रविवार, 9 अक्टूबर 2016

शव का मांस गिद्धों को खिलाकर किया जाता है अंतिम संस्कार!



जानिये कहाँ और क्यों ?
हर धर्म में इंसान के मौत के बाद अलग अलग विधि विधान से अंतिम संस्कार किया जाता है.

लेकिन इस दुनिया में कुछ ऐसे समुदाय भी है जिनमे यह क्रिया बहुत ही अलग  तरीके से निभाई जाती है.

तिब्बत में एक ऐसा ही समुदाय है जो व्रजयान बौद्ध धर्म को मानते है और शव का अंतिम संस्कार शव का मांस गिद्धों को खिलाकर करते है.

इस समुदाय के अनुसार  शरीर से आत्मा के निकलने के बाद वो एक खाली बर्तन है, जिसे सहज के रखने की जरुरत नहीं है. इसलिए वे लोग इसे आकाश में दफ़न कर देते है. इसे sky burial कहा जाता है.

दूसरी बात जो तिब्बत के लोग मानते हैं कि शवों को दफनाने के बाद भी कीड़े मकोड़े ही खा जाते है और इसलिए गिद्धों को खिला देते है.

इस पम्परा के  कुछ प्रमुख कारण भी है.

एक तो  तिब्बत इतनी ऊचाई पर बसा हैं  कि वहा पर पेड़ नहीं होते  है इसलिए वहा पर जलाने के लिए लकड़ियों नहीं मिलती.

दूसरी  बात यह कि तिब्बत की जमीन बहुत पथरीली है उसे दफ़न के लिए खोद पाना लगभग नामुमकिन सा है. यही वजह है कि शवों को दफनाया भी नहीं जा सकता.

यह समुदाय इस अंतिम संस्कार की क्रिया को हज़ारो सालों से करते आ रहे है.

इस क्रिया में पहले शव को शमशान ले जाया जाता है. जो  एक ऊचाई वाले जगह पर होता है. वहाँ पर  बौद्ध भिक्षु  धुप बत्ती जलाकर उस शव की पूजा करते है और  फिर एक शमशान कर्मचारी उस शव के छोटे छोटे टुकड़े करता है. दूसरा कर्मचारी उन टुकड़ों को जौ के आटे के घोल में डुबोता है और फिर वो टुकड़े गिद्धों को खाने के लिए डाल दिए जाते है.

जब गिद्ध सारा मांस खाके चले जाते है उसके बाद उन हड्डियों को इकठ्ठा करके उनका चुरा किया जाता है और जौ के आटे और याक के मक्खन के घोल में डुबो के कौओ और बाज को खिलाया जाता है.

पारसी समुदाय में भी शवों को पक्षियों को खिलाने की कुछ ऐसी ही परंपरा है. लेकिन वो लोग शव को जोरास्ट्रियन (पारसी का मंदिर) में ले जाकर रख देते है जहाँ पक्षी उन्हें अपना भोजन समझकर खा जाते है.

अंतिम संस्कार की ऐसी ही परम्परा मंगोलिया के कुछ इलाको में भी पायी जाती है.

हमें इस तरह की परम्पराएं शायद निर्दयी लगे लेकिन उस जगह की मांग के अनुसार यह क्रिया उचित है.



शनिवार, 1 अक्टूबर 2016

उग्रवाद ने नाप देख ली....कवि कमल 'आग्नेय'

पीओके में सीमा पार जाकर सेना की साहसिक कार्रवाही पर 
कवि कमल आग्नेय की रचना-

राष्ट्रद्रोह के रावण की सांसो का घोडा ठहर गया
सरहद पार तिरंगा अपना स्वाभिमान से लहर गया

आतंकवाद से लड़ने की शक्ति आई दरबार में
इसीलिए सेना ने मारा एलओसी के पार में

आज सियासत बदल गई है डरते डरते जीने की
उग्रवाद ने नाप देख ली छप्पन इंची सीने की

अरे शरीफों आँख खोलकर समझो जरा इशारों को
राख समझकर अब मत छूना 'आग्नेय' अंगारों को

वर्ना घायल रावलपिंडी अपना खुदा पुकारेगी
जब भारत की सेना अबकी अंदर घुसकर मारेगी

लाल रंग के बलिदानों से अजर अमर यह खाकी है
अरे मियां ये ट्रेलर है पूरी पिक्चर तो बाकी है
-कवि कमल 'आग्नेय' 

(सेना के सम्मान में इतना शेयर करें की सेना तक पहुंचे)



शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

उस समय तो ‘पाकिस्तान’ था ही नहीं



एक बार संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को ले कर चर्चा चल रही थी। एक भारतीय प्रवक्ता बोलने के लिए खड़ा हुआ, अपना पक्ष रखने से पहले उसने ऋषि कश्यप की एक बहुत पुरानी कहानी सुनाने की अनुमति माँगी।

अनुमति मिलने के बाद भारतीय प्रवक्ता ने अपनी बात शुरू की!

