गुरुवार, 31 अगस्त 2017

बने भगवान बैठे हैं.....राहुल कुमार

यहाँ कुछ लोग तो खुद को, खुदा ही मान बैठे हैं 
कराते अपनी' ही पूजा बने भगवान बैठे हैं।

मगर है जुर्म औ दहशत, ही' कारोबार बस इनका 
के हिन्दुस्तान में कैसे, ये' तालेबान बैठे हैं।

जिन्हें तो खुद भुगतनी है, सजा अपने ही' कर्मों की 
न जाने और कितनों को दिये वरदान बैठे हैं।

हो' रहबर और रहजन की, भला पहचान कैसे अब 
ये मुजरिम ही समस्या का लिए संज्ञान बैठे है।

लगाकर राम का आता, मुखौटा अब तो' रावण भी 
न जाने औ छुपे कितने यहाँ शैतान बैठे हैं।

कोई किस्सा नहीं बस दर्ज ये तो इक हकीकत है 
ये सब "होरी" यहाँ दिल में लिए "गोदान" बैठे हैं।

- राहुल कुमार (नयानगर, समस्तीपुर) 
9776660562
रहजन= डाकू  ; रहबर =मार्गदर्शक

बुधवार, 30 अगस्त 2017

शब्द.....श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


मेरे लिये शब्द एक औजार है.
भीतर की टूट-फूट
उधेडबुन अव्यवस्था और अस्वस्थता
की शल्यक्रिया के लिये।

शब्द एक आईना,
यदा-कदा अपने स्वत्व से 
साक्षात्कार के लिये।

मेरे लिये शब्द संगीत है.
ज़िन्दगी के सारे राग
और सुरों को समेटे हुए।

दोपहर की धूप में भोर की चहचहाट है तो 
रात की कालिख़ में नक्षत्रों की टिमटिमाहट।

मेरे लिये शब्द एक ढाल है,
चाही-अनचाही लड़ाइयों में
अपनी सुरक्षा के लिये।

मेरे लिये शब्द आँसू हैं,
यंत्रणा और विषाद की अभिव्यक्ति के लिये।
हताशा की भंवरों से लड़ने का सम्बल है।

शब्द एक रस्सी की तरह,
मन के अन्धे गहरे कुएं में 
दफ़न पड़ी यादों को खंगालने के लिये।

शब्द एक प्रतिध्वनि है,
वीरान/ अकेली/ निर्वासित नगरी में
हमसफ़र की तरह
साथ चलने के लिये।


-श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


मंगलवार, 29 अगस्त 2017

माँ की व्यथा....आभा नौलखा


आज यह कड़ा निर्णय लेते हुए निकुंज की आँखों के सामने उसकी पूरी जिंदगी एक चलचित्र की भाँति घूम गई। उसे आज भी याद है वह शाम जब मम्मी-पापा ने उसे उसकी ज़िन्दगी से परिचित कराया था कि वह एक हिजड़ा है। पर यह सब बताने से पहले ही उसे इतना सशक्त बना दिया था कि यह बात उसे अपने लक्ष्य से हिला न सकी। उसने कड़ा निर्णय लिया कि वह अपने माता-पिता को उनकी इस मेहनत का फल अपनी मेहनत से देगी। और एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी पाकर सपना पूरा किया। वहीं तो उसकी मुलाक़ात अभय से हुई थी और कब प्यार हो गया पता ही न चला और निकुंज के बारे में सब पता चलने के बाद भी अभय का फ़ैसला न बदला। दोनों का विवाह हो गया, कुछ समय पश्चात उन्होंने निलेश को गोद ले लिया। कितना अच्छा जीवन बीत रहा था कि... निलेश बारह साल का ही तो था कि अभय का अकस्मात निधन हो गया, पर निकुंज ने हिम्मत न हारी...।
....अब वह समय आ गया है कि निलेश को सब कुछ बता दिया जाए, क्योंकि अब वह अट्ठारह बरस का हो गया है।
....पर, निलेश यह सुनते ही चिल्ला पड़ा!
....मतलब मैं अनाथ हूँ और तुम एक हिजड़ा...!
....एक हिजड़े के हाथों मेरा पालन-पोषण...छी...!
-आभा नौलखा

सोमवार, 28 अगस्त 2017

लिखने वाला क्यों लिखता है....पावनी दीक्षित "जानिब"

लिखने वाला क्यों लिखता है मिलन के साथ बिछोड़े 
दिल में प्यार का महल बनाकर ये बनके पत्थर तोड़े। ।

कोई कसक है धड़कन में दिल मुश्किल से धड़कता है
जाने कैसी याद है तेरी जो बस सांस है दिल से जोड़े ।

