गुरुवार, 19 अक्तूबर 2017

संत की संगति का परिणाम


एक जंगल में एक संत अपनी कुटिया में रहते थे।
एक किरात (शिकारी), जब भी वहाँ से निकलता संत को प्रणाम ज़रूर करता था।

एक दिन किरात संत से बोला की बाबा मैं तो मृग का शिकार करता हूँ,
आप किसका शिकार करने जंगल में बैठे हैं.?
संत बोले - श्री कृष्ण का, और फूट फूट कर रोने लगे।

किरात बोला अरे, बाबा रोते क्यों हो ?
मुझे बताओ वो दिखता कैसा है ? मैं पकड़ के लाऊंगा उसको।

संत ने भगवान का वह मनोहारी स्वरुप वर्णन कर दिया....
कि वो सांवला सलोना है, मोर पंख लगाता है, बांसुरी बजाता है।

किरात बोला: बाबा जब तक आपका शिकार पकड़ नहीं लाता, पानी भी नही पियूँगा।

फिर वो एक जगह जाल बिछा कर बैठ गया...
3 दिन बीत गए प्रतीक्षा करते करते, दयालू ठाकुर को दया आ गयी, वो भला दूर कहाँ है,

बांसुरी बजाते आ गए और खुद ही जाल में फंस गए।

किरात तो उनकी भुवन मोहिनी छवि के जाल में खुद फंस गया और एक टक शयाम सुंदर को निहारते हुए अश्रु बहाने लगा,
जब कुछ चेतना हुयी तो बाबा का स्मरण आया और जोर जोर से चिल्लाने लगा शिकार मिल गया, शिकार मिल गया, शिकार मिल गया,

और ठाकुरजी की ओर देख कर बोला,

अच्छा बच्चू .. 3 दिन भूखा प्यासा रखा, अब मिले हो,
और मुझ पर जादू कर रहे हो।

शयाम सुंदर उसके भोले पन पर रीझे जा रहे थे एवं मंद मंद मुस्कान लिए उसे देखे जा रहे थे।

किरात, कृष्ण को शिकार की भांति अपने कंधे पे डाल कर और संत के पास ले आया।

बाबा,
आपका शिकार लाया हूँ... बाबा ने जब ये दृश्य देखा तो क्या देखते हैं किरात के कंधे पे श्री कृष्ण हैं और जाल में से मुस्कुरा रहे हैं।

संत के तो होश उड़ गए, किरात के चरणों में गिर पड़े, फिर ठाकुर जी से कातर वाणी में बोले -

हे नाथ मैंने बचपन से अब तक इतने प्रयत्न किये, आप को अपना बनाने के लिए घर बार छोडा, इतना भजन किया आप नही मिले और इसे 3 दिन में ही मिल गए...!!

भगवान बोले - इसका तुम्हारे प्रति निश्छल प्रेम व कहे हुए वचनों पर दृढ़ विश्वास से मैं रीझ गया और मुझ से इसके समीप आये बिना रहा नहीं गया।

भगवान तो भक्तों के संतों के आधीन ही होतें हैं।

जिस पर संतों की कृपा दृष्टि हो जाय उसे तत्काल अपनी सुखद शरण प्रदान करतें हैं। किरात तो जानता भी नहीं था की भगवान कौन हैं,
पर संत को रोज़ प्रणाम करता था। संत प्रणाम और दर्शन का फल ये है कि 3 दिन में ही ठाकुर मिल गए ।

यह होता है संत की संगति का परिणाम!!
"संत मिलन को जाईये तजि ममता अभिमान, 
ज्यो ज्यो पग आगे बढे कोटिन्ह यज्ञ समान
दीपावली की शुभ कामनाएँ

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

संवेदनशीलता....व्हाट्स एप्प से


मोहन काका डाक विभाग के कर्मचारी थे। बरसों से वे माधोपुर और आस पास के गाँव में चिट्ठियां बांटने का काम करते थे।


एक दिन उन्हें एक चिट्ठी मिली, पता माधोपुर के करीब का ही था लेकिन आज से पहले उन्होंने उस पते पर कोई चिट्ठी नहीं पहुंचाई थी।

रोज की तरह आज भी उन्होंने अपना थैला उठाया और चिट्ठियां बांटने निकला पड़े। सारी चिट्ठियां बांटने के बाद वे उस नए पते की ओर बढ़ने लगे।......दरवाजे पर पहुँच कर उन्होंने आवाज़ दी, “पोस्टमैन!”

अन्दर से किसी लड़की की आवाज़ आई, “काका, वहीं दरवाजे के नीचे से चिट्ठी डाल दीजिये।”

“अजीब लड़की है मैं इतनी दूर से चिट्ठी लेकर आ सकता हूँ और ये महारानी दरवाजे तक भी नहीं निकल सकतीं !”, काका ने मन ही मन सोचा।


“बाहर आइये! रजिस्ट्री आई है, हस्ताक्षर करने पर ही मिलेगी!”, काका खीजते हुए बोले।

“अभी आई।”, अन्दर से आवाज़ आई।

काका इंतज़ार करने लगे, पर जब 2 मिनट बाद भी कोई नहीं आयी तो उनके सब्र का बाँध टूटने लगा।

“यही काम नहीं है मेरे पास, जल्दी करिए और भी चिट्ठियां पहुंचानी है”, और ऐसा कहकर काका दरवाज़ा पीटने लगे।

कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।

सामने का दृश्य देख कर काका चौंक गए।

एक 12-13 साल की लड़की थी जिसके दोनों पैर कटे हुए थे। उन्हें अपनी अधीरता पर शर्मिंदगी हो रही थी।

लड़की बोली, “क्षमा कीजियेगा मैंने आने में देर लगा दी, बताइए हस्ताक्षर कहाँ करने हैं?”

काका ने हस्ताक्षर कराये और वहां से चले गए।

इस घटना के आठ-दस दिन बाद काका को फिर उसी पते की चिट्ठी मिली। इस बार भी सब जगह चिट्ठियां पहुँचाने के बाद वे उस घर के सामने पहुंचे!

“चिट्ठी आई है, हस्ताक्षर की भी ज़रूरत नहीं है…नीचे से डाल दूँ।”, काका बोले।

“नहीं-नहीं, रुकिए मैं अभी आई।”, लड़की भीतर से चिल्लाई।

कुछ देर बाद दरवाजा खुला।

लड़की के हाथ में गिफ्ट पैकिंग किया हुआ एक डिब्बा था।

“काका लाइए मेरी चिट्ठी और लीजिये अपना तोहफ़ा।”, लड़की मुस्कुराते हुए बोली।

“इसकी क्या ज़रूरत है बेटा”, काका संकोचवश उपहार लेते हुए बोले।

लड़की बोली, “बस ऐसे ही काका…आप इसे ले जाइए और घर जा कर ही खोलियेगा!”

