मंगलवार, 3 जुलाई 2018

भगवान शालिग्राम कथा...


एक संत के पास बड़े सुंदर शालिग्राम भगवान् थे । वे संत उन शालिग्राम जी को हमेशा साथ ही लिए रहते थे और बड़े प्रेम से उनकी पूजा अर्चना कर लाड लड़ाया करते थे । ट्रेन से यात्रा करते समय बाबा ने शालिग्राम जी को अपने बगल की सीट पर रख दिया और अन्य संतो के साथ हरी चर्चा में मग्न हो गए । जब ट्रेन रुकी और सब संत उतरे तब वे सत्संग में इतनें मग्न हो चुके थे कि झोला गाड़ी में ही रह गया उसमें रखे  शालिग्राम जी भी वहीं गाड़ी में रह गए । संत सत्संग की मस्ती में भावों मैं ऐसा बहे कि उन्हें साथ लेकर आना ही भूल गए । बहुत देर बाद जब उस संत के आश्रम पर सब संत पहुंछे और भोजन प्रसाद पाने का समय आया तो उन प्रेमी संत ने अपने ठाकुर जी को खोजा और देखा की हाय हमारे शालिग्राम जी तो हैं ही नहीं ।

संत बहुत व्याकुल हो गए , बहुत रोने लगे परंतु भगवान् मिले नहीं । उन्होंने भगवान् के वियोग अन्न जल लेना स्वीकार नहीं किया। संत बहुत व्याकुल होकर विरह में भगवान् को पुकारकर रोने लगे ।तब उनके एक पहचान के संत ने कहा - महाराज मै आपको बहुत सुंदर चिन्हों से अंकित नये शालिग्राम जी देता हूँ परंतु उन संत ने कहा की हमें अपने वही ठाकुर चाहिए जिनको हम अब तक लाड लड़ते आये है । उनके साथी ने पूछा - आपने उन्हें कहा रखा था ? मुझे तो लगता है गाडी में ही छूट गए होंगे। 
एक संत बोले - अब कई घंटे बीत गए है । गाड़ी से किसीने निकाल लिए होंगे और फिर  गाड़ी भी बहुत आगे निकल चुकी होगी ।
 इस पर वह संत बोले- मै स्टेशन मास्टर से बात करना 
चाहता हूँ वहाँ जाकर ।
सब संत उन महात्मा को लेकर स्टेशन पहुंचे । स्टेशन मास्टर से मिले और भगवान् के गुम होने की शिकायत करने लगे । उन्होंने पूछा की कौनसी गाड़ी में आप बैठ कर आये थे । संतो ने गाड़ी का नाम स्टेशन मास्टर को बताया तो वह कहने लगा - महाराज ! कई घंटे हो गए,यही वाली गाड़ी ही तो यहां खड़ी हो गई है , और किसी प्रकार भी आगे नहीं बढ़ रही है । न कोई खराबी है न अन्य कोई दिक्कत परंतु गाड़ी आगे ही नहीं बढ़ती । महात्मा जी बोले - अभी आगे बढ़ेगी ,मेरे बिना मेरे प्यारे कही अन्यत्र कैसे चले जायेंगे ?

वे महात्मा अंदर ट्रेन के डिब्बे के अंदर गए और ठाकुर जी वही रखे हुए थे जहां महात्मा ने उन्हें पधराया था । भगवान् को महात्मा ने गले लगाया और जैसे ही महात्मा जी उतरे गाड़ी आगे बढ़ने लग गयी । ट्रेन का चालाक , स्टेशन मास्टर सभी आश्चर्य में पड गए और बाद में उन्होंने जब यह पूरी लीला सुनी तो वे गद्गद् हो गए । उन्होंने अपना जीवंत संत और भगवान की सेवा में लगा दिया ।

मंगो नही मनो, मेरे नाल सिधि गल करो
जय गुरू जी जय गुरू जी जय गुरु जी

ऐसे करूणानिधान प्रभु की जय हो 

भक्त जहाँ मम पग धरे,, तहाँ धरूँ में हाथ।
सदा संग लाग्यो फिरूँ,, कबहू न छोडूँ साथ।।

भक्ति कथा

रविवार, 1 जुलाई 2018

भोलाराम का जीव...हरिशंकर परसाई


ऐसा कभी नहीं हुआ था. धर्मराज लाखों वर्षों से असंख्य आदमियों को कर्म और सिफ़ारिश के आधार पर स्वर्ग या नरक में निवास-स्थान 'अलॉट' करते आ रहे थे. पर ऐसा कभी नहीं हुआ था.

