मंगलवार, 27 दिसंबर 2016

क्या आपने कभी इन पश्चिमी दार्शनिकों को पढ़ा है


*लियो टॉल्स्टॉय (1828 -1910)*
"हिन्दू और हिन्दुत्व ही एक दिन दुनिया पर राज करेगी, क्योंकि इसी में ज्ञान और बुद्धि का संयोजन है"।

*हर्बर्ट वेल्स (1846 - 1946)*
" हिन्दुत्व का प्रभावीकरण फिर होने तक अनगिनत कितनी पीढ़ियां अत्याचार सहेंगी और जीवन कट जाएगा । तभी एक दिन पूरी दुनिया उसकी ओर आकर्षित हो जाएगी, उसी दिन ही दिलशाद होंगे और उसी दिन दुनिया आबाद होगी । सलाम हो उस दिन को "।

*अल्बर्ट आइंस्टीन (1879 - 1955)*
"मैं समझता हूँ कि हिन्दूओ ने अपनी बुद्धि और जागरूकता के माध्यम से वह किया जो यहूदी न कर सके । हिन्दुत्व मे ही वह शक्ति है जिससे शांति स्थापित हो सकती है"।

*हस्टन स्मिथ (1919)*
"जो विश्वास हम पर है और इस हम से बेहतर कुछ भी दुनिया में है तो वो हिन्दुत्व है । अगर हम अपना दिल और दिमाग इसके लिए खोलें तो उसमें हमारी ही भलाई होगी"।

*माइकल नोस्टरैडैमस (1503 - 1566)*
" हिन्दुत्व ही यूरोप में शासक धर्म बन जाएगा बल्कि यूरोप का प्रसिद्ध शहर हिन्दू राजधानी बन जाएगा"।

*बर्टरेंड रसेल (1872 - 1970)*
"मैंने हिन्दुत्व को पढ़ा और जान लिया कि यह सारी दुनिया और सारी मानवता का धर्म बनने के लिए है । हिन्दुत्व पूरे यूरोप में फैल जाएगा और यूरोप में हिन्दुत्व के बड़े विचारक सामने आएंगे । एक दिन ऐसा आएगा कि हिन्दू ही दुनिया की वास्तविक उत्तेजना होगा "।

*गोस्टा लोबोन (1841 - 1931)*
" हिन्दू ही सुलह और सुधार की बात करता है । सुधार ही के विश्वास की सराहना में ईसाइयों को आमंत्रित करता हूँ"।

*बरनार्ड शा (1856 - 1950)*
"सारी दुनिया एक दिन हिन्दू धर्म स्वीकार कर लेगी । अगर यह वास्तविक नाम स्वीकार नहीं भी कर सकी तो रूपक नाम से ही स्वीकार कर लेगी। पश्चिम एक दिन हिन्दुत्व स्वीकार कर लेगा और हिन्दू ही दुनिया में पढ़े लिखे लोगों का धर्म होगा "।

*जोहान गीथ (1749 - 1832)*
"हम सभी को अभी या बाद मे हिन्दू धर्म स्वीकार करना ही होगा । यही असली धर्म है ।मुझे कोई हिन्दू कहे तो मुझे बुरा नहीं लगेगा, मैं यह सही बात को स्वीकार करता हूँ ।"

विपुल लखनवी "बुलेट" की फेसबुक वाल से

गुरुवार, 22 दिसंबर 2016

जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है....


एक बार भगवान से उनका सेवक कहता है, भगवान आप एक जगह खड़े-खड़े थक गये होंगे. एक दिन के लिए मैं आपकी जगह मूर्ति बनकर खड़ा हो
जाता हूं, आप मेरा रूप धारण कर घूम आओ.

भगवान मान जाते हैं, लेकिन शर्त रखते हैं कि जो भी लोग प्रार्थना करने आयें, तुम बस उनकी प्रार्थना सुन लेना. कुछ बोलना नहीं, मैंने उन सभी के लिए प्लानिंग कर रखी है.

सेवक मान जाता है.

सबसे पहले मंदिर में बिजनेसमैन आता है और कहता है, भगवान मैंने नयी फैक्ट्री डाली है, उसे खूब उंचाई पर पहुंचाना और वह माथा टेकता है, तो उसका पर्स नीचे गिर जाता है. वह बिना पर्स लिये ही चला जाता है.

सेवक बेचैन हो जाता है. वह सोचता है कि रोक कर उसे बताये कि पर्स गिर गया, लेकिन शर्त की वजह से वह नहीं कह पाता.

इसके बाद एक गरीब आदमी आता है और भगवान को कहता है कि घर में खाने को कुछ नहीं, भगवान मदद कर.....तभी उसकी नजर पर्स पर पड़ती है. वह भगवान का शुक्रिया अदा करता है और चला जाता है.

अब तीसरा व्यक्ति आता है. वह नाविक होता है. वह भगवान से कहता है कि मैं 15 दिनों के लिए जहाज लेकर समुद्र की यात्रा पर जा रहा हूं यात्रा में कोई अड़चन न आये भगवान.

तभी पीछे से बिजनेसमैन पुलिस के साथ आता है और पुलिस को बताता है कि मेरे बाद ये नाविक आया है. इसी ने मेरा पर्स चुराया है, पुलिस नाविक को पकड के ले जा रही होती है कि भगवान की जगह खडा सेवक बोल पड़ता है कि पर्स तो उस गरीब आदमी ने उठाया है.

अब पुलिस उस गरीब आदमी को पकड़ कर जेल में बंद कर देती है.

रात को भगवान आते हैं, तो सेवक खुशी-खुशी पूरा किस्सा बताता है.
भगवान कहते हैं, तुमने किसी का काम बनाया नहीं, बल्कि बिगाड़ा है.

वह व्यापारी गलत धंधे करता है. अगर उसका पर्स गिर भी गया, तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ना था. इससे उसके पाप ही कम होते, क्योंकि वह पर्स गरीब इनसान को मिला था. पर्स मिलने पर उसके बच्चे भूखों नहीं मरते.

रही बात नाविक की, तो वह जिस यात्रा पर जा रहा था, वहां तूफान आनेवाला था. अगर वह जेल में रहता, तो जान बच जाती. उसकी पत्नी विधवा होने से बच जाती. तुमने सब गड़बड़ कर दी.

बात पते की. 
कई बार हमारी लाइफ में भी ऐसी प्रॉब्लम आती है, जब हमें लगता है कि ये मेरा साथ ही क्यों हुआ. लेकिन इसके पीछे भगवान की प्लानिंग होती है. जब भी कोई प्रॉब्लम आये. उदास मत होना. इस स्टोरी को याद करना और सोचना कि जो भी होता है, अच्छे के लिए होता है....

गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

विभिन्न पुस्तकों से संकलित

विभिन्न पुस्तकों से संकलित

कठिनाईयाँ

जब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाईयों की वजह दूसरों को मानते है, तब तक आप अपनी समस्याओं एंव कठिनाईयों को मिटा नहीं सकते। क्योंकि अपनी समस्याओं एंव कठिनाईयों की वजह आप स्वयं हैं।

असंभव

इस दुनिया में असंभव कुछ भी नहीं। हम वो सब कुछ कर सकते है, जो हम सोच सकते है और हम वो सब सोच सकते है, 
जो आज तक हमने नहीं सोचा।

हार ना मानना

बीच रास्ते से लौटने का कोई फायदा नहीं क्योंकि लौटने पर आपको उतनी ही दूरी तय करनी पड़ेगी, जितनी दूरी तय करने पर आप लक्ष्य तक पहुँच सकते है। इसलिए लक्ष्य की ओर बढ़ें। अर्थ- हार व जीत का
सफलता हमारा परिचय दुनिया को करवाती है और असफलता हमें दुनिया का सहीं परिचय करवाती है।

सच्चा आत्मविश्वास

अगर किसी चीज़ को आप सच्चे दिल से चाहो तो पूरी कायनात 
उसे तुमसे मिलाने में लग जाती हैं।

सच्ची महानता

सच्ची महानता कभी न गिरने में नहीं बल्कि 
हर बार गिरकर फिर से उठ जाने में हैं।

गलतियां

अगर आप समय पर अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं करते है तो आप एक और गलती कर बैठते है। आप अपनी गलतियों से तभी सीख सकते है जब आप अपनी गलतियों को स्वीकार करते है।

चिन्ता

अगर आप उन बातों एंव परिस्थितियों की वजह से चिंतित हो जाते है, जो आपके नियंत्रण में नहीं हैं तो इसका परिणाम समय की बर्बादी एवं भविष्य में पछतावा है।

शक्ति

ब्रह्माण्ड की सारी शक्तियां पहले से हमारी हैं। वो हम हैं जो अपनी आँखों पर हाथ रख लेते हैं और फिर रोते हैं कि कितना अन्धकार है।

मेहनत

हम चाहें तो अपने आत्मविश्वास और मेहनत के बल पर अपना भाग्य खुद लिख सकते है और अगर हमको अपना भाग्य लिखना नहीं आता तो परिस्थितियां व समय हमारा भाग्य लिख ही देंगी।

सपने

सच कहे तो सपने वो नहीं है जो हम नींद में देखते है, 
सपने तो वो है जो हमको नींद हीं न आने दें।

समय

आप यह नहीं कह सकते कि आपके पास समय नहीं है क्योंकि आपको भी दिन में उतना ही समय (२४ घंटे) मिलता है जितना समय महान एंव सफल लोगों को मिलता है। समय सभी काे एक समान ही मिलता हैं।

विश्वास

विश्वास में वो शक्ति है जिससे उजड़ी हुई दुनिया में प्रकाश लाया जा सकता है। विश्वास पत्थर को भगवान बना सकता है और अविश्वास भगवान के बनाए इंसान को भी पत्थर दिल बना सकता हैं। विश्वास की नीव पर टिके है सारे रिश्तें।

सफलता

दूर से हमें आगे के सभी रास्ते बंद नजर आते हैं क्योंकि सफलता के रास्ते हमारे लिए तभी खुलते हैं जब हम उसके बिल्कुल करीब पहुँच जाते हैं।

सोच

बारिश के दौरान सारे पक्षी आश्रय की तलाश करते है लेकिन बाज़ बादलों के ऊपर उडकर बारिश को ही नज़रअन्दाज कर देते है। समस्याए समान है, लेकिन आपका नजरिया इनमें फर्क पैदा करती है। इसलिए अपने सोचने के नजरिये में बदलाव करें।

प्रसन्नता

यहा पहले से निर्मित कोई चीज नहीं है... 
ये आप ही के कर्मों से आती है .... आपके कर्मं ही निमित्त बनते हैं।

निमित्त भाव

आप सिर्फ निमित्त मात्र हैं इस संसार में। यह संसार एक रंगमंच हैं - सभी मनुष्य आत्मायें अपना-अपना Part Play कर रही हैं। जाे आत्मा अपना Part निमित्त भाव से Play कर रही है, ओ आनंद में हैं।
याद रखें - जीवन में सच्चा आनंद और शांति ताे सिर्फ व सिर्फ ईश्वरीय ध्यान `या` परमात्म याद (Godly Meditation)  में ही हैं। चाहे अरबों-खरबों (Billions - trillions) इकट्ठा कर लो फिर भी सच्चा आनंद और शांति कभी ना मिलेगी।

साभार वैभवी पाण्डेय

मंगलवार, 8 नवंबर 2016

गोबर भी है बड़े काम की चीज.....

गाय के गोबर से बना डाला मकान
हरियाणा (रोहतक) : वर्तमान में बन रहे मकान गर्मी में तपते हैं तो सर्दी में सिकुड़ने को मजबूर कर देते हैं। इसके पीछे कारण है कि मकान निर्माण में प्रयोग होने वाला लोहा, सीमेंट और पक्की ईंट ऊष्मा को अंदर आने से नहीं रोक पाते। इस समस्या से निजात पाने के लिए डॉ. शिव दर्शन मलिक ने गाय के गोबर एवं जिप्सम को मिलाकर एक मकान तैयार किया है। इस नई तकनीक में नींव से ऊपर एक दाना भी सीमेंट, रोड़ी, पक्की ईंट आदि का प्रयोग नहीं होगा। प्राकृतिक संसाधनों से बने इस भवन में वातानुकूलन की आवश्यकता नहीं। अपने इस अविष्कार को लेकर डॉ. मलिक ने मंगलवार को प्रेसवार्ता की।
शहर के शीला बाईपास के निकट रहने वाले डॉ. मलिक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल व अविष्कार में लगे हैं। इन्होंने पूर्व में कृषि कचरे से इंजन, आटा चक्की और ट्यूबवेल भी चलाये हैं। राष्ट्रीय कृषि मेले गंगानगर, राजस्थान में इनको सर्वश्रेष्ठ किसान के रूप में नवाजा जा चुका है।
जिप्सम से बना विशेष प्लास्टर होता हो उपयोग इस भवन में 26, 20 और 4 इंच आकार के जिप्सम ब्लॉक लगे हैं। इनमें एक तरफ कट व दूसरी तरफ उभार है जिससे वे एक-दूसरे में फंस जाते हैं। इनके जोड़ों को भरने के लिए भी सीमेंट का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि गजिप्सम से निर्मित एक विशेष प्लास्टर उपयोग में लिया जाता है। खास बात ये भी है कि दीवार फटाफट बनती है और बाद में तराई भी नहीं करनी पड़ती।
जिप्सम उष्मा रोधी, ध्वनि रोधी होने के साथ-साथ सर्वश्रेष्ठ अग्नि रोधी पदार्थ है। यह आग लगने के चार घंटे तक नहीं जलता। अगर तब तक भी आग न बुझे तो यह क्रिस्टलीय जल छोड़ने लगता है और आग बुझाने में मदद करता है। जिप्सम गाय का गोबर मिलाने पर यह सोने में सुहागे जैसा काम करता है। गोबर के मिलाने से जिप्सम प्लास्टर की कमियां जैसे की भंगुरपन व पानी सोखना काफी हद तक दूर हो जाती हैं व इसकी मजबूती बढ़ती है।
गौशालाओं की बढ़ेगी आमद डॉ. शिवदर्शन ने बताया कि वे अपने इस नए वैदिक प्लास्टर अविष्कार से गौशालाओं को जोड़ेंगे। इसके गोबर से वे ब्लॉक बनाकर लोगों को मकान बनाने के लिए प्रोत्साहित करेंगे। इससे लागत बहुत ही कम आती है और गौशालाओं की आमदनी भी बढ़ेगी, क्योंकि उनका गोबर खरीदा जाएगा। उष्मा रोधी भवन की मियाद भी ज्यादा है।
कानपुर , उत्तर प्रदेश