काका डिब्बा लेकर घर की और बढ़ चले, उन्हें समझ नहीं आर रहा था कि डिब्बे में क्या होगा!

घर पहुँचते ही उन्होंने डिब्बा खोला, और तोहफ़ा देखते ही उनकी आँखों से आंसू टपकने लगे।

डिब्बे में एक जोड़ी चप्पलें थीं। काका बरसों से नंगे पाँव ही चिट्ठियां बांटा करते थे लेकिन आज तक किसी ने इस ओर ध्यान नहीं दिया था।

ये उनके जीवन का सबसे कीमती तोहफ़ा था…काका चप्पलें कलेजे से लगा कर रोने लगे; उनके मन में बार-बार एक ही विचार आ रहा था- बच्ची ने उन्हें चप्पलें तो दे दीं पर वे उसे पैर कहाँ से लाकर देंगे?

संवेदनशीलता एक बहुत बड़ा मानवीय गुण है। दूसरों के दुखों को महसूस करना और उसे कम करने का प्रयास करना एक महान काम है। जिस बच्ची के खुद के पैर न हों उसकी दूसरों के पैरों के प्रति संवेदनशीलता हमें एक बहुत बड़ा सन्देश देती है। आइये हम भी अपने समाज, अपने आस-पड़ोस, अपने यार-मित्रों-अजनबियों सभी के प्रति संवेदनशील बनें…आइये हम भी किसी के नंगे पाँव की चप्पलें बनें और दुःख से भरी इस दुनिया में कुछ खुशियाँ फैलाएं!

..................व्हाट्स एप्प से

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

एक हिंदी लेखक....सेवा सदन प्रसाद

आज एक अलक....एक हिंदी लेखक

मोबाइल की घंटी बजी। ऑन करने पे आवाज आई -- "हेलो,  सुधीर जी नमस्कार ।"
" नमस्कार भाई साहब ।"
" सुधीर जी, आपकी कहानी बहुत अच्छी लगी
"कैसी कहानी  ? " सुधीर जी ने थोड़ा आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा ।
" अरे वही ' त्रासदी ' कहानी जो इस माह के मैगजीन में छपी है ।"

सुधीर जी को तो पता भी नहीं फिर भी अपने सम्मान की सुरक्षा हेतु बोल पड़े -- " हाँ, अभी देखी नहीं है ।"
" बस आपको मुबारकबाद देने के लिए फोन किया ।"
फोन कटते ही सुधीर जी दौड़ पड़े बुक स्टाल की ओर ।पत्रिका को उलट पुलट कर देखा। कहानी तो छपी थी पर जेब में इतने पैसे नहीं थे कि पत्रिका खरीद सके। बस वापस लौट पड़े ।
फिर लेखकीय प्रति के लिए पोस्ट आॅफिस का चक्कर। जब एक सप्ताह तक पत्रिका नहीं मिली तो संपादक महोदय को फोन किया ।संपादक महोदय ने बिंदास उत्तर दिया -- " हमारे यहां जिनकी भी रचना छपती है, हम प्रति भेज देते हैं ।शायद डाक में गुम हो गईं होगी ।आप लेखक हैं इसीलिए दूसरी प्रति आधे दाम में मिल जायेगी।
सुधीर जी बुत बन गये ।


- सेवा सदन प्रसाद
इस अलक ने लेखक की आज की परिस्थियों का सही आंकनल किया है


सोमवार, 25 सितंबर 2017

मिथक कथा जो आज प्रासंगिक है....पाँच आश्चर्य....

महाभारत के युद्ध की समाप्ति के पश्चात जब समय का चक्र सही गति से चलने लगा तब एक दिन श्री कृष्ण ने पाँचों पांडवों को आज्ञा दी –
“तुम पाँचों भाई वन में जाओ और जो कुछ भी दिखे वह आकर मुझे बताओ। मैं तुम्हें उसका प्रभाव बताऊँगा।”

पाँचों भाई वन में गये।
युधिष्ठिर महाराज ने देखा कि किसी हाथी की दो सूँड है। यह देखकर उनके आश्चर्य का पार न रहा।

अर्जुन दूसरी दिशा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि कोई पक्षी है, उसके पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं पर वह पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है | यह भी किसी आश्चर्य से कम नहीं था !

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय ने बछड़े को जन्म दिया है और बछड़े को इतना चाट रही है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है।

सहदेव ने चौथा आश्चर्य देखा कि छः सात कुएँ हैं और आसपास के कुओं में पानी है किन्तु बीच का कुआँ खाली है। बीच का कुआँ गहरा है फिर भी पानी नहीं है।

पाँचवे भाई नकुल ने भी एक अदभुत आश्चर्य देखा कि एक पहाड़ के ऊपर से एक बड़ी शिला लुढ़कती-लुढ़कती आई और कितने ही वृक्षों से टकराई पर उन वृक्षों के तने उसे रोक न सके। कितनी ही अन्य शिलाओं के साथ टकराई पर वह रुक न सकीं। अंत में एक अत्यंत छोटे पौधे का स्पर्श होते ही वह स्थिर हो गई।

ये सभी अजूबे देखकर पाँचों भाईयों के आश्चर्यों का कोई पार नहीं रहा ! शाम को वे सभी श्रीकृष्ण के पास गये और अपने अलग-अलग दृश्यों का वर्णन किया।

युधिष्ठिर कहते हैं- “मैंने दो सूँडवाला हाथी देखा तो मेरे आश्चर्य का कोई पार न रहा।” तब श्री कृष्ण कहते हैं –  “कलियुग में ऐसे लोगों का राज्य होगा जो दोनों ओर से शोषण करेंगे । बोलेंगे कुछ और करेंगे कुछ। ऐसे लोगों का राज्य होगा। इसलिए तुम पहले राज्य कर लो।

अर्जुन ने आश्चर्य देखा कि पक्षी के पंखों पर वेद की ऋचाएँ लिखी हुई हैं और पक्षी मुर्दे का मांस खा रहा है। इस पर श्री कृष्णा बोले कि कलयुग में भी इसी तरह के लोग रहेंगे जो बड़े- बड़े पंडित और विद्वान कहलायेंगे किन्तु वे यही देखते रहेंगे कि कौन-सा मनुष्य मरे और हमारे नाम पर संपत्ति कर जाये। “संस्था” के व्यक्ति विचारेंगे कि कौन सा मनुष्य मरे और संस्था हमारे नाम से हो जाये। हर जाति धर्म के प्रमुख पद पर बैठे विचार करेंगे कि कब किसका श्राद्ध है ? चाहे कितने भी बड़े लोग होंगे किन्तु उनकी दृष्टि तो धन के ऊपर (मांस के ऊपर) ही रहेगी। परधन परमन हरन को वैश्या बड़ी चतुर। ऐसे लोगों की बहुतायत होगी, कोई कोई विरला ही संत पुरूष होगा।