सामने बैठे चित्रगुप्त बार-बार चश्मा पोंछ, बार-बार थूक से पन्ने पलट, रजिस्टर पर रजिस्टर देख रहे थे. गलती पकड़ में ही नहीं आ रही थी. आखिर उन्होंने खीझ कर रजिस्टर इतने जोर से बन्द किया कि मक्खी चपेट में आ गई. उसे निकालते हुए वे बोले - "महाराज, रिकार्ड सब ठीक है. भोलाराम के जीव ने पाँच दिन पहले देह त्यागी
और यमदूत के साथ इस लोक के लिए रवाना भी हुआ, पर यहाँ अभी तक नहीं पहुँचा."

धर्मराज ने पूछा - "और वह दूत कहाँ है?"

"महाराज, वह भी लापता है."

इसी समय द्वार खुले और एक यमदूत बदहवास वहाँ आया. उसका मौलिक कुरूप चेहरा परिश्रम, परेशानी और भय के कारण और भी विकृत हो गया था. उसे देखते ही चित्रगुप्त चिल्ला उठे - "अरे, तू कहाँ रहा इतने दिन? भोलाराम का जीव कहाँ है?"

यमदूत हाथ जोड़ कर बोला - "दयानिधान, मैं कैसे बतलाऊं कि क्या हो गया. आज तक मैंने धोखा नहीं खाया था, पर भोलाराम का जीव मुझे चकमा दे गया. पाँच दिन पहले जब जीव ने भोलाराम का देह त्यागा, तब मैंने उसे पकड़ा और इस लोक की यात्रा आरम्भ की. नगर के बाहर ज्यों ही मैं उसे लेकर एक तीव्र वायु-तरंग पर सवार हुआ त्यों ही
वह मेरी चंगुल से छूट कर न जाने कहाँ गायब हो गया. इन पाँच दिनों में मैंने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर उसका कहीं पता नहीं चला."

धर्मराज क्रोध से बोला - "मूर्ख ! जीवों को लाते-लाते बूढ़ा हो गया फिर भी एक मामूली बूढ़े आदमी के जीव ने तुझे चकमा दे दिया."

दूत ने सिर झुका कर कहा - "महाराज, मेरी सावधानी में बिलकुल कसर नहीं थी. मेरे इन अभ्यस्त हाथों से अच्छे-अच्छे वकील भी नहीं छूट सके. पर इस बार तो कोई इन्द्रजाल ही हो गया."

चित्रगुप्त ने कहा- "महाराज, आजकल पृथ्वी पर इस प्रकार का व्यापार बहुत चला है. लोग दोस्तों को कुछ चीज़ भेजते हैं और उसे रास्ते में ही रेलवे वाले उड़ा लेते हैं. होजरी के पार्सलों के मोजे रेलवे अफसर पहनते हैं. मालगाड़ी के डब्बे के डब्बे रास्ते में कट जाते हैं. एक बात और हो रही है. राजनैतिक दलों के नेता विरोधी नेता को उड़ाकर बन्द कर देते हैं. कहीं भोलाराम के जीव को भी तो किसी विरोधी ने मरने के बाद खराबी करने के लिए तो नहीं उड़ा दिया?"

धर्मराज ने व्यंग्य से चित्रगुप्त की ओर देखते हुए कहा - "तुम्हारी भी रिटायर होने की उमर आ गई. भला भोलाराम जैसे नगण्य, दीन आदमी से किसी को क्या लेना-देना?"

इसी समय कहीं से घूमते-घामते नारद मुनि यहाँ आ गए. धर्मराज को गुमसुम बैठे देख बोले - "क्यों धर्मराज, कैसे चिन्तित बैठे हैं? क्या नरक में निवास-स्थान की समस्या अभी हल नहीं हुई?"

धर्मराज ने कहा - "वह समस्या तो कब की हल हो गई. नरक में पिछले सालों में बड़े गुणी कारीगर आ गए हैं. कई इमारतों के ठेकेदार हैं जिन्होंने पूरे पैसे लेकर रद्दी इमारतें बनाईं. बड़े बड़े इंजीनियर भी आ गए हैं जिन्होंने ठेकेदारों से मिलकर पंचवर्षीय योजनाओं का पैसा खाया. ओवरसीयर हैं, जिन्होंने उन मजदूरों की हाजिरी भर कर पैसा हड़पा जो कभी काम पर गए ही नहीं. इन्होंने बहुत जल्दी नरक में कई इमारतें तान दी हैं. वह समस्या तो हल हो गई, पर एक बड़ी विकट उलझन आ गई है. भोलाराम नाम के एक आदमी की पाँच दिन पहले मृत्यु हुई. उसके जीव को यह दूत यहाँ ला रहा था, कि जीव इसे रास्ते में चकमा देकर भाग गया. इस ने सारा ब्रह्माण्ड छान डाला, पर वह कहीं नहीं मिला. अगर ऐसा होने लगा, तो पाप पुण्य का भेद ही मिट जाएगा."

