गुरुवार, 3 अगस्त 2017

वो दिखा तो कुछ न बात किया......हिन्दी साहित्य मंच से

रातभर जिसने मुझे याद किया
वो दिखा तो कुछ न बात किया

आज भी उसने बड़ी खामोशी से
जाने क्या-क्या फरियाद किया

टिमटिमाती हुई दो आंखों से
कुछ सितारों को बर्बाद किया

बांधकर हमसे अपने दिल को
उसने हमको आजाद किया 
...हिन्दी साहित्य मंच से

बुधवार, 2 अगस्त 2017

टूटा पहिया....धर्मवीर भारती



मैं
रथ का टूटा पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंकों मत
क्या जाने कब
इस दुरूह चक्रव्यूह में
अक्षौहिणी सेनाओं को चुनौती देता हुआ
कोई दुस्साहसी अभिमन्यु घिर जाए?
अपने पक्ष को असत्य जानते हुए भी
बड़े- बड़े महारथी
अकेली निहत्थी आवाज को
अपने ब्रह्मास्त्रों से कुचल देना चाहें

तब मैं
रथ का टूटा पहिया
उसके हाथों में
ब्रह्मास्त्रों से लोहा ले सकता हूँ !
मैं रथ का टूटा पहिया हूँ
लेकिन मुझे फेंको मत
इतिहासों की सामूहिक गति
सहसा झूठी पड़ जाने पर
क्या जाने
सच्चाई टूटे हुए पहियों का आश्रय ले!


- धर्मवीर भारती

मंगलवार, 1 अगस्त 2017

मांस का मूल्य.....व्हाट्सएप्प से


मगध सम्राट बिंन्दुसार ने एक बार अपनी सभा मे पूछा : 

देश की खाद्य समस्या को सुलझाने के लिए सबसे 
सस्ती वस्तु क्या है?
मंत्री परिषद् तथा अन्य सदस्य सोच में पड़ गये ! चावल, गेहूं, ज्वार, बाजरा आदि तो बहुत श्रम के बाद मिलते हैं और वह भी तब, जब प्रकृति का प्रकोप न हो, ऎसी हालत में अन्न तो सस्ता हो ही नहीं सकता !

तब शिकार का शौक पालने वाले एक सामंत ने कहा : राजन, सबसे सस्ता खाद्य पदार्थ मांस है, 


इसे पाने मे मेहनत कम लगती है और पौष्टिक वस्तु खाने को मिल जाती है । सभी ने इस बात का समर्थन किया, लेकिन प्रधान मंत्री चाणक्य चुप थे । 
तब सम्राट ने उनसे पूछा : आपका इस बारे में क्या मत है ? 

चाणक्य ने कहा : मैं अपने विचार कल आपके समक्ष रखूंगा !

रात होने पर प्रधानमंत्री उस सामंत के महल पहुंचे, सामन्त ने द्वार खोला, इतनी रात गये प्रधानमंत्री को देखकर घबरा गया ।

प्रधानमंत्री ने कहा : शाम को महाराज एकाएक बीमार हो गये हैं, राजवैद्य ने कहा है कि किसी बड़े आदमी के हृदय का दो तोला मांस मिल जाए तो राजा के प्राण बच सकते हैं, 

इसलिए मैं आपके पास आपके हृदय  का सिर्फ दो तोला मांस लेने आया हूं । इसके लिए आप एक लाख स्वर्ण मुद्रायें ले लें ।

यह सुनते ही सामंत के चेहरे का रंग उड़ गया, उसने प्रधानमंत्री के पैर पकड़ कर माफी मांगी और उल्टे एक लाख स्वर्ण मुद्रायें देकर कहा कि इस धन से वह किसी और सामन्त के हृदय का मांस खरीद लें ।

प्रधानमंत्री बारी-बारी सभी सामंतों, सेनाधिकारियों के यहां पहुंचे और सभी से उनके हृदय का दो तोला मांस मांगा, लेकिन कोई भी राजी न हुआ, उल्टे सभी ने अपने बचाव के लिये प्रधानमंत्री को एक लाख, दो लाख, पांच लाख तक स्वर्ण मुद्रायें दीं ।

इस प्रकार करीब दो करोड़ स्वर्ण मुद्राओं का संग्रह कर प्रधानमंत्री सवेरा होने से पहले वापस अपने महल पहुंचे और समय पर राजसभा में प्रधानमंत्री ने राजा के समक्ष दो करोड़ स्वर्ण मुद्रायें रख दीं । 

सम्राट ने पूछा : यह सब क्या है ? तब प्रधानमंत्री ने बताया कि दो तोला मांस खरिदने के लिए  इतनी धनराशि इकट्ठी हो गई फिर भी दो तोला मांस नही मिला 


राजन ! अब आप स्वयं विचार करें कि मांस कितना सस्ता है ?