भीम ने तीसरा आश्चर्य देखा कि गाय अपने बछड़े को इतना चाटती है कि बछड़ा लहुलुहान हो जाता है। इस आश्चर्य का वर्णन करते हुए कृष्णा बोले कि कलियुग का आदमी शिशुपाल हो जायेगा। बालकों के लिए इतनी ममता करेगा कि उन्हें अपने विकास का अवसर ही नहीं मिलेगा।
किसी का बेटा घर छोड़कर साधु बनेगा तो हजारों व्यक्ति दर्शन करेंगे….किन्तु यदि अपना बेटा साधु बनता होगा तो रोयेंगे कि मेरे बेटे का क्या होगा ? इतनी सारी ममता होगी कि उसे मोह-माया और परिवार में ही बाँधकर रखेंगे और उसका जीवन वहीं खत्म हो जाएगा। अंत में बेचारा अनाथ होकर मरेगा। वास्तव में लड़के तुम्हारे नहीं हैं, वे तो बहुओं की अमानत हैं; लड़कियाँ जमाइयों की अमानत हैं और तुम्हारा यह शरीर मृत्यु की अमानत है।तुम्हारी आत्मा तो परमात्मा की अमानत है। तुम अपने शाश्वत संबंध को जान लो बस, बेडा पार हो जायेगा !

सहदेव ने चौथा आश्चर्य यह देखा कि पाँच सात भरे कुएँ के बीच का कुआँ एक दम खाली ! सहदेव को समझाते हुए कृष्णा बोले कि कलियुग में धनाढय लोग लड़के-लड़की के विवाह में, मकान के उत्सव में, छोटे-बड़े उत्सवों में तो लाखों रूपये खर्च कर देंगे, परन्तु पड़ोस में ही यदि कोई भूखा प्यासा होगा तो यह नहीं देखेंगे कि उसका पेट भरा है या नहीं। दूसरी ओर मौज-मस्ती में, शराब, कबाब, फैशन और
व्यसन में पैसे उड़ा देंगे। किन्तु किसी के दो आँसूँ पोंछने में उनकी रूचि न होगी और जिनकी रूचि होगी उन पर कलियुग का प्रभाव नहीं होगा, उन पर भगवान का प्रभाव होगा।

अब आई नकुल की बारी जिन्होंने पाँचवा आश्चर्य ये देखा कि एक बड़ी चट्टान पहाड़ पर से लुढ़की, वृक्षों के तने और चट्टाने उसे रोक न
पाये किन्तु एक छोटे से पौधे से टकराते ही वह चट्टान रूक गई। इसी बात को समझाने हेतु कृष्णा कहते हैं कि कलियुग में मानव का मन नीचे गिरेगा, उसका जीवन पतित होगा । यह पतित जीवन धन की शिलाओं से नहीं रूकेगा न ही सत्ता के वृक्षों से रूकेगा । किन्तु हरिनाम के एक छोटे से पौधे से, हरि कीर्तन के एक छोटे से पौधे से मनुष्य के जीवन का पतन होना रूक जायेगा |

भले ही ये आश्चर्य पांडवों ने उस काल में देखे हो पर कलयुग में वही आश्चर्य अपनी सत्यता को प्रमाणित करते हैं |

शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

नुकसान...संजय रांका

कई बार लोग यंत्रवत उदारता दिखाते हैं 
और अचानक उनकी 
ओढ़ी हुई शालीनता से परदा उठ जाता है

वयोवृद्ध पिताजी उपचार से ठीक होकर घर आकर आज बेहद खुश थे. बार-बार उनके दिमाग में एक ही बात आ रही थी कि बचपल में मरणासन्न अवस्था में पहुच चुके बेटे को बचोने के लिए उन्होंने जी-जान एक कर दी थी, आज उसी बेटे ने करोड़ो के टर्न ओव्हर वाले बिजिनेस को छोड़कर लगातार आठ दिनों तक अस्पताल में रहकर उनकी सेवा की.

यह बात वे हर उस व्यक्ति को बड़े खुश होकर बता रहे थे जो उनका हालचाल जानने आ रहा था. हालचाल जानने का सिलसिला जब खत्म हुआ जो एक दिन पिता जी ने बेटे को बुलाकर खुशनुमा अंदाज में उसके हाथ में पचास हजार रुपए रख दिए.

बेटे ने पूछा पिता जी यह किसलिए?

पिताजी नें कहा बेटा मेरे इलाज का खर्च इतना तो हुआ ही होगा ?

उसके बाद बेटे ने जो कुछ कहा उसे सुनकर पिताजी को ऐसा लगा जैसे वे वैसी ही अवस्था मे पहुंच जैसी अवस्था किसी समय उनके बेटे की हो गई थी

बेटे ने कहा था..पिताजी मेरी दुकान आठ दिनों तक बन्द रही थी. उसका क्या?
-संजय रांका

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

तन्हाई............गीता तिवारी

जब कभी किसी
तन्हा सी शाम
बैठ अकेले चुपचाप 
पलटोगे जीवन पृष्ठों को
सच कहना तुम
क्या रोक सकोगे
इतिहास हुए उन पन्नों पर
मुझको नज़र आने से
क्या ये कह पाओगे
भुला दिया है मुझको तुमने
कैसे समझाओगे ख़ुद को
बहते अश्कों में छिपकर
याद मेरी जब आयेगी
शाम की उस तन्हाई में

-गीता तिवारी
अध्यापक 
पूर्व माध्यमिक विद्यालय 
गोरखपुर ,उ.प्र.

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

सितम भी सहा कीजिए....डॉ. डी.एम. मिश्र


इस जहाँ का चलन भी निभा दीजिए
और अपने भी दिल का कहा कीजिए।

खोज में आप जिसकी परेशान हैं
पास में ही न हो ये पता कीजिए।

एक भी आप दुश्मन नहीं पायेगे
बस ,ज़रा और दिल को बड़ा कीजिए।

प्यार जैसा मज़ा पा लिया है अगर
मुस्कराकर सितम भी सहा कीजिए।
-डॉ. डी.एम. मिश्र

रविवार, 3 सितंबर 2017

डेटिंग.....अर्जित पांडेय

मैंने देखा उसे ,वो शीशे में खुद को निहार रहा था ,होठों पर लिपस्टिक धीरे धीरे लगाकर काफी खुश दिख रहा था मानो उसे कोई खजाना मिल गया हो । बेहया एक लड़का होकर लडकियों जैसी हरकतें!

