शनिवार, 22 जुलाई 2017

बचपन-बचपन.....मीरा जैन


बेटे   दिव्यम  के जन्मदिन   पर गिफ्ट  में    आए    ढेर  से   नई तकनीक के  इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों   में  कुछ को दिव्यम   चला   ही  नहीं पा रहा था।  घर के अन्य   सदस्यों ने   भी हाथ आजमाइश  की लेकिन किसी को   भी सफलता नहीं मिली। तभी काम वाली   बाई सन्नो का दस वर्षीय लड़का  किसी काम  से घर आया  सभी  को खिलौने के  लिए बेवजह मेहनत करता देख वह  बड़े   ही  धीमे व संकोची लहजे   में   बोला-‘‘आँटी जी! आप कहें  तो  खिलौनों को   चलाकर बता दूँ?’

पहले  तो मालती उसका चेहरा देखती रही फिर  मन ही मन सोच रही थी  कि इसे दिया तो  निश्चित ही तोड़ देगा, फिर भी  सन्नो का लिहाज कर बेमन से हाँ  कर दिया  और देखते ही  देखते मुश्किल खिलौने को उसने   एक बार में   ही स्टार्ट  कर दिया। सभी आश्चर्यचकित मालती ने  सन्नों  को   हँसते हुए ताना मारा-‘वाह  री  सन्नो! यूँ   तो कहेगी   पगार कम पड़ती  है, और इतने  महँगे    खिलौने   छोरे को दिलाती है   जो  मैंने   आज तक  नहीं  खरीदे?’

इतना   सुनते  ही सन्नो की  आँखें  नम हो   गई ।   उसने रुँधे   गले से  कहा-‘‘बाई  जी! यह खिलौनों  से खेलता नहीं; बल्कि खिलौनों  की  दुकान पर काम करता है।’’ जवाब सुन  मालती   स्वयं को लज्जित महसूस कर सोचने लगी  दोनों   के  बचपन में कितना अंतर है।
-मीरा  जैन

-0-सम्पर्क -0-
मीरा  जैन   516, 
सॉईनाथ  कालोनी, 
सेठी नगर, 
उज्जैन, मध्यप्रदेश

बुधवार, 19 जुलाई 2017

उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग....अमृत

हवा के रुख के साथ ही, मसीहा बदल लेते हैं लोग।
इधर मौसम बदलते हैं, उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग।।

बदल  बदल कर लोग, बदल रहे हैं ज़िन्दगी।
इधर टोपी बदलते  हैं, उधर  सेहरा  बदल लेते है लोग।।

कौन जाने कैसे पूरा करेंगे, वे अपना सफर।
इधर  किश्ती  बदलते हैं, उधर किनारा बदल लेते हैं।। 

रंग बदलना तो कोई गिरगिट, आदमजात से सीखे।
इधर चेहरा बदलते हैं, उधर मोहरा बदल लेते हैं लोग।।

हवा के रुख के  साथ ही, मसीहा बदल लेते हैं लोग।
इधर मौसम बदलते हैं, उधर चेहरा बदल लेते हैं लोग।।

-अमृत

रविवार, 16 जुलाई 2017

‘पगलिया’.......प्रशान्त पांडेय

एगो कुसुमिया है. हड़हड़ाते चलती है. मुंह खोली नहीं की राजधानी एक्सप्रेस फेल. हमरे यहां काम करने आती है. टेंथ का एक्जाम था तो काम छोड़ दी थी. दू-तीन महीना बाद अब जा के फिर पकड़ी है.

"तब सब ठीक है?" हम अइसही पूछ लिए. गलती किये। माने कुसुमिया का पटर-पटर चालू।

"सब ठीके न है....कमाना, खाना है..... चलिए रहा है......भाभी लेकिन धुक-धुक भी हो रहा है....परीक्षा में पास हो जाएंगे न?"

"काहे नहीं...मेहनत की हो, निकल जाओगी,"

"हाँ.....आ जरूरी भी न है, आज कल कोइयो तो पढ़ले-लिखल न खोजता है?"

तभी हमको याद आया की काम छोड़ने से पहले कुसुमिया बोली थी उसका सादी होने वाला है.

