सोमवार, 21 अगस्त 2017

गाली.....-अरुण कुमार

दस बजे बड़े बाबू    ने   कार्यालय में   प्रवेश  किया और कुर्सी   पर बैठने  से पहले उस पर उँगली  फिराकर गुस्से और रौब से  चीखा,  ‘‘अबे  चरणदास … लगता है   तू   आज भी   देर से  ड्यूटी   पर आया,  जो तूने  मेज–कुर्सी   की   सफाई  नहीं की?’’

‘‘बाबू  जी, मैं    तो पौने   नौ  बजे ही आ  गया था।  आपकी मेज कुर्सी    तो   मैंने इसलिए छोड़    दी  कि आप दस  बजे आकर मुझसे दोबारा सफाई  करवाते तो  हैं   ही  , तो  क्यों न आपके  आने पर आपके सामने ही सफाई  कर दूँ…’’ चरणदास ने  सहजता से जवाब दिया तो  बड़ा बाबू  बुरी   तरह से  चिढ़ गया।  अपनी  खिसियाहट छुपाते हुए  बोला, ‘‘अच्छा–अच्छा… अब ज्यादा जिरह मत लगा  और फटाफट मेज–कुर्सी  साफ कर दे। दुनियाभर का काम पड़ा है   करने को।  अब तेरी तरह मजे की  नौकरी तो है नहीं    हमारी कि सारा दिन बैन्च  पर बैठे ऊँघते  रहें।’’

चरणदास बडे़ बाबू    की   मेज–कुर्सी झाड़कर  चुपचाप अपनी बैन्च  पर आ बैठा  था। उसका मन कुछ  बुझ–सा  गया था।  अब वह  अपने  हिस्से के सारे काम  तो  करता ही   है, पर बड़ा  बाबू   कभी    उसके  काम से  प्रसन्न   हुआ    हो  ऐसा   कभी प्रकट  में  नहीं    आया। चरणदास जानता है।  वह सब कुछ जानता   है    कि बड़ा  बाबू   उससे  इतनी नफरत क्यों  करता है!   क्यों  वह उसकी हर छोटी – सी बात में  दोष   ढूँढने  बैठ    जाता है।

बड़े बाबू    ने   मेज पर पड़ी  फाइलों   पर नोटिंग  चढ़ाकर एक तरफ रखा  तथा पैन्ट  की अन्दरूनी  जेब से   चाभी निकालकर मेज पर पटकते   हुए  हाँक लगायी,   ‘‘चरणदास… अल्मारी खोलकर  कैश बुक निकाल… सर्टिफिकेट   देना है!’’  चरणदास ने  अल्मारी खोलकर कैशबुक मेज पर रखी  ही थी  कि बड़ा बाबू   कैशबुक  देखते ही तैश में आ गया। चरणदास की तरफ लाल–पीली  आँखें   करता हुआ  गुर्राया, ‘‘अबे   तुझे  समझ  नहीं    है  क्या…  करंट वाली  कैशबुक  निकालकर ला। चरणदास ने  चुपचाप   वह  कैशबुक उठाकर अल्मारी में रखी  तथा वहाँ से  एक अन्य कैशबुक  उठाकर  ले आया।  उस कैशबुक   को देखते ही  बड़ा बाबू  आपे से बाहर हो  गया।  लगा चिल्लाने, ‘‘अबे  आज क्या तू  अपना  दिमाग घर  छोड़कर आया है  जो ऐसी  हरकतें कर रहा   है! ग्रीन जिल्द  वाली कैशबुक तू  रोज़   निकालकर  लाता है  और  आज देख  कैसे  जानबूझकर मुझे परेशान    कर रहा है   …!

