सोमवार, 26 मार्च 2018

लक्ष्मी...अपनी मर्जी की मालिक है.....विजय विक्रान्त


सेठ करोड़ी मल का जैसा नाम था वैसे ही उसकी किस्मत थी। 
लक्ष्मी की कृपा से धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। व्यापार में 
खूब कमाई हो रही थी और जीवन बहुत सुखी था। करोड़ी सेठ को पैसे से  बहुत ही अधिक प्यार था और वो इस की पूरी देख भाल करता था। एक रात सपने में सेठ को लक्ष्मी ने दर्शन दिए और कहने लगी कि अब मेरा तुम से रिश्ता नाता समाप्त हो गया है और मैं तुम्हें छोड़ कर गंगा पार फ़कीरा हलवाई के यहाँ जा रही हूँ।

इस डर से कि कहीं सपना सच्चा न हो, करोड़ी मल ने अपनी सारी 
दौलत अपने महल की छत की कड़ियों में छुपा दी। " देखता हूँ कि 
अब तू मुझे छोड़ कर कहाँ जाती है" , ऐसा वो सोचने लगा। कुछ ऐसा 
हुआ कि अगले ही दिन बादल घिर आए और बहुत ज़ोर की वर्षा होने 
लगी। इतना पानी बरसा कि सेठ का महल गिर गया और छत की कड़ियाँ गंगा के पानी में बह गयीं और दूसरे किनारे जा कर लगीं। वहाँ 
बुलाकी मल्लाह ने जब ये सब देखा तो सोचा कि क्यों न इन्हें इकट्ठी 
कर के बेच कर आज की दिहाड़ी बना लूँ। बाढ़ के कारण आज कोई भी 
उस पार जाने वाला यात्री नहीं मिला है। मल्लाह ने सारी कड़ियाँ एक 
रस्सी में बान्धी और जा कर फ़कीरा हलवाई को एक रुपये में बेच दी। 
लकड़ीयों को चीरने की ख़ातिर जब फ़कीरा ने कुल्हाड़ी चलाई तो छन्न 
छन्न करती अशर्फ़ीयों से सारी दुकान गूँज गई।

उधर सेठ का बुरा हाल था। घर में खाने तक के लाले पड़ गए। 
सोचा कि जाकर फ़कीरा से मिलूँ और विनती करूँ। शायद मेरी 
हालत देख कर उसे कुछ तरस ही आजाए। यह सोच कर उसने 
अपनी बीवी से दो रोटियाँ बाँधने को कहा और उस पार जाने के लिए गंगा की ओर चल दिया। पार ले जाने के लिये जब मल्लाह ने 
किराया माँगा तो करोड़ी ने बताया कि उसके पास केवल दो 
रोटी हैं। मल्लाह एक रोटी लेकर उसे पार उतारने पर राज़ी हो गया 
और एक रोटी लेकर उसे गंगा पार छोड़ दिया।

करोड़ी मल फ़कीरा हलवाई से मिला और अपनी सारी कथा 
सुाई। सारी बात सुनकर फ़कीरा चुप रहा और कुछ नहीं बोला। थोड़ी 
देर बाद उसने अन्दर जाकर दो बड़े बड़े अशर्फ़ियों के लड्डू बनाए 
और करोड़ी को मल देते हुए कहा कि वो इनको बच्चों के लिये ले जाए। सेठ को इस बात का बहुत मलाल रहा कि फ़कीरा ने कोई हमदर्दी नहीं 
दिखाई और केवल दो लड्डू देकर टाल दिया। भरे मन से वो गंगा की 
ओर बढ़ा और घर वापिस जाने के लिए मल्लाह से विनती करने लगा। 
" वापिस जाने के लिए किराए के पैसे हैं क्या?" जब मल्लाह ने       
ये सवाल किया तो सेठ ने कहा कि उस के पास दो लड्डू हैं। एक लड्डू 
वो किराए का दे देगा और एक लड्डू से अपने बच्चों का पेट भरेगा। 
क्योंकि रात हो रही थी और मल्लाह को वापिसी सवारी की कोई उम्मीद नहीं थी, उस ने सेठ से कहा कि अगर पार जाना है 
तो दोनों लड्डू देने होंगे। 