उस समय तो हम यही सोचे थे की आदिवासी लोग है, गरीब हईये है.......माई-बाप जल्दी सादी करके काम निपटा देना चाह रहा होगा। छौ  गो बच्चा में चार गो बेटिये है; आ ई सबसे बड़ी है.

अब हमरो मन कुलबुला रहा था.

पूछ लिए: "का हुआ तुम्हरा सादी का?"

"सादी? काहे ला सादी?"

"तुम्ही तो बोली थी छुट्टिया से पहले,"

"अरे! तो अभी घर में बोले नहीं हैं न....अइसे कइसे माँ से बोल दें.....अभी दू-तीन साल बाद देखेंगे,"

"दू-तीन साल बाद?"

"भाभी, सादी तो हम ही तय किये हैं....लेकिन लड़कवा का अभी कोई नौकरिये नहीं है.... एक्के बात है की खाता पीता नहीं है... ऊ भी पढ़ाइये न कर रहा है!"

"तुम्हरा माई-बाप? ऊ लोग भी तो खोज रहा होगा?"

"माँ को ढलैया के काम से फ़ुरसते नहीं है और बाप तो जानबे करते हैं.....ऊ कुछ करता तो हम लोग को काहे काम करना पड़ता?"

"अरे जो पूछ रहे हैं ऊ बता न.....सदिया करेगी की नहीं?”

"नहीं भाभी, अभिये ई सब पचड़ा में कौन पड़े...अभी कमा रहे हैं, खेला-मदारी चलिए रहा है........सादी कौन करेगा रे अभी? बक्क!"

जाने केतना और बकबकाने के बाद गयी तब हम, आ ई, खूब हँसे। ई हो घरे पर थे. उसका सब बात सुने थे.

"एतना साल सादी को हो गया, सोच सकते हैं की अपना चक्कर के बारे में कउनो लईकी अइसे बात करेगी?" हम इनसे पूछे. ई खाली हंस रहे थे.

उधर से अम्मा आईं. पूजा पर बइठे-बइठे उहो सब सुन लीं थीं. प्रसाद बाँटते हुए कहीं: "जाए दो! कम से कम इमनदारी से मान तो रही है. न तो इसी के लिए आज-काल केतना न करम हो जाता है."