बार–बार  के अपमान से आहत चरणदास के  भीतर  विरोध के  स्वर   उभर आए   थे।  वह कैशबुक   वहीं मेज पर छोड़कर बोला,   ‘‘मैं तो   अनपढ़ हूँ     बाऊजी! अब मुझे क्या   समझ कि आपको  क्या चाहिए! …  यह आपके  सामने चार कदम पर तो अल्मारी   है   …  आप थोड़ी   सी तकलीफ करो  और आपको   जो चाहिए   स्वयं  ही ले लो! यह कहकर चरणदास वापिस अपनी बैन्च  पर आकर बैठ  गया था।

चरणदास की इस क्रिया से बड़े बाबू    की क्रोघाग्नि  में घी  पड़   गया था,  मानो। वह कुर्सी को  पीछे  धकेलकर खड़ा   होता हुआ  चिल्लाया,    ‘‘अबे  ओ चूहड़े   के  बीज… तू   अपना ये चूहड़ापना घर  पर ही  छोड़कर आया कर … यहाँ हमारे सामने  दफ्तर में   अपनी गंदगी मत खिंडाया  कर…

जातिसूचक गाली सुनकर  चरणदास का खून  खौल  उठा।  दफ्तर और अपने   छोटे   पद  का खयाल कर बमुश्किल अपने गुस्से  को  पीता   हुआ बोला, ‘‘बाऊजी आप उम्र  में   और पद में   मुझसे बडे़   हैं।  आप ऊँची जाति से हैं    पर इसका मतलब यह तो  नहीं  कि आप मुझे जातिसूचक गाली देकर  बात करेंगे।  यह सब आपको शोभा नहीं   देता   है।

‘‘कहूँगा  मैं   तो तुझे  … चूहड़ा। चूहड़े  की औलाद!   तुझे जो  मेरा  बिगाड़ना है,  बिगाड़ले… जा!’’बडे़ बाबू    ने   चरणदास के अपने  प्रति मन में    बसी नफरत को   उल्टी  की तरह से उगला तथा बड़बड़ाता    हुआ    अपने काम में   लग गया।

चरणदास  का बाहर भीतर अपमान की आग में   जलने लगा था।  उसे लगा  कि अगर आज वह चुप बैठा  रह गया ,तो  यह आग तो  उसकी पीढ़यों को  जला देगी।  मन ही  मन कुछ  निश्चय कर वह उठा और  अपने प्रधान  रामआसरे को साथ  ले जाकर चौकी  में  बड़े बाबू  के  खिलाफ   पर्चा दे   दिया।

बड़े बाबू    को   जब पुलिस चौकी से  बुलावा आया तो  उसके सारे तेवर ढीले   पड़ गए। चौकी इंचार्ज उसे  समझाते हुए  बोला, ‘‘बाऊजी सरकारी नौकरी में होते    हुए आपने ऐसी गलती क्यों  की! आपको पता होना चाहिए    कि छुआछूत  अपराध   की  श्रेणी में   आता है।एक दिन का समय दे  रहा हूँ,   अगर अपनी नौकरी  की सलामती  चाहते हो , तो   समझौता कर लो।  कल इसी समय पुन:  हाजिर हो  जाना…।’’

बडे़ बाबू    ने   अपनी पूरी  ताकत लगा  दी कि किसी तरह से चरणदास  अपनी शिकायत वापिस ले  ले।  उसने अपनी यूनियन   के पदा​धिकारियों एवं कार्यालय के अन्य  कर्मचारियों के माध्यम   से भी   चरणदास को मनाने  की  कोशिश  की  किंतु चरणदास टस से मस न हुआ।  वह हाथ  जोड़कर   मात्र  एक ही  बात कहता कि उसे न्याय  चाहिए।

अगले दिन पुलिस  चौकी  में   चरणदास तथा   बड़ा बाबू  अपने  साथ दो–दो   मौजिज व्यक्तियों  को लेकर   पहुँच गये  थे।  बड़े   बाबू के  होश–हवाश  उड़े   हुए थे।  उसे   काटो तो खून नहीं।  चौकी  इंचार्ज  ने फिर  से कहा,  ‘‘तुम दोनों  सरकारी कर्मचारी हो।  बात बढ़ाने  से क्या फायदा…।  एक–दूसरे   से  हाथ मिलाकर बात खत्म करो।  बड़ा बाबू  तो  मानो   इसी ताक में था। क्षणांश  की भी देरी   किये  बिना उसने चरणदास   के  पैरों को    छू    लिया।  हाथ जोड़कर फफकता हुआ  बोला, ‘‘मेरी नौकरी  तेरे हाथ है  चरणदास … मेरी   दो बेटियाँ अभी अनब्याही  हैं     … भाई मुझे    माफ कर दे।

