सोमवार, 16 अप्रैल 2018

शैतान क्या हैं...?...बोधकथा


एक प्रोफेसर ने अपने छात्र से पूछा....
क्या वह भगवान था जिसने इस संसार की हर वस्तु को बनाया...?
छात्र का जवाब : हां
उन्होंने फिर पूछा : शैतान क्या हैं...?
क्या भगवान ने इसे भी बनाया ?
छात्र चुप हो गया.......!
फिर छात्र ने आग्रह किया कि-क्या वह उनसे कुछ
सवाल पूछ सकता हैं...?
प्रोफेसर ने इजाजत दे दी... 
छात्र ने पूछा - क्या ठण्ड होती हैं..?
प्रोफेसर ने कहा : हां बिल्कुल क्या तुम्हे यह महसूस नहीं होती....?
छात्र ने कहा : मैं माफी चाहता हूँ सर लेकिन आप गलत हो ।
गर्मी का पूर्ण रुप से लुप्त होना ही ठण्ड कहलाता
हैं, जबकि इसका अस्तित्व नहीं होता। ठण्ड होती ही नहीं..?
छात्र ने फिर पूछा : क्या अन्धकार होता हैं...?
प्रोफेसर ने कहा:- हां, होता हैं....
छात्र ने कहा : आप फिर गलत हैं सर।
अन्धकार जैसी कोई चीज नहीं होती वास्तव में इसका कारण रोशनी का पूर्ण रुप से लुप्त होना हैं सर हमने हमेशा गर्मी और रोशनी के बारे में पढा और सुना हैं।
ठण्ड और अन्धकार के बारे में नहीं । वैसे ही भगवान हैं....
और....
बस इसी तरह शैतान भी नहीं होता l वास्तव में पूर्ण रुप से भगवान में विश्वास सत्य और आस्था का ना होना ही शैतान का होना हैं।
और वह छात्र था ...... स्वामी विवेकानन्द 

प्रस्तुति : अनु कश्यप

गुरुवार, 12 अप्रैल 2018

शेर के बाल से पति का इलाज...हिन्दी एरा

    
        एक बार एक भीषण युद्ध हुआ। युद्ध समाप्त होने के बाद उसकी भयावहता की यादें अपने साथ लिए सभी जिन्दा बच गए लोग अपने अपने घर लौट गए। इस युद्ध से लौटने के बाद लक्ष्मी का पति बिलकुल बदल गया था। युद्ध की भयावहता ने उसके दिलो-दिमाग पर बहुत गहरा असर किया और उसके मिजाज़ को बहुत बदल दिया था। अब वह हमेशा गुमसुम रहता और बात-बात पर गुस्सा करने लगता। उसका स्वभाव ऐसा हो गया था कि लक्ष्मी को उससे डर लगने लगा था।

पति की ऐसी हालात देखकर उसे पति के स्वास्थ्य की चिंता होने लगी। किसी ने उसे एक अच्छे वैद्य के बारे में बताया और उसके पति का इलाज उनके पास कराने के लिए समझाया। अपने पति का इलाज कराने के लिए लक्ष्मी उस वैद्य के पास गयी। वह वैद्य अपनी झोपडी में बैठा अपनी कुछ दवाइयाँ तैयार कर रहा था। लक्ष्मी ने उस वैद्य को अपने पति के व्यव्हार में युद्ध के बाद आये परिवर्तन की समस्या को सिलसिलेवार बता दी। लक्ष्मी ने वैद्य से गुजारिश की कि वो उसके पति का ऐसा इलाज कर दे जिससे जिससे उसका पति पहले की तरह ही प्रेमपूर्वक व्यव्हार करने लगे। उस वैद्य ने लक्ष्मी की समस्या सुन उसे तीन दिन बाद आने को कहा।

