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गुरुवार, 31 अगस्त 2017

बने भगवान बैठे हैं.....राहुल कुमार

यहाँ कुछ लोग तो खुद को, खुदा ही मान बैठे हैं 
कराते अपनी' ही पूजा बने भगवान बैठे हैं।

मगर है जुर्म औ दहशत, ही' कारोबार बस इनका 
के हिन्दुस्तान में कैसे, ये' तालेबान बैठे हैं।

जिन्हें तो खुद भुगतनी है, सजा अपने ही' कर्मों की 
न जाने और कितनों को दिये वरदान बैठे हैं।

हो' रहबर और रहजन की, भला पहचान कैसे अब 
ये मुजरिम ही समस्या का लिए संज्ञान बैठे है।

लगाकर राम का आता, मुखौटा अब तो' रावण भी 
न जाने औ छुपे कितने यहाँ शैतान बैठे हैं।

कोई किस्सा नहीं बस दर्ज ये तो इक हकीकत है 
ये सब "होरी" यहाँ दिल में लिए "गोदान" बैठे हैं।

- राहुल कुमार (नयानगर, समस्तीपुर) 
9776660562
रहजन= डाकू  ; रहबर =मार्गदर्शक

रविवार, 27 अगस्त 2017

तुम्हें बेवफा मान लेते जो पहले...नवीन मणि त्रिपाठी

122 122 122 122 
अगर मेरे दिल पे हुकूमत न होती ।
तो फिर आपकी भी रियासत न होती ।।

पलट जाती कश्ती भी तूफां में मेरी ।
मेरे पास उनकी नसीहत न होती ।।

बहुत कुछ बदलते फ़िजा के नज़ारे ।
अगर आपकी कुछ सियासत न होती ।।

जरा सा भी वो थाम लेते जो दामन ।
यहां आसुओं की इज़ाफ़त न होती ।।

वो मेरा सुकूँ भी मेरे साथ रहता ।
अदाओं में थोड़ी शरारत न होती ।।

वो इंसाफ करता न अब तक जहां में ।
कहीं भी खुदा की इबादत न होती ।।

बरसते न बादल भी प्यासी जमीं पर ।
अगर आपकी कुछ इज़ाज़त न होती।।

मुहब्बत के रिश्ते न होते सलामत ।
तो फिर ताज जैसी इमारत न होती ।।

यूँ लहरा के जुल्फ़े न करतीं नुमाइश ।
तो अहले चमन में कयामत न होती ।।

तुम्हें बेवफा मान लेते जो पहले ।
कसम से वफ़ा की फ़जीहत न होती ।।
-- नवीन मणि त्रिपाठी

शनिवार, 26 अगस्त 2017

आईना भी ख़फ़ा हो गया.....डॉ.यासमीन ख़ान

तू जो मुझसे जुदा हो गया
आईना भी ख़फ़ा हो गया।।

ढ़ूंढ़ती हूँ उसे दर- ब- दर।
जो हसीं पल हवा हो गया।।

पहले ऐसा नहीं था कभी 
वक्त क्यों बेवफ़ा हो गया।।

याद आने लगी है तेरी
ज़ख़्मे दिल फिर हरा हो गया।।

भूख वो ही,वही मुफ़लिसी।
साल कैसे नया हो गया।।

मंज़िलों के लिये आज तो।
जिस्म भी रास्ता हो गया।।

फ़िक़्र है हम सभी की यही।
क्या तवक़्क़ो थी क्या हो गया।।

"यास्मीं" अब तिरा ये बदन।
ख़्वाब का मक़बरा हो गया।।

-डॉ.यासमीन ख़ान