सोमवार, 26 मार्च 2018

लक्ष्मी...अपनी मर्जी की मालिक है.....विजय विक्रान्त


सेठ करोड़ी मल का जैसा नाम था वैसे ही उसकी किस्मत थी। 
लक्ष्मी की कृपा से धन दौलत की कोई कमी नहीं थी। व्यापार में 
खूब कमाई हो रही थी और जीवन बहुत सुखी था। करोड़ी सेठ को पैसे से  बहुत ही अधिक प्यार था और वो इस की पूरी देख भाल करता था। एक रात सपने में सेठ को लक्ष्मी ने दर्शन दिए और कहने लगी कि अब मेरा तुम से रिश्ता नाता समाप्त हो गया है और मैं तुम्हें छोड़ कर गंगा पार फ़कीरा हलवाई के यहाँ जा रही हूँ।

इस डर से कि कहीं सपना सच्चा न हो, करोड़ी मल ने अपनी सारी 
दौलत अपने महल की छत की कड़ियों में छुपा दी। " देखता हूँ कि 
अब तू मुझे छोड़ कर कहाँ जाती है" , ऐसा वो सोचने लगा। कुछ ऐसा 
हुआ कि अगले ही दिन बादल घिर आए और बहुत ज़ोर की वर्षा होने 
लगी। इतना पानी बरसा कि सेठ का महल गिर गया और छत की कड़ियाँ गंगा के पानी में बह गयीं और दूसरे किनारे जा कर लगीं। वहाँ 
बुलाकी मल्लाह ने जब ये सब देखा तो सोचा कि क्यों न इन्हें इकट्ठी 
कर के बेच कर आज की दिहाड़ी बना लूँ। बाढ़ के कारण आज कोई भी 
उस पार जाने वाला यात्री नहीं मिला है। मल्लाह ने सारी कड़ियाँ एक 
रस्सी में बान्धी और जा कर फ़कीरा हलवाई को एक रुपये में बेच दी। 
लकड़ीयों को चीरने की ख़ातिर जब फ़कीरा ने कुल्हाड़ी चलाई तो छन्न 
छन्न करती अशर्फ़ीयों से सारी दुकान गूँज गई।

उधर सेठ का बुरा हाल था। घर में खाने तक के लाले पड़ गए। 
सोचा कि जाकर फ़कीरा से मिलूँ और विनती करूँ। शायद मेरी 
हालत देख कर उसे कुछ तरस ही आजाए। यह सोच कर उसने 
अपनी बीवी से दो रोटियाँ बाँधने को कहा और उस पार जाने के लिए गंगा की ओर चल दिया। पार ले जाने के लिये जब मल्लाह ने 
किराया माँगा तो करोड़ी ने बताया कि उसके पास केवल दो 
रोटी हैं। मल्लाह एक रोटी लेकर उसे पार उतारने पर राज़ी हो गया 
और एक रोटी लेकर उसे गंगा पार छोड़ दिया।

करोड़ी मल फ़कीरा हलवाई से मिला और अपनी सारी कथा 
सुाई। सारी बात सुनकर फ़कीरा चुप रहा और कुछ नहीं बोला। थोड़ी 
देर बाद उसने अन्दर जाकर दो बड़े बड़े अशर्फ़ियों के लड्डू बनाए 
और करोड़ी को मल देते हुए कहा कि वो इनको बच्चों के लिये ले जाए। सेठ को इस बात का बहुत मलाल रहा कि फ़कीरा ने कोई हमदर्दी नहीं 
दिखाई और केवल दो लड्डू देकर टाल दिया। भरे मन से वो गंगा की 
ओर बढ़ा और घर वापिस जाने के लिए मल्लाह से विनती करने लगा। 
" वापिस जाने के लिए किराए के पैसे हैं क्या?" जब मल्लाह ने       
ये सवाल किया तो सेठ ने कहा कि उस के पास दो लड्डू हैं। एक लड्डू 
वो किराए का दे देगा और एक लड्डू से अपने बच्चों का पेट भरेगा। 
क्योंकि रात हो रही थी और मल्लाह को वापिसी सवारी की कोई उम्मीद नहीं थी, उस ने सेठ से कहा कि अगर पार जाना है 
तो दोनों लड्डू देने होंगे। 

कोई और चारा न देख कर सेठ ने दोनों लड्डू बुलाकी मल्लाह 
को दे दिए और नाव में गंगा पार कर अपने घर आगया। वापिस आकर 
मल्लाह ने सोचा कि वो इन लड्डूओं का क्या करेगा। उसने फ़कीरा के 
यहाँ जाकर दोनों लड्डू दो रुपये में बेच दिये। 
लक्ष्मी का कहना सच्चा था, जहाँ रहना है वहीं जाना है
यह बारिश, मल्लाह, कड़ियों का बस केवल एक बहाना है।
-विजय विक्रान्त


9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...
    मातुश्री को नमन
    सादर

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १३ अप्रैल २०१८ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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  3. सुंदर, रोचक काव्य कथ्य आदरणीय |

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