तीन दिन बाद जब लक्ष्मी उस वैद्य के पास पहुंची तो वैद्य ने कहा कि तुम्हारे पति की बीमारी बहुत ही भयंकर है और उसे ठीक करने के लिए एक खास प्रकार की दवा तैयार करनी होगी। वैद्य ने आगे कहा कि मुझे ये दवा तैयार करने के लिए जिन्दा शेर का एक बाल चाहिए। अगर तुम अपने पति को ठीक करके फिर से पहले जैसा करना चाहती हो तो तुम्हे कहीं से भी मुझे जिंदा शेर का एक बाल लाकर देना होगा तभी मैं ये खास दवा तैयार कर पाउँगा, जिसे खाते ही तुम्हारा पति बिलकुल पहले जैसा हो जायेगा।

लक्ष्मी तो जिंदा शेर के बाल की बात सुनकर ही सहम गयी और उसने वैद्य से जिंदा शेर का बाल लेकर आने में असमर्थता जता दी। उसने वैद्य से कहा वैद्यमहाराज, आप ही सोचें मैं कैसे एक जिंदा शेर का बाल लेकर आ पाऊँगी। आप कृपया करके मेरे पति के लिए कोई दूसरा इलाज बताएं। वैद्य ने भी लक्ष्मी से कह दिया तुम्हारे पति का इलाज सिर्फ जिंदा शेर के बाल से बनी खास दवा से ही किया जा सकता है। इसके अलावा इस बीमारी को कोई इलाज नहीं है। अगर तुम शेर का बाल नहीं ला सकती तो तुम्हारा पति जैसा भी है तुम उसके साथ उसी हाल में रहो और उसके इलाज की बात भूल जाओ। वैद्य के मुँह से ऐसी बात सुनकर लक्ष्मी परेशान हो गयी। लेकिन कोई और चारा ना देख आखिरकार वो जिंदा शेर का बाल लाने को तैयार हो गयी।

वो घर चली गयी और शेर का बाल लाने को लेकर अपने आप को हिम्मत बंधाती रही। अगले दिन वह हिम्मत करके एक कटोरी में मांस लेकर पास के एक जंगल की तरफ चली गयी। वहाँ जंगल में उसे एक गुफा नज़र आई, जहाँ से उसे शेर की गुर्राहट सुनाई दी। उसे लगा जरूर इस गुफा में कोई शेर रहता होगा। पर वो वहां मांस रखने की हिम्मत नहीं कर पाई और ऐसे ही वहां से वापस घर चली गयी। घर आकर उसे लगा ऐसे तो वो कभी भी शेर का बाल लेकर नहीं आ पायेगी और उसके पति का इलाज नहीं हो पायेगा। वो पूरी रात इसी के बारे में सोच सोच कर परेशान होती रही।

अगले दिन फिर से उसने हिम्मत की और एक कटोरी में मांस लेकर जंगल की तरफ रवाना हो गयी। जंगल में पहुंचकर हिम्मत करके वह चुपचाप दबे पांव गुफा के पास गयी और गुफा के सामने कटोरी रखकर तुरंत ही वहां से वापस घर आ गयी।  अगले दिन फिर से उसने ऐसा ही किया, धीरे-धीरे यही उसका नियम बन गया। वह हर रोज जंगल जाती, गुफा के पास पहुँचती, एक दिन पुरानी कटोरी उठाती और मांस से भरी नई कटोरी रखकर दबे पांव वहां से निकलकर वापस अपने घर लौट आती। ऐसा करते उसे कई दिन हो गए लेकिन अभी तक उसका शेर से कभी सामना नहीं हुआ था।

