युद्ध के आखिर में जला
एक जला हुआ जमीन का टुकड़ा
बारुद की फसल गल गई होगी.
सैकड़ो ं बदबूदार जिस्म फैले होंगे
जमीन के ऊपर, जिन्हे कब्रें नसीब नहीं हुई.
जले जिस्म, हथियार और घर,
सब गड्ड-मड्ड हो जाएंगे
एक दूसरे के साथ
और आखिर में तुम उन सब पर फूल चढ़ाओगे
दुआ मांगोगे उनकी शांति के लिए,
प्रार्थनाएं करोगे और मोमबत्तियां जलाओगे
आने वाली पीढ़ियों को सुनाओगे
सदियों तक,
उस अनचाही युद्ध की दास्तां
जो कभी नहीं चाही थी,
उस जली हुई जमीन ने,
सड़े हुए जवान जिस्मों ने,
और एक उजड़ी हुई सभ्यता ने,
एक युद्ध जिसे,
एक सभ्य दुनिया ने थोपा था ,
सभ्यता के खिलाफ
- चंडीगढ़ के प्रवीण चौबे

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर शुक्रवार 27 मार्च 2026 को लिंक की गयी है....
जवाब देंहटाएंhttp://halchalwith5links.blogspot.in पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!
!
सुंदर
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