तो ऐसे ही एतना देर हो चुका, जाने मालकिन का पारा केतना गरम होगा? परवी नै दी तो का फगुआ का बैसाखी। सारी भी तो दे के खातिर बोले रही, बिटवा का उतारन भी। चल न तुमको साथ काम करते देखेगी तो मन पसीजेगा जरूर, कुछ न कुछ दइए देगी।"
माँ बड़बड़ाती हाथ खींचती चलती रही।
"गली के मोड़ पर पहले पचमंज़िला मकान मालकिन का ही तो है। हे भगवान! उसका बेटा घर में न हो! केतना तंग करता है हमको।'' नौ वर्षीया निक्की ने मन ही मन ईश्वर को याद किया। कभी मंदिर गई नहीं, भगवान स्त्री हैं या पुरुष, उसको भ्रम बना हुआ है, मगर जब मुसीबत नज़र आती है,वह झट से भगवान को पुकार लेती। मालकिन बोली की कड़ी थी, मगर उसे कभी डाँटा नहीं, माँ को ज़रूर डाँटती कि इसे स्कूल भेजा कर! घर में बिठाकर अपने जैसा बनाएगी क्या?" उसे मालकिन से डर नहीं लगता मगर उसके बेटे ओम से लगता है, वह हमेशा छेड़ता रहता। उससे थोड़ा बड़ा है तो का? अकड़ू कहीं का!"
चप्पल उतार कर अभी बैठक में क़दम रखा ही था कि ओम दिख गया। वह सकपकाती हुई माँ के बगल जा खड़ी हुई।
"जा सीढ़ियों पर झाडू लगा दे, हम आते हैं कमरा में झाड़ू लगाकर।" वह हिली नहीं, सकपकाई सी खड़ी रही रही।
"अरी का हुआ, सुनाई कम देत है का?" माँ धीमी आवाज़ में मगर रोष में बोली।
"वो - वो- " वह हकला गई।
"चल जा, जल्दी काम कर,"कह कर माँ अंदर कमरे में चली गई। ओम चुपचाप कब उसके पीछे खड़ा हो गया, उसे पता ही न चला। अचानक उसे पाकर वह भीतर तक सिहर गई। ओम का हाथ पीछे था। "अब फिर यह मेरे बाल खींचेगा या चिकोटी काटेगा, हे भगवान का करें? आज तो चिल्ला कर रोने लगेंगे हम, मालकिन को पता चल जाएगा कि ...."
"निक्की," वह आगे सोच पाती, तभी ओम ने धीरे से उसे पुकारा और हाथ आगे बढ़ा दिया। उसके हाथ में रंग और अबीर पुड़िया की थैली और प्यारी-सी पिचकारी थी।
"यह तुम्हारे लिए।"
" नहीं-नहीं हमको नहीं चाहिए।" वह छिटककर दूर जा खड़ी हुई, तभी मालकिन कमरे में आ गई ।
"ले लो बेटा! भैया ने तुम्हारे लिए ख़रीदा है।" वह हैरान होकर कभी रंग और पिचकारी देखती, कभी ओम और मालकिन को। "तो क्या ओम उसे छोटी बहन समझ कर उसे तंग करता था, यही बात अच्छे से समझा भी सकता था, डरा कर रख दिया हमको" वह मन ही मन बुदबुदाई। साँवले चेहरे पर मुस्कान खिली और गुलाबी रंग निखर आया। होंठ हिले और बोल फूटे, "थैंकू भैया!"








-डॉ. आरती स्मित