कोई और चारा न देख कर सेठ ने दोनों लड्डू बुलाकी मल्लाह 
को दे दिए और नाव में गंगा पार कर अपने घर आगया। वापिस आकर 
मल्लाह ने सोचा कि वो इन लड्डूओं का क्या करेगा। उसने फ़कीरा के 
यहाँ जाकर दोनों लड्डू दो रुपये में बेच दिये। 
लक्ष्मी का कहना सच्चा था, जहाँ रहना है वहीं जाना है
यह बारिश, मल्लाह, कड़ियों का बस केवल एक बहाना है।
-विजय विक्रान्त


रविवार, 4 मार्च 2018

च.तुर राज ज्योतिषी.......विजय विक्रान्त

महाराजा करमवीर सिंह के दरबार में राज ज्योतिषी पण्डित
श्याम मुरारी की बहुत चर्चा थी और बड़ा मान था। राजा कोई भी
काम ज्योतिषी की सलाह के बिना नहीं करता था। समय बीतता
गया और राजा को अपनी सीमाओं को बढ़ाने की इच्छा दिन प्रति
दिन प्रबल होती चली गई।

एक दिन राजा ने ज्योतिषी को बुलाकर अपने दिल की बात     
कही और पूछा कि क्या साथ वाले राजा पर आक्रमण करना ठीक
रहेगा और यदि ठीक है तो उसका राज्य हड़प करने का कौन सा
शुभ समय है। यह जानते हुए भी कि पड़ोसी राजा बहुत बलवान
है, श्याम मुरारी ने बिना सोचे समझे सलाह दी कि हे राजन! आप
जल्दी से जल्दी आक्रमण कर डालें। आप इस संग्राम में अवश्य
सफल होंगे। ज्योतिषी के कहने पर करमवीर सिंह ने धावा बोल
दिया। हुआ वही जिसका डर था। राजा को मुँह की खानी पड़ी।
बहुत पिटाई हुई और जैसे तैसे करके अपनी जान बचा कर भागा।
महल में आकर राजा ने सबसे पहले राज ज्योतिषी को
बुलाया। ज्योतिषी को तो सब बात का पता चल गया था और उसे
ये भी मालूम था कि उसको क्यों बुलाया जा रहा है। फिर भी वो
चेहरे पर मुस्कान लेकर दरबार में पहुँचा।
आसन ग्रहण करने के बाद राजा ने ज्योतिषी से पूछा कि
महाराज आप सब का भविष्य बताते हैं। क्या आपको अपना
भविष्य भी पता है? राजा के प्रश्न के पीछे जो रहस्य था उसे
जानने में पण्डित को ज़रा देर नहीं लगी। उसने हाथ जोड़कर
विनम्रता से कहा कि महाराज मैं ने सब नक्षत्रों का अध्ययन
किया है और मुझे अपने और आपके भविष्य के बारे में सब कुछ
पता है। राजा के यह पूछने पर कि आपकी मृत्यु कब होगी,
पंडितजी ने बड़ी नम्रता से कहा कि महाराज कुछ ग्रहों का चक्कर
ऐसा है कि मेरे और आपके नक्षत्रों का चोली दामन का साथ है।
गणित के अनुसार मेरी मृत्यु आपकी मृत्यु से ठीक दो घण्टे पहले
 होगी। कहने का मतलब ये है कि मेरे मरने के ठीक दो घण्टे बाद
आपकी मृत्यु हो जाएगी।
राज ज्योतिषी का जवाब सुनकर राजा भी चक्कर में आ गया
और जो उसने मन में सोचा था उस बात को वहीं पी गया। इधर
राज ज्योतिषी ने भी सोचा कि एक बार तो जैसे तैसे जान बच
 गई मगर आगे का कुछ पता नहीं है। कुछ दिन रहने के पश्चात
 उसने महाराज से आज्ञा ली और वन की ओर प्रस्थान कर दिया।
-विजय विक्रान्त


शुक्रवार, 23 फ़रवरी 2018

भाग्य का लिखा टल नहीं सकता....विजय विक्रान्त



                   बनारस के ज्योतिषाचार्य पण्डित कपिलदेव के बारे में प्रसिद्ध था वो जन्म कुण्डली और ग्रहों का अध्ययन करके किसी का भी भविष्य ठीक ठीक बता सकते थे। कभी कभी तो यदि ग्रहों का चक्कर अनुकूल न हो तो उपाय भी सुझा देते थे। अभी तक उनकी भविष्यवाणी या उचित उपाय सदा सच होते आए थे और दूर दूर के लोग उनको बहुत मानते थे तथा सम्मान देते थे।

