रविवार, 21 जनवरी 2018

इज़्ज़त....अनन्त आलोक


          नशे में धुत लड़खड़ाते मित्र को सहारा देकर घर छोड़ने आये सुनील ने याद दिलाया, "देखो जगपाल तुम्हें कितनी बार समझाया है, सराब पीना अच्छी आदत नहीं है इससे न केवल तुम्हारा स्वास्थ्य बिगड़ रहा है अपितु रिश्तेदारों, सगे संबंधियों और समाज में भी बदनामी हो रही है।"

                        "बदनामी! कैसी बदनामी अरे तुम क्या जानो समाज में हमारी कितनी इज़्ज़त होती है। लोग स्पेशल कमरे में बिठाते हैं, दारू, सलाद, नमकीन और अन्य ज़रूरी सामान इज़्ज़त के साथ वहीं छोड़ कर जाते हैं और हाँ खाना भी वहीं टेबल पर आता है शान से। तुम पीते नहीं हो न तुम क्या जानो कितनी इज़्ज़त करते हैं लोग। अरे तुम्हें तो कोई यह भी नहीं पूछता होगा कि खाना भी खाया है या नहीं," जगपाल ने लड़खडाती जुबान से जवाब दिया।

                           "तुम्हारी बात सोलह आने सच है, खाने पीने वालों का मेज़बान पूरा पूरा ध्यान रखते हैं, इतना ही नहीं गंदी नाली में गिरने पर उठाया भी जाता है। और लड़खड़ाने पर घर तक भी छोड़ा जाता है, जैसे मैं तुम्हें छोड़ने आया हूँ, लेकिन मित्र यह इज़्ज़त नहीं सहानुभूति है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक मरीज़ के प्रति रखी जाती है, जिस प्रकार एक बीमार व्यक्ति की सुख सुविधा का ध्यान रखा जाता है। और रही बात खाने के लिए पूछने की तो वह इसलिए पूछा जाता क्योंकि नशा न करने वाला व्यक्ति अपना ध्यान स्वयं रख सकता है, उसे कब क्या चाहिए वह माँग लेता है," सुनील ने उतर दिया। सुनील का जवाब सुन जयपाल उसे देखता ही रह गया।
..............अनन्त आलोक

मंगलवार, 16 जनवरी 2018

संतोषी सदा सुखी.....निधि सिंघल


              एक बार की बात है। एक गाँव में एक महान संत रहते थे। वे अपना स्वयं का आश्रम बनाना चाहते थे जिसके लिए वे कई लोगो से मुलाकात करते थे। और उन्हें एक जगह से दूसरी जगह यात्रा के लिए जाना पड़ता था। इसी यात्रा के दौरान एक दिन उनकी मुलाकात एक साधारण सी कन्या विदुषी से हुई। विदुषी ने उनका बड़े हर्ष से स्वागत किया और संत से कुछ समय कुटिया में रुक कर विश्राम करने की याचना की। संत उसके व्यवहार से प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका आग्रह स्वीकार किया।

         विदुषी ने संत को अपने हाथो से स्वादिष्ट भोज कराया। और उनके विश्राम के लिए खटिया पर एक दरी बिछा दी। और खुद धरती पर टाट बिछा कर सो गई। विदुषी को सोते ही नींद आ गई। उसके चेहरे के भाव से पता चल रहा था कि विदुषी चैन की सुखद नींद ले रही हैं। उधर संत को खटिया पर नींद नहीं आ रही थी। उन्हें मोटे नरम गद्दे की आदत थी जो उन्हें दान में मिला था। वो रात भर चैन की नींद नहीं सो सके और विदुषी के बारे में ही सोचते रहे सोच रहे थे कि वो कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो सकती हैं।

         दूसरे दिन सवेरा होते ही संत ने विदुषी से पूछा कि – तुम कैसे इस कठोर जमीन पर इतने चैन से सो रही थी। तब विदुषी ने बड़ी ही सरलता से उत्तर दिया – हे गुरु देव! मेरे लिए मेरी ये छोटी सी कुटिया एक महल के समान ही भव्य हैं| इसमें मेरे श्रम की महक हैं। अगर मुझे एक समय भी भोजन मिलता हैं तो मैं खुद को भाग्यशाली मानती हूँ। जब दिन भर के कार्यों के बाद मैं इस धरा पर सोती हूँ तो मुझे माँ की गोद का आत्मीय अहसास होता हैं। मैं दिन भर के अपने सत्कर्मो का विचार करते हुए चैन की नींद सो जाती हूँ। मुझे अहसास भी नहीं होता कि मैं इस कठोर धरा पर हूँ।