हां,  इसके आलावा मैं और क्या सोच सकता था? आखिर मै ठहरा पुरुषप्रधान समाज का एक पुरुष ही न, जिसके सोचने की सीमा बड़ी संकरी है ।

उसके कमरे का दरवाजा खुला हुआ था बेहया के साथ ढीठ और बेशर्म भी ,जब लड़कियों जैसी हरकतें करनी ही थी तो बंद कमरे में करता। सबके सामने नुमाइश करने की क्या जरुरत है उसे?

‘दीप ये तुम क्या कर रहे हो?  मैंने उससे पूछा। मेरे शब्दों में प्रश्न भी था और क्रोध भी । प्रश्न इसलिए क्योंकि मै जानना चाहता था कि वो होंठो पर लाली क्यों लगा रहा है और क्रोध इसलिए कि एक पुरुष होकर सजना संवरना!

‘अरे अर्जित, तुम कब आये?  उसने खुश होकर पूछा।  ऐसी हरकत के बाद ख़ुशी!  ये तो बड़ा बेशर्म है मैंने मन ही मन सोचा । मैं उत्तर देने ही वाला था कि उसने एक और प्रश्न पूछ लिया,  ‘मैं कैसा दिख रहा हूँ अर्जित?

‘एक नंबर के नचनिया लग रहे हो । ऐसा लग रहा मानो पूरी दुनिया दर्शक बन बैठी है और तुम्हें उनके सामने नाचकर उनका दिल हिलाना है।’ मैंने झुंझलाकर उत्तर दिया,  ‘तुम स्त्रियों की भांति सज संवरकर कहा जा रहे हो हो?’

‘मैं डेट पर जा रहा हूं मित्र’ उसने थोड़ा शरमाकर कहा । उसका शरमाना मुझे जलाने के लिए काफी था।

‘यानि किसी पुरुष के साथ जा रहे हो डेट पर?’

‘हा हा हा, तुम पुरुष प्रधान समाज के लोग भी न? क्यों एक लड़का सज संवरकर किसी लड़की के साथ डेट पर चला जायेगा तो पाप हो जायेगा। ओह, तो मेरे प्यारे दोस्त को मेरा सजना संवरना अच्छा नहीं लगा।’ दीप ने मुझपर व्यंग्य कसा।

‘नहीं, मुझे मेरे दोस्त का लड़की बनना अच्छा नहीं लगा’ मैंने झट से उत्तर दिया।

‘क्यों? अगर मै होठों पर लाली लगा रहा ,सज सवर रहा तो क्या इससे मेरी मर्दानगी पर सवाल खड़ा हो जाता है? क्या मै मर्द नही दीखता?’

मै कुछ बोलने वाला ही था की दीप ने मुझे बीच में रोकर कहना शुरू किया, ‘आज जमाना कह रहा लड़के लडकियां बराबर है। अगर एक लड़की लडकों के रहन सहन को स्वीकार कर लेती है तो ज़माने को कोई दिक्कत नहीं पर अगर एक लड़का लड़की के रहन सहन को स्वीकारता है तो लोग उसे नचनिया ,बेशर्म ,बेहया कहना शुरू कर देते हैं। उसकी मर्दानगी पर सवाल खड़ा करते है। क्या एक पुरुष को सजने का अधिकार नहीं? क्या एक पुरुष को अच्छा दिखने का अधिकार नहीं? क्या होठों पर लिपस्टिक लगाने से मर्द ,मर्द नही रह जाता?

दीप के इन सवालों का जवाब मैं दे नहीं पाया। 
मैं आज भी इन सवालों के जवाब ढूँढ़ ही रहा हूँ

-अर्जित पांडेय
छात्र, एम. टेक,आईआईटी, 
दिल्ली
मोबाइल--7408918861

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

बने भगवान बैठे हैं.....राहुल कुमार

यहाँ कुछ लोग तो खुद को, खुदा ही मान बैठे हैं 
कराते अपनी' ही पूजा बने भगवान बैठे हैं।

मगर है जुर्म औ दहशत, ही' कारोबार बस इनका 
के हिन्दुस्तान में कैसे, ये' तालेबान बैठे हैं।

जिन्हें तो खुद भुगतनी है, सजा अपने ही' कर्मों की 
न जाने और कितनों को दिये वरदान बैठे हैं।

हो' रहबर और रहजन की, भला पहचान कैसे अब 
ये मुजरिम ही समस्या का लिए संज्ञान बैठे है।

लगाकर राम का आता, मुखौटा अब तो' रावण भी 
न जाने औ छुपे कितने यहाँ शैतान बैठे हैं।

कोई किस्सा नहीं बस दर्ज ये तो इक हकीकत है 
ये सब "होरी" यहाँ दिल में लिए "गोदान" बैठे हैं।

- राहुल कुमार (नयानगर, समस्तीपुर) 
9776660562
रहजन= डाकू  ; रहबर =मार्गदर्शक

बुधवार, 30 अगस्त 2017

शब्द.....श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


मेरे लिये शब्द एक औजार है.
भीतर की टूट-फूट
उधेडबुन अव्यवस्था और अस्वस्थता
की शल्यक्रिया के लिये।

शब्द एक आईना,
यदा-कदा अपने स्वत्व से 
साक्षात्कार के लिये।

मेरे लिये शब्द संगीत है.
ज़िन्दगी के सारे राग
और सुरों को समेटे हुए।

दोपहर की धूप में भोर की चहचहाट है तो 
रात की कालिख़ में नक्षत्रों की टिमटिमाहट।

मेरे लिये शब्द एक ढाल है,
चाही-अनचाही लड़ाइयों में
अपनी सुरक्षा के लिये।

मेरे लिये शब्द आँसू हैं,
यंत्रणा और विषाद की अभिव्यक्ति के लिये।
हताशा की भंवरों से लड़ने का सम्बल है।

शब्द एक रस्सी की तरह,
मन के अन्धे गहरे कुएं में 
दफ़न पड़ी यादों को खंगालने के लिये।

शब्द एक प्रतिध्वनि है,
वीरान/ अकेली/ निर्वासित नगरी में
हमसफ़र की तरह
साथ चलने के लिये।


