गुरुवार, 8 जून 2017

बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है......व्हाट्स एप्प से


लड़कियों के स्कूल में आने वाली नई टीचर ख़ूबसूरत और बा अख़्लाक़ होने के साथ साथ इल्मी तौर पर भी मज़बूत थी लेकिन उसने अभी तक शादी नहीं की थी..

 सब लड़कियां उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं और मज़ाक़ करने लगीं कि मैडम आपने अभी तक शादी क्यों नहीं की..?

मैडम ने दास्तान कुछ यूं शुरू की_एक ख़ातून की पांच बेटियां थीं, शौहर ने उसको धमकी दी कि अगर इस दफा भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा,

ख़ुदा की हिकमत ख़ुदा ही जाने कि छटी मर्तबा भी बेटी पैदा हुई और मर्द ने बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया, मां पूरी रात उस नन्ही सी जान के लिए दुआ करती रही और बेटी को अल्लाह के सुपुर्द कर दिया।

दूसरे दिन सुबह बाप जब चौक से गुज़रा तो देखा कि कोई बच्ची को ले नहीं गया बाप बेटी को वापस घर लाया लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को चौक पर रख आया लेकिन माजरा उसी तरह तकरार होता रहा यहां तक कि सात दिन बाप बाहर रख आया और जब कोई लेना जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता,

यहां तक कि बाप थक गया और ख़ुदा की रज़ा पर राज़ी हो गया और फिर ख़ुदा काम करना ऐसा हुआ कि एक साल बाद मां फिर हामिला हो गई और इस दफा अल्लाह ने उनको बेटा अता फरमा दिया लेकिन कुछ ही दिन बाद बेटियों में से एक फौत हो गई यहां तक कि पांच बार हामिला हुई और अल्लाह ने पांच बेटे अता किए लेकिन हर दफा उसकी बेटियों में से एक इस दुनियां से रुख्सत हो जाती 

फ़क़त एक ही बेटी ज़िंदा बची और वो वही बेटी थी जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था, मां भी इस दुनियां से चली गई इधर पांच बेटे और एक बेटी सब बड़े हो गए टीचर ने कहा पता है वो बेटी जो ज़िंदा रही कौन है.? "वो मैं हूं" और मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की कि बाप इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते जबकि कोई दूसरा नहीं जो उनकी खिदमत करें बस मैं ही उनकी खिदमत किया करती हूं और वो पांच बेटे कभी कभी आकर बाप की अहवाल पुरसी कर जाते हैं 

जबकि बाप हमेशा शर्मिंदगी के साथ रो रो कर मुझ से कहा करते हैं, मेरी प्यारी बेटी जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उस पर मुझे मुआफ करना, मैंने किसी जगह बेटी की बाप से मुहब्बत के बारे मैं एक प्यारी बात पढ़ी थी कि एक बाप बेटे के साथ फुटबॉल खेल रहा था और बेटे की हौसला अफजाई के लिए जान बूझ कर हार रहा था दूर बैठी बेटी बाप की शिकस्त बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपट के रोने लगी और बोली बाबाजान आप मेरे साथ खेलें, ताकि मैं आपकी जीत के लिए खुद जान बूझ कर हार जाऊं 

और सच कहा जाता है कि
बेटी तो बाप के लिए रहमत होती है..
.....व्हाट्स  एप्प से

शुक्रवार, 12 मई 2017

न देने वाला मन....लघुकथा



एक भिखारी सुबह-सुबह भीख मांगने निकला। चलते समय उसने अपनी झोली में जौ के मुट्ठी भर दाने डाल लिए। टोटके या अंधविश्वास के कारण भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। थैली देख कर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से किसी ने दे रखा है। पूर्णिमा का दिन था, भिखारी सोच रहा था कि आज ईश्वर की कृपा होगी तो मेरी यह झोली शाम से पहले ही भर जाएगी।

