रविवार, 11 फ़रवरी 2018

सुने कौन ?....संकलित

               
                 एक राजा के दरबार में एक ऋषि पहुंचे, साथ में था पिंजरे में एक कौआ। राजा को ऋषि का आशय समझ में नहीं आया।

उन्होंने पूछा, ‘मुनिवर! आप कौआ लेकर क्यों चल रहे हैं? तोता या कबूतर लेकर क्यों नहीं ?’ ऋषि बोले, ‘सभी पशु-पक्षियों के अपने-अपने गुण होते हैं। पर कौए का विशेष गुण हमें सतर्क करता है। कौआ ही एक ऐसा पक्षी है, जो किसी व्यक्ति को देखकर उसके मन के भाव और क्रियाकलाप भी समझ जाता है। 

           आपके राजदरबार के अंदर आते हुए उसने आपके एक-एक अधिकारी और कर्मचारियों के गुण-दोष बता दिए। मुझे आश्चर्य है कि आप इतने चाटुकारों और भ्रष्ट आचरण वालों से घिरे रहकर प्रजा के कल्याण के कार्य कैसे कर पाते हैं ?’ ऋषि की बात सुनकर दरबार में कंपन हुआ। राजा ने समझा कि वे ऋषि उनके लिए बड़े उपयोगी होंगे। उन्हें अतिथि गृह में ठहरा दिया गया। 

           दूसरे दिन ऋषि फिर राजदरबार में आए। इस बार उनके साथ कौआ नहीं था। राजा ने कौए के बारे में पूछा तो ऋषि ने कहा, ‘आपके दरबार में बड़े भ्रष्ट लोग हैं। उन्हें पता चल गया है कि कौए के माध्यम से मैं आपको उनके बारे में बताऊंगा। इसलिए किसी ने तीर से मुझ पर वार किया। मैं तो बच गया। पर मेरा कौआ मारा गया।’ राजा को यह बात सुनकर बड़ा क्रोध आया। वे बोले, ‘मैं उस दुष्ट को कड़ी सजा दूंगा।’ 
            ऋषि मुस्कराकर बोले, ‘राजन! उस दुष्ट का पता लगाने में आपको कई वर्ष बीत जाएंगे। शायद तीर मारने वाले का पता भी न चले। मेरा कौआ होता तो तुरंत बता देता। आप भी अपने आस-पास कौए के गुण वाले व्यक्ति रखिए।’ अक्सर सही बात बताने वाले को पुरस्कृत नहीं, दंडित ही किया जाता है। 

             इसलिए समाज में सही बोलने वालों की कमी है। राजसत्ता में बैठे लोगों को अपनी प्रशंसा सुनने में ही आनंद आता है। इसलिए वे सही स्थिति से अवगत नहीं हो पाते। 

          हमारे समाज में कौए के गुण रखने वाले व्यक्तियों की कमी नहीं है। वे खुद सतर्क रहते हैं। दूसरों को भी तत्काल आने वाले खतरों से सावधान करते रहते हैं। पर उनकी सुनता कौन है ? सुनने वालों की ही कमी है, बोलने वालों की नहीं। 

        कौए की आवाज सुनकर हम अनुमान लगाते हैं कि कोई मेहमान आने वाला है। और भी बातों की सूचना देता होगा कौआ। काश! हम उसकी भाषा समझ पाते। 

          सूचना क्रांति के युग में कौए का महत्व बढ़ना चाहिए। कम से कम कौए की बुद्धि और गुण रखने वालों की पूछ बढ़नी ही चाहिए। पर सच-सच बताने वालों की परिणति भी उस साधु के कौए की ही तरह होती है। फिर सचाई बताए कौन ? सचाई किसी से छिपती नहीं, पर बोले कौन ?  सुने कौन ?

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