-श्रीमती डॉ. प्रभा मुजुमदार


मंगलवार, 29 अगस्त 2017

माँ की व्यथा....आभा नौलखा


आज यह कड़ा निर्णय लेते हुए निकुंज की आँखों के सामने उसकी पूरी जिंदगी एक चलचित्र की भाँति घूम गई। उसे आज भी याद है वह शाम जब मम्मी-पापा ने उसे उसकी ज़िन्दगी से परिचित कराया था कि वह एक हिजड़ा है। पर यह सब बताने से पहले ही उसे इतना सशक्त बना दिया था कि यह बात उसे अपने लक्ष्य से हिला न सकी। उसने कड़ा निर्णय लिया कि वह अपने माता-पिता को उनकी इस मेहनत का फल अपनी मेहनत से देगी। और एक प्रतिष्ठित कंपनी में नौकरी पाकर सपना पूरा किया। वहीं तो उसकी मुलाक़ात अभय से हुई थी और कब प्यार हो गया पता ही न चला और निकुंज के बारे में सब पता चलने के बाद भी अभय का फ़ैसला न बदला। दोनों का विवाह हो गया, कुछ समय पश्चात उन्होंने निलेश को गोद ले लिया। कितना अच्छा जीवन बीत रहा था कि... निलेश बारह साल का ही तो था कि अभय का अकस्मात निधन हो गया, पर निकुंज ने हिम्मत न हारी...।
....अब वह समय आ गया है कि निलेश को सब कुछ बता दिया जाए, क्योंकि अब वह अट्ठारह बरस का हो गया है।
....पर, निलेश यह सुनते ही चिल्ला पड़ा!
....मतलब मैं अनाथ हूँ और तुम एक हिजड़ा...!
....एक हिजड़े के हाथों मेरा पालन-पोषण...छी...!
-आभा नौलखा

सोमवार, 28 अगस्त 2017

लिखने वाला क्यों लिखता है....पावनी दीक्षित "जानिब"

लिखने वाला क्यों लिखता है मिलन के साथ बिछोड़े 
दिल में प्यार का महल बनाकर ये बनके पत्थर तोड़े। ।

कोई कसक है धड़कन में दिल मुश्किल से धड़कता है
जाने कैसी याद है तेरी जो बस सांस है दिल से जोड़े ।

दर्द हमारे बसमें नहीँ है चाहत में कोई रस्में नहीं हैं 
बह ना जाए दुनिया निगोड़ी मैनें अश्कों के बांध है छोड़े ।

अब सोचूं मुझे भूल गए हो फिर सोचूं तुम रूठ गए हो 
टूटे दिल के टुकड़े लेकर मैंने कितनी बार हैं जोड़े।

आसां नहीं दिलका लगाना इश्क़ का मतलब ही है मिटाना
इस बैरन चाहत की गली में अब कोई कदम न मोंड़े ।

"जानिब" मेरी आह में ढलके आए लब पे गीत मचलके
अपना क्या है कट ही जाएंगे जीवन के दिन थोड़े ।
-पावनी दीक्षित "जानिब"
महफिल से...

रविवार, 27 अगस्त 2017

तुम्हें बेवफा मान लेते जो पहले...नवीन मणि त्रिपाठी

122 122 122 122 
अगर मेरे दिल पे हुकूमत न होती ।
तो फिर आपकी भी रियासत न होती ।।

पलट जाती कश्ती भी तूफां में मेरी ।
मेरे पास उनकी नसीहत न होती ।।

बहुत कुछ बदलते फ़िजा के नज़ारे ।
अगर आपकी कुछ सियासत न होती ।।

जरा सा भी वो थाम लेते जो दामन ।
यहां आसुओं की इज़ाफ़त न होती ।।

वो मेरा सुकूँ भी मेरे साथ रहता ।
अदाओं में थोड़ी शरारत न होती ।।

वो इंसाफ करता न अब तक जहां में ।
कहीं भी खुदा की इबादत न होती ।।

बरसते न बादल भी प्यासी जमीं पर ।
अगर आपकी कुछ इज़ाज़त न होती।।

मुहब्बत के रिश्ते न होते सलामत ।
तो फिर ताज जैसी इमारत न होती ।।

यूँ लहरा के जुल्फ़े न करतीं नुमाइश ।
तो अहले चमन में कयामत न होती ।।

तुम्हें बेवफा मान लेते जो पहले ।
कसम से वफ़ा की फ़जीहत न होती ।।
-- नवीन मणि त्रिपाठी

शनिवार, 26 अगस्त 2017

आईना भी ख़फ़ा हो गया.....डॉ.यासमीन ख़ान

तू जो मुझसे जुदा हो गया
आईना भी ख़फ़ा हो गया।।

ढ़ूंढ़ती हूँ उसे दर- ब- दर।
जो हसीं पल हवा हो गया।।

पहले ऐसा नहीं था कभी 
वक्त क्यों बेवफ़ा हो गया।।

याद आने लगी है तेरी
ज़ख़्मे दिल फिर हरा हो गया।।

भूख वो ही,वही मुफ़लिसी।
साल कैसे नया हो गया।।

मंज़िलों के लिये आज तो।
जिस्म भी रास्ता हो गया।।

फ़िक़्र है हम सभी की यही।
क्या तवक़्क़ो थी क्या हो गया।।

"यास्मीं" अब तिरा ये बदन।
ख़्वाब का मक़बरा हो गया।।

-डॉ.यासमीन ख़ान

सोमवार, 21 अगस्त 2017

गाली.....-अरुण कुमार

दस बजे बड़े बाबू    ने   कार्यालय में   प्रवेश  किया और कुर्सी   पर बैठने  से पहले उस पर उँगली  फिराकर गुस्से और रौब से  चीखा,  ‘‘अबे  चरणदास … लगता है   तू   आज भी   देर से  ड्यूटी   पर आया,  जो तूने  मेज–कुर्सी   की   सफाई  नहीं की?’’

‘‘बाबू  जी, मैं    तो पौने   नौ  बजे ही आ  गया था।  आपकी मेज कुर्सी    तो   मैंने इसलिए छोड़    दी  कि आप दस  बजे आकर मुझसे दोबारा सफाई  करवाते तो  हैं   ही  , तो  क्यों न आपके  आने पर आपके सामने ही सफाई  कर दूँ…’’ चरणदास ने  सहजता से जवाब दिया तो  बड़ा बाबू  बुरी   तरह से  चिढ़ गया।  अपनी  खिसियाहट छुपाते हुए  बोला, ‘‘अच्छा–अच्छा… अब ज्यादा जिरह मत लगा  और फटाफट मेज–कुर्सी  साफ कर दे। दुनियाभर का काम पड़ा है   करने को।  अब तेरी तरह मजे की  नौकरी तो है नहीं    हमारी कि सारा दिन बैन्च  पर बैठे ऊँघते  रहें।’’

चरणदास बडे़ बाबू    की   मेज–कुर्सी झाड़कर  चुपचाप अपनी बैन्च  पर आ बैठा  था। उसका मन कुछ  बुझ–सा  गया था।  अब वह  अपने  हिस्से के सारे काम  तो  करता ही   है, पर बड़ा  बाबू   कभी    उसके  काम से  प्रसन्न   हुआ    हो  ऐसा   कभी प्रकट  में  नहीं    आया। चरणदास जानता है।  वह सब कुछ जानता   है    कि बड़ा  बाबू   उससे  इतनी नफरत क्यों  करता है!   क्यों  वह उसकी हर छोटी – सी बात में  दोष   ढूँढने  बैठ    जाता है।