             यह सब सुनकर संत जाने लगे। तब विदुषी ने पूछा – हे गुरुवर! क्या मैं भी आपके साथ आश्रम के लिए धन एकत्र करने चल सकती हूँ ? तब संत ने विनम्रता से उत्तर दिया – बालिका! तुमने जो मुझे आज ज्ञान दिया हैं उससे मुझे पता चला कि मन का सच्चा का सुख कहाँ हैं। अब मुझे किसी आश्रम की इच्छा नहीं रह गई।

             यह कहकर संत वापस अपने गाँव लौट गये और एकत्र किया धन उन्होंने गरीबो में बाँट दिया और स्वयं एक कुटिया बनाकर रहने लगे।

        जिसके मन में संतोष नहीं है सब्र नहीं हैं वह लाखों करोड़ों की दौलत होते हुए भी खुश नहीं रह सकता। बड़े बड़े महलों, बंगलों में मखमल के गद्दों पर भी उसे चैन की नींद नहीं आ सकती। उसे हमेशा और ज्यादा पाने का मोह लगा रहता है। इसके विपरीत जो अपने पास जितना है उसी में संतुष्ट है, जिसे और ज्यादा पाने का मोह नहीं है वह कम संसाधनों में भी ख़ुशी से रह सकता है।
-निधि सिंघल

रविवार, 7 जनवरी 2018

अहसास....मनोज चौहान

                   सुधीर की पत्नी मालती की डिलीवरी हुए आज पाँच दिन हो गए थे। उसने एक बच्ची को जन्म दिया था और वह शहर के सिविल हॉस्पिटल में एडमिट थी। सुधीर और उसके घर वालों ने बहुत आस लगा रखी थी कि उनके यहाँ लड़का ही पैदा होगा। सुधीर की माँ मालती का गर्भ ठहरने के बाद अब तक कितनी सेवा और देखभाल करती आई थी। मगर नियति के आगे किसका वश चलता है। आखिर लड़की पैदा हुयी और उनके खिले हुए चेहरे मायूस हो गए। सुधीर तो इतना निराश हो गया था कि डिलीवरी के दिन के बाद, वो दोबारा कभी अपनी पत्नी और बच्ची से मिलने हॉस्पिटल नहीं गया था।

                   सुधीर आई.पी.एच. विभाग में सहायक अभियन्ता के पद पर कार्यरत था। उस रोज़ वह दफ़्तर में बैठा था। उसके ऑफ़िस में काम करने वाला चपरासी रामदीन छुट्टी की अर्जी लेकर आया। कारण पढ़ा तो देखा की पत्नी बीमार है और देखभाल करने वाला कोई नहीं है। डॉक्टरों ने भी जवाब दे दिया था। इसीलिए रामदीन 15 दिन की छुट्टी ले रहा था। सुधीर ने पूछा कि तुम्हारा बेटा और बहू तुम्हारी पत्नी की देखभाल नहीं करते। यह सुनकर रामदीन ख़ुद को रोक ना सका और फफक- फफक कर रोने लग गया। सुधीर ने उसकी दुखती रग पर हाथ रख दिया था। उसकी आँखों से निकलने वाली अश्रुधारा ने सुधीर को एक पल के लिए विचलित कर दिया।

                     रामदीन बोला, "साहब,अपने जीवन की सारी जमा पूँजी मैंने बेटे की पढ़ाई पर ख़र्च कर दी।" सोचा था कि पढ़–लिख कर कुछ बन जाएगा तो बुढ़ापे की लाठी बनेगा। मगर शादी के छः महीने बाद ही वह अलग रहता है। उसे तो यह भी नहीं मालूम की हम लोग ज़िन्दा हैं या मर गए। ऐसा तो कोई बेगाना भी नहीं करता, साहब। काश! मेरी लड़की पैदा हुई होती तो आज हमारे बुढ़ापे का सहारा तो बनती।" इतना कहकर रामदीन चला गया। सुधीर ने उसकी अर्जी तो मंजूर कर ली मगर उसके ये शब्द कि "काश! मेरी लड़की पैदा हुई होती," उसे अन्दर तक झकझोरते चले गए। एक वो था जो लड़की के पैदा होने पर ख़ुश नहीं था और दूसरी ओर रामदीन लड़की के ना होने पर पछता रहा था।