          कपिलदेव जी के परिवार में केवल पत्नी योगेश्वरी देवी और पुत्री कलावती थी। जैसे जैसे कलावती बड़ी होने लगी, योगेश्वरी देवी को उसके विवाह की चिंता होने लगी। वो बार बार पति को ये बात याद दिलाती थी कि वो जल्दी से जल्दी पुत्री के हाथ पीले कर दें। कपिलदेव जी को भी अपनी ज़िम्मेवारी का पूरा एहसास था मगर एक भविष्य की घटना जो उन्हें घुन्न की तरह खाए जा रही थी, उसे वो पत्नी से कहते हुए बहुत घबरा रहे थे। आखिर पत्नी के बहुत आग्रह करने पर वो बोले 
  “योगेश्वरी, तुम क्या समझती हो कि मुझे इस बात का फ़िक्र नहीं है। मैंने कलावती की कुण्डली कई बार देखी है और हर बार इस निश्चय पर पहुँचा हूँ कि ये कन्या विवाह के तीन साल बाद विधवा हो जाएगी।”

    कपिलदेव की ये बातें सुनकर योगेश्वरी बोली, “हे नाथ अगर इस के भाग्य में यही क्खा है तो इसका कोई उपाय भी तो होगा।”

“उपाय तो अवश्य है परंतु ग्रह इतने बलवान हैं कि कोई भी उपाय काम नहीं करेगा।” ऐसा कहकर कपिलदेव दुखी होकर रो पड़ा।

योगेश्वरी देवी बहुत सहनशील औरत थी। उसने दिल नहीं छोड़ा और पति से आग्रह किया कि जो भी उपाय है हम उसे करेंगे। आप बस वर तलाश में लग जाओ। माता पिता ने  एक योग्य वर ढूँढ कर मकर संक्रांति के दिन शादी का महूरत निकाला। सब ग्रहों का अध्य्यन करके कपिलदेव ने एक चाँदी का कटोरा लिया और उसके बीच में एक बहुत छोटा सा सुराख कर के पानी में तैरने के लिए छोड़ दिया और बोले, “ग्रहों के अनुसार जब ये कटोरा पानी से भर कर डूब जाएगा वही फेरों का महूरत होगा और बुरी घड़ी टल जाएगी।”

उधर कलावती अपने पूरे साज श्रृंगार से सुसज्जित थी। सोने चाँदी और मोतियों के आभूषण उस पर बहुत अच्छे लग रहे थे। उस ने भी चाँदी के लोटे की बात सुनी और उसे देखने को उत्सुकित हो गई। पिता की आज्ञा लेकर अपनी सहेलियों सहित वो नीचे आई और जहाँ लोटा तैर रहा था वहाँ सिर झुका कर सुराख में से पानी को आता देखने लगी और थोड़ी देर बाद वापिस चली गई। उसे क्या मालूम था कि जब वो झाँक कर कटोरे में देख रही थी तो उस के सिर के आभूषण का एक मोती कटोरे में गिर गया है और कटोरे के उस छोटे से सुराख को बन्द कर दिया है। इधर सारे लोग लोटा डूबने की इंतज़ार में थे कि कब लोटा डूबे और कब शादी की रसम शुरू हो। कपिलदेव के हिसाब से लोटे को डूबने में कोई दो घण्टे लगने चाहिये थे मगर जब इस बात को तीन घण्टे हो गए और लोटा फिर भी नहीं डूबा तो सब ने वहाँ जाकर लोटे का निरिक्षण किया और जो पाया उसे देख कर चकित हो गए। हालाँकि शादी का महूरत निकल चुका था मगर लड़के वालों के आग्रह करने पर शादी कर दी गई। ठीक तीन साल बाद वही हुआ जिसका डर था।

ज़ोर लगाले मनुष्य तू कितना, भाग्य पलट न पाओगे
हाथ की रेखाओं में जो लिखा है, उसी को बस तुम पाओगे
विजय विक्रान्त