धीरे – धीरे लक्ष्मी का डर कम होने लगा। अब वो बहुत इत्मिनान से जंगल जाती और मांस की कटोरी गुफा के बाहर रखकर आ जाती। कुछ दिनों तक ऐसा ही करते रहने के बाद एक दिन उसने देखा कि शेर गुफा में बाहर की तरफ ही बैठा है। लक्ष्मी हिम्मत करके धीरे-धीरे गुफा की तरफ बढ़नी लगी। शेर ने उससे कुछ नहीं कहा। लक्ष्मी ने मांस से भरी कटोरी वहां रखी और खाली कटोरी लेकर वहां से रवाना हो गयी। इसी प्रकार कई और दिन बीत गए। लक्ष्मी के प्रति शेर का स्वभाव दोस्ताना हो गया, वो कभी भी उसके आने पर आक्रामक नहीं होता। शेर के इस दोस्ताना व्यवहार के चलते अब लक्ष्मी कभी-कभी उसे सहला भी देती थी।लक्ष्मी को शेर के पास आते जाते करीब छह महीने बीत गए तब उसे लगा कि अब वह शेर के बाल काट सकती है। अगले दिन वह अपने साथ एक छोटा चाकू छुपाकर ले गई और शेर को सहलाते-पुचकारते हुए लक्ष्मी ने उसके कुछ बाल काट लिए।

शेर का बाल मिलते ही लक्ष्मी तुरंत वैद्य के पास पहुँच गई और उसे शेर के बाल दिखाए। वैद्य ने उससे पूछा कि उसने ये शेर के बाल कैसे हासिल किये। लक्ष्मी ने वैद्य को अपने 6 महीने की पूरी कहानी सुना दी। लक्ष्मी की पूरी कहानी सुनने के बाद वैद्य ने उसी समय शेर के बाल को आग के हवाले कर दिया और लक्ष्मी को समझाते हुए कहा कि इंसान शेर से ज्यादा खतरनाक नहीं हो सकता। यदि वह प्यार और धैर्य से शेर को अपने वश में कर सकती है तो पति को क्यों नहीं। लक्ष्मी को अपने पति की बीमारी का इलाज मिल गया था।

दोस्तों इस कहानी का moral यही है कि प्यार ही वो अहसास है जिससे हम किसी को भी अपना बना सकते हैं।

सोमवार, 26 मार्च 2018

लक्ष्मी...अपनी मर्जी की मालिक है.....विजय विक्रान्त


सेठ करोड़ी मल का जैसा नाम था वैसे ही उसकी किस्मत थी। 
लक्ष्मी की कृपा से धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। व्यापार में 
खूब कमाई हो रही थी और जीवन बहुत सुखी था। करोड़ी सेठ को पैसे से  बहुत ही अधिक प्यार था और वो इस की पूरी देख भाल करता था। एक रात सपने में सेठ को लक्ष्मी ने दर्शन दिए और कहने लगी कि अब मेरा तुम से रिश्ता नाता समाप्त हो गया है और मैं तुम्हें छोड़ कर गंगा पार फ़कीरा हलवाई के यहाँ जा रही हूँ।

इस डर से कि कहीं सपना सच्चा न हो, करोड़ी मल ने अपनी सारी 
दौलत अपने महल की छत की कड़ियों में छुपा दी। " देखता हूँ कि 
अब तू मुझे छोड़ कर कहाँ जाती है" , ऐसा वो सोचने लगा। कुछ ऐसा 
हुआ कि अगले ही दिन बादल घिर आए और बहुत ज़ोर की वर्षा होने 
लगी। इतना पानी बरसा कि सेठ का महल गिर गया और छत की कड़ियाँ गंगा के पानी में बह गयीं और दूसरे किनारे जा कर लगीं। वहाँ 
बुलाकी मल्लाह ने जब ये सब देखा तो सोचा कि क्यों न इन्हें इकट्ठी 
कर के बेच कर आज की दिहाड़ी बना लूँ। बाढ़ के कारण आज कोई भी 
उस पार जाने वाला यात्री नहीं मिला है। मल्लाह ने सारी कड़ियाँ एक 
रस्सी में बान्धी और जा कर फ़कीरा हलवाई को एक रुपये में बेच दी। 
लकड़ीयों को चीरने की ख़ातिर जब फ़कीरा ने कुल्हाड़ी चलाई तो छन्न 
छन्न करती अशर्फ़ीयों से सारी दुकान गूँज गई।