रविवार, 9 अक्तूबर 2016

शव का मांस गिद्धों को खिलाकर किया जाता है अंतिम संस्कार!



जानिये कहाँ और क्यों ?
हर धर्म में इंसान के मौत के बाद अलग अलग विधि विधान से अंतिम संस्कार किया जाता है.

लेकिन इस दुनिया में कुछ ऐसे समुदाय भी है जिनमे यह क्रिया बहुत ही अलग  तरीके से निभाई जाती है.

तिब्बत में एक ऐसा ही समुदाय है जो व्रजयान बौद्ध धर्म को मानते है और शव का अंतिम संस्कार शव का मांस गिद्धों को खिलाकर करते है.

इस समुदाय के अनुसार  शरीर से आत्मा के निकलने के बाद वो एक खाली बर्तन है, जिसे सहज के रखने की जरुरत नहीं है. इसलिए वे लोग इसे आकाश में दफ़न कर देते है. इसे sky burial कहा जाता है.

दूसरी बात जो तिब्बत के लोग मानते हैं कि शवों को दफनाने के बाद भी कीड़े मकोड़े ही खा जाते है और इसलिए गिद्धों को खिला देते है.

इस पम्परा के  कुछ प्रमुख कारण भी है.

एक तो  तिब्बत इतनी ऊचाई पर बसा हैं  कि वहा पर पेड़ नहीं होते  है इसलिए वहा पर जलाने के लिए लकड़ियों नहीं मिलती.

दूसरी  बात यह कि तिब्बत की जमीन बहुत पथरीली है उसे दफ़न के लिए खोद पाना लगभग नामुमकिन सा है. यही वजह है कि शवों को दफनाया भी नहीं जा सकता.

यह समुदाय इस अंतिम संस्कार की क्रिया को हज़ारो सालों से करते आ रहे है.

इस क्रिया में पहले शव को शमशान ले जाया जाता है. जो  एक ऊचाई वाले जगह पर होता है. वहाँ पर  बौद्ध भिक्षु  धुप बत्ती जलाकर उस शव की पूजा करते है और  फिर एक शमशान कर्मचारी उस शव के छोटे छोटे टुकड़े करता है. दूसरा कर्मचारी उन टुकड़ों को जौ के आटे के घोल में डुबोता है और फिर वो टुकड़े गिद्धों को खाने के लिए डाल दिए जाते है.

जब गिद्ध सारा मांस खाके चले जाते है उसके बाद उन हड्डियों को इकठ्ठा करके उनका चुरा किया जाता है और जौ के आटे और याक के मक्खन के घोल में डुबो के कौओ और बाज को खिलाया जाता है.

पारसी समुदाय में भी शवों को पक्षियों को खिलाने की कुछ ऐसी ही परंपरा है. लेकिन वो लोग शव को जोरास्ट्रियन (पारसी का मंदिर) में ले जाकर रख देते है जहाँ पक्षी उन्हें अपना भोजन समझकर खा जाते है.

अंतिम संस्कार की ऐसी ही परम्परा मंगोलिया के कुछ इलाको में भी पायी जाती है.

हमें इस तरह की परम्पराएं शायद निर्दयी लगे लेकिन उस जगह की मांग के अनुसार यह क्रिया उचित है.



शनिवार, 1 अक्तूबर 2016

उग्रवाद ने नाप देख ली....कवि कमल 'आग्नेय'

पीओके में सीमा पार जाकर सेना की साहसिक कार्रवाही पर 
कवि कमल आग्नेय की रचना-

राष्ट्रद्रोह के रावण की सांसो का घोडा ठहर गया
सरहद पार तिरंगा अपना स्वाभिमान से लहर गया

आतंकवाद से लड़ने की शक्ति आई दरबार में
इसीलिए सेना ने मारा एलओसी के पार में

आज सियासत बदल गई है डरते डरते जीने की
उग्रवाद ने नाप देख ली छप्पन इंची सीने की

अरे शरीफों आँख खोलकर समझो जरा इशारों को
राख समझकर अब मत छूना 'आग्नेय' अंगारों को

वर्ना घायल रावलपिंडी अपना खुदा पुकारेगी
जब भारत की सेना अबकी अंदर घुसकर मारेगी

लाल रंग के बलिदानों से अजर अमर यह खाकी है
अरे मियां ये ट्रेलर है पूरी पिक्चर तो बाकी है
-कवि कमल 'आग्नेय' 

(सेना के सम्मान में इतना शेयर करें की सेना तक पहुंचे)



शुक्रवार, 23 सितंबर 2016

उस समय तो ‘पाकिस्तान’ था ही नहीं



एक बार संयुक्त राष्ट्र में कश्मीर को ले कर चर्चा चल रही थी। एक भारतीय प्रवक्ता बोलने के लिए खड़ा हुआ, अपना पक्ष रखने से पहले उसने ऋषि कश्यप की एक बहुत पुरानी कहानी सुनाने की अनुमति माँगी।

अनुमति मिलने के बाद भारतीय प्रवक्ता ने अपनी बात शुरू की!