रविवार, 18 फ़रवरी 2018

चुड़ैल या परी

                                        
            पुराने समय की बात है, एक विद्वान को फांसी लगनी थी। राजा ने कहा, "जान बख्श दें सही उत्तर मिल जाये कि आखिर स्त्री चाहती क्या है?"
             विद्वान ने कहा, मोहलत मिले तो पता कर के बता सकता हूँ। एक साल की मोहलत मिली, बहुत घूमा, कहीं से भी संतोषजनक उत्तर नहीं मिला। आखिर में किसी ने कहा दूर एक चुड़ैल रहती है वही बता सकती है। चुड़ैल ने कहा कि मै इस शर्त पर बताउंगी जब तुम मुझसे शादी करो। उसने जान बचाने के लिए शादी की सहमति दे दी।
शादी होने के बाद चुड़ैल ने कहा, चूंकि तुमने मेरी बात मान ली है, तो मैंने तुम्हें खुश करने के लिए फैसला किया है कि 12 घन्टे मैं चुड़ैल और 12 घन्टे खूबसूरत परी बनके रहूंगी, अब तुम ये बताओ कि दिन में चुड़ैल रहूँ या रात को।

         

          उसने सोचा यदि वह दिन में चुड़ैल हुई तो दिन नहीं कटेगा, रात में हुई तो रात नहीं कटेगी। अंत में उस विद्वान कैदी ने कहा, जब तुम्हारा दिल करे परी बन जाना, जब दिल करे चुड़ैल बनना।
ये बात सुनकर चुड़ैल ने प्रसन्न होकर कहा, चूंकि तुमने मुझे अपनी मर्ज़ी की करने की छूट दे दी है, तो मै हमेशा ही परी बन के रहा करूँगी। "यही तुम्हारे प्रश्न का उत्तर भी है।" 

          स्त्री अपनी मर्जी का करना चाहती है। यदि स्त्री को अपनी मर्ज़ी का करने देंगे तो, वो परी बनी रहेगी वरना चुड़ैल !
आज का भी सच यही है ! मन का करने दीजिये स्त्री को ! वो खुश रहेगी तभी आप खुश रह सकेंगे !

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

सुने कौन ?....संकलित

               
                 एक राजा के दरबार में एक ऋषि पहुंचे, साथ में था पिंजरे में एक कौआ। राजा को ऋषि का आशय समझ में नहीं आया।

उन्होंने पूछा, ‘मुनिवर! आप कौआ लेकर क्यों चल रहे हैं? तोता या कबूतर लेकर क्यों नहीं ?’ ऋषि बोले, ‘सभी पशु-पक्षियों के अपने-अपने गुण होते हैं। पर कौए का विशेष गुण हमें सतर्क करता है। कौआ ही एक ऐसा पक्षी है, जो किसी व्यक्ति को देखकर उसके मन के भाव और क्रियाकलाप भी समझ जाता है। 

           आपके राजदरबार के अंदर आते हुए उसने आपके एक-एक अधिकारी और कर्मचारियों के गुण-दोष बता दिए। मुझे आश्चर्य है कि आप इतने चाटुकारों और भ्रष्ट आचरण वालों से घिरे रहकर प्रजा के कल्याण के कार्य कैसे कर पाते हैं ?’ ऋषि की बात सुनकर दरबार में कंपन हुआ। राजा ने समझा कि वे ऋषि उनके लिए बड़े उपयोगी होंगे। उन्हें अतिथि गृह में ठहरा दिया गया। 

           दूसरे दिन ऋषि फिर राजदरबार में आए। इस बार उनके साथ कौआ नहीं था। राजा ने कौए के बारे में पूछा तो ऋषि ने कहा, ‘आपके दरबार में बड़े भ्रष्ट लोग हैं। उन्हें पता चल गया है कि कौए के माध्यम से मैं आपको उनके बारे में बताऊंगा। इसलिए किसी ने तीर से मुझ पर वार किया। मैं तो बच गया। पर मेरा कौआ मारा गया।’ राजा को यह बात सुनकर बड़ा क्रोध आया। वे बोले, ‘मैं उस दुष्ट को कड़ी सजा दूंगा।’ 
            ऋषि मुस्कराकर बोले, ‘राजन! उस दुष्ट का पता लगाने में आपको कई वर्ष बीत जाएंगे। शायद तीर मारने वाले का पता भी न चले। मेरा कौआ होता तो तुरंत बता देता। आप भी अपने आस-पास कौए के गुण वाले व्यक्ति रखिए।’ अक्सर सही बात बताने वाले को पुरस्कृत नहीं, दंडित ही किया जाता है। 