“एक बार महर्षि कश्यप, जिनके नाम पर आज कश्मीर का नाम पड़ा है, घूमते-घूमते कश्मीर पहुंच गए। वहाँ उन्होंने एक सुन्दर झील देखी तो उस झील में उनका नहाने का मन हुआ। उन्होंने अपने कपड़े उतारे और झील में नहाने चले गए।

जब वो नहा कर बाहर निकले, तो उनके कपड़े वहाँ से गायब मिले।
दरअसल, उनके कपड़े किसी पाकिस्तानी ने चुरा लिये थे…

इतने में पाकिस्तानी प्रवक्ता चीख पड़ा और बोला:
“क्या बकवास कर रहे हो? उस समय तो ‘पाकिस्तान’ था ही नहीं!!!”

भारतीय प्रवक्ता मुस्कुराया और बोला:
अब सब कुछ साफ़ हो चुका है। अब मैं अपना भाषण शुरू करना चाहता हूँ।
मेरा भाषण है… और ये पाकिस्तानी कहते हैं कि कश्मीर इनका है!!!”

इतना सुनते ही… पूरा संयुक्त राष्ट्र सभा ठहाकों की गूंज से भर उठा।।

-संकलित

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है....कृष्ण मोहन सिंह


एक छोटा-सा पहाड़ी गांव था। वहां एक किसान, उसकी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी रहते थे। एक दिन बेटी की इच्छा स्कार्फ खरीदने की हुई और उसने पिताजी की जेब से 10 रुपए चुरा लिए।

पिताजी को पता चला तो उन्होंने सख्ती से दोनों बच्चों से पूछा - पैसे किसने चुराए ?
अगर तुम लोगों ने सच नहीं बताया तो सजा दोनों को मिलेगी। बेटी डर गई, बेटे को लगा कि दोनों को सजा मिलेगी तो सही नहीं होगा।

वह बोला - पिताजी, मैंने चुराए, पिताजी ने उसकी पिटाई की और आगे से चोरी न करने की हिदायत भी दी। भाई ने बहन के लिए चुपचाप मार खा ली। वक्त बीतता गया। दोनों बच्चे बड़े हो गए।

एक दिन मां ने खुश होकर कहा - दोनों बच्चों के रिजल्ट अच्छे आए हैं। पिताजी (दुखी होकर) - पर मैं तो किसी एक की पढ़ाई का ही खर्च उठा सकता हूं।

बेटे ने फौरन कहा - पिताजी, मैं आगे पढ़ना नहीं चाहता।
बेटी बोली - लड़कों को आगे जाकर घर की जिम्मेदारी उठानी होती है, इसलिए तुम पढ़ाई जारी रखो। मैं कॉलेज छोड़ दूंगी। अगले दिन सुबह जब किसान की आंख खुली तो घर में एक चिट्ठी मिली।

उसमें लिखा था - मैं घर छोड़कर जा रहा हूं। कुछ काम कर लूंगा और आपको पैसे भेजता रहूंगा। मेरी बहन की पढ़ाई जारी रहनी चाहिए। एक दिन बहन हॉस्टल के कमरे में पढ़ाई कर रही थी।

तभी गेटकीपर ने आकर कहा - आपके गांव से कोई मिलने आया है। बहन नीचे आई तो फटे-पुराने और मैले कपड़ों में भी अपने भाई को फौरन पहचान लिया और उससे लिपट गई।

बहन - तुमने बताया क्यों नहीं कि मेरे भाई हो - भाई।

मेरे - ऐसे कपड़े देखकर तुम्हारे सहेलियाें में बेइज्जती होगी। मैं तो तुम्हें बस एक नजर देखने आया हूं।
भाई चला गया - बहन देखती रही।

बहन की शादी शहर में एक पढ़े - लिखे लड़के से हो गई। बहन का पति कंपनी में डायरेक्टर बन गया। उसने भाई को मैनेजर का काम ऑफर किया, पर उसने इनकार कर दिया।

बहन ने नाराज होकर वजह पूछी तो भाई बोला - मैं कम पढ़ा-लिखा होकर भी मैनेजर बनता तो तुम्हारे पति के बारे में कैसी-कैसी बातें उड़तीं, मुझे अच्छा नहीं लगता।

भाई की शादी गांव की एक लड़की से हो गई। इस मौके पर किसी ने पूछा कि उसे सबसे ज्यादा प्यार किससे है ?