“एक बार महर्षि कश्यप, जिनके नाम पर आज कश्मीर का नाम पड़ा है, घूमते-घूमते कश्मीर पहुंच गए। वहाँ उन्होंने एक सुन्दर झील देखी तो उस झील में उनका नहाने का मन हुआ। उन्होंने अपने कपड़े उतारे और झील में नहाने चले गए।

जब वो नहा कर बाहर निकले, तो उनके कपड़े वहाँ से गायब मिले।
दरअसल, उनके कपड़े किसी पाकिस्तानी ने चुरा लिये थे…

इतने में पाकिस्तानी प्रवक्ता चीख पड़ा और बोला:
“क्या बकवास कर रहे हो? उस समय तो ‘पाकिस्तान’ था ही नहीं!!!”

भारतीय प्रवक्ता मुस्कुराया और बोला:
अब सब कुछ साफ़ हो चुका है। अब मैं अपना भाषण शुरू करना चाहता हूँ।
मेरा भाषण है… और ये पाकिस्तानी कहते हैं कि कश्मीर इनका है!!!”

इतना सुनते ही… पूरा संयुक्त राष्ट्र सभा ठहाकों की गूंज से भर उठा।।

-संकलित

शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है....कृष्ण मोहन सिंह


एक छोटा-सा पहाड़ी गांव था। वहां एक किसान, उसकी पत्नी, एक बेटा और एक बेटी रहते थे। एक दिन बेटी की इच्छा स्कार्फ खरीदने की हुई और उसने पिताजी की जेब से 10 रुपए चुरा लिए।

पिताजी को पता चला तो उन्होंने सख्ती से दोनों बच्चों से पूछा - पैसे किसने चुराए ?
अगर तुम लोगों ने सच नहीं बताया तो सजा दोनों को मिलेगी। बेटी डर गई, बेटे को लगा कि दोनों को सजा मिलेगी तो सही नहीं होगा।

वह बोला - पिताजी, मैंने चुराए, पिताजी ने उसकी पिटाई की और आगे से चोरी न करने की हिदायत भी दी। भाई ने बहन के लिए चुपचाप मार खा ली। वक्त बीतता गया। दोनों बच्चे बड़े हो गए।

एक दिन मां ने खुश होकर कहा - दोनों बच्चों के रिजल्ट अच्छे आए हैं। पिताजी (दुखी होकर) - पर मैं तो किसी एक की पढ़ाई का ही खर्च उठा सकता हूं।

बेटे ने फौरन कहा - पिताजी, मैं आगे पढ़ना नहीं चाहता।
बेटी बोली - लड़कों को आगे जाकर घर की जिम्मेदारी उठानी होती है, इसलिए तुम पढ़ाई जारी रखो। मैं कॉलेज छोड़ दूंगी। अगले दिन सुबह जब किसान की आंख खुली तो घर में एक चिट्ठी मिली।

उसमें लिखा था - मैं घर छोड़कर जा रहा हूं। कुछ काम कर लूंगा और आपको पैसे भेजता रहूंगा। मेरी बहन की पढ़ाई जारी रहनी चाहिए। एक दिन बहन हॉस्टल के कमरे में पढ़ाई कर रही थी।

तभी गेटकीपर ने आकर कहा - आपके गांव से कोई मिलने आया है। बहन नीचे आई तो फटे-पुराने और मैले कपड़ों में भी अपने भाई को फौरन पहचान लिया और उससे लिपट गई।

बहन - तुमने बताया क्यों नहीं कि मेरे भाई हो - भाई।

मेरे - ऐसे कपड़े देखकर तुम्हारे सहेलियाें में बेइज्जती होगी। मैं तो तुम्हें बस एक नजर देखने आया हूं।
भाई चला गया - बहन देखती रही।

बहन की शादी शहर में एक पढ़े - लिखे लड़के से हो गई। बहन का पति कंपनी में डायरेक्टर बन गया। उसने भाई को मैनेजर का काम ऑफर किया, पर उसने इनकार कर दिया।

बहन ने नाराज होकर वजह पूछी तो भाई बोला - मैं कम पढ़ा-लिखा होकर भी मैनेजर बनता तो तुम्हारे पति के बारे में कैसी-कैसी बातें उड़तीं, मुझे अच्छा नहीं लगता।

भाई की शादी गांव की एक लड़की से हो गई। इस मौके पर किसी ने पूछा कि उसे सबसे ज्यादा प्यार किससे है ?

वह बोला - अपनी बहन से, क्योंकि जब हम प्राइमरी स्कूल में थे तो हमें पढ़ने दो किमी दूर पैदल जाना पड़ता था। एक बार ठंड के दिनों में मेरा एक दस्ताना खो गया।

बहन ने अपना दे दिया - जब वह घर पहुंची तो उसका हाथ सुन्न पड़ चुका था और वह ठंड से बुरी तरह कांप रही थी। यहां तक कि उसे हाथ से खाना खाने में भी दिक्कत हो रही थी। उस दिन से मैंने ठान लिया कि अब जिंदगी भर मैं इसका ध्यान रखूंगा। बहन ने हमारी हर गलती का बचाव किया था बचपन से वो हमे मां-बाप से ज्यादा स्नेह करती है।

जीवन में कुछ मिले या ना मिले पर बहन का स्नेह मिलना खुशनसीबी है।

-कृष्ण मोहन सिंह

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

संगठित कार्य हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है


आपने कछुए और खरगोश की कहानी ज़रूर सुनी होगी, 
उसे फिर से दोहराता हूँ
एक बार खरगोश को अपनी तेज चाल पर घमंड हो गया और

वो जो मिलता उसे रेस लगाने के लिए चुनौती देता रहता। 

         कछुए ने उसकी चुनौती स्वीकार कर ली।

रेस हुई। खरगोश तेजी से भागा और काफी आगे जाने पर

पीछे मुड़ कर देखा, कछुआ कहीं आता नज़र नहीं आया, उसने

मन ही मन सोचा कछुए को तो यहाँ तक आने में बहुत समय

लगेगा, चलो थोड़ी देर आराम कर लेते हैं, और वह एक पेड़ के

नीचे लेट गया। लेटे-लेटे कब उसकी आँख लग गयी पता ही नहीं चला।

उधर कछुआ धीरे-धीरे मगर लगातार चलता रहा। बहुत देर

बाद जब खरगोश की आँख खुली तो कछुआ फिनिशिंग

लाइन तक पहुँचने वाला था। खरगोश तेजी से भागा,

लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी और कछुआ रेस जीत गया।


_धीमा और लगातार चलने वाला रेस जीतता है_        

ये कहानी तो हम सब जानते हैं, अब आगे की कहानी देखते हैं:

रेस हारने के बाद खरगोश निराश हो जाता है, वो अपनी

हार पर चिंतन करता है और उसे समझ आता है कि 

वो अधिक विश्वाश होने के कारण ये रेस हार गया…उसे अपनी

मंजिल तक पहुँच कर ही रुकना चाहिए था।

अगले दिन वो फिर से कछुए को दौड़ की चुनौती देता है।

कछुआ पहली रेस जीत कर आत्मविश्वाश से भरा होता है

और तुरंत मान जाता है।

रेस होती है, इस बार खरगोश बिना रुके अंत तक दौड़ता

जाता है, और कछुए को एक बहुत बड़े अंतर से हराता है।

_तेज और लगातार चलने वाला 
धीमे और लगातार चलने वाले से हमेशा जीत जाता है।_


कहानी अभी बाकी है जी….
इस बार कछुआ कुछ सोच-विचार करता है और उसे ये बात

समझ आती है कि जिस तरह से अभी रेस हो रही है वो

कभी-भी इसे जीत नहीं सकता।

वो एक बार फिर खरगोश को एक नयी रेस के लिए चैलेंज

करता है, पर इस बार वो रेस का रूट अपने मुताबिक रखने

को कहता है। खरगोश तैयार हो जाता है।

रेस शुरू होती है। खरगोश तेजी से तय स्थान की और

भागता है, पर उस रास्ते में एक तेज धार नदी बह रही होती

है, बेचारे खरगोश को वहीँ रुकना पड़ता है। कछुआ धीरे-

धीरे चलता हुआ वहां पहुँचता है, आराम से नदी पार करता

है और लक्ष्य तक पहुँच कर रेस जीत जाता है।



_पहले अपनी ताकत को जानो और 
उसके मुताबिक काम करो जीत ज़रुर मिलेगी_

कहानी अभी भी बाकी है जी …..

इतनी रेस करने के बाद अब कछुआ और खरगोश अच्छे दोस्त

बन गए थे और एक दुसरे की ताकत और कमजोरी समझने लगे

थे। दोनों ने मिलकर विचार किया कि अगर हम एक दुसरे

का साथ दें तो कोई भी रेस आसानी से जीत सकते हैं।

इसलिए दोनों ने आखिरी रेस एक बार फिर से मिलकर

दौड़ने का फैसला किया, पर इस बार एक प्रतियोगी के रूप में

नहीं बल्कि संघठित होकर काम करने का निश्चय लिया।

दोनों स्टार्टिंग लाइन पे खड़े हो गए….आओ चलें…. और

तुरंत ही खरगोश ने कछुए को ऊपर उठा लिया और तेजी से

दौड़ने लगा। दोनों जल्द ही नहीं के किनारे पहुँच गए। अब

कछुए की बारी थी, कछुए ने खरगोश को अपनी पीठ

बैठाया और दोनों आराम से नदी पार कर गए। अब एक

बार फिर खरगोश कछुए को उठा फिनिशिंग लाइन की

ओर दौड़ पड़ा और दोनों ने साथ मिलकर रिकॉर्ड टाइम

में रेस पूरी कर ली। दोनों बहुत ही खुश और संतुष्ट थे, आज से

पहले कोई रेस जीत कर उन्हें इतनी ख़ुशी नहीं मिली थी।



-संगठित कार्य हमेशा व्यक्तिगत प्रदर्शन से बेहतर होता है-

*व्यक्तिगत रूप से चाहे आप जितने बड़े खिलाड़ी हों लेकिन अकेले दम पर हर मैच नहीं जीता सकते अगर लगातार जीतना है तो आपको संघठन में काम करना सीखना होगा, आपको अपनी काबिलियत के आलावा दूसरों की ताकत को भी समझना होगा। और जब जैसी परिस्थिति हो, उसके हिसाब से संगठन की ताकत का उपयोग करना होगा*

शनिवार, 3 सितंबर 2016

जिह्वा का वर्चस्व रहेगा.........हरि जोशी



पंक्तिबद्ध और एकजुट रहने के कारण दाँत बहुत दुस्साहसी हो गए थे। 
एक दिन वे गर्व में चूर होकर जिह्वा से बोले "हम बत्तीस घनिष्ट मित्र हैं एक से एक मज़बूत। और तू ठहरी अकेली, 
न चाहें तो तुझे बाहर ही न निकलने दें।"

जिह्वा ने पहली बार ऐसा कलुषित विचार सुना। 
वह अब हँसकर बोली "अच्छा ऊपर से एकदम सफ़ेद और स्वच्छ हो पर मन से बड़े कपटी हो।"

"ऊपर से स्वच्छ और अन्दर से काले घोषित करने वाली जीभ वाचालता छोड़, अपनी औक़ात में रह। हम तुझे चबा सकते हैं। यह मत भूल कि तू हमारी कृपा पर ही राज कर रही है," दाँतों ने किटकिटाकर कहा।
जीभ ने नम्रता बनाये रखी किन्तु उत्तर दिया, "दूसरों को चबा जाने की ललक रखने वाले बहुत जल्दी टूटते भी हैं। सामने वाले तो और जल्दी गिर जाते हैं। तुम लोग अवसरवादी हो मनुष्य का साथ 
तभी तक देते हो जब तक वह जवान रहता है। 
वृद्धावस्था में उसे असहाय छोड़कर चल देते हो।"

शक्तिशाली दाँत भी अपनी हार आखिर क्यों मानने लगे?" 
हमारी जड़ें बहुत गहरी हैं। 
हमारे कड़े और नुकीलेपन के कारण बड़े बड़े तक हमसे थर्राते हैं।"

जिह्वा ने विवेकपूर्ण उत्तर दिया "तुम्हारे नुकीले या कड़ेपन का कार्यक्षेत्र मुँह के भीतर तक सीमित है। 
मुझमें पूरी दुनिया को प्रभावित करने और झुकाने की क्षमता है।"

दाँतों ने पुनः धमकी दी, 
"हम सब मिलकर तुझे घेरे खड़े हैं। कब तक हमसे बचेगी?”

जीभ ने दाँतों के घमंड को चूर करते चेतावनी दी 
"डॉक्टर को बुलाऊँ? 
दन्त चिकित्सक एक एक को बाहर कर देगा। 
मुझे तो छुएगा भी नहीं और तुम सब बाहर दिखाई दोगे।"
संगठित और घमंडी दाँत अब निरुत्तर थे। 
उन्हें कविता पंक्ति याद आ गई –

"किसी को पसंद नहीं सख़्ती बयान में, 
तभी तो दी नहीं हड्डी ज़बान में।"

-हरि जोशी

बुधवार, 10 अगस्त 2016

त्रावणकोर की महिलाओं ने कटा दिये थे अपने स्तन....आईचौक

समाज में बदलाव लाने और लोगों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए दिए गए 
बलिदान की कई घटनाएं इतिहास में दर्ज हैं. ऐसी ही एक घटना में केरल में एक क्रूर प्रथा के खात्मे के लिए एक महिला द्वारा दी गई अपने प्राणों की कुर्बानी हमेशा के लिए 
केरल के इतिहास में दर्ज हो गई है.