नारद ने पूछा - "उस पर इनकमटैक्स तो बकाया नहीं था? हो सकता है, उन लोगों ने रोक लिया हो."

चित्रगुप्त ने कहा - "इनकम होती तो टैक्स होता. भुखमरा था."

नारद बोले - "मामला बड़ा दिलचस्प है. अच्छा मुझे उसका नाम पता तो बताओ. मैं पृथ्वी पर जाता हूँ."

चित्रगुप्त ने रजिस्टर देख कर बताया - "भोलाराम नाम था उसका. जबलपुर शहर में धमापुर मुहल्ले में नाले के किनारे एक डेढ़ कमरे टूटे-फूटे मकान में वह परिवार समेत रहता था. उसकी एक स्त्री थी, दो लड़के और एक लड़की. उम्र लगभग साठ साल. सरकारी नौकर था. पाँच साल पहले रिटायर हो गया था. मकान का किराया उसने एक साल से नहीं दिया, इस लिए मकान मालिक उसे निकालना चाहता था. इतने में भोलाराम ने संसार ही छोड़ दिया. आज पाँचवाँ दिन है. बहुत सम्भव है कि अगर मकान-मालिक वास्तविक मकान-मालिक
है तो उसने भोलाराम के मरते ही उसके परिवार को निकाल दिया होगा. इस लिए आप को परिवार की तलाश में काफी घूमना पड़ेगा."

मां-बेटी के सम्मिलित क्रन्दन से ही नारद भोलाराम का मकान पहचान गए.
द्वार पर जाकर उन्होंने आवाज लगाई - "नारायण! नारायण!" लड़की ने देखकर कहा- "आगे जाओ महाराज."

नारद ने कहा - "मुझे भिक्षा नहीं चाहिए, मुझे भोलाराम के बारे में कुछ पूछ-ताछ करनी है. अपनी मां को जरा बाहर भेजो, बेटी!"

भोलाराम की पत्नी बाहर आई. नारद ने कहा - "माता, भोलाराम को क्या बीमारी थी?"

"क्या बताऊँ? गरीबी की बीमारी थी. पाँच साल हो गए, पेंशन पर बैठे. पर पेंशन अभी तक नहीं मिली. हर दस-पन्द्रह दिन में एक दरख्वास्त देते थे, पर वहाँ से या तो जवाब आता ही नहीं था और आता तो यही कि तुम्हारी पेंशन के मामले में विचार हो रहा है. इन पाँच सालों में सब गहने बेच कर हम लोग खा गए. फिर बरतन बिके. अब कुछ नहीं बचा था. चिन्ता में घुलते-घुलते और भूखे मरते-मरते उन्होंने दम तोड़ दी."

नारद ने कहा - "क्या करोगी मां? उनकी इतनी ही उम्र थी."

"ऐसा तो मत कहो, महाराज ! उम्र तो बहुत थी. पचास साठ रुपया महीना पेंशन मिलती तो कुछ और काम कहीं कर के गुजारा हो जाता. पर क्या करें? पाँच साल नौकरी से बैठे हो गये और अभी तक एक कौड़ी नहीं मिली."

दुःख की कथा सुनने की फुरसत नारद को थी नहीं. वे अपने मुद्दे पर आए, "मां, यह तो बताओ कि यहाँ किसी से उन का विशेष प्रेम था, जिस में उन का जी लगा हो?"

पत्नी बोली - "लगाव तो महाराज, बाल बच्चों से ही होता है."

"नहीं, परिवार के बाहर भी हो सकता है. मेरा मतलब है, किसी स्त्री..."
स्त्री ने गुर्रा कर नारद की ओर देखा. बोली - "अब कुछ मत बको महाराज ! तुम साधु हो, उचक्के नहीं हो. जिंदगी भर उन्होंने किसी दूसरी स्त्री की ओर आँख उठाकर नहीं देखा."

नारद हँस कर बोले - "हाँ, तुम्हारा यह सोचना ठीक ही है. यही हर अच्छी गृहस्थी का आधार है. अच्छा, माता मैं चला."

स्त्री ने कहा - "महाराज, आप तो साधु हैं, सिद्ध पुरूष हैं. कुछ ऐसा नहीं कर सकते कि उन की रुकी हुई पेंशन मिल जाए. इन बच्चों का पेट कुछ दिन भर जाए."

नारद को दया आ गई थी. वे कहने लगे - "साधुओं की बात कौन मानता है? मेरा यहाँ कोई मठ तो है नहीं. फिर भी मैं सरकारी दफ्तर जाऊँगा और कोशिश करूंगा."

वहाँ से चल कर नारद सरकारी दफ़्तर पहुँचे. वहाँ पहले ही से कमरे में बैठे बाबू से उन्होंने भोलाराम के केस के बारे में बातें कीं. उस बाबू ने उन्हें ध्यानपूर्वक  देखा और बोला - "भोलाराम ने दरख्वास्तें तो भेजी थीं, पर उन पर वज़न नहीं रखा था, इसलिए कहीं उड़ गई होंगी."