दर्द हमारे बसमें नहीँ है चाहत में कोई रस्में नहीं हैं 
बह ना जाए दुनिया निगोड़ी मैनें अश्कों के बांध है छोड़े ।

अब सोचूं मुझे भूल गए हो फिर सोचूं तुम रूठ गए हो 
टूटे दिल के टुकड़े लेकर मैंने कितनी बार हैं जोड़े।

आसां नहीं दिलका लगाना इश्क़ का मतलब ही है मिटाना
इस बैरन चाहत की गली में अब कोई कदम न मोंड़े ।

"जानिब" मेरी आह में ढलके आए लब पे गीत मचलके
अपना क्या है कट ही जाएंगे जीवन के दिन थोड़े ।
-पावनी दीक्षित "जानिब"
महफिल से...

रविवार, 27 अगस्त 2017

तुम्हें बेवफा मान लेते जो पहले...नवीन मणि त्रिपाठी

122 122 122 122 
अगर मेरे दिल पे हुकूमत न होती ।
तो फिर आपकी भी रियासत न होती ।।

पलट जाती कश्ती भी तूफां में मेरी ।
मेरे पास उनकी नसीहत न होती ।।

बहुत कुछ बदलते फ़िजा के नज़ारे ।
अगर आपकी कुछ सियासत न होती ।।

जरा सा भी वो थाम लेते जो दामन ।
यहां आसुओं की इज़ाफ़त न होती ।।

वो मेरा सुकूँ भी मेरे साथ रहता ।
अदाओं में थोड़ी शरारत न होती ।।

वो इंसाफ करता न अब तक जहां में ।
कहीं भी खुदा की इबादत न होती ।।

बरसते न बादल भी प्यासी जमीं पर ।
अगर आपकी कुछ इज़ाज़त न होती।।

मुहब्बत के रिश्ते न होते सलामत ।
तो फिर ताज जैसी इमारत न होती ।।

यूँ लहरा के जुल्फ़े न करतीं नुमाइश ।
तो अहले चमन में कयामत न होती ।।

तुम्हें बेवफा मान लेते जो पहले ।
कसम से वफ़ा की फ़जीहत न होती ।।
-- नवीन मणि त्रिपाठी

शनिवार, 26 अगस्त 2017

आईना भी ख़फ़ा हो गया.....डॉ.यासमीन ख़ान

तू जो मुझसे जुदा हो गया
आईना भी ख़फ़ा हो गया।।

ढ़ूंढ़ती हूँ उसे दर- ब- दर।
जो हसीं पल हवा हो गया।।

पहले ऐसा नहीं था कभी 
वक्त क्यों बेवफ़ा हो गया।।

याद आने लगी है तेरी
ज़ख़्मे दिल फिर हरा हो गया।।

भूख वो ही,वही मुफ़लिसी।
साल कैसे नया हो गया।।

मंज़िलों के लिये आज तो।
जिस्म भी रास्ता हो गया।।

फ़िक़्र है हम सभी की यही।
क्या तवक़्क़ो थी क्या हो गया।।

"यास्मीं" अब तिरा ये बदन।
ख़्वाब का मक़बरा हो गया।।

-डॉ.यासमीन ख़ान

सोमवार, 21 अगस्त 2017

गाली.....-अरुण कुमार

दस बजे बड़े बाबू    ने   कार्यालय में   प्रवेश  किया और कुर्सी   पर बैठने  से पहले उस पर उँगली  फिराकर गुस्से और रौब से  चीखा,  ‘‘अबे  चरणदास … लगता है   तू   आज भी   देर से  ड्यूटी   पर आया,  जो तूने  मेज–कुर्सी   की   सफाई  नहीं की?’’

‘‘बाबू  जी, मैं    तो पौने   नौ  बजे ही आ  गया था।  आपकी मेज कुर्सी    तो   मैंने इसलिए छोड़    दी  कि आप दस  बजे आकर मुझसे दोबारा सफाई  करवाते तो  हैं   ही  , तो  क्यों न आपके  आने पर आपके सामने ही सफाई  कर दूँ…’’ चरणदास ने  सहजता से जवाब दिया तो  बड़ा बाबू  बुरी   तरह से  चिढ़ गया।  अपनी  खिसियाहट छुपाते हुए  बोला, ‘‘अच्छा–अच्छा… अब ज्यादा जिरह मत लगा  और फटाफट मेज–कुर्सी  साफ कर दे। दुनियाभर का काम पड़ा है   करने को।  अब तेरी तरह मजे की  नौकरी तो है नहीं    हमारी कि सारा दिन बैन्च  पर बैठे ऊँघते  रहें।’’