वह बोला - अपनी बहन से, क्योंकि जब हम प्राइमरी स्कूल में थे तो हमें पढ़ने दो किमी दूर पैदल जाना पड़ता था। एक बार ठंड के दिनों में मेरा एक दस्ताना खो गया।

बहन ने अपना दे दिया - जब वह घर पहुंची तो उसका हाथ सुन्न पड़ चुका था और वह ठंड से बुरी तरह कांप रही थी। यहां तक कि उसे हाथ से खाना खाने में भी दिक्कत हो रही थी। उस दिन से मैंने ठान लिया कि अब जिंदगी भर मैं इसका ध्यान रखूंगा। बहन ने हमारी हर गलती का बचाव किया था बचपन से वो हमे मां-बाप से ज्यादा स्नेह करती है।

जीवन में कुछ मिले या ना मिले पर बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है।

-कृष्ण मोहन सिंह

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

संगठित कार्य हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है


आपने कछुए और खरगोश की कहानी ज़रूर सुनी होगी, 
उसे फिर से दोहराता हूँ
एक बार खरगोश को अपनी तेज चाल पर घमंड हो गया और

वो जो मिलता उसे रेस लगाने के लिए चुनौती देता रहता। 

         कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।

रेस हुई। खरगोश तेजी से भागा और काफी आगे जाने पर

पीछे मुड़ कर देखा, कछुआ कहीं आता नज़र नहीं आया, उसने

मन ही मन सोचा कछुए को तो यहाँ तक आने में बहुत समय

लगेगा, चलो थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, और वह एक पेड़ के

नीचे लेट गया। लेटे-लेटे कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

उधर कछुआ धीरे-धीरे मगर लगातार चलता रहा। बहुत देर

बाद जब खरगोश की आँख खुली तो कछुआ फिनिशिंग

लाइन तक पहुँचने वाला था। खरगोश तेजी से भागा,

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कछुआ रेस जीत गया।


_धीमा और लगातार चलने वाला रेस जीतता है_        

ये कहानी तो हम सब जानते हैं, अब आगे की कहानी देखते हैं:

रेस हारने के बाद खरगोश निराश हो जाता है, वो अपनी

हार पर चिंतन करता है और उसे समझ आता है कि 

वो अधिक विश्वाश होने के कारण ये रेस हार गया…उसे अपनी

मंजिल तक पहुँच कर ही रुकना चाहिए था।

अगले दिन वो फिर से कछुए को दौड़ की चुनौती देता है।

कछुआ पहली रेस जीत कर आत्मविश्वाश से भरा होता है

और तुरंत मान जाता है।

रेस होती है, इस बार खरगोश बिना रुके अंत तक दौड़ता

जाता है, और कछुए को एक बहुत बड़े अंतर से हराता है।

_तेज और लगातार चलने वाला 
धीमे और लगातार चलने वाले से हमेशा जीत जाता है।_


कहानी अभी बाकी है जी….
इस बार कछुआ कुछ सोच-विचार करता है और उसे ये बात

समझ आती है कि जिस तरह से अभी रेस हो रही है वो

कभी-भी इसे जीत नहीं सकता।

वो एक बार फिर खरगोश को एक नयी रेस के लिए चैलेंज

करता है, पर इस बार वो रेस का रूट अपने मुताबिक रखने

को कहता है। खरगोश तैयार हो जाता है।

रेस शुरू होती है। खरगोश तेजी से तय स्थान की और

भागता है, पर उस रास्ते में एक तेज धार नदी बह रही होती

है, बेचारे खरगोश को वहीँ रुकना पड़ता है। कछुआ धीरे-

धीरे चलता हुआ वहां पहुँचता है, आराम से नदी पार करता

है और लक्ष्य तक पहुँच कर रेस जीत जाता है।



_पहले अपनी ताकत को जानो और 
उसके मुताबिक काम करो जीत ज़रुर मिलेगी_

कहानी अभी भी बाकी है जी …..