नारद ने कहा - "भई, ये बहुत से 'पेपर-वेट' तो रखे हैं. इन्हें क्यों नहीं रख दिया?"

बाबू हँसा - "आप साधु हैं, आपको दुनियादारी समझ में नहीं आती. दरख्वास्तें 'पेपरवेट' से नहीं दबतीं. खैर, आप उस कमरे में बैठे बाबू से मिलिए."

नारद उस बाबू के पास गए. उस ने तीसरे के पास भेजा, तीसरे ने चौथे के पास चौथे ने पांचवे के पास. जब नारद पच्चीस-तीस बाबुओं और अफ़सरों के पास घूम आए तब एक चपरासी ने कहा - "महाराज, आप क्यों इस झंझट में पड़ गए. अगर आप साल भर भी यहाँ चक्कर लगाते रहे, तो भी काम नहीं होगा. आप तो सीधे बड़े साहब से मिलिए. उन्हें खुश कर दिया तो अभी काम हो जाएगा."

नारद बड़े साहब के कमरे में पहुँचे. बाहर चपरासी ऊँघ रहा था. इसलिए उन्हें किसी ने छेड़ा नहीं. बिना 'विजिटिंग कार्ड' के आया देख साहब बड़े नाराज हुए. बोले - "इसे कोई मन्दिर वन्दिर समझ लिया है क्या? धड़धड़ाते चले आए! चिट क्यों नहीं भेजी?"

नारद ने कहा - "कैसे भेजता? चपरासी सो रहा है."

"क्या काम है?" साहब ने रौब से पूछा.

नारद ने भोलाराम का पेंशन केस बतलाया.

साहब बोले- "आप हैं बैरागी. दफ़्तरों के रीति-रिवाज नहीं जानते. असल में भोलाराम ने गलती की. भई, यह भी एक मन्दिर है. यहाँ भी दान पुण्य करना पड़ता है. आप भोलाराम के आत्मीय मालूम होते हैं. भोलाराम की दरख्वास्तें उड़ रही हैं. उन पर वज़न रखिए."

नारद ने सोचा कि फिर यहाँ वज़न की समस्या खड़ी हो गई. साहब 
बोले - "भई, सरकारी पैसे का मामला है. पेंशन का केस बीसों दफ्तरों में जाता है. देर लग ही जाती है.
बीसों बार एक ही बात को बीस जगह लिखना पड़ता है, तब पक्की होती है. जितनी पेंशन मिलती है उतने की स्टेशनरी लग जाती है. हाँ, जल्दी भी हो सकती है मगर..." साहब रुके.

नारद ने कहा - "मगर क्या?"

साहब ने कुटिल मुसकान के साथ कहा, "मगर वज़न चाहिए. आप समझे नहीं. जैसे आपकी यह सुन्दर वीणा है, इसका भी वज़न भोलाराम की दरख्वास्त पर रखा जा सकता है. मेरी लड़की गाना बजाना सीखती है. यह मैं उसे दे दूंगा. साधु-सन्तों की वीणा से तो और अच्छे स्वर निकलते हैं."

नारद अपनी वीणा छिनते देख जरा घबराए. पर फिर संभल कर उन्होंने वीणा टेबिल पर रख कर कहा - "यह लीजिए. अब जरा जल्दी उसकी पेंशन ऑर्डर निकाल दीजिए."

साहब ने प्रसन्न्ता से उन्हें कुर्सी दी, वीणा को एक कोने में रखा और घण्टी बजाई. चपरासी हाजिर हुआ.

साहब ने हुक्म दिया - बड़े बाबू से भोलाराम के केस की फ़ाइल लाओ.

थोड़ी देर बाद चपरासी भोलाराम की सौ-डेढ़-सौ दरख्वास्तों से भरी फ़ाइल ले कर आया. उसमें पेंशन के कागजात भी थे. साहब ने फ़ाइल पर नाम देखा और निश्चित करने के
लिए पूछा - "क्या नाम बताया साधु जी आपने?"

नारद समझे कि साहब कुछ ऊँचा सुनता है. इसलिए जोर से बोले - "भोलाराम!"
सहसा फ़ाइल में से आवाज आई - "कौन पुकार रहा है मुझे. पोस्टमैन है? क्या पेंशन का ऑर्डर आ गया?"
नारद चौंके. पर दूसरे ही क्षण बात समझ गए. बोले - "भोलाराम ! तुम क्या भोलाराम के जीव हो?"
"हाँ ! आवाज आई."
नारद ने कहा - "मैं नारद हूँ. तुम्हें लेने आया हूँ. चलो स्वर्ग में तुम्हारा इंतजार हो रहा है."
आवाज आई - "मुझे नहीं जाना. मैं तो पेंशन की दरख्वास्तों पर 
अटका हूँ. यहीं मेरा मन लगा है. मैं अपनी दरख्वास्तें छोड़कर नहीं 
जा सकता."