जीवन अमूल्य है, हम यह न भूलें कि जिस तरह हमें अपनी जान प्यारी है, उसी तरह सभी जीवों को भी अपनी जान उतनी ही प्यारी है । किंतु अंतर बस इतना है कि मनुष्य अपने प्राण बचाने हेतु हर सम्भव प्रयास कर सकता है । बोलकर, रिझाकर, डराकर, रिश्वत देकर आदि आदि । 

पशु न तो बोल सकते हैं, न ही अपनी व्यथा बता सकते हैं । तो क्या बस इसी कारण उनस जीने का अधिकार छीन लिया जाय ।

हिन्दू धर्म के अनुसार हर किसी को स्वेच्छा से जीने का अधिकार है, प्राणी मात्र की रक्षा हमारा धर्म है..!

शुद्ध आहार, शाकाहार !
मानव आहार, शाकाहार !

.....................व्हाट्सएप्प से

सोमवार, 31 जुलाई 2017

माँ – अनोखे रूप....विश्वनाथ त्रिपाठी

काशी दशाश्वमेघ घाट पर अनेक छोटे-बड़े मंदिर हैं, उन्ही में से एक छोटा- सा मंदिर गंगा में अधडूबा सा है, नौका-विहार करते समय एक मल्लाह  ने मुझे उस भग्न अध डूबे मंदिर की कहानी सुनाई|

एक बुड्ढी विधवा थी, उसका एक बेटा था| बुढ़िया ने मेहनत मजदूरी करके बेटे को पढ़ाया-लिखाया| बेटा बुद्धिमान था, पढ़-लिखकर बड़ा अफसर बन गया|वह अपनी माँ के दिन भूला नहीं , गंगा-तट पर उसने मंदिर बनवाया|

मंदिर बन गया तो माँ से बोला – माँ तूने मेरे लिए इतना किया| मैंने तेरे लिए मंदिर बनवा दिया है, अब तू इधर-उधर मत जा| इसी मंदिर में भगवान की पूजा कर| तूने मेरे लिए इतना किया मैंने भी मंदिर बनवा कर तेरे ऋण से मुक्त हो गया|

कहते हैं कि जैसे ही बेटे ने कहा- मैं तेरे ऋण से मुक्त हो गया वैसे ही मंदिर टूटकर गंगा जी में डूब गया|

मल्लाह ने मुझे बताया – वह यही मंदिर है|

रविवार, 30 जुलाई 2017

तो क्या…?..... कुमार शर्मा ‘अनिल’


 ज़्यादा पुरानी बात नहीं है। मात्रा तीन  महीने ही गुजरे होंगे  जब उसे अचानक अपनी चालीस बरस की  उम्र में   सोलह बरस की अनन्या  से प्रेम   हो  गया था।  उसने बहुत बार  सोचा था  कि यह वाकई में   प्रेम  है   या मात्रा  शारीरिक आकर्षण अथवा  पत्नी से नीरस बन चुके    सम्बन्धों से उकता जाकर कुछ नया  तलाशने  की  पुरुष की  आदिम   प्रवृत्ति। प्रेम  और  शारीरिक   आकर्षण में    अंतर की  बहुत  ही महीन  सी रेखा  होती  है  और  इन्हें  एकदम से अलग कर नहीं देखा  जा सकता।  अनन्या उसकी बेटी  की  अभी हाल  ही में  बनी सहेली थी   और लगभग   रोज  ही शाम   को पढ़ने उसके   घर  आती   थी।