बडे़ बाबू    की आँखों    में  आँसू  देखकर चरणदास  पिघल गया, बोला,  ‘‘बाऊजी! मैं   तो छोटा  आदमी हूँ    और सदा   छोटा ही   रहूँगा।  आपको सजा दिलवाना   मेरा उद्देश्य नहीं  था। मैं    तो  बस आपको अहसास दिलाना चाहता  था  कि मैं  भी    एक मनुष्य हूँ।  क्या  हुआ गर मैं  छोटी     जाति में   पैदा   हो  गया …!’’

चरणदास ने  समझौता  प्रस्तुत करके   अपनी शिकायत वापिस ले ली  थी।

पुलिस चौकी से  बाहर   आते  हुए  बड़ा  बाबू   पसीने पौंछ  रहा था। वह अपने आप को बेहद अपमानित महसूस कर रहा था।  रही–सही कसर पुलिस वालों  ने  उसकी जेब खाली करा कर पूरी  कर दी  थी।  बाहर आते हुए उसकी  हालत  ऐसी  हो   रही थी , मानो   बस के पहिये   के नीचे उसकी   गर्दन आती–आती  बची  हो  ! चरणदास  की गर्दन  आत्मविश्वास  से तनी हुई  थी   तथा उसका   चेहरा  स्वाभिमान की  आभा से  दमक रहा था।  यह देखकर बड़े बाबू के  मन में   जातीय द्वेष  की भावना  फिर से जाग्रत हो   गयी थी।  बड़ा  बाबू   चरणदास के नजदीक आकर, नफरत से उसकी तरफ देखता  हुआ बुदबुदाया, ‘‘चरणदास … हो  गई तेरे  मन की  पूरी! अब तो  तू खुश   है!  पर एक बात बता चरणदास … अब क्या तू  ब्राह्मण हो   गया है?’’

चरणदास  विस्फारित नेत्रों   से बडे़ बाबू    का चेहरा ताकता ही रह गया। उसे लगा,  मानो बड़े बाबू    ने   उसे फिर  से  गाली देते  हुए उसके  गाल  पर तमाचा जड़ दिया   है।

-अरुण  कुमार 

-0- स्थायी  पता -0-    
अरुण कुमार, 895/12,
आजाद नगर, 
कुरुक्षेत्र –136119(हरियाणा)

-0- वर्तमान   पता -0-
 मकान नं।   1460,
सेक्टर–13,  हिसार।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

अश्लील .....हरिशंकर परसाई



शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।
दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।
उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।
दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा - किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।
किताब कोई लाया नहीं था।
एक ने कहा - कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।
दूसरे ने कहा - अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।
उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।
तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।
एक ने कहा - अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।
दूसरे ने कहा - अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।
तीसरे ने कहा - भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी।
चौथे ने कहा - अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।
अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।.
-हरिशंकर परसाई 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