-हरिशंकर परसाई 

रविवार, 3 जून 2018

अमीर व्यक्ति से भी अमीर

किसी समय दुनिया के सबसे धनवान व्यक्ति बिल गेट्स से किसी न पूछा - 'क्या इस धरती पर आपसे भी अमीर कोई है ?
बिल गेट्स ने जवाब दिया - हां, एक व्यक्ति इस दुनिया में मुझसे भी अमीर है.
कौन ---!!!!!

बिल गेट्स ने बताया -

एक समय में जब मेरी प्रसिद्धि और अमीरी के दिन नहीं थे, न्यूयॉर्क एयरपोर्ट पर था.. वहां सुबह सुबह अखबार देख कर, मैंने एक अखबार खरीदना चाहा,पर मेरे पास खुदरा पैसे नहीं थे.. सो, मैंने अखबार लेने का विचार त्याग कर उसे वापस रख दिया.. अखबार बेचने वाले काले लड़के ने मुझे देखा, तो मैंने खुदरा पैसे/सिक्के न होने की बात कही.. लड़के ने अखबार देते हुए कहा - यह मैं आपको मुफ्त में देता हूँ.. बात आई-गई हो गई.. कोई तीन माह बाद संयोगवश उसी एयरपोर्ट पर मैं फिर उतरा और अखबार के लिए फिर मेरे पास सिक्के नहीं थे. उस लड़के ने मुझे फिर से अखबार दिया, तो मैंने मना कर दिया. मैं ये नहीं ले सकता.. उस लड़के ने कहा, आप इसे ले सकते हैं,मैं इसे अपने प्रॉफिट के हिस्से से दे रहा हूँ.. मुझे नुकसान नहीं होगा. मैंने अखबार ले लिया......

19 साल बाद अपने प्रसिद्ध हो जाने के बाद एक दिन मुझे उस लड़के की याद आयी और मैन उसे ढूंढना शुरू किया. कोई डेढ़ महीने खोजने के बाद आखिरकार वह मिल गया.

मैंने पूछा - क्या तुम मुझे पहचानते हो ?
लड़का - हां, आप मि. बिल गेट्स हैं.
गेट्स - तुम्हे याद है, कभी तुमने मुझे फ्री में अखबार दिए थे ?
लड़का - जी हां, बिल्कुल.. ऐसा दो बार हुआ था..
गेट्स- मैं तुम्हारे उस किये हुए की कीमत अदा करना चाहता हूँ.. तुम अपनी जिंदगी में जो कुछ चाहते हो, बताओ, मैं तुम्हारी हर जरूरत पूरी करूंगा..
लड़का - सर, लेकिन क्या आप को नहीं लगता कि, ऐसा कर के आप मेरे काम की कीमत अदा नहीं कर पाएंगे..
गेट्स - क्यूं ..!!!
लड़का - मैंने जब आपकी मदद की थी, मैं एक गरीब लड़का था, जो अखबार बेचता था..
आप मेरी मदद तब कर रहे हैं, जब आप इस दुनिया के सबसे अमीर और सामर्थ्य वाले व्यक्ति हैं.. फिर, आप मेरी मदद की बराबरी कैसे करेंगे...!!!

बिल गेट्स की नजर में, वह व्यक्ति दुनिया के सबसे 
अमीर व्यक्ति से भी अमीर था, 
क्योंकि-----
"किसी की मदद करने के लिए, उसने अमीर होने 
का इंतजार नहीं किया था "....

रविवार, 20 मई 2018

दर्द...अति लघु कथा (अलक)....व्हाट्'अप


शाम से ही सीमा के सीने में बायीं तरफ़ हल्का दर्द था। पर इतने दर्द को तो औरतें चाय में ही घोलकर पी जाती हैं। सीमा ने भी यही सोचा कि शायद कोई झटका आया होगा और रात के खाने की तैयारी में लग गई।किचन निपटाकर सोने को आई तो विवेक को बताया। विवेक ने दर्द की दवा लेकर आराम करने को कहा।साथ ही ज़्यादा काम करने की बात बोलकर मीठी डाँट भी लगाई।
  
देर रात को अचानक सीमा का दर्द बढ़ गया था। सॉंस लेने में भी उसे तकलीफ़ सी होने लगी थी। “कहीं ये हार्ट अटैक तो नहीं ! ”ये विचार मन में आते ही वो पसीने से भर उठी।