                           सुधीर सारा दिन इसी कशमकश में रहा। कब पाँच बज गए उसे पता ही नहीं चला। छुट्टी होते ही वह ऑफ़िस से बाहर निकला और उसके क़दम अपनेआप ही सिविल हॉस्पिटल की तरफ बढ़ने लगे।

                    "मैटरनिटी वार्ड" में दाख़िल होते ही उसने अपनी पाँच दिन की नन्ही बच्ची को प्यार से पुचकारना और सहलाना शुरू कर दिया। मालती सुधीर में आये इस अचानक परिवर्तन से हैरान थी। अपनी बच्ची के लिए सुधीर के दिल में प्यार उमड़ आया था। वह आत्ममंथित हो चुका था और उसे अहसास हो गया था की एक लड़की जो माँ-बाप के लिए कर सकती है, एक लड़का वो कभी नहीं कर सकता। उसे रामदीन के वो शब्द अब भी याद आ रहे थे कि काश! मेरी लड़की ......l
.................मनोज चौहान

रविवार, 31 दिसंबर 2017

दही का इन्तजाम


गुप्ता जी जब लगभग पैंतालीस वर्ष के थे तब उनकी पत्नी का स्वर्गवास हो गया था। लोगों ने दूसरी शादी की सलाह दी परन्तु गुप्ता जी ने यह कहकर मना कर दिया कि पुत्र के रूप में पत्नी की दी हुई भेंट मेरे पास हैं, इसी के साथ पूरी जिन्दगी अच्छे से कट जाएगी।

पुत्र जब वयस्क हुआ तो गुप्ता जी ने पूरा कारोबार पुत्र के हवाले कर दिया। स्वयं कभी मंदिर और आॅफिस में बैठकर समय व्यतीत करने लगे। 

पुत्र की शादी के बाद गुप्ता जी और अधिक निश्चित हो गये। पूरा घर बहू को सुपुर्द कर दिया।

पुत्र की शादी के लगभग एक वर्ष बाद दुपहरी में गुप्ता जी खाना खा रहे थे, पुत्र भी ऑफिस से आ गया था और हाथ–मुँह धोकर खाना खाने की तैयारी कर रहा था। 

उसने सुना कि पिता जी ने बहू से खाने के साथ दही माँगा और बहू ने जवाब दिया कि आज घर में दही उपलब्ध नहीं है। खाना खाकर पिताजी ऑफिस चले गये। 

पुत्र अपनी पत्नी के साथ खाना खाने बैठा। खाने में प्याला भरा हुआ दही भी था। पुत्र ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी और खाना खाकर स्वयं भी ऑफिस चला गया।

लगभग दस दिन बाद पुत्र ने गुप्ता जी से कहा- ‘‘ पापा आज आपको कोर्ट चलना है,आज आपका विवाह होने जा रहा है।’’ 

पिता ने आश्चर्य से पुत्र की तरफ देखा और कहा-‘‘बेटा मुझे पत्नी की आवश्यकता नही है और मैं तुझे इतना स्नेह देता हूँ कि शायद तुझे भी माँ की जरूरत नहीं है, फिर दूसरा विवाह क्यों?’’

पुत्र ने कहा ‘‘ पिता जी, न तो मै अपने लिए माँ ला रहा हूँ न आपके लिए पत्नी,
मैं तो केवल आपके लिये दही का इन्तजाम कर रहा हूँ। 

कल से मै किराए के मकान मे आपकी बहू के साथ रहूँगा तथा ऑफिस मे एक कर्मचारी की तरह वेतन लूँगा ताकि आपकी बहू को दही की कीमत का पता चले।’’
संकलित....पर महत्वपूर्ण...