उधर सेठ का बुरा हाल था। घर में खाने तक के लाले पड़ गए। 
सोचा कि जाकर फ़कीरा से मिलूँ और विनती करूँ। शायद मेरी 
हालत देख कर उसे कुछ तरस ही आजाए। यह सोच कर उसने 
अपनी बीवी से दो रोटियाँ बाँधने को कहा और उस पार जाने के लिए गंगा की ओर चल दिया। पार ले जाने के लिये जब मल्लाह ने 
किराया माँगा तो करोड़ी ने बताया कि उसके पास केवल दो 
रोटी हैं। मल्लाह एक रोटी लेकर उसे पार उतारने पर राज़ी हो गया 
और एक रोटी लेकर उसे गंगा पार छोड़ दिया।

करोड़ी मल फ़कीरा हलवाई से मिला और अपनी सारी कथा 
सुाई। सारी बात सुनकर फ़कीरा चुप रहा और कुछ नहीं बोला। थोड़ी 
देर बाद उसने अन्दर जाकर दो बड़े बड़े अशर्फ़ियों के लड्डू बनाए 
और करोड़ी को मल देते हुए कहा कि वो इनको बच्चों के लिये ले जाए। सेठ को इस बात का बहुत मलाल रहा कि फ़कीरा ने कोई हमदर्दी नहीं 
दिखाई और केवल दो लड्डू देकर टाल दिया। भरे मन से वो गंगा की 
ओर बढ़ा और घर वापिस जाने के लिए मल्लाह से विनती करने लगा। 
" वापिस जाने के लिए किराए के पैसे हैं क्या?" जब मल्लाह ने       
ये सवाल किया तो सेठ ने कहा कि उस के पास दो लड्डू हैं। एक लड्डू 
वो किराए का दे देगा और एक लड्डू से अपने बच्चों का पेट भरेगा। 
क्योंकि रात हो रही थी और मल्लाह को वापिसी सवारी की कोई उम्मीद नहीं थी, उस ने सेठ से कहा कि अगर पार जाना है 
तो दोनों लड्डू देने होंगे। 

कोई और चारा न देख कर सेठ ने दोनों लड्डू बुलाकी मल्लाह 
को दे दिए और नाव में गंगा पार कर अपने घर आगया। वापिस आकर 
मल्लाह ने सोचा कि वो इन लड्डूओं का क्या करेगा। उसने फ़कीरा के 
यहाँ जाकर दोनों लड्डू दो रुपये में बेच दिये। 
लक्ष्मी का कहना सच्चा था, जहाँ रहना है वहीं जाना है
यह बारिश, मल्लाह, कड़ियों का बस केवल एक बहाना है।
-विजय विक्रान्त


रविवार, 4 मार्च 2018

च.तुर राज ज्योतिषी.......विजय विक्रान्त

महाराजा करमवीर सिंह के दरबार में राज ज्योतिषी पण्डित
श्याम मुरारी की बहुत चर्चा थी और बड़ा मान था। राजा कोई भी
काम ज्योतिषी की सलाह के बिना नहीं करता था। समय बीतता
गया और राजा को अपनी सीमाओं को बढ़ाने की इच्छा दिन प्रति
दिन प्रबल होती चली गई।