       “हे भगवान! पालक-मेथी तो साफ़ ही नहीं किए,मटर भी छिलने बाक़ी थे।ऊपर से फ़्रीज़ में मलाई का भगोना भी पूरा भरा रखा हुआ है,आज मक्खन निकाल लेना चाहिए था। अगर मर गई तो लोग कहेंगे कि कितना गंदा फ़्रीज़ कर रखा था। कपड़े भी प्रेस को नहीं डाले।चावल भी ख़त्म हो रहे हैं, आज बाज़ार जाकर राशन भर लेना चाहिए था। 
मेरे जाने के बाद जो लोग बारह दिनों तक यहाँ रहेंगे, उनके पास तो मेरे मिस-मैनेजमेंट के कितने सारे क़िस्से होंगे।”

      अब सीमा सीने का दर्द भूलकर काल्पनिक अपमान के दर्द को महसूस करने लगी। “नहीं भगवान! प्लीज़ आज मत मारना। आज ना तो मैं प्रिपेयर हूँ और ना ही मेरा घर।” यही प्रार्थना करते-करते सीमा गहरी नींद में सो गई
-व्हाट्'अप

शनिवार, 19 मई 2018

कम्प्यूटर में वायरस..रहस्य कथा....पुष्पेन्द्र द्विवेदी

लोनावला का एक सूनसान बंगला जिसमे शायद ही कोई रहता हो,
अरसे गुज़र गए इस बंगले के इर्द गिर्द कोई परिंदा भी भटका हो , वैसे ये बंगला एक बहुत बड़े फिल्म प्रोड्यूसर मिस्टर केशवदास मूलचंदानी का है , जो की ९० के दशक के मशहूर प्रोड्यूसर हुआ करते थे , 
अब वो इस दुनिया में नहीं रहे ,

उनका एक बेटा है रोहित जो लंदन में पढ़ लिख कर सेटल हो गया है , इस बंगले की देखभाल करने वाला अब कोई नहीं है, सारी प्रॉपर्टी मिस्टर मूलचंदानी के मैनेजर देखते हैं , इस बंगले के रखरखाव के लिए एक नौकर और एक वॉचमैन रख छोड़ा है ।

रोहित अपनी गर्लफ्रेंड के साथ इंडिया आता है घूमने के लिए , 
वो मैनेजर के साथ प्रॉपर्टी का मुआयना करता है , तब उसे पता 
चलता है उसका एक बंगला लोनावला में भी है ,वो उस बंगले में 
अपनी छुट्टियां बिताने का प्लान बनाता और दूसरे दिन सुबह 
लोनावला पहुंच जाता , बांग्ला सजा हुआ है नौकर ने बंगले 
को अच्छी तरह से साफ़ सुथरा कर रखा था ,
वो बंगले का मुआयना करता है , बंगले में एक कमरा है जिसमें एक पुराना कंप्यूटर रखा हुआ था , रोहित ने नौकर को बोला ये कंप्यूटर यहां क्यों रखा है , नौकर जवाब देता है साहेब ये कमरा आपके आने पर ही खुला है , इसके अन्दर जाने को किसी को इजाज़त नहीं थी , खैर, रोहित इस बात को नज़र अंदाज़ करता हुआ आगे बढ़ जाता है , रात होती है डिनर के बाद रोहित अपने लैपटॉप पर अपना काम करता है , वो थका हुआ रहता है काम की फाइल को डेस्कटॉप 
पर ही सेव करके सो जाता है ।

सुबह जब वो सो कर उठता है बेड टी पीते हुए लैपटॉप ऑन करता है , सेव की हुई फाइल खोलता है उसमे काम की जगह कुछ पोएट्री लिखी हुयी मिलती है , वो अपनी गर्लफ्रेंड से बोलता है नीस पोएट्री 
तुमने कब से पोएट्री लिखनी शुरु कर दी

मुझे अब तक बताया क्यों नहीं , गर्लफ्रेंड बोलती है क्या बकवास कर रहे हो मुझे पोएट्री में कोई इंटरेस्ट नहीं है , तब रोहित को लगता है 
हो सकता है , कल रात थकान ज़्यादा थी दो पैग व्हिस्की के मार भी लिया था , हो सकता है फाइल किसी और फोल्डर में सेव कर दिया 
हो , खैर इस बात को नज़र अंदाज़ कर देता है, और अपनी गर्लफ्रेंड के साथ बाहर घूमने निकल जाता है, फिर रात होती है वो आज डिनर बाहर से कर के लौटा है , वो सीढ़ियां चढ़ता हुआ सीधा अपने रूम में जाता है , उसकी गर्लफ्रेंड थक कर सो जाती है, 
वो आज फिर लैपटॉप पर काम करता है ।