रविवार, 17 दिसंबर 2017

आजादी.....मीना पाण्डेय

पहली रोटी मैंने अभी तवे पर डाली ही थी।

‘माँ, मैं कैसी लग रही हूँ ?‘ रोहिणी ने आते ही पूछा।  मैं कुछ कहती इससे पहले उसका फोन बजने लगा। वह जल्दी से बालकनी की तरफ चली गयी बात करने। पर आधे मिनट बाद ही लौट भी आई, थोड़े उखड़े मूड में।

‘ मां, ये आदमी भी कितना अजीब है न ? ‘

‘ कौन? ‘

‘अरे वही जो पीछे वाले फ्लैट में रहता है। ‘

‘क्यों क्या हुआ ? ‘

‘ मैं फोन पर बात कर रही थी बालकनी में,और देखो सिर्फ गंजी और चड्डे में आ कर वह अपनी बालकनी में खड़ा हो गया सामने। बदतमीज!! इतना भी नहीं पता की लड़कियों और औरतों के सामने कैसे कपड़े पहन कर आते हैं। ‘

‘ बात तो तुम्हारी सही है,उसे बाहर वालों के सामने ढंग के कपड़े पहनने चाहिए।’

‘बिलकुल, और नहीं तो क्‍या ! ‘

‘ लेकिन इसका एक और पहलू भी है। ‘

‘वो क्या माँ ? ‘

‘ उसे या किसी को भी पूरा हक़ है अपने घर में अपने तरीके से कपड़े पहनने और रहने का। और घर ही क्यों, बाहर भी। नहीं क्या ? ‘

‘हाँ माँ ,पर…..।  ‘

‘ पर क्या ? ये आजादी तो तुम भी चाहती हो न। ‘

बात तो सही थी, यह आजादी तो वह भी चाहती थी। पर क्‍या सचमुच यह आजादी का मामला है…?  रोहिणी सोच रही थी।


-मीना पाण्डेय

रविवार, 10 दिसंबर 2017

इज़्ज़त का सवाल....गोवर्धन यादव


                              शादी से पूर्व सरला ने अपना निर्णय कह सुनाया था कि अभी वह और आगे पढ़ना चाहती है। जब उसके होने वाले भावी पति ने अपनी सहमती जतलाते हुए उससे वादा किया था कि शादी के बाद वह आगे पढ़ सकती है और समय आने पर कोई अच्छी सी नौकरी भी कर सकती है। इसी आश्वासन के बाद वह शादी करने के लिए राज़ी हो पायी थी।

                  ससुराल में रहते हुए वह घर के सारे काम निपटाती और समय बचाकर अपनी पढ़ाई में जुट जाती। बीए तो वह पहले ही कर चुकी थी। उसने अब एम.ए. करने के फ़ार्म आदि भर दिए थे। एक समय आया कि उसने पूरे संभाग में प्रथम स्थान बनाया था। घर का हर सदस्य उसकी तारीफ़ करते नहीं अघाता था।

                   एम.ए. में प्रथम स्थान बना चुकने के बाद उसने पी.एस.सी. की परीक्षाएँ देने का मानस बनाया। कड़ी मेहनत और लगन ने वह सब कर दिखाया जिसकी उसने कभी कल्पना की थी। उसे तो अब पूरा विश्वास हो चला था कि यदि वह यू.पी.पी.एस.सी. की परीक्षा दे दे तो उसमे में सफलता हासिल कर सकती है।

                   पी.एस.सी. का रिज़ल्ट आने के कुछ समय बाद पर्सनल इंटरव्यू दिया और वह उसमें भी उत्तीर्ण हो गई। कुछ समय पश्चात उसकी पोस्टिंग तहसीलदार के पद पर हो गई। एक ओर उसे अपनी सफलता पर नाज़ हो रहा था तो दूसरी तरफ़ घर में हंगामा मचा हुआ था। घर के सारे लोग इस बात पर ख़ुश हो रहे थे जबकि उसका पति अवसाद में घिरा बैठा था। वह नहीं चाहता था कि जिस तहसील कार्यालय में वह एक मामूली बाबू की हैसियत से काम कर रहा है, उसकी बीवी उसी आफ़िस में उसकी बॉस बनकर काम करे।
...........गोवर्धन यादव

रविवार, 26 नवंबर 2017

Awesome Paper Art .......S.P.Chari

Jeff Nishinaka, paper sculptor, was born in Los Angeles and gained international recognition in the past fifteen years through his unique representational art forms in 3-Dimension. He pioneered paper sculpture in the US advertising, promotion, and publishing fields. Since then he has worked non-stop as the premiere paper sculptor in both commercial advertising, illustration, and fine art.

Generally using Strathmore 2-ply and 3-ply kid finish papers (and sometimes using watercolor paper or handmade papers), he tears and cuts the paper into three-dimensional sculptures.



















Presented by: S.P.Chari
sp chari seshampc@yahoo.com