-प्रशान्त पांडेय


शनिवार, 1 जुलाई 2017

थैंकू भैया....डॉ. आरती स्मित


वह माँ के साथ ज़बरन पाँव घसीटती चली जा रही थी। उसकी नज़रें बार-बार सड़क के दोनों ओर सजी दुकानों पर जा-जाकर अटक जातीं। मन हिलोर मारता कि माँ से कुछ कहे, मगर उसे डर था कि माँ से अभी कुछ कहने का मतलब यहीं बीच सड़क पर मार खाना होगा। यों भी, आज माँ का मूड कुछ ठीक नहीं, कल मालकिन ने ताकीद की थी, देर न करना, मगर देर हो ही गई, इसलिए काम में हाथ बँटाने को माँ उसको भी ज़बर्दस्ती साथ ले जा रही थी। अबीर~, गुलाल के रंग-बिरंगे पैकेट उसे बुलाते, तरह-तरह के रूपों वाली पिचकारियाँ, गुब्बारे सब उसे उसे इशारा करते से लगते। वह टूटी चप्पल घसीटती अधमरी सी चलती रही।
"अरी,चल ना! का हुआ, पाँव में छाले पड़ गए का.... एक तो ऐसे ही एतना देर हो चुका, जाने मालकिन का पारा केतना गरम होगा? परवी नै दी तो का फगुआ का बैसाखी। सारी भी तो दे के खातिर बोले रही, बिटवा का उतारन भी। चल न तुमको साथ काम करते देखेगी तो मन पसीजेगा जरूर, कुछ न कुछ दइए देगी।"
माँ बड़बड़ाती हाथ खींचती चलती रही।
"गली के मोड़ पर पहले पचमंज़िला मकान मालकिन का ही तो है। हे भगवान! उसका बेटा घर में न हो! केतना तंग करता है हमको।'' नौ वर्षीया निक्की ने मन ही मन ईश्वर को याद किया। कभी मंदिर गई नहीं, भगवान स्त्री हैं या पुरुष, उसको भ्रम बना हुआ है, मगर जब मुसीबत नज़र आती है,वह झट से भगवान को पुकार लेती। मालकिन बोली की कड़ी थी, मगर उसे कभी डाँटा नहीं, माँ को ज़रूर डाँटती कि इसे स्कूल भेजा कर! घर में बिठाकर अपने जैसा बनाएगी क्या?" उसे मालकिन से डर नहीं लगता मगर उसके बेटे ओम से लगता है, वह हमेशा छेड़ता रहता। उससे थोड़ा बड़ा है तो का? अकड़ू कहीं का!"
चप्पल उतार कर अभी बैठक में क़दम रखा ही था कि ओम दिख गया। वह सकपकाती हुई माँ के बगल जा खड़ी हुई।
"जा सीढ़ियों पर झाडू लगा दे, हम आते हैं कमरा में झाड़ू लगाकर।" वह हिली नहीं, सकपकाई सी खड़ी रही रही।
"अरी का हुआ, सुनाई कम देत है का?" माँ धीमी आवाज़ में मगर रोष में बोली।
"वो - वो- " वह हकला गई।
"चल जा, जल्दी काम कर,"कह कर माँ अंदर कमरे में चली गई। ओम चुपचाप कब उसके पीछे खड़ा हो गया, उसे पता ही न चला। अचानक उसे पाकर वह भीतर तक सिहर गई। ओम का हाथ पीछे था। "अब फिर यह मेरे बाल खींचेगा या चिकोटी काटेगा, हे भगवान का करें? आज तो चिल्ला कर रोने लगेंगे हम, मालकिन को पता चल जाएगा कि ...."
"निक्की," वह आगे सोच पाती, तभी ओम ने धीरे से उसे पुकारा और हाथ आगे बढ़ा दिया। उसके हाथ में रंग और अबीर पुड़िया की थैली और प्यारी-सी पिचकारी थी।
"यह तुम्हारे लिए।"
" नहीं-नहीं हमको नहीं चाहिए।" वह छिटककर दूर जा खड़ी हुई, तभी मालकिन कमरे में आ गई ।
"ले लो बेटा! भैया ने तुम्हारे लिए ख़रीदा है।" वह हैरान होकर कभी रंग और पिचकारी देखती, कभी ओम और मालकिन को। "तो क्या ओम उसे छोटी बहन समझ कर उसे तंग करता था, यही बात अच्छे से समझा भी सकता था, डरा कर रख दिया हमको" वह मन ही मन बुदबुदाई। साँवले चेहरे पर मुस्कान खिली और गुलाबी रंग निखर आया। होंठ हिले और बोल फूटे, "थैंकू भैया!"








-डॉ. आरती स्मित

रविवार, 11 जून 2017

मारकर भी खिलाता है...व्हाट्स एप्प से

जो सबके हृदय की धड़कनें चलाता है, 
भक्तवत्सल है वह 
अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शांत कैसे रहता


मलूकचंद नाम के एक सेठ थे। उनके घर के नजदीक ही एक मंदिर था। एक रात्रि को पुजारी जी के कीर्तन की ध्वनि के कारण उन्हें ठीक से नींद नहीं आयी। सुबह उन्होंने पुजारी जी को खूब डाँटा कि “यह सब क्या है ?”

पुजारी जी बोले “एकादशी का जागरण कीर्तन चल रहा था।”
“अरे ! क्या जागरण कीर्तन करते हो ? हमारी नींद हराम कर दी। अच्छी नींद के बाद ही व्यक्ति काम करने के लिए तैयार हो पाता है, फिर कमाता है तब खाता है।”

पुजारी जी ने कहा “मलूक जी ! खिलाता तो वह खिलाने वाला ही है।”
“क्या भगवान खिलाता है ! हम कमाते हैं तब खाते हैं।”

“निमित्त होता है तुम्हारा कमाना और पत्नी का रोटी बनाना, बाकी सबको खिलाने वाला, सबका पालनहार तो वह जगन्नियंता ही है।”