चरणदास बडे़ बाबू    की   मेज–कुर्सी झाड़कर  चुपचाप अपनी बैन्च  पर आ बैठा  था। उसका मन कुछ  बुझ–सा  गया था।  अब वह  अपने  हिस्से के सारे काम  तो  करता ही   है, पर बड़ा  बाबू   कभी    उसके  काम से  प्रसन्न   हुआ    हो  ऐसा   कभी प्रकट  में  नहीं    आया। चरणदास जानता है।  वह सब कुछ जानता   है    कि बड़ा  बाबू   उससे  इतनी नफरत क्यों  करता है!   क्यों  वह उसकी हर छोटी – सी बात में  दोष   ढूँढने  बैठ    जाता है।

बड़े बाबू    ने   मेज पर पड़ी  फाइलों   पर नोटिंग  चढ़ाकर एक तरफ रखा  तथा पैन्ट  की अन्दरूनी  जेब से   चाभी निकालकर मेज पर पटकते   हुए  हाँक लगायी,   ‘‘चरणदास… अल्मारी खोलकर  कैश बुक निकाल… सर्टिफिकेट   देना है!’’  चरणदास ने  अल्मारी खोलकर कैशबुक मेज पर रखी  ही थी  कि बड़ा बाबू   कैशबुक  देखते ही तैश में आ गया। चरणदास की तरफ लाल–पीली  आँखें   करता हुआ  गुर्राया, ‘‘अबे   तुझे  समझ  नहीं    है  क्या…  करंट वाली  कैशबुक  निकालकर ला। चरणदास ने  चुपचाप   वह  कैशबुक उठाकर अल्मारी में रखी  तथा वहाँ से  एक अन्य कैशबुक  उठाकर  ले आया।  उस कैशबुक   को देखते ही  बड़ा बाबू  आपे से बाहर हो  गया।  लगा चिल्लाने, ‘‘अबे  आज क्या तू  अपना  दिमाग घर  छोड़कर आया है  जो ऐसी  हरकतें कर रहा   है! ग्रीन जिल्द  वाली कैशबुक तू  रोज़   निकालकर  लाता है  और  आज देख  कैसे  जानबूझकर मुझे परेशान    कर रहा है   …!

बार–बार  के अपमान से आहत चरणदास के  भीतर  विरोध के  स्वर   उभर आए   थे।  वह कैशबुक   वहीं मेज पर छोड़कर बोला,   ‘‘मैं तो   अनपढ़ हूँ     बाऊजी! अब मुझे क्या   समझ कि आपको  क्या चाहिए! …  यह आपके  सामने चार कदम पर तो अल्मारी   है   …  आप थोड़ी   सी तकलीफ करो  और आपको   जो चाहिए   स्वयं  ही ले लो! यह कहकर चरणदास वापिस अपनी बैन्च  पर आकर बैठ  गया था।

चरणदास की इस क्रिया से बड़े बाबू    की क्रोघाग्नि  में घी  पड़   गया था,  मानो। वह कुर्सी को  पीछे  धकेलकर खड़ा   होता हुआ  चिल्लाया,    ‘‘अबे  ओ चूहड़े   के  बीज… तू   अपना ये चूहड़ापना घर  पर ही  छोड़कर आया कर … यहाँ हमारे सामने  दफ्तर में   अपनी गंदगी मत खिंडाया  कर…

जातिसूचक गाली सुनकर  चरणदास का खून  खौल  उठा।  दफ्तर और अपने   छोटे   पद  का खयाल कर बमुश्किल अपने गुस्से  को  पीता   हुआ बोला, ‘‘बाऊजी आप उम्र  में   और पद में   मुझसे बडे़   हैं।  आप ऊँची जाति से हैं    पर इसका मतलब यह तो  नहीं  कि आप मुझे जातिसूचक गाली देकर  बात करेंगे।  यह सब आपको शोभा नहीं   देता   है।

‘‘कहूँगा  मैं   तो तुझे  … चूहड़ा। चूहड़े  की औलाद!   तुझे जो  मेरा  बिगाड़ना है,  बिगाड़ले… जा!’’बडे़ बाबू    ने   चरणदास के अपने  प्रति मन में    बसी नफरत को   उल्टी  की तरह से उगला तथा बड़बड़ाता    हुआ    अपने काम में   लग गया।

चरणदास  का बाहर भीतर अपमान की आग में   जलने लगा था।  उसे लगा  कि अगर आज वह चुप बैठा  रह गया ,तो  यह आग तो  उसकी पीढ़यों को  जला देगी।  मन ही  मन कुछ  निश्चय कर वह उठा और  अपने प्रधान  रामआसरे को साथ  ले जाकर चौकी  में  बड़े बाबू  के  खिलाफ   पर्चा दे   दिया।