एक दिन राजा ने ज्योतिषी को बुलाकर अपने दिल की बात     
कही और पूछा कि क्या साथ वाले राजा पर आक्रमण करना ठीक
रहेगा और यदि ठीक है तो उसका राज्य हड़प करने का कौन सा
शुभ समय है। यह जानते हुए भी कि पड़ोसी राजा बहुत बलवान
है, श्याम मुरारी ने बिना सोचे समझे सलाह दी कि हे राजन! आप
जल्दी से जल्दी आक्रमण कर डालें। आप इस संग्राम में अवश्य
सफल होंगे। ज्योतिषी के कहने पर करमवीर सिंह ने धावा बोल
दिया। हुआ वही जिसका डर था। राजा को मुँह की खानी पड़ी।
बहुत पिटाई हुई और जैसे तैसे करके अपनी जान बचा कर भागा।
महल में आकर राजा ने सबसे पहले राज ज्योतिषी को
बुलाया। ज्योतिषी को तो सब बात का पता चल गया था और उसे
ये भी मालूम था कि उसको क्यों बुलाया जा रहा है। फिर भी वो
चेहरे पर मुस्कान लेकर दरबार में पहुँचा।
आसन ग्रहण करने के बाद राजा ने ज्योतिषी से पूछा कि
महाराज आप सब का भविष्य बताते हैं। क्या आपको अपना
भविष्य भी पता है? राजा के प्रश्न के पीछे जो रहस्य था उसे
जानने में पण्डित को ज़रा देर नहीं लगी। उसने हाथ जोड़कर
विनम्रता से कहा कि महाराज मैं ने सब नक्षत्रों का अध्ययन
किया है और मुझे अपने और आपके भविष्य के बारे में सब कुछ
पता है। राजा के यह पूछने पर कि आपकी मृत्यु कब होगी,
पंडितजी ने बड़ी नम्रता से कहा कि महाराज कुछ ग्रहों का चक्कर
ऐसा है कि मेरे और आपके नक्षत्रों का चोली दामन का साथ है।
गणित के अनुसार मेरी मृत्यु आपकी मृत्यु से ठीक दो घण्टे पहले
 होगी। कहने का मतलब ये है कि मेरे मरने के ठीक दो घण्टे बाद
आपकी मृत्यु हो जाएगी।
राज ज्योतिषी का जवाब सुनकर राजा भी चक्कर में आ गया
और जो उसने मन में सोचा था उस बात को वहीं पी गया। इधर
राज ज्योतिषी ने भी सोचा कि एक बार तो जैसे तैसे जान बच
 गई मगर आगे का कुछ पता नहीं है। कुछ दिन रहने के पश्चात
 उसने महाराज से आज्ञा ली और वन की ओर प्रस्थान कर दिया।
-विजय विक्रान्त


शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

भाग्य का लिखा टल नहीं सकता....विजय विक्रान्त



                   बनारस के ज्योतिषाचार्य पण्डित कपिलदेव के बारे में प्रसिद्ध था वो जन्म कुण्डली और ग्रहों का अध्ययन करके किसी का भी भविष्य ठीक ठीक बता सकते थे। कभी कभी तो यदि ग्रहों का चक्कर अनुकूल न हो तो उपाय भी सुझा देते थे। अभी तक उनकी भविष्यवाणी या उचित उपाय सदा सच होते आए थे और दूर दूर के लोग उनको बहुत मानते थे तथा सम्मान देते थे।

          कपिलदेव जी के परिवार में केवल पत्नी योगेश्वरी देवी और पुत्री कलावती थी। जैसे जैसे कलावती बड़ी होने लगी, योगेश्वरी देवी को उसके विवाह की चिंता होने लगी। वो बार बार पति को ये बात याद दिलाती थी कि वो जल्दी से जल्दी पुत्री के हाथ पीले कर दें। कपिलदेव जी को भी अपनी ज़िम्मेवारी का पूरा एहसास था मगर एक भविष्य की घटना जो उन्हें घुन्न की तरह खाए जा रही थी, उसे वो पत्नी से कहते हुए बहुत घबरा रहे थे। आखिर पत्नी के बहुत आग्रह करने पर वो बोले 
  “योगेश्वरी, तुम क्या समझती हो कि मुझे इस बात का फ़िक्र नहीं है। मैंने कलावती की कुण्डली कई बार देखी है और हर बार इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि ये कन्या विवाह के तीन साल बाद विधवा हो जाएगी।”

    कपिलदेव की ये बातें सुनकर योगेश्वरी बोली, “हे नाथ अगर इस के भाग्य में यही क्खा है तो इसका कोई उपाय भी तो होगा।”

“उपाय तो अवश्य है परंतु ग्रह इतने बलवान हैं कि कोई भी उपाय काम नहीं करेगा।” ऐसा कहकर कपिलदेव दुखी होकर रो पड़ा।