अचानक सामने से राजपथ पर उसी देश के राजा की सवारी आती दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा, राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से सारे दरिद्र दूर हो जाएंगे, जीवन संवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना भी बढ़ती गई। जैसे ही राजा का रथ भिखारी के निकट आया, राजा ने अपना रथ रुकवाया, उतर कर उसके निकट पहुंचे। भिखारी की तो मानो सांसें ही रुकने लगीं। लेकिन राजा ने उसे कुछ देने के बदले उलटे अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैला दी और भीख की याचना करने लगे। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि क्या करे। अभी वह सोच ही रहा था कि राजा ने पुन: याचना की। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला, मगर हमेशा दूसरों से लेने वाला मन देने को राजी नहीं हो रहा था। जैसे-तैसे कर उसने दो दाने जौ के निकाले और उन्हें राजा की चादर पर डाल दिया। उस दिन भिखारी को रोज से अधिक भीख मिली, मगर वे दो दाने देने का मलाल उसे सारे दिन रहा। शाम को जब उसने झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। जो जौ वह ले गया था, उसके दो दाने सोने के हो गए थे। उसे समझ में आया कि यह दान की ही महिमा के कारण हुआ है। 
वह पछताया कि काश! उस समय राजा को और अधिक जौ दी होती, लेकिन नहीं दे सका, क्योंकि देने की आदत जो नहीं थी।

गुरुवार, 11 मई 2017

दुख का कारण....लघु कथा



एक व्यापारी को नींद न आने की बीमारी थी। उसका नौकर मालिक की बीमारी से दुखी रहता था। एक दिन व्यापारी अपने नौकर को सारी संपत्ति देकर चल बसा। 
सम्पत्ति का मालिक बनने के बाद नौकर रात को सोने की कोशिश कर रहा था, किन्तु अब उसे नींद नहीं आ रही थी। एक रात जब वह सोने की कोशिश कर रहा था, उसने कुछ आहट सुनी। 
देखा, एक चोर घर का सारा सामान समेट कर उसे बांधने की कोशिश कर रहा था, परन्तु चादर छोटी होने के कारण गठरी बंध नहीं रही थी।

नौकर ने अपनी ओढ़ी हुई चादर चोर को दे दी और बोला, 
इसमें बांध लो। उसे जगा देखकर चोर सामान छोड़कर भागने लगा। किन्तु नौकर ने उसे रोककर हाथ जोड़कर कहा, 
भागो मत, इस सामान को ले जाओ ताकि मैं चैन से सो सकूँ। 
इसी ने मेरे मालिक की नींद उड़ा रखी थी और अब मेरी। 
उसकी बातें सुन चोर की भी आंखें खुल गईं।

बुधवार, 10 मई 2017

प्रेम और भक्ति में हिसाब!


एक पहुंचे हुए सन्यासी का एक शिष्य था, जब भी किसी मंत्र का जाप करने बैठता तो संख्या को खडिया से दीवार पर लिखता जाता। किसी दिन वह लाख तक की संख्या छू लेता किसी दिन हजारों में सीमित हो जाता। उसके गुरु उसका यह कर्म नित्य देखते और मुस्कुरा देते।

एक दिन वे उसे पास के शहर में भिक्षा मांगने ले गये। जब वे थक गये तो लौटते में एक बरगद की छांह बैठे, उसके सामने एक युवा दूधवाली दूध बेच रही थी, जो आता उसे बर्तन में नाप कर देती और गिनकर पैसे रखवाती। वे दोनों ध्यान से उसे देख रहे थे। तभी एक आकर्षक युवक आया और दूधवाली के सामने अपना बर्तन फैला दिया, दूधवाली मुस्कुराई और बिना मापे बहुत सारा दूध उस युवक के बर्तन में डाल दिया, पैसे भी नहीं लिये। गुरु मुस्कुरा दिये, शिष्य हतप्रभ!

उन दोनों के जाने के बाद, वे दोनों भी उठे और अपनी राह चल पडे। चलते चलते शिष्य ने दूधवाली के व्यवहार पर अपनी जिज्ञासा प्रकट की तो गुरु ने उत्तर दिया,

'' प्रेम वत्स, प्रेम! यह प्रेम है, और प्रेम में हिसाब कैसा? उसी प्रकार भक्ति भी प्रेम है, जिससे आप अनन्य प्रेम करते हो, उसके स्मरण में या उसकी पूजा में हिसाब किताब कैसा?'' और गुरु वैसे ही मुस्कुराये व्यंग्य से।

'' समझ गया गुरुवर। मैं समझ गया प्रेम और भक्ति के इस दर्शनप्रेम और भक्ति में हिसाब!