बड़े बाबू    को   जब पुलिस चौकी से  बुलावा आया तो  उसके सारे तेवर ढीले   पड़ गए। चौकी इंचार्ज उसे  समझाते हुए  बोला, ‘‘बाऊजी सरकारी नौकरी में होते    हुए आपने ऐसी गलती क्यों  की! आपको पता होना चाहिए    कि छुआछूत  अपराध   की  श्रेणी में   आता है।एक दिन का समय दे  रहा हूँ,   अगर अपनी नौकरी  की सलामती  चाहते हो , तो   समझौता कर लो।  कल इसी समय पुन:  हाजिर हो  जाना…।’’

बडे़ बाबू    ने   अपनी पूरी  ताकत लगा  दी कि किसी तरह से चरणदास  अपनी शिकायत वापिस ले  ले।  उसने अपनी यूनियन   के पदा​धिकारियों एवं कार्यालय के अन्य  कर्मचारियों के माध्यम   से भी   चरणदास को मनाने  की  कोशिश  की  किंतु चरणदास टस से मस न हुआ।  वह हाथ  जोड़कर   मात्र  एक ही  बात कहता कि उसे न्याय  चाहिए।

अगले दिन पुलिस  चौकी  में   चरणदास तथा   बड़ा बाबू  अपने  साथ दो–दो   मौजिज व्यक्तियों  को लेकर   पहुँच गये  थे।  बड़े   बाबू के  होश–हवाश  उड़े   हुए थे।  उसे   काटो तो खून नहीं।  चौकी  इंचार्ज  ने फिर  से कहा,  ‘‘तुम दोनों  सरकारी कर्मचारी हो।  बात बढ़ाने  से क्या फायदा…।  एक–दूसरे   से  हाथ मिलाकर बात खत्म करो।  बड़ा बाबू  तो  मानो   इसी ताक में था। क्षणांश  की भी देरी   किये  बिना उसने चरणदास   के  पैरों को    छू    लिया।  हाथ जोड़कर फफकता हुआ  बोला, ‘‘मेरी नौकरी  तेरे हाथ है  चरणदास … मेरी   दो बेटियाँ अभी अनब्याही  हैं     … भाई मुझे    माफ कर दे।

बडे़ बाबू    की आँखों    में  आँसू  देखकर चरणदास  पिघल गया, बोला,  ‘‘बाऊजी! मैं   तो छोटा  आदमी हूँ    और सदा   छोटा ही   रहूँगा।  आपको सजा दिलवाना   मेरा उद्देश्य नहीं  था। मैं    तो  बस आपको अहसास दिलाना चाहता  था  कि मैं  भी    एक मनुष्य हूँ।  क्या  हुआ गर मैं  छोटी     जाति में   पैदा   हो  गया …!’’

चरणदास ने  समझौता  प्रस्तुत करके   अपनी शिकायत वापिस ले ली  थी।

पुलिस चौकी से  बाहर   आते  हुए  बड़ा  बाबू   पसीने पौंछ  रहा था। वह अपने आप को बेहद अपमानित महसूस कर रहा था।  रही–सही कसर पुलिस वालों  ने  उसकी जेब खाली करा कर पूरी  कर दी  थी।  बाहर आते हुए उसकी  हालत  ऐसी  हो   रही थी , मानो   बस के पहिये   के नीचे उसकी   गर्दन आती–आती  बची  हो  ! चरणदास  की गर्दन  आत्मविश्वास  से तनी हुई  थी   तथा उसका   चेहरा  स्वाभिमान की  आभा से  दमक रहा था।  यह देखकर बड़े बाबू के  मन में   जातीय द्वेष  की भावना  फिर से जाग्रत हो   गयी थी।  बड़ा  बाबू   चरणदास के नजदीक आकर, नफरत से उसकी तरफ देखता  हुआ बुदबुदाया, ‘‘चरणदास … हो  गई तेरे  मन की  पूरी! अब तो  तू खुश   है!  पर एक बात बता चरणदास … अब क्या तू  ब्राह्मण हो   गया है?’’

चरणदास  विस्फारित नेत्रों   से बडे़ बाबू    का चेहरा ताकता ही रह गया। उसे लगा,  मानो बड़े बाबू    ने   उसे फिर  से  गाली देते  हुए उसके  गाल  पर तमाचा जड़ दिया   है।

-अरुण  कुमार 

-0- स्थायी  पता -0-    
अरुण कुमार, 895/12,
आजाद नगर, 
कुरुक्षेत्र –136119(हरियाणा)

-0- वर्तमान   पता -0-
 मकान नं।   1460,
सेक्टर–13,  हिसार।