‘‘तेरे  पापा  बहुत  ही हैण्डसम  और यंग  लगते   हैं’’ -अनन्या   ने उसकी बेटी  से  कहा   तो बेटी  ने  गर्व  महसूस  करते  हुए यह जुमला परिवार  में   सभी को ‘एज़ इट इज़’ बता दिया। अगले  दिन उसने जब अनन्या को  देखा  तो  उसकी दृष्टि  बदली हुई   थी।  अब वह उसकी बेटी  की सहेली नहीं   थी ; बल्कि  सिर्फ़ ‘अनन्या’ थी।  उसे वह  खूबसूरत गुड़िया – सी लगी। सोलह बरस की  खूबसूरत  लड़कियाँ  जिनके चेहरे की मासूमियत यह चुगली  खा रही  होती है  कि उनका बचपन अभी गया नहीं  है और शरीर  की  बढ़ती मांसलता यह बता रही होती है  कि जवानी ने  अपनी दस्तक दे दी   है, लगती भी गुड़िया – सी ही हैं। वह जब भी गुड़ियाओं को  देखता    था तब भी  उसके मन में   यह सवाल हमेशा आता  था  कि बच्चों  के खेलने के लिए बनी गुडि़याएँ   अपनी शारीरिक  बनावट में   इतनी  उत्तेजक क्यों बनाई   जाती हैं।

लापरवाही से भरी और  अल्हड़ता  से छलकती  सी बातबात में  ‘तो    क्या…?’ बोलने वाली अनन्या  की न तो  उम्र  इतनी थी  ,न उसमें इतनी   समझ ही  थी कि वह उसकी आँखों के  भावों   को  जान सके और  चेहरे  को  पढ़  सके…और उसकी उम्र   भी इतनी कहाँ   थी कि वह  अनन्या  जितनी छोटी, मासूम  - सी लड़की  का  हाथ पकड़   जाकर  कह सके कि‘‘तुम   बहुत  सुंदर हो’’   या‘‘ तुम मुझे  बहुत अच्छी लगती  हो’’।

बस यही दो   वाक्य थे  जो उसके  मस्तिष्क   में  गूंजते     थे   परंतु उसकी   उन्हें   कहने की हिम्मत नहीं पड़ती  थी।  वह इतनी बातूनी और  चंचल थी  कि बहुत  संभव था  कि वह प्रति उत्तर में   कह देती‘‘सुंदर   तो मैं    हूँ…तो क्या?’’वह   ऐसी  ही थी। चंचल,   बातूनी और अपनी सुंदरता  व परिवार   की  सम्पन्नता  के दंभ   या स्वाभिमान से  भरी…छलकती -सी लड़की।  इसमें उसका  कोई  दोष  भी नहीं   था ; क्योंकि बचपन से ही अपनी सुंदरता  की  बातें सुनते  हुए  ही  वह   बड़ी   हुई  थी।   लेकिन  पहली बार   देखने पर ही अनन्या   का  यह कहना ‘‘तेरे पापा  बहुत   ही हैण्डसम   और यंग  है’’ उसे हमेशा  इस अनजानी  राह पर आगे   बढ़ने के  लिए प्रेरित  करता - सा लगता।

तीन  माह तक  प्रेम  और   शारीरिक   आकर्षक के बीच   के अंतर की  जद्दोजहद से गुजरने  के पश्चात कल उसे  मौका मिल ही गया  जब अनन्या को  रात  ज्यादा हो  जाने पर उसे  कार में   घर  छोड़ने   जाना पड़ा।  सब कुछ अप्रत्याशित   था   उसके लिए।

‘‘तुम  मुझे बहुत अच्छी लगती  हो  अनन्या’’ उसने हिम्मत करके  उसे  बोल ही दिया।

‘‘तो  क्या…?।आप भी  मुझे  बहुत  अच्छे लगते  हो…।  पहले  दिन  से ही’’-अनन्या ने अपनी सीट बेल्ट खोली  और   उसके गाल पर एक लम्बा ‘किस’  रसीद कर दिया।

सब कुछ इतनी  जल्दी घट  जाएगा  और इतना  अप्रत्याशित,   इसकी उसने कल्पना  भी नहीं की   थी।  उसे लगा  वह  खुशी  से पागल  हो   जाएगा।

‘‘पहली नजर  में   ही  मुझे तुमसे प्यार  हो  गया था’’उसने  प्यार  से अनन्या का हाथ पकड़ लिया-‘‘ पर तुम मुझसे इतनी  छोटी  हो  कि मेरी हिम्मत   ही  नहीं  पड़ती  थी कि तुम्हें कह सकूँ  कि मैं तुम्हें     प्यार करता हूँ।’’

‘‘छोटी  हूँ  तो  क्या?  हमारे मैथ्स के टीचर राकेश सर तो आपसे भी   बड़े  हैं। सुरभि और राकेश  सर भी  तो  आपस  में  बहुत प्यार करते हैं।  वो  तो   आपस  में …’