योगेश्वरी देवी बहुत सहनशील औरत थी। उसने दिल नहीं छोड़ा और पति से आग्रह किया कि जो भी उपाय है हम उसे करेंगे। आप बस वर तलाश में लग जाओ। माता पिता ने  एक योग्य वर ढूँढ कर मकर संक्रांति के दिन शादी का महूरत निकाला। सब ग्रहों का अध्य्यन करके कपिलदेव ने एक चाँदी का कटोरा लिया और उसके बीच में एक बहुत छोटा सा सुराख कर के पानी में तैरने के लिए छोड़ दिया और बोले, “ग्रहों के अनुसार जब ये कटोरा पानी से भर कर डूब जाएगा वही फेरों का महूरत होगा और बुरी घड़ी टल जाएगी।”

उधर कलावती अपने पूरे साज श्रृंगार से सुसज्जित थी। सोने चाँदी और मोतियों के आभूषण उस पर बहुत अच्छे लग रहे थे। उस ने भी चाँदी के लोटे की बात सुनी और उसे देखने को उत्सुकित हो गई। पिता की आज्ञा लेकर अपनी सहेलियों सहित वो नीचे आई और जहाँ लोटा तैर रहा था वहाँ सिर झुका कर सुराख में से पानी को आता देखने लगी और थोड़ी देर बाद वापिस चली गई। उसे क्या मालूम था कि जब वो झाँक कर कटोरे में देख रही थी तो उस के सिर के आभूषण का एक मोती कटोरे में गिर गया है और कटोरे के उस छोटे से सुराख को बन्द कर दिया है। इधर सारे लोग लोटा डूबने की इंतज़ार में थे कि कब लोटा डूबे और कब शादी की रसम शुरू हो। कपिलदेव के हिसाब से लोटे को डूबने में कोई दो घण्टे लगने चाहिये थे मगर जब इस बात को तीन घण्टे हो गए और लोटा फिर भी नहीं डूबा तो सब ने वहाँ जाकर लोटे का निरिक्षण किया और जो पाया उसे देख कर चकित हो गए। हालाँकि शादी का महूरत निकल चुका था मगर लड़के वालों के आग्रह करने पर शादी कर दी गई। ठीक तीन साल बाद वही हुआ जिसका डर था।

ज़ोर लगाले मनुष्य तू कितना, भाग्य पलट न पाओगे
हाथ की रेखाओं में जो लिखा है, उसी को बस तुम पाओगे
विजय विक्रान्त

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

चुड़ैल या परी

                                        
            पुराने समय की बात है, एक विद्वान को फांसी लगनी थी। राजा ने कहा, "जान बख्श दें सही उत्तर मिल जाये कि आखिर स्त्री चाहती क्या है?"
             विद्वान ने कहा, मोहलत मिले तो पता कर के बता सकता हूँ। एक साल की मोहलत मिली, बहुत घूमा, कहीं से भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। आखिर में किसी ने कहा दूर एक चुड़ैल रहती है वही बता सकती है। चुड़ैल ने कहा कि मै इस शर्त पर बताउंगी जब तुम मुझसे शादी करो। उसने जान बचाने के लिए शादी की सहमति दे दी।
शादी होने के बाद चुड़ैल ने कहा, चूंकि तुमने मेरी बात मान ली है, तो मैंने तुम्हें खुश करने के लिए फैसला किया है कि 12 घन्टे मैं चुड़ैल और 12 घन्टे खूबसूरत परी बनके रहूंगी, अब तुम ये बताओ कि दिन में चुड़ैल रहूँ या रात को।

         

          उसने सोचा यदि वह दिन में चुड़ैल हुई तो दिन नहीं कटेगा, रात में हुई तो रात नहीं कटेगी। अंत में उस विद्वान कैदी ने कहा, जब तुम्हारा दिल करे परी बन जाना, जब दिल करे चुड़ैल बनना।
ये बात सुनकर चुड़ैल ने प्रसन्न होकर कहा, चूंकि तुमने मुझे अपनी मर्ज़ी की करने की छूट दे दी है, तो मै हमेशा ही परी बन के रहा करूँगी। "यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी है।" 

          स्त्री अपनी मर्जी का करना चाहती है। यदि स्त्री को अपनी मर्ज़ी का करने देंगे तो, वो परी बनी रहेगी वरना चुड़ैल !
आज का भी सच यही है ! मन का करने दीजिये स्त्री को ! वो खुश रहेगी तभी आप खुश रह सकेंगे !

