हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए
अध्यापिका ने कहा, "पहले एक कहानी सुनाती हूं।" उसने कहा, "एक महिला को बेटे की लालसा में लगातार पांच बेटियां ही पैदा होती रहीं। जब छठवीं बार वह गर्भवती हुई तो पति ने उसे धमकी दी कि अगर इस बार भी बेटी हुई तो उस बेटी को बाहर किसी सड़क या चौक पर फेंक आऊंगा। महिला अकेले में रोती हुई भगवान से प्रार्थना करने लगी, क्योंकि यह उसके वश की बात नहीं थी कि अपनी इच्छा अनुसार बेटा पैदा कर दे। इस बार भी बेटी ही पैदा हुई। पति ने नवजात बेटी को उठाया और रात के अंधेरे में शहर के बीचों-बीच चौक पर रख आया। मां पूरी रात उस नन्हीं सी जान के लिए रो-रोकर दुआ करती रही...!!
अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है। उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया। रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता। यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझ कर शांत हो गया। फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनिया से चली जाती...!!
अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आंसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी जिंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनियां से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए...!!अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं।
जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं, 'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना...!!अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सब कुछ कर सकती है, सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके...!!
एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए वह जानबूझकर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली, "पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं...!!
इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है।
वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।
हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए...!!
अध्यापिका ने आगे कहा, "दूसरे दिन सुबह पिता जब चौक पर बेटी को देखने पहुंचा तो देखा कि बच्ची वहीं पड़ी है।
उसे जीवित रखने के लिए बाप बेटी को वापस घर लाया, लेकिन दूसरी रात फिर बेटी को उसी चौक पर रख आया।
रोज़ यही होता रहा। हर बार पिता उस नवजात बेटी को बाहर रख आता और जब कोई उसे लेकर नहीं जाता तो मजबूरन वापस उठा लाता।
यहां तक कि उसका पिता एक दिन थक गया और भगवान की इच्छा समझ कर शांत हो गया।
फिर एक वर्ष बाद मां जब फिर से गर्भवती हुई तो इस बार उन्हें बेटा हुआ। लेकिन कुछ ही दिन बाद ही छह बेटियों में से एक बेटी की मौत हो गई। यहां तक कि माँ पांच बार गर्भवती हुई और हर बार बेटे ही हुए। लेकिन हर बार उसकी बेटियों में से एक बेटी इस दुनिया से चली जाती...!!
अध्यापिका की आंखों से आंसू गिरने लगे थे। उसने आँसू पोंछकर आगे कहना शुरू किया, "अब सिर्फ एक ही बेटी जिंदा बची थी और वह वही बेटी थी, जिससे बाप जान छुड़ाना चाह रहा था। एक दिन अचानक मां भी इस दुनिया से चली गई। इधर पांच बेटे और एक बेटी सब धीरे-धीरे बड़े हो गए...!!
अध्यापिका ने फिर कहा, "पता है वह बेटी जो ज़िंदा बची रही, मैं ही हूं। मैंने अभी तक शादी इसलिए नहीं की, कि मेरे पिता अब इतने बूढ़े हो गए हैं कि अपने हाथ से खाना भी नहीं खा सकते और अब घर में और कोई नहीं है जो उनकी सेवा कर सके। बस मैं ही उनकी सेवा और देखभाल किया करती हूं।
जिन बेटों के लिए पिताजी परेशान थे, वो पांच बेटे अपनी-अपनी पत्नियों और बच्चों के साथ अलग रहते हैं। बस कभी-कभी आकर पिता का हालचाल पूछ जाते हैं।"वह थोड़ा मुस्कराई। फिर बोली, "मेरे पिताजी अब हर दिन शर्मिंदगी के साथ रो-रो कर मुझसे कहा करते हैं,
'मेरी प्यारी बेटी, जो कुछ मैंने बचपन में तेरे साथ किया उसके लिए मुझे माफ कर देना...!!
अध्यापिका की कहानी सुनकर सभी छात्राएं भावुक हो गईं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बेटी की ममता और त्याग अद्वितीय है। एक बेटी अपने पिता के लिए सब कुछ कर सकती है,
सिर्फ इसलिए कि वह अपने पिता को खुश देख सके...!!एक पिता बेटे के साथ खेल रहा था। बेटे का हौसला बढ़ाने के लिए वह जानबूझकर हार जा रहा था। दूर बैठी बेटी बाप की हार बर्दाश्त ना कर सकी और बाप के साथ लिपटकर रोते हुए बोली,
"पापा! आप मेरे साथ खेलिए, ताकि मैं आपकी जीत के लिए हार सकूं...!!इस कहानी में निहित संदेश यह है कि बेटियों की ममता और प्यार का कोई मुकाबला नहीं है। वे अपने माता-पिता के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं।
हमें अपनी बेटियों की कद्र करनी चाहिए
और उनके प्यार और त्याग को समझना चाहिए...!!!!!
-पूजा मिश्रा

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