बड़े बाबू    ने   मेज पर पड़ी  फाइलों   पर नोटिंग  चढ़ाकर एक तरफ रखा  तथा पैन्ट  की अन्दरूनी  जेब से   चाभी निकालकर मेज पर पटकते   हुए  हाँक लगायी,   ‘‘चरणदास… अल्मारी खोलकर  कैश बुक निकाल… सर्टिफिकेट   देना है!’’  चरणदास ने  अल्मारी खोलकर कैशबुक मेज पर रखी  ही थी  कि बड़ा बाबू   कैशबुक  देखते ही तैश में आ गया। चरणदास की तरफ लाल–पीली  आँखें   करता हुआ  गुर्राया, ‘‘अबे   तुझे  समझ  नहीं    है  क्या…  करंट वाली  कैशबुक  निकालकर ला। चरणदास ने  चुपचाप   वह  कैशबुक उठाकर अल्मारी में रखी  तथा वहाँ से  एक अन्य कैशबुक  उठाकर  ले आया।  उस कैशबुक   को देखते ही  बड़ा बाबू  आपे से बाहर हो  गया।  लगा चिल्लाने, ‘‘अबे  आज क्या तू  अपना  दिमाग घर  छोड़कर आया है  जो ऐसी  हरकतें कर रहा   है! ग्रीन जिल्द  वाली कैशबुक तू  रोज़   निकालकर  लाता है  और  आज देख  कैसे  जानबूझकर मुझे परेशान    कर रहा है   …!

बार–बार  के अपमान से आहत चरणदास के  भीतर  विरोध के  स्वर   उभर आए   थे।  वह कैशबुक   वहीं मेज पर छोड़कर बोला,   ‘‘मैं तो   अनपढ़ हूँ     बाऊजी! अब मुझे क्या   समझ कि आपको  क्या चाहिए! …  यह आपके  सामने चार कदम पर तो अल्मारी   है   …  आप थोड़ी   सी तकलीफ करो  और आपको   जो चाहिए   स्वयं  ही ले लो! यह कहकर चरणदास वापिस अपनी बैन्च  पर आकर बैठ  गया था।

चरणदास की इस क्रिया से बड़े बाबू    की क्रोघाग्नि  में घी  पड़   गया था,  मानो। वह कुर्सी को  पीछे  धकेलकर खड़ा   होता हुआ  चिल्लाया,    ‘‘अबे  ओ चूहड़े   के  बीज… तू   अपना ये चूहड़ापना घर  पर ही  छोड़कर आया कर … यहाँ हमारे सामने  दफ्तर में   अपनी गंदगी मत खिंडाया  कर…

जातिसूचक गाली सुनकर  चरणदास का खून  खौल  उठा।  दफ्तर और अपने   छोटे   पद  का खयाल कर बमुश्किल अपने गुस्से  को  पीता   हुआ बोला, ‘‘बाऊजी आप उम्र  में   और पद में   मुझसे बडे़   हैं।  आप ऊँची जाति से हैं    पर इसका मतलब यह तो  नहीं  कि आप मुझे जातिसूचक गाली देकर  बात करेंगे।  यह सब आपको शोभा नहीं   देता   है।

‘‘कहूँगा  मैं   तो तुझे  … चूहड़ा। चूहड़े  की औलाद!   तुझे जो  मेरा  बिगाड़ना है,  बिगाड़ले… जा!’’बडे़ बाबू    ने   चरणदास के अपने  प्रति मन में    बसी नफरत को   उल्टी  की तरह से उगला तथा बड़बड़ाता    हुआ    अपने काम में   लग गया।

चरणदास  का बाहर भीतर अपमान की आग में   जलने लगा था।  उसे लगा  कि अगर आज वह चुप बैठा  रह गया ,तो  यह आग तो  उसकी पीढ़यों को  जला देगी।  मन ही  मन कुछ  निश्चय कर वह उठा और  अपने प्रधान  रामआसरे को साथ  ले जाकर चौकी  में  बड़े बाबू  के  खिलाफ   पर्चा दे   दिया।

बड़े बाबू    को   जब पुलिस चौकी से  बुलावा आया तो  उसके सारे तेवर ढीले   पड़ गए। चौकी इंचार्ज उसे  समझाते हुए  बोला, ‘‘बाऊजी सरकारी नौकरी में होते    हुए आपने ऐसी गलती क्यों  की! आपको पता होना चाहिए    कि छुआछूत  अपराध   की  श्रेणी में   आता है।एक दिन का समय दे  रहा हूँ,   अगर अपनी नौकरी  की सलामती  चाहते हो , तो   समझौता कर लो।  कल इसी समय पुन:  हाजिर हो  जाना…।’’

बडे़ बाबू    ने   अपनी पूरी  ताकत लगा  दी कि किसी तरह से चरणदास  अपनी शिकायत वापिस ले  ले।  उसने अपनी यूनियन   के पदा​धिकारियों एवं कार्यालय के अन्य  कर्मचारियों के माध्यम   से भी   चरणदास को मनाने  की  कोशिश  की  किंतु चरणदास टस से मस न हुआ।  वह हाथ  जोड़कर   मात्र  एक ही  बात कहता कि उसे न्याय  चाहिए।

अगले दिन पुलिस  चौकी  में   चरणदास तथा   बड़ा बाबू  अपने  साथ दो–दो   मौजिज व्यक्तियों  को लेकर   पहुँच गये  थे।  बड़े   बाबू के  होश–हवाश  उड़े   हुए थे।  उसे   काटो तो खून नहीं।  चौकी  इंचार्ज  ने फिर  से कहा,  ‘‘तुम दोनों  सरकारी कर्मचारी हो।  बात बढ़ाने  से क्या फायदा…।  एक–दूसरे   से  हाथ मिलाकर बात खत्म करो।  बड़ा बाबू  तो  मानो   इसी ताक में था। क्षणांश  की भी देरी   किये  बिना उसने चरणदास   के  पैरों को    छू    लिया।  हाथ जोड़कर फफकता हुआ  बोला, ‘‘मेरी नौकरी  तेरे हाथ है  चरणदास … मेरी   दो बेटियाँ अभी अनब्याही  हैं     … भाई मुझे    माफ कर दे।

बडे़ बाबू    की आँखों    में  आँसू  देखकर चरणदास  पिघल गया, बोला,  ‘‘बाऊजी! मैं   तो छोटा  आदमी हूँ    और सदा   छोटा ही   रहूँगा।  आपको सजा दिलवाना   मेरा उद्देश्य नहीं  था। मैं    तो  बस आपको अहसास दिलाना चाहता  था  कि मैं  भी    एक मनुष्य हूँ।  क्या  हुआ गर मैं  छोटी     जाति में   पैदा   हो  गया …!’’