             इसलिए समाज में सही बोलने वालों की कमी है। राजसत्ता में बैठे लोगों को अपनी प्रशंसा सुनने में ही आनंद आता है। इसलिए वे सही स्थिति से अवगत नहीं हो पाते। 

          हमारे समाज में कौए के गुण रखने वाले व्यक्तियों की कमी नहीं है। वे खुद सतर्क रहते हैं। दूसरों को भी तत्काल आने वाले खतरों से सावधान करते रहते हैं। पर उनकी सुनता कौन है ? सुनने वालों की ही कमी है, बोलने वालों की नहीं। 

        कौए की आवाज सुनकर हम अनुमान लगाते हैं कि कोई मेहमान आने वाला है। और भी बातों की सूचना देता होगा कौआ। काश! हम उसकी भाषा समझ पाते। 

          सूचना क्रांति के युग में कौए का महत्व बढ़ना चाहिए। कम से कम कौए की बुद्धि और गुण रखने वालों की पूछ बढ़नी ही चाहिए। पर सच-सच बताने वालों की परिणति भी उस साधु के कौए की ही तरह होती है। फिर सचाई बताए कौन ? सचाई किसी से छिपती नहीं, पर बोले कौन ?  सुने कौन ?

रविवार, 4 फ़रवरी 2018

आदतें नस्लों का पता देती हैं....प्रस्तुतिः ज्योति अग्रवाल

            बादशाह के यहॉं एक अजनबी नौकरी के लिए हाज़िर हुआ । क़ाबिलियत पूछी गई, कहा, "सियासी हूँ " (अरबी में सियासी अक्ल ओ तदब्बुर से मसला हल करने वाले को कहते हैं )।

 उसे खास "घोड़ों के अस्तबल का इंचार्ज" बना लिया। 

        चंद दिनों बाद बादशाह ने अपने सबसे महंगे और अज़ीज़ घोड़े के बारे में पूछा। उसने कहा, "नस्ली नहीं  हैं ।"

         बादशाह ने साईस को बुला कर पूँछा।उसने बताया, “घोड़ा नस्ली हैं, लेकिन पैदायश पर इसकी मां मर गई थी तो गाय का दूध पी कर पला है।” 

    बादशाह, “तुमको कैसे पता चला कि घोड़ा नस्ली नहीं हैं ?" 

       उसने कहा, "जब ये घास खाता है तो गायों की तरह सर नीचे करके, जबकि नस्ली घोड़ा घास मुँह में लेकर सर उठा लेता हैं ।"

        बादशाह उसकी होशियारी से बहुत ख़ुश हुआ, और उसके घर अनाज, घी, भुने दुंबे, और परिंदों का आला गोश्त बतौर इनाम भिजवाया। 

फिर, उसे मलिका के महल में तैनात कर दिया। 

       चंद दिनो बाद, बादशाह ने उस से बेगम के बारे में राय मांगी।  उसने कहा, "तौर तरीके तो मलिका जैसे हैं लेकिन शहज़ादी नहीं हैं ।"

      बादशाह के पैरों तले जमीन निकल गई। अपनी सास को बुलाया, मामला उसको बताया, सास ने कहा, "हक़ीक़त ये हैं, कि आपके वालिद ने मेरे खाविंद से हमारी बेटी की पैदायश पर ही रिश्ता मांग लिया था, लेकिन हमारी बेटी ६ माह में ही मर गई थी, लिहाज़ा हम ने आपकी बादशाहत से करीबी ताल्लुक़ात क़ायम करने के लिए किसी और कि बच्ची को अपनी बेटी बना लिया।"

        बादशाह ने अपने मुसाहिब से पूछा, "तुम को कैसे इल्म हुआ ?"