यह कुर्बानी केरल में 19वीं सदी में त्रावणकोर के राजा द्वारा निचली जातियों की महिलाओं के खिलाफ लगाए जाने वाले ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ दी गई थी. इस क्रूर टैक्स से न सिर्फ इन महिलाओं को अपमानित किया जाता था बल्कि सम्मानपूर्वक जीने का हक ही उनसे छीन लिया गया. इसी टैक्स के खिलाफ खड़ी हुईं एक महिला नानगेली, जिन्होंने अपने प्राण न्योछावर करके इस प्रथा का विरोध किया और उनका यह साहसिक कदम इस टैक्स के खात्मे की वजह बन गया. आइए जानें 19वीं सदी में केरल में लगने वाले इस ब्रेस्ट टैक्स के बारे में.

निचली जाति की महिलाओं पर लगता था 'ब्रेस्ट टैक्स'

केरल के त्रावणकोर में 19वीं सदी में लगाया जाने वाला ब्रेस्ट टैक्स उस समय निचली जाति के लोगों के साथ किए जाने वाले बेहद ही खराब व्यवहार की बानगी देता है. यह टैक्स त्रावणकोर के राजा द्वारा लगाया जाता था. नियमों के मुताबिक उस समय निचली जाति की महिलाओं को अपने स्तन ढंकने की इजाजत नहीं थी. इसलिए सार्वजनिक जगहों पर अपने स्तनों को ढंकने के लिए राजा द्वारा उन पर ब्रेस्ट टैक्स लगाया जाता था. कहा जाता है कि टैक्स का निर्धारण स्तन के साइज के आधार पर होता था.

यह टैक्स निचली जाति के लोगों को अपमानित करने और उन्हें कर्ज में डुबाए रखने के उद्देश्य से लगाया जाता था. ब्रेस्ट टैक्स के साथ-साथ निचली जाति के लोगों को जूलरी पहनने और पुरुषों को मूंछ रखने के अधिकार पर भी टैक्स लगता था.

साभारः अजय शेखर द्वारा नानगेली के त्याग की एक प्रतीकात्मक तस्वीर
ब्रेस्ट टैक्स जैसी क्रूर प्रथा को खत्म करने के लिए नानगेली नामक एक दलित महिला के बलिदान ने अहम भूमिका निभाई. नानगेली चेरथाला की निचली जाति की महिला थीं. वह बेहद गरीब परिवार की थीं और इस टैक्स का भुगतान करने में असमर्थ थी. इसलिए ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ विद्रोही तेवर दिखाते हुए नानगेली ने सार्वजनिक जगहों पर अपने स्तनों को न ढंकने से इनकार कर दिया.

जब टैक्स अधिकारकी नानगेली के घर पर ब्रेस्ट टैक्स लेने पहुंचा तो इस टैक्स के विरोध में नानगेली ने वह क्रांतिकारी कदम उठाया जो इस टैक्स के खत्म होने की वजह बनी. उन्होंने अपने दोनों स्तनों को काटकर एक केले के पत्ते पर रखकर उस टैक्स अधिकारी के सामने रख दिया. यह देखकर टैक्स अधिकारी भाग खड़ा हुआ और खून से लथपथ नानगेली ने वहीं दम तोड़ दिया. नानगेली के मौत की खबर जंगल में आग की तरह फैली और लोग इस टैक्स के खिलाफ उठ खड़े हुए.  

साभारः अजय शेखर द्वारा नानगेली के त्याग की एक प्रतीकात्मक तस्वीर
इस टैक्स के विरोध में नानगेली के पति चिरकुंडन ने उनकी चिता में कूदकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. यह किसी पुरुष के सती होने की पहली ज्ञात घटना थी. नानगेली के इस कदम से लोग ब्रेस्ट टैक्स के खिलाफ उठ खड़े हुए और राजा को यह क्रूर टैक्स समाप्त करना पड़ा. चेरथाला की वह जगह, जहां पर नानगेली और उनके पति चिरकुंडन ने अपने प्राण त्यागे थे, उसे अब उनके सम्मान में मुलाचीपराम्बु (महिलाओं के स्तम की भूमि) के नाम से जाना जाता है. हालांकि स्थानीय लोग अब इस जगह का नाम लेने से झिझकते हैं और अब इसे मनोरमा कवाला (कवाला मतलब जंक्शन) के नाम से जाना जाता है.

वह जगह जहां नानगेली की झोपड़ी थी, वह जगह आज भी अनछुई है 
और एक तालाब के साथ-साथ चारों तरफ से हरियाली से घिरी हुई है. 
इस जगह के दोनों तरफ दो बड़े बंगले बन गए हैं.

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शनिवार, 30 जुलाई 2016

शांतिपूर्ण और सुखमय वैवाहिक जीवन












राज....
एक दंपत्ति नें जब अपनी शादी की 25
वीं वर्षगांठ मनायी तो एक पत्रकार
उनका साक्षात्कार लेने पहुंचा.
वो दंपत्ति अपने शांतिपूर्ण और सुखमय
वैवाहिक जीवन के लिये प्रसिद्ध थे. 
उनके बीच कभी नाम मात्र का भी तकरार नहीं हुआ था.
लोग उनके इस सुखमय वैवाहिक जीवन का राज
जानने को उत्सुक थे.....
पति ने बताया :
हमारी शादी के फ़ौरन बाद हम हनीमून मनाने
शिमला गये. वहाँ हम लोगो ने घुड़सवारी की.
मेरा घोड़ा बिल्कुल ठीक था 
लेकिन मेरी पत्नी का घोड़ा थोड़ा नखरैल था.
उसने दौड़ते दौड़ते अचानक मेरी पत्नी को गिरा दिया.
मेरी पत्नी उठी और घोड़े के पीठ पर हाथ फ़ेरकर कहा :
"यह पहली बार है",
और फ़िर उसपर सवार
हो गयी. थोड़े दूर चलने के बाद घोड़े ने फ़िर उसे
गिरा दिया. पत्नी ने घोड़े से फ़िर कहा : "यह
दुसरी बार है",
और फ़िर उस पर सवार हो गयी.
लेकिन थोड़े दूर जा कर घोड़े ने फ़िर उसे
गिरा दिया. 
अबकी पत्नी ने कुछ नहीं 
कहा.
चुपचाप अपना पर्स खोला, 
पिस्तौल निकाली और घोड़े को गोली मार दी.
मुझे देखकर काफ़ी गुस्सा आया और 
मैं जोर से पत्नी पर चिल्लाया : "ये तुमने क्या किया, पागल हो गयी हो?"
पत्नी ने मेरी तरफ़ देखा और कहा :
"ये पहली बार है"
और बस उसके बाद से हमारी ज़िंदगी सुख और
शांति से चल रही है |||

-व्हाट्एप से प्राप्त
............................