तुम्हारे लैपटॉप में वायरस आ गया होगा एक बार स्केन कर लो रोहित लैपटॉप स्केन करता है ,वायरस नॉट फाउंड बताता है
अब रोहित की शंका बढ़ जाती है ,कि आखिर लैपटॉप में पोएट्री और रात में प्यानो आखिर कौन बजाता है, वो बंगले के
नौकर से पूछ ताछ-करता है मगर वो भी कोई संतोषजनक जवाब रोहित को नहीं दे पाते हैं , रोहित बंगले के हर एक
कमरे में सी सी टी वी कैमरा लगवा देता है , और अगले दिन का इंतज़ार करता है , सी सी टी वी फुटेज जब वह देखता है तो भौचक्का रह जाता है , ग्राउंड फ्लोर के हाल में रखा प्यानो रात १२ के बाद कोई स्केलटन बजा रहा था, और जिस कमरे में पुराना कम्प्यूटर रखा था वो पुराना कम्प्यूटर अपने आप चालू हो गया, और एक 
स्केलटन का पंजा उस कम्प्यूटर के की बोर्ड पर कुछ टाइप कर
  
रहा था, रोहित हैरान था की आखिर ये सब क्या हो रहा है , 
वो फ़ौरन उस रूम में जाता है जहां पुराना कम्प्यूटर रखा हुआ था , 
वो उस पुराने कम्प्यूटर को चालू करता है , किसी तरह वो उस पुराने
कम्प्यूटर को चालू करता है , मगर उस कम्प्यूटर से उसे ऐसा कुछ नहीं लगता की उसका कनेक्शन किसी भूत प्रेत के साथ हो , 
वो निराश होता है ।

वो कम्प्यूटर की हर एक ड्राइव का हर एक फोल्डर और फाइल चेक कर डालता है, की कहीं कोई सुराग मिल जाए , मगर ऐसा कुछ होता नहीं है , अब रोहित खुद उस कम्प्यूटर की रात भर निगरानी करने का फैसला लेता हैं , रात भर वो अकेला उस कमरे में कम्प्यूटर के पास बैठता है, जैसे ही रात के १२ बजते हैं कम्प्यूटर अपने आप 
चालू हो जाता है ,

कम्प्यूटर की स्क्रीन पर टाइप होता है हाय रोहित ,तुम मुझे नहीं जानते मगर मैं तुम्हे जानता हूँ , मैं अरविन्द मजूमदार तुम्हारे पिता जी की फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिखता था, बात उन दिनों की है जब हम एक पोलिटिकल इशु पर फिल्म बना रहे थे , मैं यही इसी बंगले में उस समय नौकरों के साथ अकेला यहीं राइटिंग करता था, हम जिस फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे थे वो ख़त्म होने वाली ही थी उस फिल्म में उस समय के बहुत बड़े नेता के भ्रष्टाचार का
भंडाफोड़ होने वाला था, मुझ पर और केशवदास मूलचंदानी जी पर काफी प्रेशर था की मुँह मांगी कीमत लो और फिल्म
का काम रोक दो , मगर न प्रोडूसर साहेब रुके न मैं माना, आखिर कार एक रात मुझे और मेरे साथ के नौकर का इसी
बंगले में क़त्ल कर दिया , और स्क्रिप्ट की फाइल को कम्प्यूटर में से उड़ा दिया गया , मूलचंदानी जी ने पुलिस कंप्लेंट की सी बी आई 
जांच हुई , मगर मामला लीप पोत दिया गया, फिल्म बीच में ही रोकनी पड़ी , और तब से मेरी आत्मा इस बंगले में भटक रही है , रात काफी हो जाती है और रोहित वहीँ कुर्सी पर बैठा बैठा ही सो जाता है , सुबह जब उसकी नींद खुलती है उसे सब सपना सा लगता है ।

वो अब निश्चय कर चुका था की वो इस नेता की घिनौनी करतूत को जनता के सामने लेकर दम लेगा , और अरविन्द
मजूमदार जी की भटकती आत्मा को इन्साफ दिलाकर ही दम लेगा , रोहित को ये बात पता थी उसकी इस बात पर न
कानून न न्यायालय न भांड मीडिया कोई भरोसा नहीं करेगा , 
उसने नेट का सहारा लिया और सभी सोशल साइट्स पर
इस घटना का लाइव शो दिखाया , और आखिर कार सबको यकीन मानना पड़ा केस री-ओपन हुआ सबूत जुटाए गए नेता
जी की तो खैर उम्र हो चुकी थी , फिर भी उनकी करतूत का खामियाजा पार्टी और उनके आल-औलाद को भुगतना पड़ा ।