मंगलवार, 9 मई 2017

गधे की कब्र


एक फकीर किसी बंजारे की सेवा से बहुत प्रसन्न हो गया। और उस बंजारे को उसने एक गधा भेंट किया। बंजारा बड़ा प्रसन्न था। गधे के साथ, अब उसे पेदल यात्रा न करनी पड़ती थी। सामान भी अपने कंधे पर न ढोना पड़ता था। और गधा बड़ा स्वामीभक्त था।

लेकिन एक यात्रा पर गधा अचानक बीमार पडा और मर गया। दुःख में उसने उसकी कब्र बनायी, और कब्र के पास बैठकर रो रहा था कि एक राहगीर गुजरा।

उस राहगीर ने सोचा कि जरूर किसी महान आत्मा की मृत्यु हो गयी है। तो वह भी झुका कब्र के पास। इसके पहले कि बंजारा कुछ कहे, उसने कुछ रूपये कब्र पर चढ़ाये। बंजारे को हंसी भी आई आयी। लेकिन तब तक भले आदमी की श्रद्धा को तोड़ना भी ठीक मालुम न पडा। और उसे यह भी समझ में आ गया कि यह बड़ा उपयोगी व्यवसाय है।

फिर उसी कब्र के पास बैठकर रोता, यही उसका धंधा हो गया। लोग आते, गांव-गांव खबर फैल गयी कि किसी महान आत्मा की मृत्यु हो गयी। और गधे की कब्र किसी पहुंचे हुए फकीर की समाधि बन गयी। ऐसे वर्ष बीते, वह बंजारा बहुत धनी हो गया। 
फिर एक दिन जिस सूफी साधु ने उसे यह गधा भेंट किया था। वह भी यात्रा पर था और उस गांव के करीब से गुजरा। उसे भी लोगों ने कहा, ऐ महान आत्मा की कब्र है यहां, दर्शन किये बिना मत चले जाना। वह गया देखा उसने इस बंजारे को बैठा, तो उसने कहा, किसकी कब्र है यहा, और तू यहां बैठा क्यों रो रहा है। उस बंजारे ने कहां, अब आप से क्या छिपाना, जो गधा आप ने दिया था। उसी की कब्र है। जीते जी भी उसने बड़ा साथ दिया और मर कर और ज्यादा साथ दे रहा है। सुनते ही फकीर खिल खिलाकर हंसने लगा। उस बंजारे ने पूछा आप हंसे क्यों? फकीर ने कहां तुम्हें पता है। जिस गांव में मैं रहता हूं वहां भी एक पहुंचे हुए महात्मा की कब्र है। उसी से तो मेरा काम चलता है। बंजारे ने पूछा वह किस महात्मा की कब्र है। तुम्हें मालूम है। उसने कहां मुझे कैसे नहीं, पर क्या आप को मालूम है। क्यों नहीं मालूम हो सकता, वह इसी गधे की मां की कब्र है।

धर्म के नाम पर अंधविश्वासों का बड़ा विस्तार है। धर्म के नाम पर थोथे, व्यर्थ के क्रियाकांड़ो, यज्ञों, हवनों का बड़ा विस्तार है। फिर जो चल पड़ी बात, उसे हटाना मुश्किल हो जाता है। जो बात लोगों के मन में बैठ गयी। उसे मिटाना मुश्किल हो जाता है। और इसे बिना मिटाये वास्तविक धर्म का जन्म नहीं हो सकता। अंधविश्वास उसे जलने ही न देगा।

सभी बुद्धिमान व्यक्तियों के सामने यही सवाल थे। और दो ही विकल्प है। एक विकल्प है नास्तिकता का, जो अंधविश्वास को इन कार कर देता है। और अंधविश्वास के साथ-साथ धर्म को भी इंकार कर देता है। क्योंकि नास्तिकता देखती है इस धर्म के ही कारण तो अंधविश्वास खड़े होते है। तो वह कूड़े-कर्कट को तो फेंक ही देती है। साथ में उस सोने को भी फेंक देती है। क्योंकि इसी सोने की बजह से तो कूड़ा कर्कट इक्कठ होता हे। न रहेगा बांस और न बजेगी बांसुरी।