एक अशुद्ध बेवकूफ .....हरिशंकर परसाई

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।
मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा मजा है- मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है- करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं- चिढ़ जायें या शुद्ध बेवकूफ बन जायें। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूं।
अभी जो साहब आये थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आये। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं- तुलसीदास, सूरदास, गालिब, अनीस वगैरह। पर मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं, इसलिए काव्य-चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आये।
मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आमतौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनायी, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आये ही नहीं थे- वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है।
मैंने कहा- कुछ सुनाइए।
वे बोले- मैं आपसे कुछ लेने आया हूं।
मैंने समझा ये शायद ज्ञान लेने आये हैं।
मैंने सोचा- यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा।
पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे- हम तो आपसे कुछ लेने आये हैं।
मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आये हैं।
कविताएं उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए।
उठने लगे तो बोले- डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा।
मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मन्त्री से कह दूंगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं।
एक घण्टे जानकर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना- मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आये। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बर्ताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है।
डीन मेरे यार हैं। कहने लगे- यार चलो केण्टीन में, अच्छी चाय पी जाय। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाय।
अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके।
हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गये कि मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूं। आज यह लालसा पूर्ण हुई।(हालांकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।)
अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है- 'टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट'- याने थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली।
शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आये। कहने लगे- डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कांपियां भी- और 'माडरेशन' के लिए बुला लें तो और अच्छा है।
मैंने कहा- मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूंगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी।
बेचारे क्या जवाब देते? अशुद्ध बेवकूफ मैं- मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है।
एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गये। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आये हैं। वे पसीना पोंछकर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूं। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूं। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है।
घण्टे-भर राजनीतिक बातें हुईं।
वे उठे तो कहने लगे- मुझे जरा दस रुपये दे दीजिए।
मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपये में निपट गई।
एक दिन एक नीति वाले भी आ गये। बड़े तैश में थे।
कहने लगे- हद हो गयी! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए।
मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूं न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा।
वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए।
मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उल्टा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं।
वे बोले- याने बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है?
मैंने कहा- आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सुअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाईये कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएं।
वे बोले- बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुम्बा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सिलेक्शन हो जाएगा।
मैंने कहा- कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कालरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं।
वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गयी।
मैंने कहा- आप जाइए। निश्चिंत रहिए- लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूं करूंगा।
वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बनने-वाले 'अशुद्ध' बेवकूफ के अलग मजे हैं।
मुझे याद आया गुरु कबीर ने कहा था- 'माया महा ठगनि हम जानी'।

-हरिशंकर परसाई

रविवार, 13 अगस्त 2017

स्नेहमयी 'दीदी'.....हिन्दी साहित्य मंच से

महादेवी वर्मा को जब ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, तो एक साक्षात्कार के दौरान उनसे पूछा गया था, 'आप इस एक लाख रुपये का क्या करेंगी? '

कहने लगी, 'न तो मैं अब कोई क़ीमती साड़ियाँ पहनती हूँ,  न कोई सिंगार-पटार कर सकती हूँ, ये लाख रुपये पहले मिल गए होते तो भाई को चिकित्सा और दवा के अभाव में यूँ न जाने देती, कहते-कहते उनका दिल भर आया।  कौन था उनका वो 'भाई'?  हिंदी के युग-प्रवर्तक औघड़-फक्कड़-महाकवि पंडित सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला', महादेवी के मुंहबोले भाई थे।

एक बार वे रक्षा-बंधन के दिन सुबह-सुबह जा पहुँचे अपनी लाडली बहन के घर और रिक्शा रुकवाकर चिल्लाकर द्वार से बोले,  'दीदी, जरा बारह रुपये तो लेकर आना।'  महादेवी रुपये तो तत्काल ले आई, पर पूछा, 'यह तो बताओ भैय्या, यह सुबह-सुबह आज बारह रुपये की क्या जरूरत आन पड़ी?

हालाँकि, 'दीदी' जानती थी कि उनका यह दानवीर भाई रोजाना ही किसी न किसी को अपना सर्वस्व दान कर आ जाता है, पर आज तो रक्षा-बंधन है, आज क्यों?


निरालाजी सरलता से बोले, "ये दुई रुपया तो इस रिक्शा वाले के लिए और दस रुपये तुम्हें देना है। आज राखी है ना!  तुम्हें भी तो राखी बँधवाई के पैसे देने होंगे।"
ऐसे थे फक्कड़ निराला और ऐसी थी उनकी वह स्नेहमयी 'दीदी'।
प्रस्तुति करणः मनोहर वासवानी
मोबाइलः 9404825544