रविवार, 13 मई 2018

सत्रह हाथी...विजय विक्रान्त

सेठ घनश्याम दास बहुत बड़ी हवेली में रहता था। उसके तीन लड़के थे। पैसा, नौकर, चाकर, घोड़ा गाड़ी तो थी ही, मगर उसे अपने ख़ज़ाने में सबसे अधिक प्यार अपने 17 हाथियों से था। हाथियों की देखरेख में कोई कसर न रह जाए, इस बात का उसे बहुत ख़्याल था। उसे सदा यही फ़िक्र रहता था कि उसके मरने के बाद उसके हाथियों का क्या होगा। समय ऐसे ही बीतता चला गया और सेठ को महसूस हुआ कि उसका अंतिम समय अब अधिक दूर नहीं है।

उसने अपने तीनों बेटों को अपने पास बुलाया और कहा कि मेरा समय आ गया है। मेरे मरने के बाद मेरी सारी जायदाद को मेरी वसीयत के हिसाब से आपस में बाँट लेना। एक बात का ख़ास ख़्याल रखना कि मेरे हाथियों को किसी भी किस्म की कोई भी हानि न हो।

कुछ दिन बाद सेठ स्वर्ग सिधार गया। तीनों लड़कों ने जायदाद का बंटवारा पिता की इच्छा अनुसार किया, मगर हाथियों को लेकर सब परेशान हो गए। कारण था कि सेठ ने हाथियों के बंटवारे में पहले लड़के को आधा, दूसरे को एक तिहाई और तीसरे को नौवाँ हिस्सा दिया था। 17 हाथियों को इस तरह बाँटना एकदम असम्भव लगा। हताश होकर तीनों लड़के 17 हाथियों को लेकर अपने बाग में चले गए और सोचने लगे कि इस विकट समस्या का कैसे समाधान हो।

तभी तीनों ने देखा कि एक साधू अपने हाथी पर सवार, उनकी ही ओर आ रहा है। साधू के पास आने पर लड़कों ने प्रणाम किया और अपनी सारी कहानी सुनाई। साधू ने कहा कि अरे इस में परेशान होने की क्या बात है। लो मैं तुम्हें अपना हाथी दे देता हूँ। सुनकर तीनों लड़के बहुत खुश हुए। अब सामने 18 हाथी खड़े थे। साधू ने पहले लड़के को बुलाया और कहा कि तुम अपने पिता की इच्छा अनुसार आधे यानि नौ हाथी ले जाओ। दूसरे लड़के को बुलाकर उसने एक तिहाई यानि छ: हाथी दे दिए। छोटे लड़के को उसने बुलाकर कहा कि तुम भी अपना नौंवाँ हिस्सा यानि दो हाथी ले जाओ। नौ जमा छ: जमा दो मिलाकर 17 हाथी हो गए और एक हाथी फिर भी बचा गया। लड़कों की समझ में यह गणित बिलकुल नहीं आया और तीनों साधू महाराज की ओर देखते ही रहे। उन सब को इस हालत में देखकर साधू महाराज मुस्काए और आशीर्वाद देकर तीनों से विदा ले, अपने हाथी पर जिस दिशा से आए थे, उसी दिशा में चले गए। इधर यह तीनों सोच रहे थे कि साधू महाराज ने अपना हाथी देकर कितनी सरलता और भोलेपन से एक जटिल समस्या को सुलझा दिया।
-विजय विक्रान्त

रविवार, 6 मई 2018

रविवार की छुट्टी का काला सच

रविवार की छुट्टी का काला सच जिसे कोई नही जानता

हम सबको को सप्ताह में रविवार की छुट्टी का इंतजार रहता है 
लेकिन इस छुट्टी का इतिहास कोई नही जानता है। हम सब जानते हैं की हमे आजादी के लिए कितना संघर्ष करना पड़ा था।उसी प्रकार हमें रविवार की छुट्टी के लिए भी संघर्ष करना पड़ा था। जब भारत में 
अंग्रेजो का शासन था तो भारत के मजदूरों और कर्मचारियों को सप्ताह के सातों दिन कार्य करना पड़ता था।

तब यह सब देखकर मजदूरों के नेता श्री नारायण मेघा जी लोखंडे ने सप्ताह में एक दिन की छुट्टी का प्रस्ताव अंग्रेजो के सामने रखा था।उन्होंने ब्रिटिश सरकार से कहा कि हमारे मजदुरों और कर्मचारियों को सप्ताह में एक दिन की मिलना चाहिए जिससे वह एक दिन का समय आराम से उनके परिवार और मित्रों के साथ बिता सके।

इन सब के साथ श्री नारायण ने रविवार का दिन चुना क्योकि रविवार के दिन अंग्रेज चर्च जाते थे और यह हिन्दू मान्यताओं के अनुसार भगवान खण्डोभ का दिन था।लेकिन अंग्रेजों ने उनके इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया था।इसके बाद आठ सालों तक संघर्ष चला जिसके बाद अंग्रेजों ने रविवार की छुट्टी देने की घोषणा की थी।