चरणदास ने  समझौता  प्रस्तुत करके   अपनी शिकायत वापिस ले ली  थी।

पुलिस चौकी से  बाहर   आते  हुए  बड़ा  बाबू   पसीने पौंछ  रहा था। वह अपने आप को बेहद अपमानित महसूस कर रहा था।  रही–सही कसर पुलिस वालों  ने  उसकी जेब खाली करा कर पूरी  कर दी  थी।  बाहर आते हुए उसकी  हालत  ऐसी  हो   रही थी , मानो   बस के पहिये   के नीचे उसकी   गर्दन आती–आती  बची  हो  ! चरणदास  की गर्दन  आत्मविश्वास  से तनी हुई  थी   तथा उसका   चेहरा  स्वाभिमान की  आभा से  दमक रहा था।  यह देखकर बड़े बाबू के  मन में   जातीय द्वेष  की भावना  फिर से जाग्रत हो   गयी थी।  बड़ा  बाबू   चरणदास के नजदीक आकर, नफरत से उसकी तरफ देखता  हुआ बुदबुदाया, ‘‘चरणदास … हो  गई तेरे  मन की  पूरी! अब तो  तू खुश   है!  पर एक बात बता चरणदास … अब क्या तू  ब्राह्मण हो   गया है?’’

चरणदास  विस्फारित नेत्रों   से बडे़ बाबू    का चेहरा ताकता ही रह गया। उसे लगा,  मानो बड़े बाबू    ने   उसे फिर  से  गाली देते  हुए उसके  गाल  पर तमाचा जड़ दिया   है।

-अरुण  कुमार 

-0- स्थायी  पता -0-    
अरुण कुमार, 895/12,
आजाद नगर, 
कुरुक्षेत्र –136119(हरियाणा)

-0- वर्तमान   पता -0-
 मकान नं।   1460,
सेक्टर–13,  हिसार।

बुधवार, 16 अगस्त 2017

अश्लील .....हरिशंकर परसाई



शहर में ऐसा शोर था कि अश्‍लील साहित्‍य का बहुत प्रचार हो रहा है। अखबारों में समाचार और नागरिकों के पत्र छपते कि सड़कों के किनारे खुलेआम अश्‍लील पुस्‍तकें बिक रही हैं।
दस-बारह उत्‍साही समाज-सुधारक युवकों ने टोली बनाई और तय किया कि जहाँ भी मिलेगा हम ऐसे साहित्‍य को छीन लेंगे और उसकी सार्वजनिक होली जलाएँगे।
उन्‍होंने एक दुकान पर छापा मारकर बीच-पच्‍चीस अश्‍लील पुस्‍तकें हाथों में कीं। हरके के पास दो या तीन किताबें थीं। मुखिया ने कहा - आज तो देर हो गई। कल शाम को अखबार में सूचना देकर परसों किसी सार्वजनिक स्‍थान में इन्‍हें जलाएँगे। प्रचार करने से दूसरे लोगों पर भी असर पड़ेगा। कल शाम को सब मेरे घर पर मिलो। पुस्‍तकें में इकट्ठी अभी घर नहीं ले जा सकता। बीस-पच्‍चीस हैं। पिताजी और चाचाजी हैं। देख लेंगे तो आफत हो जाएगी। ये दो-तीन किताबें तुम लोग छिपाकर घर ले जाओ। कल शाम को ले आना।
दूसरे दिन शाम को सब मिले पर किताबें कोई नहीं लाया था। मुखिया ने कहा - किताबें दो तो मैं इस बोरे में छिपाकर रख दूँ। फिर कल जलाने की जगह बोरा ले चलेंगे।
किताब कोई लाया नहीं था।
एक ने कहा - कल नहीं, परसों जलाना। पढ़ तो लें।
दूसरे ने कहा - अभी हम पढ़ रहे हैं। किताबों को दो-तीन बाद जला देना। अब तो किताबें जब्‍त ही कर लीं।
उस दिन जलाने का कार्यक्रम नहीं बन सका। तीसरे दिन फिर किताबें लेकर मिलने का तय हुआ।
तीसरे दिन भी कोई किताबें नहीं लाया।
एक ने कहा - अरे यार, फादर के हाथ किताबें पड़ गईं। वे पढ़ रहे हैं।
दूसरे ने कहा - अंकिल पढ़ लें, तब ले आऊँगा।
तीसरे ने कहा - भाभी उठाकर ले गई। बोली की दो-तीन दिनों में पढ़कर वापस कर दूँगी।
चौथे ने कहा - अरे, पड़ोस की चाची मेरी गैरहाजिर में उठा ले गईं। पढ़ लें तो दो-तीन दिन में जला देंगे।
अश्‍लील पुस्‍तकें कभी नहीं जलाई गईं। वे अब अधिक व्‍यवस्थित ढंग से पढ़ी जा रही हैं।.
-हरिशंकर परसाई 