          उसने कहा, "उसका खादिमों के साथ सुलूक जाहिलों से भी बदतर हैं । एक खानदानी इंसान का दूसरों से व्यवहार करने का एक मुलाहजा एक अदब होता हैं, जो शहजादी में बिल्कुल नहीं ।"

       बादशाह फिर उसकी फरासत से खुश हुआ और बहुत से अनाज , भेड़ बकरियां बतौर इनाम दीं साथ ही उसे अपने दरबार में तैनात कर दिया। कुछ वक्त गुज़रा,मुसाहिब को बुलाया, अपने बारे में दरियाफ्त किया ।

मुसाहिब ने कहा "जान की अमान ।” बादशाह नें वादा किया । 

       उसने कहा, "न तो आप बादशाह ज़ादे हो न आपका चलन बादशाहों वाला है।"

        बादशाह को ताव आया, मगर जान की अमान दे चुका था, सीधा अपनी वालिदा के महल पहुंचा ।

       वालिदा ने कहा, "ये सच है, तुम एक चरवाहे के बेटे हो, हमारी औलाद नहीं थी तो तुम्हें पाला ।"

बादशाह ने मुसाहिब से पूँछा, "तुझे कैसे इल्म हुआ ?"

        उसने कहा, "बादशाह जब किसी को "इनाम ओ इकराम" दिया करते हैं, तो हीरे मोती जवाहरात की शक्ल में देते हैं। लेकिन आप भेड़, बकरियां, खाने पीने की चीजें इनायत करते हैं। ये असलूब बादशाह ज़ादे का नही,  किसी चरवाहे के बेटे का ही हो सकता है।"

     किसी इंसान के पास कितनी धन दौलत, सुख समृद्धि, रुतबा, इल्म, बाहुबल हैं ये सब बाहरी मुल्लम्मा हैं । 

इंसान की असलियत, उस के खून की किस्म उसके व्यवहार, 
उसकी नीयत से होती हैं । 

इंसान आर्थिक, शारीरिक, सामाजिक और राजनैतिक रूप से बहुत शक्तिशाली होने के उपरांत भी अगर छोटी छोटी चीजों के लिए नियत खराब कर लेता हैं, इंसाफ और सच की कद्र नहीं करता,  अपने पर उपकार और विश्वास करने वालों के साथ दगाबाजी कर देता हैं, अपने तुच्छ फायदे और स्वार्थ पूर्ति के लिए दूसरे इंसान को बड़ा नुकसान पहुंचाने की लिए तैयार हो जाता हैं, तो समझ लीजिए पीतल पर चढ़ा हुआ सोने का मुलम्मा है।

......................प्रस्तुतिः ज्योति अग्रवाल

रविवार, 21 जनवरी 2018

इज़्ज़त....अनन्त आलोक


          नशे में धुत लड़खड़ाते मित्र को सहारा देकर घर छोड़ने आये सुनील ने याद दिलाया, "देखो जगपाल तुम्हें कितनी बार समझाया है, सराब पीना अच्छी आदत नहीं है इससे न केवल तुम्हारा स्वास्थ्य बिगड़ रहा है अपितु रिश्तेदारों, सगे संबंधियों और समाज में भी बदनामी हो रही है।"

                        "बदनामी! कैसी बदनामी अरे तुम क्या जानो समाज में हमारी कितनी इज़्ज़त होती है। लोग स्पेशल कमरे में बिठाते हैं, दारू, सलाद, नमकीन और अन्य ज़रूरी सामान इज़्ज़त के साथ वहीं छोड़ कर जाते हैं और हाँ खाना भी वहीं टेबल पर आता है शान से। तुम पीते नहीं हो न तुम क्या जानो कितनी इज़्ज़त करते हैं लोग। अरे तुम्हें तो कोई यह भी नहीं पूछता होगा कि खाना भी खाया है या नहीं," जगपाल ने लड़खडाती जुबान से जवाब दिया।

                           "तुम्हारी बात सोलह आने सच है, खाने पीने वालों का मेज़बान पूरा पूरा ध्यान रखते हैं, इतना ही नहीं गंदी नाली में गिरने पर उठाया भी जाता है। और लड़खड़ाने पर घर तक भी छोड़ा जाता है, जैसे मैं तुम्हें छोड़ने आया हूँ, लेकिन मित्र यह इज़्ज़त नहीं सहानुभूति है। ठीक उसी प्रकार जैसे एक मरीज़ के प्रति रखी जाती है, जिस प्रकार एक बीमार व्यक्ति की सुख सुविधा का ध्यान रखा जाता है। और रही बात खाने के लिए पूछने की तो वह इसलिए पूछा जाता क्योंकि नशा न करने वाला व्यक्ति अपना ध्यान स्वयं रख सकता है, उसे कब क्या चाहिए वह माँग लेता है," सुनील ने उतर दिया। सुनील का जवाब सुन जयपाल उसे देखता ही रह गया।
..............अनन्त आलोक