बुधवार, 19 अप्रैल 2017

किसी के इतने पास न जा......अनुपम वर्मा



कमरे में चारों तरफ़ अँधेरा और सन्नाटा ही था,ठीक वैसा ही सन्नाटा उस कमरे में मौजूद हस्ती के वजूद पर भारी था.......
उनकी चीखें और दहाड़ मार कर मातम करने की ख्वाहिश भी जैसे उस रात उनके घर के पिछवाडे में कब्र खोद कर दफन कर दी गई हो
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अब्बू हमें जल्द ही ये शहर छोड़ना होगा-,उमेर ने चाय का घूंट हलक में उतारते हुए कहा मगर फिरोज साहब ने जैसे अनसुना कर दिया !वो अब भी छत पर लटकते फानूस को गायब दिमागी से देखे जा रहे थे!पिछली ईद पर ही तो उनकी हानिया ने मंगवाया था........ 
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जुबैर,मैं कितने दिन छिपा सकती हूँ अम्मी अब्बू से हमारे बारे में ? आप प्लीज़ अपने घरवालों को मेरे घर भेजें !!
भाई सख्त खफा हैं मेरे रवैये से क्योंकि मैं ही बिना किसी माक़ूल वज़ह के शादी से इनकार कर रही हूँ.......कुछ परेशान सी, घनी पलकों वाली हानिया उस वक़्त जुबैर को अपने दिल के और करीब महसूस हुई!!!!
" हानी, मैं इसी सण्डे को अम्मी अब्बू को भेजता हूँ, अब्बू वापस आ रहे हैं इसी हफ्ते..... जुबैर ने यकीन दिलाया उसे !! और फ़िर दोनों खामोश होकर कॉलेज के ग्राउंड की घास को बेवजह तोड़ते रहे !!!!
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सेटर्डे की शाम से ही जुबैर का फोन ऑफ था, जुबैर के दोस्त ज्यादा नहीं थे जितने भी थे उनसे हानी और जुबैर के रिश्ते की संजीदगी छिपी हुई थी इसलिये सख्त परेशान होते हुए भी हानिया दिल ही दिल में सिर्फ़ दुआ ही कर पाई !!!!!!
इसी आलम में उमेर भाई कमरे के अंदर आये और अपने लहजे के खिलाफ़ मिठास घोल कर बोले.........."चल हानी तुझे आज आइसक्रीम खिला कर लाता हूँ""
कोई और वक़्त होता तो हानिया खुशी से झूम उठती इस पेशकश पर मगर अभी उसका जहन जुबैर में उलझा था इसलिये बमुश्किल ही सही इनकार कर दिया !!! मगर उमैर ने एक ना सुनी, आइस क्रीम खिलाने के बाद हानिया को दो रेडीमेड खूबसूरत सूट दिलाये और फ़िर डिनर पर भी ले गया!!
हानिया खुश थी और भाई के होने को महसूस कर रही थी
वह बिरयानी की खुशबू से ज्यादा भाई का प्यार महसूस कर रही थी !इतने में ही मैसेज टोन बजा.......भाई के सामने उसने देखना ठीक नहीं समझा,यूँ ही उसे भाई का साथ मुश्किल से मिला था !!!
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वापसी में हानिया जहनी तौर पर हल्का महसूस कर रही थी!! पोर्च में गाड़ी रुकते ही उसे अब्बू दिख गए जो शायद क्यारी की तरफ़ से आये थे..मिट्टी लगी थी सारे कपडों पर!! अम्मी भी मिजाज के खिलाफ आज पौधों को पानी दे रही थीं वो भी इस वक़्त !!! हानिया खुश थी इस तब्दीली से !!!
कमरे में जाकर उसने मोबाइल उठाया ही था कि अम्मी दूध का गिलास लेकर आ गयीं, "हानी, मेरी बच्ची आज मैं तेरे साथ ही सोउँगी, ले तू दूध ख़त्म कर!!!
अम्मी मैं नहीं पी सकती, आज भाई ने बेवजह ही दावत दे डाली.....हानिया ने इनकार करने की पुरजोर कोशिश की मगर अम्मी का दिल दुखने के डर से एक साँस में ही पी गई !!! दूध उसे हमेशा से नापसंद था और आज कुछ ज़्यादा ही अजीब लग रहा था!!!!!