“क्या पालनहार-पालनहार लगा रखा है ! बाबा आदम के जमाने की बातें करते हो। क्या तुम्हारा पालने वाला एक-एक को आकर खिलाता है ?”
“सभी को वही खिलाता है।”

“हम नहीं खाते उसका दिया।”
“नहीं खाओ तो मारकर भी खिलाता है।”

“पुजारी जी ! अगर तुम्हारा भगवान मुझे चौबीस घंटों में खिला पाया तो फिर तुम्हें अपना यह भजन-कीर्तन सदा के लिए बंद करना होगा।”
“मैं जानता हूँ कि तुम्हारी बहुत पहुँच है लेकिन उसके हाथ बड़े लम्बे हैं। जब तक वह नहीं चाहता तब तक किसी का बाल भी बाँका नहीं हो सकता। आजमाकर देख लेना।” पुजारी जी भगवान में प्रीति वाले कोई सात्त्विक भक्त रहे होंगे।

मलूकचंद किसी घोर जंगल में चले गये और एक विशालकाय वृक्ष की ऊँची डाल पर चढ़कर बैठ गये कि .....
ʹअब देखें इधर कौन खिलाने आता है!ʹ
दो-तीन घंटे बाद एक अजनबी आदमी वहाँ आया। उसने उसी वृक्ष के नीचे आराम किया, फिर अपना सामान उठाकर चल दिया लेकिन एक थैला वहीं भूल गया। थोड़ी देर बार पाँच डकैत वहाँ से पसार हुए। उनमें से एक ने अपने सरदार से कहाः ” उस्ताद ! यहाँ कोई थैला पड़ा है।”
“क्या है जरा देखो।”

खोलकर देखा तो उसमें गरमागरम भोजन से भरा डिब्बा ! उन्होंने सोचा कि उन्हें पकड़ने या फँसाने के लिए किसी शत्रु ने ही जहर-वहर डालकर यह डिब्बा यहाँ रखा होगा अथवा पुलिस का कोई षडयंत्र होगा। उन्होंने इधर-उधर देखा लेकिन कोई भी आदमी नहीं दिखा। तब डाकुओं के मुखिया ने जोर से आवाज लगायीः “कोई हो तो बताये कि यह थैला यहाँ कौन छोड़ गया है ?”

मलूकचंद सोचने लगे कि ʹअगर मैं कुछ बोलूँगा तो ये मेरे ही गले पड़ेंगे।ʹ
वे तो चुप रहे लेकिन जो सबके हृदय की धड़कनें चलाता है, भक्तवत्सल है वह अपने भक्त का वचन पूरा किये बिना शांत कैसे रहता ! उसने उन डकैतों को प्रेरित किया कि ऊपर भी देखो। उन्होंने ऊपर देखा तो वृक्ष की डाल पर एक आदमी बैठा हुआ दिखा। डकैत चिल्लायेः “अरे ! नीचे उतर !”

“मैं नहीं उतरता।”
“क्यों नहीं उतरता, यह भोजन तूने ही रखा होगा।”
“मैंने नहीं रखा। कोई यात्री आया था, वही इसे भूलकर चला गया।”
“नीचे उतर ! तूने ही रखा होगा जहर-वहर मिलाकर और अब बचने के लिए बहाने बना रहा है। तुझे ही यह भोजन खाना पड़ेगा।” अब कौन सा काम वह सर्वेश्वर किसके द्वारा, किस निमित्त से करवाये या उसके लिए क्या रूप ले यह उसकी मर्जी की बात है। बड़ी गजब की व्यवस्था है उसकी !

मलूकचंद बोलेः “मैं नहीं उतरूँगा और खाना तो मैं कतई नहीं खाऊँगा।”
“पक्का तूने खाने में जहर मिलाया है। अब तो तुझे खाना ही होगा !”
“मैं नहीं खाऊँगा, नीचे भी नहीं उतरूँगा।”
“अरे, कैसे नहीं उतरेगा !”