शुक्रवार, 11 अगस्त 2017

एक छोटी सी अच्छी कहानी.... हिन्दी एरा

विडम्बना है कि आज समाज में अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए मानव कहीं भी माथा टेकने को गुरेज नहीं करता है। ऐसी ही एक कहानी जो मैंने कभी अपने पिताजी से सुनी थी आज कहीं पढ़ने को मिल गयी तो सोचा क्यों न इसे अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट किया जाए।

किसी मजार पर एक फ़क़ीर रहते थे। सैकड़ों भक्त उस मजार पर आकर दान-दक्षिणा चढ़ाते थे। उन भक्तों में एक बंजारा भी था। वह बहुत गरीब था फिर भी नियमानुसार आकर माथा टेकता, फ़क़ीर की सेवा करता और फिर अपने काम पर जाता। उसके कपडे का व्यवसाय था, कपड़ों की भारी पोटली कन्धों पर लिए सुबह से लेकर शाम तक गलियों में फेरी लगाता। एक दिन उस फ़क़ीर को उस पर दया आ गयी, उसने अपना गधा उसे भेंट कर दिया। अब तो बंजारे की आधी समस्याएं हल हो गयी।

वह सारे कपडे गधे पर लादता और जब थक जाता तो खुद भी गधे पर बैठ जाता। यूँ ही कुछ महीने बीत गए और फिर एक दिन गधे की मौत हो गयी। बंजारा बहुत दुखी हुई, उसने उसे उचित स्थान पर दफनाया, उसकी कब्र बनायीं और फूट-फूट के रोने लगा। समीप से जा रहे किसी व्यक्ति ने जब ये देखा तो सोचा जरूर ये किसी संत की मजार होगी। तभी ये आदमी यहाँ बैठकर अपना दुःख रो रहा है।
यह सोचकर उस व्यक्ति ने कब्र पर माथा टेका और अपनी मन्नत हेतु वहां प्रार्थना की और कुछ पैसे चढ़ाकर वहां से चला गया। कुछ दिनों के उपरांत ही उस व्यक्ति की कामना पूर्ण हो गयी। उसने खुशी के मारे सारे गावं में डंका बजाया कि अमुक स्थान पर एक बहुत बड़े फ़क़ीर की मजार हैं। वहां जाकर जो अरदास करो वो पूरी  होती है। मन चाही मुरादें बख्शी जाती हैं वहां।

उस दिन से उस कब्र पर भक्तो का ताँता लगना शुरू हो गया। दूर-दराज से भक्त अपनी मुरादें बख्शाने वहां आने लगें। बंजारे की तो चांदी हो गयी, बैठे-बैठे उसे कमाई का साधन मिल गया था।

एक दिन वही फ़क़ीर, जिन्होंने बंजारे को अपना गधा भेंट स्वरुप दिया था वहां से गुजर रहे थे। उन्हें देखते ही बंजारे ने उनके चरण पकड़ लिए,”आपके गधे ने तो मेरी ज़िन्दगी बना दी। जब तक जीवित था तब तक मेरे रोजगार में मेरी मदद करता था और मरने के बाद मेरी जीविका का साधन बन गया है।”
फ़क़ीर हँसते हुए बोले,”बच्चा! जिस मजार पर तू नित्य माथा टेकने आता था वह मज़ार इस गधे के माँ की थी।”

रविवार, 6 अगस्त 2017

सुखी व्यक्ति की खोज ..... व्हाट्स एप्प से


चाँदपुर इलाके के राजा कुँवरसिंह जी बड़े अमीर थे। उन्हें किसी चीज़ की कमी नहीं थी, फिर भी उनका स्वास्थ्य अच्छा नहीं था। बीमारी के मारे वे सदा परेशान रहते थे। कई वैद्यों ने उनका इलाज किया, लेकिन उनको कुछ फ़ायदा नहीं हुआ।

राजा की बीमारी बढ़ती गई। सारे नगर में यह बात फैल गई। तब एक बूढ़े ने राजा के पास आकर कहा, ''महाराज, आपकी बीमारी का इलाज करने की मुझे आज्ञा दीजिए।'' राजा से अनुमति पाकर वह बोला, ''आप किसी सुखी मनुष्य का कुरता पहनिए, अवश्य स्वस्थ हो जाएँगे।''