शनिवार, 23 जुलाई 2016

तोता बेहोश हो गया...



पिंजरे का तोता

एक समय की बात हैं, एक सेठ और सेठानी रोज सत्संग में जाते थे। सेठजी के एक घर एक पिंजरे में तोता पाला हुआ था। तोता रोज सेठ-सेठानी को बाहर जाते देख एक दिन पूछता हैं कि सेठजी आप रोज कहाँ जाते है। सेठजी बोले कि भाई सत्संग में ज्ञान सुनने जाते है। तोता कहता है सेठजी फिर तो कोई ज्ञान की बात मुझे भी बताओ। तब सेठजी कहते हैं की ज्ञान भी कोई घर बैठे मिलता हैं। इसके लिए तो सत्संग में जाना पड़ता हैं। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी आप मेरा एक काम करना। सत्संग जाओ तब संत महात्मा से एक बात पूछना कि में आजाद कब होऊंगा।

सेठजी सत्संग ख़त्म होने के बाद संत से पूछते है की महाराज हमारे घर जो तोता है उसने पूछा हैं की वो आजाद कब होगा? संत को ऐसा सुनते हीं पता नही क्या होता है जो वो बेहोश होकर गिर जाते है। सेठजी संत की हालत देख कर चुप-चाप वहाँ से निकल जाते है। 

घर आते ही तोता सेठजी से पूछता है कि सेठजी संत ने क्या कहा। सेठजी कहते है की तेरे किस्मत ही खराब है जो तेरी आजादी का पूछते ही वो बेहोश हो गए। तोता कहता है कोई बात नही सेठजी मैं सब समझ गया।

दूसरे दिन सेठजी सत्संग में जाने लगते है तब तोता पिंजरे में जानबूझ कर बेहोश होकर गिर जाता हैं। सेठजी उसे मरा हुआ मानकर जैसे हीं उसे पिंजरे से बाहर निकालते है तो वो उड़ जाता है। सत्संग जाते ही संत सेठजी को पूछते है की कल आप उस तोते के बारे में पूछ रहे थे ना अब वो कहाँ हैं। सेठजी कहते हैं, हाँ महाराज आज सुबह-सुबह वो जानबूझ कर बेहोश हो गया मैंने देखा की वो मर गया है इसलिये मैंने उसे जैसे ही बाहर निकाला तो वो उड़ गया।

तब संत ने सेठजी से कहा की देखो तुम इतने समय से सत्संग सुनकर भी आज तक सांसारिक मोह-माया के पिंजरे में फंसे हुए हो और उस तोते को देखो बिना सत्संग में आये मेरा एक इशारा समझ कर आजाद हो गया।

जो मनुष्य संसार के विषयों से उपराम होकर मृतक समान अनभिज्ञ और निष्काम ,निरभिमान हो जाता है वो सदा के लिए जन्म मरण के बन्धन से छूटकर अमर जीवन प्राप्त कर लेता है

रविवार, 19 जून 2016

संतोषी सदा सुखी..


एक व्यक्ति एक दिन बिना बताए काम पर नहीं गया.....
मालिक ने,सोचा इस कि तनख्वाह बढ़ा दी जाये तो यह
और दिलचस्पी से काम करेगा.....और उसकी तनख्वाह बढ़ा दी....
अगली बार जब उसको तनख्वाह से ज़्यादा पैसे दिये
तो वह कुछ नही बोला चुपचाप पैसे रख लिये.....
कुछ महीनों बाद वह फिर ग़ैर हाज़िर हो गया......मालिक को बहुत ग़ुस्सा आया.....सोचा इसकी तनख्वाह बढ़ाने का क्या फायदा हुआ

यह नहीं सुधरेगा और उस ने बढ़ी हुई

तनख्वाह कम कर दी और इस बार उसको पहले वाली ही
तनख्वाह दी......वह इस बार भी चुपचाप ही रहा और
ज़बान से कुछ ना बोला.... तब मालिक को बड़ा ताज्जुब हुआ....

उसने उससे पूछा कि जब मैने तुम्हारे ग़ैरहाज़िर होने के बाद तुम्हारी तनख्वाह बढा कर दी तुम कुछ नही बोले और आज तुम्हारी ग़ैर हाज़री पर तनख्वाह कम कर के दी फिर भी खामोश ही रहे.....!!

इस की क्या वजह है..? उसने जवाब दिया....जब मै पहले
ग़ैर हाज़िर हुआ था तो मेरे घर एक बच्चा पैदा हुआ था....!!
आपने मेरी तनख्वाह बढ़ा कर दी तो मै समझ गया.....
परमात्मा ने उस बच्चे के पोषण का हिस्सा भेज दिया है......
और जब दोबारा मै ग़ैर हाजिर हुआ तो मेरी माता जी
का निधन हो गया था...जब आप ने मेरी तनख्वाह कम
दी तो मैने यह मान लिया की मेरी माँ अपने हिस्से का
अपने साथ ले गयीं.....फिर मै इस तनख्वाह की ख़ातिर क्यों परेशान होऊँ
जिस का ज़िम्मा ख़ुद परमात्मा ने ले रखा है......!!


: एक खूबसूरत सोच :
अगर कोई पूछे जिंदगी में क्या खोया और क्या पाया,
तो बेशक कहना, जो कुछ खोया वो मेरी नादानी थी और जो भी पाया वो प्रभु की मेहरबानी थी, खूबसूरत रिश्ता है मेरा और भगवान के बीच में, ज्यादा मैं मांगता. नहीं और कम वो देता नहीं.. 
......संकलन से

बुधवार, 25 मई 2016

नेता की कूटनीति


● हिंसा के बीज 

● कस्बे में एक महात्मा थे। सत्संग करते और लोगों को धैर्य, अहिंसा, सहनशीलता, सन्तोष आदि के सदुपदेश देते। उनके पास सत्संग मे बहुत बड़ी संख्या में भक्त आने लगे। एक बार भक्तों ने कहा महात्मा जी आप कस्बे में अस्पताल, स्कूल आदि भी बनवाने की प्रेरणा दीजिए। महात्मा जी ने ऐसा ही किया। भक्तों के अवदान और परिश्रम से योजनाएं भी बन गई। योजनाओं में सुविधा के लिए भक्तों नें, कस्बे के नेता को सत्संग में बुलाने का निर्णय किया।