डकैतों के सरदार ने हुक्म दियाः “इसको जबरदस्ती नीचे उतारो।”
मलूकचंद को पकड़कर नीचे उतारा गया। “ले खाना खा।”
“मैं नहीं खाऊँगा।”

उस्ताद ने धड़ाक से उनके मुँह पर तमाचा जड़ दिया। मलूकचंद को पुजारी जी की बात याद आयी कि ʹनहीं खाओगे तो मारकर भी खिलायेगा।ʹ
मलूकचंद बोलेः “मैं नहीं खाऊँगा।” वहीं डंडी पड़ी थी। डकैतों ने उससे उनकी नाक दबायी, मुँह खुलवाया और जबरदस्ती खिलाने लगे। वे नहीं खा रहे थे तो डकैत उन्हें पीटने लगे।

अब मलूकचंद ने सोचा कि ʹये पाँच हैं और मैं अकेला हूँ। नहीं खाऊँगा तो ये मेरी हड्डी पसली एक कर देंगे।ʹ इसलिए चुपचाप खाने लगे और मन-ही-मन कहाः ʹमान गये मेरे बाप ! मारकर भी खिलाता है ! डकैतों के रूप में आकर खिला चाहे भक्तों के रूप में लेकिन खिलाने वाला तो तू ही है। अपने पुजारी की बात तूने सत्य साबित कर दिखायी।ʹ वे सोचने लगे, ʹजिसने मुझे मारकर भी खिलाया, अब उस सर्वसमर्थ की ही मैं खोज करूँगा।ʹ


वे उस खिलाने वाले की खोज में घने जंगल में चले गये। वहाँ वे भगवदभजन में लग गये। लग गये तो ऐसे लगे कि मलूकचंद में से संत मलूकदास प्रकट हो गये।
.....व्हाट्स एप्प से

शनिवार, 10 जून 2017

यमराज मुझे स्वर्ग में ले गये...व्हाट्स एप्प से








कल रात मैंने एक
"सपना"  देखा.!
मेरी मृत्यु हो गई....

जीवन में कुछ अच्छे कर्म किये होंगे
इसलिये यमराज मुझे
स्वर्ग में ले गये...

देवदूतों ने
मुस्कुराकर
मेरा स्वागत किया...

मेरे हाथ में 
थैला देखकर पूछने लगे
''इसमें क्या है..?"
मैंने कहा...
''इसमें मेरे जीवन भर की कमाई है, 
पांच करोड़ रूपये हैं ।"

देवदूत ने 
बी आर पी-16011966'
नम्बर के लॉकर की ओर
इशारा करते हुए कहा-
''आपकी अमानत इसमें रख
दीजिये..!''

मैंने थैला वहाँ रख दिया...
मुझे एक कमरा भी दिया...

मैं नित्य-कर्म  से निपट कर
बाजार की तरफ निकला...
देवलोक के बाजार में
अद्भुत वस्तुएं देखकर
मेरा मन ललचा गया..!

मैंने कुछ चीजें पसन्द करके
टोकरी में डाली,
और काउंटर पर जाकर
उन्हें हजार हजार के
करारे नोटें देने लगा...

प्रबंधक ने 
नोटों को देखकर कहा,
''यह करेंसी यहाँ नहीं चलती..!''

यह सुनकर 
मैं हैरान रह गया..!

मैंने देवदूत के पास 
शिकायत की
देवदूत ने मुस्कुराते हुए कहा कि,
''आप व्यापारी होकर
इतना भी नहीं जानते..?
कि आपकी करेंसी
बाजू के मुल्क
पाकिस्तान,
श्रीलंका
और बांगलादेश में भी
नही चलती...

और आप
मृत्यूलोक की करेंसी
स्वर्गलोक में चलाने की
मूर्खता कर रहे हो..?''

यह सब सुनकर 
मुझे मानो साँप सूंघ गया..!

मैं जोर जोर से दहाड़े मारकर
रोने लगा.
और परमात्मा से
दरखास्त करने लगा, 
''हे भगवान्.ये...
क्या हो गया.?''
''मैंने कितनी मेहनत से
ये पैसा कमाया..!''
''दिन नही देखा, 
रात नही देखा,"
''पैसा कमाया...!''

''माँ बाप की सेवा नही की,
पैसा कमाया,
बच्चों की परवरीश नही की,
पैसा कमाया....
पत्नी की सेहत की ओर
ध्यान नही दिया, 
पैसा कमाया...!''