इतनी रेस करने के बाद अब कछुआ और खरगोश अच्छे दोस्त

बन गए थे और एक दुसरे की ताकत और कमजोरी समझने लगे

थे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि अगर हम एक दुसरे

का साथ दें तो कोई भी रेस आसानी से जीत सकते हैं।

इसलिए दोनों ने आखिरी रेस एक बार फिर से मिलकर

दौड़ने का फैसला किया, पर इस बार एक प्रतियोगी के रूप में

नहीं बल्कि संघठित होकर काम करने का निश्चय लिया।

दोनों स्टार्टिंग लाइन पे खड़े हो गए….आओ चलें…. और

तुरंत ही खरगोश ने कछुए को ऊपर उठा लिया और तेजी से

दौड़ने लगा। दोनों जल्द ही नहीं के किनारे पहुँच गए। अब

कछुए की बारी थी, कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ

बैठाया और दोनों आराम से नदी पार कर गए। अब एक

बार फिर खरगोश कछुए को उठा फिनिशिंग लाइन की

ओर दौड़ पड़ा और दोनों ने साथ मिलकर रिकॉर्ड टाइम

में रेस पूरी कर ली। दोनों बहुत ही खुश और संतुष्ट थे, आज से

पहले कोई रेस जीत कर उन्हें इतनी ख़ुशी नहीं मिली थी।



-संगठित कार्य हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है-

*व्यक्तिगत रूप से चाहे आप जितने बड़े खिलाड़ी हों लेकिन अकेले दम पर हर मैच नहीं जीता सकते अगर लगातार जीतना है तो आपको संघठन में काम करना सीखना होगा, आपको अपनी काबिलियत के आलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होगा। और जब जैसी परिस्थिति हो, उसके हिसाब से संगठन की ताकत का उपयोग करना होगा*

शनिवार, 3 सितंबर 2016

जिह्वा का वर्चस्व रहेगा.........हरि जोशी



पंक्तिबद्ध और एकजुट रहने के कारण दाँत बहुत दुस्साहसी हो गए थे। 
एक दिन वे गर्व में चूर होकर जिह्वा से बोले "हम बत्तीस घनिष्ट मित्र हैं एक से एक मज़बूत। और तू ठहरी अकेली, 
न चाहें तो तुझे बाहर ही न निकलने दें।"

जिह्वा ने पहली बार ऐसा कलुषित विचार सुना। 
वह अब हँसकर बोली "अच्छा ऊपर से एकदम सफ़ेद और स्वच्छ हो पर मन से बड़े कपटी हो।"

"ऊपर से स्वच्छ और अन्दर से काले घोषित करने वाली जीभ वाचालता छोड़, अपनी औक़ात में रह। हम तुझे चबा सकते हैं। यह मत भूल कि तू हमारी कृपा पर ही राज कर रही है," दाँतों ने किटकिटाकर कहा।
जीभ ने नम्रता बनाये रखी किन्तु उत्तर दिया, "दूसरों को चबा जाने की ललक रखने वाले बहुत जल्दी टूटते भी हैं। सामने वाले तो और जल्दी गिर जाते हैं। तुम लोग अवसरवादी हो मनुष्य का साथ 
तभी तक देते हो जब तक वह जवान रहता है। 
वृद्धावस्था में उसे असहाय छोड़कर चल देते हो।"

शक्तिशाली दाँत भी अपनी हार आखिर क्यों मानने लगे?" 
हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं। 
हमारे कड़े और नुकीलेपन के कारण बड़े बड़े तक हमसे थर्राते हैं।"

जिह्वा ने विवेकपूर्ण उत्तर दिया "तुम्हारे नुकीले या कड़ेपन का कार्यक्षेत्र मुँह के भीतर तक सीमित है। 
मुझमें पूरी दुनिया को प्रभावित करने और झुकाने की क्षमता है।"

दाँतों ने पुनः धमकी दी, 
"हम सब मिलकर तुझे घेरे खड़े हैं। कब तक हमसे बचेगी?”

जीभ ने दाँतों के घमंड को चूर करते चेतावनी दी 
"डॉक्टर को बुलाऊँ? 
दन्त चिकित्सक एक एक को बाहर कर देगा। 
मुझे तो छुएगा भी नहीं और तुम सब बाहर दिखाई दोगे।"
संगठित और घमंडी दाँत अब निरुत्तर थे। 
उन्हें कविता पंक्ति याद आ गई –

"किसी को पसंद नहीं सख़्ती बयान में, 
तभी तो दी नहीं हड्डी ज़बान में।"

-हरि जोशी

बुधवार, 10 अगस्त 2016

त्रावणकोर की महिलाओं ने कटा दिये थे अपने स्तन....आईचौक

समाज में बदलाव लाने और लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए दिए गए 
बलिदान की कई घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं. ऐसी ही एक घटना में केरल में एक क्रूर प्रथा के खात्मे के लिए एक महिला द्वारा दी गई अपने प्राणों की कुर्बानी हमेशा के लिए 
केरल के इतिहास में दर्ज हो गई है.