● नेताजी सत्संग में पधारे और जनसुविधा के कार्यों की जी भरकर सराहना की और दानदाताओं की प्रशंसा भी। किन्तु महात्मा जी की विशाल जनप्रियता देखकर, अन्दर ही अन्दर जल-भुन गए। महात्मा जी के संतोष और सहनशीलता के उपदेशों के कारण कस्बे में समस्याएं भी बहुत कम थी। परिणाम स्वरूप नेता जी के पास भीड कम ही लगती थी।

● घर आकर नेताजी सोच में डूब गए। इतनी अधिक जनप्रियता मुझे कभी भी प्राप्त नहीं होगी, अगर यह महात्मा अहिंसा आदि सदाचारों का प्रसार करता रहा। महात्मा की कीर्ति भी इतनी सुदृढ थी कि उसे बदनाम भी नहीं किया जा सकता था। नेता जी अपने भविष्य को लेकर चिंतित थे।आचानक उसके दिमाग में एक जोरदार विचार कौंधा और निश्चिंत होकर आराम से सो गए।

● प्रातः काल ही नेता जी पहुँच गए महात्मा जी के पास। थोडी ज्ञान ध्यान की बात करके नेताजी नें महात्मा जी से कहा आप एक रिवाल्वर का लायसंस ले लीजिए। एक हथियार आपके पास हमेशा रहना चाहिए। इतनी पब्लिक आती है पता नहीं कौन आपका शत्रु हो? आत्मरक्षा के लिए हथियार का पास होना बेहद जरूरी है।

● महात्मा जी नें कहा, “बंधु! मेरा कौन शत्रु? शान्ति और सदाचार की शिक्षा देते हुए भला मेरा कौन अहित करना चाहेगा। मै स्वयं अहिंसा का उपदेश देता हूँ और अहिंसा में मानता भी हूँ।” नेता जी नें कहा, “इसमें कहाँ आपको कोई हिंसा करनी है। इसे तो आत्मरक्षा के लिए अपने पास रखना भर है। हथियार पास हो तो शत्रु को भय रहता है, यह तो केवल सावधानी भर है।” नेताजी ने छूटते ही कहा, “महात्मा जी, मैं आपकी अब एक नहीं सुनूंगा। आपको भले आपकी जान प्यारी न हो, हमें तो है। कल ही मैं आपको लायसेंस शुदा हथियार भेंट करता हूँ।”

● दूसरे ही दिन महात्मा जी के लिए चमकदार हथियार आ गया। महात्मा जी भी अब उसे सदैव अपने पास रखने लगे। सत्संग सभा में भी वह हथियार, महात्मा जी के दायी तरफ रखे ग्रंथ पर शान से सजा रहता। किन्तु अब पता नहीं, महाराज जब भी अहिंसा पर प्रवचन देते, शब्द तो वही थे किन्तु श्रोताओं पर प्रभाव नहीं छोडते थे। वे सदाचार पर चर्चा करते किन्तु लोग आपसी बातचीत में ही रत रहते। दिन प्रतिदिन श्रोता कम होने लगे।

● एक दिन तांत्रिकों का सताया, एक विक्षिप्त सा युवक सभा में हो-हल्ला करने लगा। महाराज नें उसे शान्त रहने के लिए कहा। किन्तु टोकने पर उस युवक का आवेश और भी बढ़ गया और वह चीखा, “चुप तो तू रह पाखण्डी” इतना सुनना था कि महात्मा जी घोर अपमान से क्षुब्ध हो उठे। तत्क्षण क्रोधावेश में निकट रखा हथियार उठाया और हवाई फायर कर दिया। लोगों की जान हलक में अटक कर रह गई।

● उसके बाद कस्बे में महात्मा जी का सत्संग वीरान हो गया और नेताजी की जनप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ने लगी।....

-संकलित

रविवार, 22 मई 2016

बोध कथा..हंस और हंसिनी



एक बार एक हंस और हंसिनी हरिद्वार के सुरम्य वातावरण से भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में आ गये!

हंसिनी ने हंस को कहा कि ये किस उजड़े इलाके में आ गये हैं ?? 

यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठंडी हवाएं हैं यहाँ तो हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा !

भटकते भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा कि किसी तरह आज की रात बीता लो, सुबह हम लोग हरिद्वार लौट चलेंगे !

रात हुई तो जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा था।

वह जोर से चिल्लाने लगा।

हंसिनी ने हंस से कहा- अरे यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते।

ये उल्लू चिल्ला रहा है। 

हंस ने फिर हंसिनी को समझाया कि किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यूँ है ??

ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वो तो वीरान और उजड़ा रहेगा ही।

पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था।

सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा कि हंस भाई, मेरी वजह से आपको रात में तकलीफ हुई, मुझे माफ़ करदो।

हंस ने कहा- कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद! 

यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा 

पीछे से उल्लू चिल्लाया, अरे हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहे हो।

हंस चौंका- उसने कहा, आपकी पत्नी ??

अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है,मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है!

उल्लू ने कहा- खामोश रहो, ये मेरी पत्नी है।

दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये। 

कई गावों की जनता बैठी। पंचायत बुलाई गयी। 

पंचलोग भी आ गये!

बोले- भाई किस बात का विवाद है ??

लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है!

लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और कहा कि भाई बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जायेंगे।

हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। 

इसलिए फैसला उल्लू के ही हक़ में ही सुनाना चाहिए! 

फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाया और कहा कि सारे तथ्यों और सबूतों की जांच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुंची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है!

यह सुनते ही हंस हैरान हो गया और रोने, चीखने और चिल्लाने लगा कि पंचायत ने गलत फैसला सुनाया। 

उल्लू ने मेरी पत्नी ले ली!

रोते- चीखते जब वह आगे बढ़ने लगा तो उल्लू ने आवाज लगाई - ऐ मित्र हंस, रुको!

हंस ने रोते हुए कहा कि भैया, अब क्या करोगे ?? 

पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब जान भी लोगे ?

उल्लू ने कहा- नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी! 

लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है! 

मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है।

यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक़ में फैसला सुनाते हैं!





शायद 65 साल की आजादी के बाद भी हमारे देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि हमने उम्मीदवार की योग्यता न देखते हुए, हमेशा ये हमारी जाति का है. ये हमारी पार्टी का है के आधार पर अपना फैसला उल्लुओं के ही पक्ष में सुनाया है, देश क़ी बदहाली और दुर्दशा के लिए कहीं न कहीं हम भी जिम्मेदार हैँ!