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अम्मी ने उसका सर गोद में रख लिया और अपनी अंगुलियों से उसके रेशम जैसे बाल सहलाती रहीं!!! अम्मी के सामने जुबैर को कॉल नही कर सकती थी इसीलिये मैसेज करने के लिए फोन अनलॉक किया कि जुबैर का मैसेज जगमगाया.......अम्मी ना होतीं तो शायद खुशी से चीख पड़ती मगर........
अम्मी के सामने भी चीखी ही थी ---बेयकीनी से , ग़म की शिद्दत से , माँ बाप और भाई की बेरहमी से ,एक बेकसूर के कत्ल की वजह बनने के अहसास से.......आखिरी पैगाम था जुबैर की तरफ़ से...........हानी, मुझे धोखेबाज़ मत समझना!! हमें उस दिन उमैर भाई ने एक साथ देख लिया था! उन्होंने मुझसे मुलाकात की ,पसंद भी किया !! मगर वादा ले लिया कि तुम्हे ना बताऊँ !! मुझे वादे का पास रखना था! उन्होंने मुझे कोल्ड ड्रिंक में ज़हर दे दिया ! मर रहा हूँ ! शायद तुम्हारे घर में ही गाड़ दिया जाऊँ! मेरे अम्मी अब्बू की ख़बर लेते रहना! साँसें चल रहीं हैं! शायद जिंदा ही दफन किया जाऊँगा.................
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अम्मी ने हानी का मोबाइल लेकर मैसेज डिलीट कर दिया !!!!
हानी के मुँह से झाग निकल रहा था!!
इस वक़्त वो जिंदा लाश बनकर एक लाश को घूर रहीं थीं
कुछ वक़्त बाद इस लाश को भी दूसरी लाश के बगल में दफना कर वहाँ चम्पा के सफ़ेद फूलों वाले पौधे रोप दिये जायेंगे !!!
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आज वो पौधे बडे हो चुके हैं !!!खुशबू है उन चम्पा के फूलों में
मगर जुबैर और हानिया की मोहब्बत की खुशबू !!
अकसर कुंदुस बेगम के आँसुओं के क़तरे ओस के कतरों के साथ इन पौधों की सब्ज पत्तियों पर जम जाते हैं
अकसर वह इन मासूमों की अनाम कब्रों पर अपने गुनाह की सज़ा के लिये दुआ माँगती हैं
-अनुपम वर्मा
अगस्त 29, 2016




बुधवार, 1 फ़रवरी 2017

भाग्य और पुरुषार्थ... प्रेरक कथा


एक बार दो राज्यों के बीच युद्ध की तैयारियां चल रही थीं। दोनों के शासक एक प्रसिद्ध संत के भक्त थे। वे अपनी-अपनी विजय का आशीर्वाद मांगने के लिए अलग-अलग समय पर उनके पास पहुंचे। पहले शासक को आशीर्वाद देते हुए संत बोले, ‘तुम्हारी विजय निश्चित है।’

दूसरे शासक को उन्होंने कहा, ‘तुम्हारी विजय संदिग्ध है।’ दूसरा शासक संत की यह बात सुनकर चला आया किंतु उसने हार नहीं मानी और अपने सेनापति से कहा, ‘हमें मेहनत और पुरुषार्थ पर विश्वास करना चाहिए। इसलिए हमें जोर-शोर से तैयारी करनी होगी। दिन-रात एक कर युद्ध की बारीकियां सीखनी होंगी। अपनी जान तक को झोंकने के लिए तैयार रहना होगा।’

इधर पहले शासक की प्रसन्नता का ठिकाना न था। उसने अपनी विजय निश्चित जान अपना सारा ध्यान आमोद-प्रमोद व नृत्य-संगीत में लगा दिया। उसके सैनिक भी रंगरेलियां मनाने में लग गए। निश्चित दिन युद्ध आरंभ हो गया। जिस शासक को विजय का आशीर्वाद था, उसे कोई चिंता ही न थी। उसके सैनिकों ने भी युद्ध का अभ्यास नहीं किया था। दूसरी ओर जिस शासक की विजय संदिग्ध बताई गई थी, उसने व उसके सैनिकों ने दिन-रात एक कर युद्ध की अनेक बारीकियां जान ली थीं। उन्होंने युद्ध में इन्हीं बारीकियों का प्रयोग किया और कुछ ही देर बाद पहले शासक की सेना को परास्त कर दिया।

अपनी हार पर पहला शासक बौखला गया और संत के पास जाकर बोला, ‘महाराज, आपकी वाणी में कोई दम नहीं है। आप गलत भविष्यवाणी करते हैं।’ उसकी बात सुनकर संत मुस्कराते हुए बोले, ‘पुत्र, इतना बौखलाने की आवश्यकता नहीं है। तुम्हारी विजय निश्चित थी किंतु उसके लिए मेहनत और पुरुषार्थ भी तो जरूरी था। भाग्य भी हमेशा कर्मरत और पुरुषार्थी मनुष्यों का साथ देता है और उसने दिया भी है तभी तो वह शासक जीत गया जिसकी पराजय निश्चित थी।’ संत की बात सुनकर पराजित शासक लज्जित हो गया और संत से क्षमा मांगकर वापस चला आया।