''रिश्तेदार, 
भाईबन्द, 
परिवार और
यार दोस्तों से भी 
किसी तरह की
हमदर्दी न रखते हुए
पैसा कमाया.!!"

''जीवन भर हाय पैसा
हाय पैसा किया...!
ना चैन से सोया, 
ना चैन से खाया...
बस,
जिंदगी भर पैसा कमाया.!''

''और यह सब 
व्यर्थ गया..?''

''हे ईश्वर अब क्या होगा"
अब क्या होगा..!''

देवदूत ने कहा,-
''रोने से 
कुछ हासिल होने वाला
नहीं है.!! "
"जिन जिन लोगो ने
यहाँ जितना भी पैसा लाया,
सब रद्दी हो गया।"

"जमशेद जी टाटा के
55 हजार करोड़ रूपये,
बिरला जी के
47 हजार करोड़ रूपये,
धीरू भाई अम्बानी के
29 हजार करोड़
अमेरिकन डॉलर...!
सबका पैसा यहां पड़ा है...!"

मैंने देवदूत से पूछा-
"फिर यहां पर 
कौनसी करेंसी
चलती है..?"

देवदूत ने कहा-
"धरती पर अगर 
कुछ अच्छे कर्म
किये है...!

जैसे किसी दुखियारे को
मदद की, 
किसी रोते हुए को
हंसाया, 
किसी गरीब बच्ची की
शादी कर दी, 
किसी अनाथ बच्चे को
पढ़ा लिखा कर 
काबिल बनाया...! 
किसी को 
व्यसनमुक्त किया...!
किसी अपंग स्कूल, वृद्धाश्रम या 
मंदिरों में दान धर्म किया...!"

"ऐसे पुण्य कर्म करने वालों को
यहाँ पर एक क्रेडिट कार्ड
मिलता है...!
और 
उसे वापर कर आप यहाँ
स्वर्गीय सुख का उपभोग ले
सकते है..!''

मैंने कहा,
"भगवन....
मुझे यह पता
नहीं था. 
इसलिए मैंने अपना जीवन 
व्यर्थ गँवा दिया.!!"

"हे प्रभु, 
मुझे थोडा आयुष्य दीजिये..!''
और मैं गिड़गिड़ाने लगा.!

देवदूत को मुझ पर दया आ गई.!!
उसने तथास्तु कहा 
और मेरी नींद खुल गयी..!
मैं जाग गया..!
अब मैं वो दौलत कमाऊँगा
जो वहाँ चलेगी..!!
-व्हाट्स एप्प से

शुक्रवार, 9 जून 2017

“जब तक हो सके, आत्मनिर्भर रहो।”...व्हाट्स एप्प से


कल दिल्ली से गोवा  की उड़ान में एक सरदारजी मिले। साथ में उनकी पत्नि भी थीं।
सरदारजी की उम्र करीब 80 साल रही होगी। मैंने पूछा नहीं लेकिन सरदारनी भी 75 पार ही रही होंगी।
उम्र के सहज प्रभाव को छोड़ दें, तो दोनों करीब करीब फिट थे।
सरदारनी खिड़की की ओर बैठी थीं, सरदारजी बीच में और मैं सबसे किनारे वाली सीट पर था।
उड़ान भरने के साथ ही सरदारनी ने कुछ खाने का सामान निकाला और सरदारजी की ओर किया। सरदार जी कांपते हाथों से धीरे-धीरे खाने लगे।
फिर फ्लाइट में जब भोजन सर्व होना शुरू हुआ तो उन लोगों ने राजमा-चावल का ऑर्डर किया।

दोनों बहुत आराम से राजमा-चावल खाते रहे। मैंने पता नहीं क्यों पास्ता ऑर्डर कर दिया था। खैर, मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है कि मैं जो ऑर्डर करता हूं, मुझे लगता है कि सामने वाले ने मुझसे बेहतर ऑर्डर किया है।

अब बारी थी कोल्ड ड्रिंक की।
पीने में मैंने कोक का ऑर्डर दिया था।
अपने कैन के ढक्कन को मैंने खोला और धीरे-धीरे पीने लगा।