बूढ़े की बात सुनकर सभी दरबारी हँसने लगे, लेकिन राजा ने सोचा, ''इतने इलाज किए हैं तो एक और सही।'' राजा के सेवकों ने सुखी मनुष्य की बहुत खोज की, लेकिन उन्हें कोई पूर्ण सुखी मनुष्य नहीं मिला। सभी लोगों को किसी न किसी बात का दुख था।

अब राजा स्वयं सुखी मनुष्य की खोज में निकल पड़े। बहुत तलाश के बाद वे एक खेत में जा पहुँचे। जेठ की धूर में एक किसान अपने काम में लगा हुआ था। राजा ने उससे पूछा, ''क्यों जी, तुम सुखी हो?'' किसान की आँखें चमक उठी, चेहरा मुस्करा उठा। वह बोला, ''ईश्वर की कृपा से मुझे कोई दुख नहीं है।'' यह सुनकर राजा का अंग-अंग मुस्करा उठा। उस किसान का कुरता माँगने के लिए ज्यों ही उन्होंने उसके शरीर की ओर देखा, उन्हें मालूम हुआ कि किसान सिर्फ़ धोती पहने हुए है और उसकी सारी देह पसीने से तर है।

राजा समझ गया कि श्रम करने के कारण ही यह किसान सच्चा सुखी है। उन्होंने आराम-चैन छोड़कर परिश्रम करने का संकल्प किया।
थोड़े ही दिनों में राजा की बीमारी दूर हो गई।"

.....व्हाट्स एप्प से
कुलदीप सिंह ठाकुर


शनिवार, 5 अगस्त 2017

तुलसी विवाह......ऋषभ आदर्श


"अरे शकरकन्द उबल गया है तो गुड़ मिला दे..हलवा जल्दी बना मुहूर्त निकल जाएगा," माँ आँगन में चावल के घोल और सिंदूर से रंगोलियाँ बनाते हुए निर्देश दे रहीं थीं।

ग्यारह वर्षीय दया अनमने भाव से कड़ाही में कड़छी घुमा रही थी। माँ ने उसे ऐसा करते देखा तो पीछे से एक चपत जमाते हुए बोली, "क्यों री समझ नहीं आती तेरे को बात? अभी तक तुलसी नहीं सजाई, ला दे कड़छी और जा तैयार हो जा।" माँ ने झिड़कते स्वर में कहा।

दया सरक कर रसोई की चौखट पर खड़ी हो गयी। उसकी आँखें डबडबाती जा रहीं थीं, माँ ने उसकी नज़रों में उतर आई बूँदों को देखा तो उसके पास आकर चिंतित स्वर में पूछा, "का हुआ दया? ऐसे काहे गुमसुम हो गयी?"

"माँ हम नहीं सजायेंगे तुलसी, हमको नहीं करना तुलसी ब्याह," सुबकते हुए दया की आवाज़ निकली।

"ऐसा काहे बोल रही? पूजा अच्छे से करेगी तो तेरा पति भी बिसनू भगवान जईसा मिलेगा ना! और जल्दी भी। तेरी गुड़िया...," माँ ने समझाया।

"हमका नहीं चाहिए बिसनू!" दया अचानक ज़ोर से बोली, फिर सिसकियाँ लेते हुए कहना शुरू किया....

"पिछला साल लछमी भी करी थी अइसने तुलसी ब्याह पूजा-पाठ फिर उसका भी ब्याह हो गया। देखो उसका गुड्डा गुड़िया भी यहीं रह गया और उ चली गयी। कोई हमरे साथ खेलने वाली सहेली भी नही अब।"

सिसकियाँ गूँज-गूँज कर माहौल में स्तब्धता फैला रहीं थीं, तुलसी भी नहीं चाहती थी कि उसे कोई अभी सजाये, मानो कह रही हो देखो मेरा "क़द" छोटा बहुत है। मैं तैयार नहीं अभी।


-ऋषभ आदर्श
सिमडेगा, झारखण्ड