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

सुने कौन ?....संकलित

               
                 एक राजा के दरबार में एक ऋषि पहुंचे, साथ में था पिंजरे में एक कौआ। राजा को ऋषि का आशय समझ में नहीं आया।

उन्होंने पूछा, ‘मुनिवर! आप कौआ लेकर क्यों चल रहे हैं? तोता या कबूतर लेकर क्यों नहीं ?’ ऋषि बोले, ‘सभी पशु-पक्षियों के अपने-अपने गुण होते हैं। पर कौए का विशेष गुण हमें सतर्क करता है। कौआ ही एक ऐसा पक्षी है, जो किसी व्यक्ति को देखकर उसके मन के भाव और क्रियाकलाप भी समझ जाता है। 

           आपके राजदरबार के अंदर आते हुए उसने आपके एक-एक अधिकारी और कर्मचारियों के गुण-दोष बता दिए। मुझे आश्चर्य है कि आप इतने चाटुकारों और भ्रष्ट आचरण वालों से घिरे रहकर प्रजा के कल्याण के कार्य कैसे कर पाते हैं ?’ ऋषि की बात सुनकर दरबार में कंपन हुआ। राजा ने समझा कि वे ऋषि उनके लिए बड़े उपयोगी होंगे। उन्हें अतिथि गृह में ठहरा दिया गया। 

           दूसरे दिन ऋषि फिर राजदरबार में आए। इस बार उनके साथ कौआ नहीं था। राजा ने कौए के बारे में पूछा तो ऋषि ने कहा, ‘आपके दरबार में बड़े भ्रष्ट लोग हैं। उन्हें पता चल गया है कि कौए के माध्यम से मैं आपको उनके बारे में बताऊंगा। इसलिए किसी ने तीर से मुझ पर वार किया। मैं तो बच गया। पर मेरा कौआ मारा गया।’ राजा को यह बात सुनकर बड़ा क्रोध आया। वे बोले, ‘मैं उस दुष्ट को कड़ी सजा दूंगा।’ 
            ऋषि मुस्कराकर बोले, ‘राजन! उस दुष्ट का पता लगाने में आपको कई वर्ष बीत जाएंगे। शायद तीर मारने वाले का पता भी न चले। मेरा कौआ होता तो तुरंत बता देता। आप भी अपने आस-पास कौए के गुण वाले व्यक्ति रखिए।’ अक्सर सही बात बताने वाले को पुरस्कृत नहीं, दंडित ही किया जाता है। 

             इसलिए समाज में सही बोलने वालों की कमी है। राजसत्ता में बैठे लोगों को अपनी प्रशंसा सुनने में ही आनंद आता है। इसलिए वे सही स्थिति से अवगत नहीं हो पाते। 

          हमारे समाज में कौए के गुण रखने वाले व्यक्तियों की कमी नहीं है। वे खुद सतर्क रहते हैं। दूसरों को भी तत्काल आने वाले खतरों से सावधान करते रहते हैं। पर उनकी सुनता कौन है ? सुनने वालों की ही कमी है, बोलने वालों की नहीं। 

        कौए की आवाज सुनकर हम अनुमान लगाते हैं कि कोई मेहमान आने वाला है। और भी बातों की सूचना देता होगा कौआ। काश! हम उसकी भाषा समझ पाते। 

          सूचना क्रांति के युग में कौए का महत्व बढ़ना चाहिए। कम से कम कौए की बुद्धि और गुण रखने वालों की पूछ बढ़नी ही चाहिए। पर सच-सच बताने वालों की परिणति भी उस साधु के कौए की ही तरह होती है। फिर सचाई बताए कौन ? सचाई किसी से छिपती नहीं, पर बोले कौन ?  सुने कौन ?