मंगलवार, 15 अगस्त 2017

एक अशुद्ध बेवकूफ .....हरिशंकर परसाई

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।
मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूं और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूं। पर यह महंगा मजा है- मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है- करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं- चिढ़ जायें या शुद्ध बेवकूफ बन जायें। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूं।
अभी जो साहब आये थे, निहायत अच्छे आदमी हैं। अच्छी सरकारी नौकरी में हैं। साहित्यिक भी हैं। कविता भी लिखते हैं। वे एक परिचित के साथ मेरे पास कवि के रूप में आये। बातें काव्य की ही घंटा भर होती रहीं- तुलसीदास, सूरदास, गालिब, अनीस वगैरह। पर मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं, इसलिए काव्य-चर्चा का मजा लेते हुए भी जान रहा था कि भेंट के बाद काव्य के सिवाय कोई और बात निकलेगी। वे मेरी तारीफ भी करते रहे और मैं बरदाश्त करता रहा। पर मैं जानता था कि वे साहित्य के कारण मेरे पास नहीं आये।
मैंने उनसे कविता सुनाने को कहा। आमतौर पर कवि कविता सुनाने को उत्सुक रहता है, पर वे कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे। कविता उन्होंने सुनायी, पर बड़े बेमन से। वे साहित्य के कारण आये ही नहीं थे- वरना कविता की फरमाइश पर तो मुर्दा भी बोलने लगता है।
मैंने कहा- कुछ सुनाइए।
वे बोले- मैं आपसे कुछ लेने आया हूं।
मैंने समझा ये शायद ज्ञान लेने आये हैं।
मैंने सोचा- यह आदमी ईश्वर से भी बड़ा है। ईश्वर को भी प्रोत्साहित किया जाए तो वह अपनी तुकबंदी सुनाने के लिए सारे विश्व को इकट्ठा कर लेगा।
पर ये सज्जन कविता सुनाने में संकोच कर रहे थे और कह रहे थे- हम तो आपसे कुछ लेने आये हैं।
मैं समझता रहा कि ये समाज और साहित्य के बारे में कुछ ज्ञान लेने आये हैं।
कविताएं उन्होंने बड़े बेमन से सुना दीं। मैंने तारीफ की, पर वे प्रसन्न नहीं हुए। यह अचरज की सी बात थी। घटिया से घटिया साहित्यिक सर्जक भी प्रशंसा से पागल हो जाता है। पर वे जरा भी प्रशंसा से विचलित नहीं हुए।
उठने लगे तो बोले- डिपार्टमेंट में मेरा प्रमोशन होना है। किसी कारण अटक गया है। जरा आप सेक्रेटरी से कह दीजिए, तो मेरा काम हो जाएगा।
मैंने कहा- सेक्रेटरी क्यों? मैं मन्त्री से कह दूंगा। पर आप कविता अच्छी लिखते हैं।
एक घण्टे जानकर भी मैं साहित्य के नाम पर बेवकूफ बना- मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
एक प्रोफेसर साहब क्लास वन के। वे इधर आये। विभाग के डीन मेरे घनिष्ठ मित्र हैं, यह वे नहीं जानते थे। यों वे मुझसे पच्चीसों बार मिल चुके थे। पर जब वे डीन के साथ मिले तो उन्होंने मुझे पहचाना ही नहीं। डीन ने मेरा परिचय उनसे करवाया। मैंने भी ऐसा बर्ताव किया, जैसे यह मेरा उनसे पहला परिचय है।
डीन मेरे यार हैं। कहने लगे- यार चलो केण्टीन में, अच्छी चाय पी जाय। अच्छा नमकीन भी मिल जाए तो मजा आ जाय।
अब क्लास वन के प्रोफेसर साहब थोड़ा चौंके।
हम लोगों ने चाय और नाश्ता किया। अब वे समझ गये कि मैं 'अशुद्ध' बेवकूफ हूं।
कहने लगे- सालों से मेरी लालसा थी कि आपके दर्शन करूं। आज यह लालसा पूर्ण हुई।(हालांकि वे कई बार मिल चुके थे। पर डीन सामने थे।)
अंग्रेजी में एक बड़ा अच्छा मुहावरा है- 'टेक इट विद ए पिंच ऑफ साल्ट'- याने थोड़े नमक के साथ लीजिए। मैंने अपनी तारीफ थोड़े नमक के साथ ले ली।
शाम को प्रोफेसर साहब मेरे घर आये। कहने लगे- डीन साहब तो आपके बड़े घनिष्ठ हैं। उनसे कहिए न कि मुझे पेपर दे दें, कुछ कांपियां भी- और 'माडरेशन' के लिए बुला लें तो और अच्छा है।
मैंने कहा- मैं ये सब काम डीन से आपके करवा दूंगा। पर आपने मुझे पहचानने में थोड़ी देर कर दी थी।
बेचारे क्या जवाब देते? अशुद्ध बेवकूफ मैं- मजा लेता रहा कि वे क्लास वन के अफसर नहीं, चपरासी की तरह मेरे पास से विदा हुए। बड़ा आदमी भी कितना बेचारा होता है।
एक दिन मई की भरी दोपहर में एक साहब आ गये। भयंकर गर्मी और धूप। मैंने सोचा कि कोई भयंकर बात हो गई है, तभी ये इस वक्त आये हैं। वे पसीना पोंछकर वियतनाम की बात करने लगे। वियतनाम में अमरीकी बर्बरता की बात कर रहे थे। मैं जानता था कि मैं निक्सन नहीं हूं। पर वे जानते थे कि मैं बेवकूफ हूं। मैं भी जानता था कि इनकी चिंता वियतनाम नहीं है।
घण्टे-भर राजनीतिक बातें हुईं।
वे उठे तो कहने लगे- मुझे जरा दस रुपये दे दीजिए।
मैंने दे दिए और वियतनाम की समस्या आखिर कुल दस रुपये में निपट गई।
एक दिन एक नीति वाले भी आ गये। बड़े तैश में थे।
कहने लगे- हद हो गयी! चेकोस्लोवाकिया में रूस का इतना हस्तक्षेप! आपको फौरन वक्तव्य देना चाहिए।
मैंने कहा- मैं न रूस का प्रवक्ता हूं न चेकोस्लोवाकिया का। मेरे बोलने से क्या होगा।
वे कहने लगे- मगर आप भारतीय हैं, लेखक हैं, बुद्धिजीवी हैं। आपको कुछ कहना ही चाहिए।
मैंने कहा- बुद्धिजीवी वक्तव्य दे रहे हैं। यही काफी है। कल वे ठीक उल्टा वक्तव्य भी दे सकते हैं, क्योंकि वे बुद्धिजीवी हैं।
वे बोले- याने बुद्धिजीवी बेईमान भी होता है?
मैंने कहा- आदमी ही तो ईमानदार और बेईमान होता है। बुद्धिजीवी भी आदमी ही है। वह सुअर या गधे की तरह ईमानदार नहीं हो सकता। पर यह बतलाईये कि इस समय क्या आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं? आपकी पार्टी तो काफी नारे लगा रही है। एक छोटा सा नारा आप भी लगा दें और परेशानी से बरी हो जाएं।
वे बोले- बात यह है कि मैं एक खास काम से आपके पास आया था। लड़के ने रूस की लुमुम्बा यूनिवर्सिटी के लिए दरख्वास्त दी है। आप दिल्ली में किसी को लिख दें तो उसका सिलेक्शन हो जाएगा।
मैंने कहा- कुल इतनी-सी बात है। आप चेकोस्लोवाकिया के कारण परेशान हैं। रूस से नाराज हैं। पर लड़के को स्कालरशिप पर रूस भेजना भी चाहते हैं।
वे गुमसुम हो गए। मुझ अशुद्ध बेवकूफ की दया जाग गयी।
मैंने कहा- आप जाइए। निश्चिंत रहिए- लड़के के लिए जो मैं कर सकता हूं करूंगा।
वे चले गए। बाद में मैं मजा लेता रहा। जानते हुए बेवकूफ बनने-वाले 'अशुद्ध' बेवकूफ के अलग मजे हैं।
मुझे याद आया गुरु कबीर ने कहा था- 'माया महा ठगनि हम जानी'।

-हरिशंकर परसाई