उसने एक झटके से अनन्या का हाथ  छोड़  दिया।  ‘‘सुरभि’’…शब्द उसके  दिमाग में फँस _सा गया।

‘‘प्यार ही  तो करते हैं  तो  क्या…?’’ अनन्या  उसी  मासूमियत से  उसका  चेहरा देखने  लगी।

सुरभि  उसकी अपनी बेटी  थी।

-0-कुमार   शर्मा ‘अनिल’ -0-

संपर्क : म नं 46,  रमन एनक्लेव, 
छज्जू  माजरा, 
खरड़ सेक्टर–117,    
ग्रेटर मोहाली–140301  (पंजाब)

शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

"एक प्यार ऐसा भी....व्हाट्स एप्प से


नींद की गोलियों की आदी हो चुकी
बूढ़ी माँ नींद की गोली के लिए ज़िद कर रही थी।

बेटे की कुछ समय पहले शादी हुई थी।

बहू डॉक्टर थी। 
बहू सास को नींद की दवा की लत के नुक्सान के बारे में बताते
हुए उन्हें गोली नहीं देने पर अड़ी थी।

जब बात नहीं बनी तो सास ने गुस्सा
दिखाकर नींद की गोली पाने का प्रयास किया।

अंत में अपने बेटे को आवाज़ दी।

बेटे ने आते ही कहा,'माँ मुहं खोलो।

पत्नी ने मना करने पर भी बेटे ने जेब से एक दवा का पत्ता निकाल कर एक छोटी पीली गोली माँ के मुहं में डाल दी।

पानी भी पिला दिया। गोली लेते ही आशीर्वाद देती हुई

माँ सो गयी।

पत्नी ने कहा....ऐसा नहीं करना चाहिए।'

पति ने दवा का पत्ता अपनी पत्नी को दे दिया।

विटामिन की गोली का पत्ता देखकर पत्नी के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी।
धीरे से बोली....
आप माँ के साथ चीटिंग करते हो।

''बचपन में माँ ने भी चीटिंग करके
कई चीजें खिलाई है।
पहले वो करती थीं,

अब मैं बदला ले रहा हूँ।
यह कहते हुए बेटा मुस्कुराने लगा।"

.....व्हाट्स एप्प से

गुरुवार, 27 जुलाई 2017

कुण्डलिया काका की....समापन किस्त

पिछले अंक से आगे....

नाम बड़े दर्शन छोटे / काका हाथरसी 
सुखीरामजी अति दुखी, दुखीराम अलमस्त,
हिकमतराय हकीमजी रहें सदा अस्वस्थ।
रहें सदा अस्वस्थ, प्रभु की देखो माया,
प्रेमचंद में रत्ती-भर भी प्रेम न पाया।
 कह ‘काका’ जब व्रत-उपवासों के दिन आते, 
त्यागी साहब, अन्न त्यागकार रिश्वत खाते।

रामराज के घाट पर आता जब भूचाल,
लुढ़क जायं श्री तख्तमल, बैठें घूरेलाल।
बैठें घूरेलाल, रंग किस्मत दिखलाती,
इतरसिंह के कपड़ों में भी बदबू आती।
कह ‘काका’, गंभीरसिंह मुंह फाड़ रहे हैं,
महाराज लाला की गद्दी झाड़ रहे हैं।

दूधनाथजी पी रहे सपरेटा की चाय,
गुरू गोपालप्रसाद के घर में मिली न गाय।
घर में मिली न गाय, समझ लो असली कारण-
मक्खन छोड़ डालडा खाते बृजनारायण।
‘काका’, प्यारेलाल सदा गुर्राते देखे,
हरिश्चंद्रजी झूठे केस लड़ाते देखे।

रूपराम के रूप की निन्दा करते मित्र,
चकित रह गए देखकर कामराज का चित्र।
कामराज का चित्र, थक गए करके विनती,
यादराम को याद न होती सौ तक गिनती,
कह ‘काका’ कविराय, बड़े निकले बेदर्दी,
भरतराम ने चरतराम पर नालिश कर दी।

नाम-धाम से काम का क्या है सामंजस्य?
किसी पार्टी के नहीं झंडाराम सदस्य।
झंडाराम सदस्य, भाग्य की मिटें न रेखा,
स्वर्णसिंह के हाथ कड़ा लोहे का देखा।
कह ‘काका’, कंठस्थ करो, यह बड़े काम की,
माला पूरी हुई एक सौ आठ नाम की।
- काका हाथरसी