सरदार जी ने कोई जूस लिया था।

खाना खाने के बाद जब उन्होंने जूस की बोतल के ढक्कन को खोलना शुरू किया तो ढक्कन खुले ही नहीं।

सरदारजी कांपते हाथों से उसे खोलने की कोशिश कर रहे थे। 
मैं लगातार उनकी ओर देख रहा था। मुझे लगा कि ढक्कन खोलने में उन्हें मुश्किल आ रही है तो मैंने शिष्टाचार हेतु कहा कि लाइए... " मैं खोल देता हूं।"

सरदारजी ने मेरी ओर देखा, फिर मुस्कुराते हुए कहने लगे कि...  "बेटा ढक्कन तो मुझे ही खोलना होगा।

मैंने कुछ पूछा नहीं, लेकिन सवाल भरी निगाहों से उनकी ओर देखा।

यह देख,  सरदारजी ने आगे कहा बेटाजी, आज तो आप खोल देंगे। लेकिन अगली बार..? कौन खोलेगा.?

 इसलिए मुझे खुद खोलना आना चाहिए। सरदारनी भी सरदारजी की ओर देख रही थीं।

जूस की बोतल का ढक्कन उनसे अभी भी नहीं खुला था। पर सरदारजी लगे रहे और बहुत बार कोशिश कर के उन्होंने ढक्कन खोल ही दिया।

दोनों आराम से जूस पी रहे थे।

मुझे दिल्ली से गोवा की इस उड़ान में ज़िंदगी का एक सबक मिला।

सरदारजी ने मुझे बताया कि उन्होंने.. ये नियम बना रखा है,
कि अपना हर काम वो खुद करेंगे। घर में बच्चे हैं, भरा पूरा परिवार है।
सब साथ ही रहते हैं। पर अपनी रोज़ की ज़रूरत के लिये वे  सिर्फ सरदारनी की मदद ही लेते हैं, बाकी किसी की नहीं।
वो दोनों एक दूसरे की ज़रूरतों को समझते हैं
सरदारजी ने मुझसे कहा कि जितना संभव हो, अपना काम खुद करना चाहिए।
एक बार अगर काम करना छोड़ दूंगा, दूसरों पर निर्भर हुआ तो समझो बेटा कि बिस्तर पर ही पड़ जाऊंगा।
फिर मन हमेशा यही कहेगा कि ये काम इससे करा लूं, वो काम उससे।
फिर तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ेगा।
अभी चलने में पांव कांपते हैं, खाने में भी हाथ कांपते हैं, पर जब तक आत्मनिर्भर रह सको, रहना चाहिए।
हम गोवा जा रहे हैं, दो दिन वहीं रहेंगे।

हम महीने में एक दो बार ऐसे ही घूमने निकल जाते हैं।

बेटे-बहू कहते हैं कि अकेले मुश्किल होगी, पर उन्हें कौन समझाए कि मुश्किल तो तब होगी जब हम घूमना-फिरना बंद करके खुद को घर में कैद कर लेंगे।

पूरी ज़िंदगी खूब काम किया। अब सब बेटों को दे कर अपने लिए महीने के पैसे तय कर रखे हैं। और हम दोनों उसी में आराम से घूमते हैं।
जहां जाना होता है एजेंट टिकट बुक करा देते हैं। घर पर टैक्सी आ जाती है। वापिसी में एयरपोर्ट पर भी टैक्सी ही आ जाती है।
होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है। स्वास्थ्य, उम्रनुसार, एकदम ठीक है। कभी-कभी जूस की बोतल ही नहीं खुलती। पर थोड़ा दम लगाओ, तो वो भी खुल ही जाती है।
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मेरी तो आखेँ ही खुली की खुली रह गई।
मैंने तय किया था कि इस बार की उड़ान में लैपटॉप पर एक पूरी फिल्म देख लूंगा।पर यहां तो मैंने जीवन की फिल्म ही देख ली। एक वो  फिल्म जिसमें जीवन जीने का संदेश छिपा था।
“जब तक हो सके,
 आत्मनिर्भर रहो।”
अपना काम,
 जहाँ तक संभव हो,
स्वयम् ही करो।
......व्हाट्स एप्प से