यह कुर्बानी केरल में 19वीं सदी में त्रावणकोर के राजा द्वारा निचली जातियों की महिलाओं के खिलाफ लगाए जाने वाले ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ दी गई थी. इस क्रूर टैक्स से न सिर्फ इन महिलाओं को अपमानित किया जाता था बल्कि सम्मानपूर्वक जीने का हक ही उनसे छीन लिया गया. इसी टैक्स के खिलाफ खड़ी हुईं एक महिला नानगेली, जिन्होंने अपने प्राण न्योछावर करके इस प्रथा का विरोध किया और उनका यह साहसिक कदम इस टैक्स के खात्मे की वजह बन गया. आइए जानें 19वीं सदी में केरल में लगने वाले इस ब्रेस्ट टैक्स के बारे में.

निचली जाति की महिलाओं पर लगता था 'ब्रेस्ट टैक्स'

केरल के त्रावणकोर में 19वीं सदी में लगाया जाने वाला ब्रेस्ट टैक्स उस समय निचली जाति के लोगों के साथ किए जाने वाले बेहद ही खराब व्यवहार की बानगी देता है. यह टैक्स त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाया जाता था. नियमों के मुताबिक उस समय निचली जाति की महिलाओं को अपने स्तन ढंकने की इजाजत नहीं थी. इसलिए सार्वजनिक जगहों पर अपने स्तनों को ढंकने के लिए राजा द्वारा उन पर ब्रेस्ट टैक्स लगाया जाता था. कहा जाता है कि टैक्स का निर्धारण स्तन के साइज के आधार पर होता था.

यह टैक्स निचली जाति के लोगों को अपमानित करने और उन्हें कर्ज में डुबाए रखने के उद्देश्य से लगाया जाता था. ब्रेस्ट टैक्स के साथ-साथ निचली जाति के लोगों को जूलरी पहनने और पुरुषों को मूंछ रखने के अधिकार पर भी टैक्स लगता था.

साभारः अजय शेखर द्वारा नानगेली के त्याग की एक प्रतीकात्मक तस्वीर
ब्रेस्ट टैक्स जैसी क्रूर प्रथा को खत्म करने के लिए नानगेली नामक एक दलित महिला के बलिदान ने अहम भूमिका निभाई. नानगेली चेरथाला की निचली जाति की महिला थीं. वह बेहद गरीब परिवार की थीं और इस टैक्स का भुगतान करने में असमर्थ थी. इसलिए ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ विद्रोही तेवर दिखाते हुए नानगेली ने सार्वजनिक जगहों पर अपने स्तनों को न ढंकने से इनकार कर दिया.

जब टैक्स अधिकारकी नानगेली के घर पर ब्रेस्ट टैक्स लेने पहुंचा तो इस टैक्स के विरोध में नानगेली ने वह क्रांतिकारी कदम उठाया जो इस टैक्स के खत्म होने की वजह बनी. उन्होंने अपने दोनों स्तनों को काटकर एक केले के पत्ते पर रखकर उस टैक्स अधिकारी के सामने रख दिया. यह देखकर टैक्स अधिकारी भाग खड़ा हुआ और खून से लथपथ नानगेली ने वहीं दम तोड़ दिया. नानगेली के मौत की खबर जंगल में आग की तरह फैली और लोग इस टैक्स के खिलाफ उठ खड़े हुए.  

साभारः अजय शेखर द्वारा नानगेली के त्याग की एक प्रतीकात्मक तस्वीर
इस टैक्स के विरोध में नानगेली के पति चिरकुंडन ने उनकी चिता में कूदकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. यह किसी पुरुष के सती होने की पहली ज्ञात घटना थी. नानगेली के इस कदम से लोग ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ उठ खड़े हुए और राजा को यह क्रूर टैक्स समाप्त करना पड़ा. चेरथाला की वह जगह, जहां पर नानगेली और उनके पति चिरकुंडन ने अपने प्राण त्यागे थे, उसे अब उनके सम्मान में मुलाचीपराम्बु (महिलाओं के स्तम की भूमि) के नाम से जाना जाता है. हालांकि स्थानीय लोग अब इस जगह का नाम लेने से झिझकते हैं और अब इसे मनोरमा कवाला (कवाला मतलब जंक्शन) के नाम से जाना जाता है.

वह जगह जहां नानगेली की झोपड़ी थी, वह जगह आज भी अनछुई है 
और एक तालाब के साथ-साथ चारों तरफ से हरियाली से घिरी हुई है. 
इस जगह के दोनों तरफ दो बड़े बंगले बन गए हैं.

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